राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव को भांपकर अपनी रणनीति ढाल लेना ही किसी राजनेता की सबसे बड़ी ताकत होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार अपनी ऊर्जावान सक्रियता और अप्रत्याशित पहलकदमी से चौंकाते हैं। वडोदरा में ‘जेन-जी’ के छह हजार युवाओं के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी महज एक सरकारी या औपचारिक संवाद नहीं थी, बल्कि यह बदलते भारत की नब्ज पर हाथ रखने की एक सोची-समझी राजनीतिक और विकासात्मक कवायद थी। मंच पर क्वीन का कालजयी गीत ‘वी विल रॉक यू’ और ‘आरी आरी’ की गूंज के बीच वाई-आकार के रैंप पर चलकर युवाओं के करीब पहुंचना यह साबित करता है कि वे आज की युवा संस्कृति और उनके तेवर को बखूबी समझते हैं।
इससे पहले युवाओं से जुड़ने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर वहीं से शुरुआत की है, जहाँ से 2014 में की थी। प्रधानमंत्री मोदी 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में शामिल होने पहुँचे और वहाँ की नयी पीढ़ी को याद दिलाया कि प्रधानमंत्री बनने से पहले 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर यहाँ आए थे। उस समय उन्होंने जो भाषण दिया था, उसके कारण युवाओं के बीच वे काफी लोकप्रिय हुए। युवा पीढ़ी के साथ उसी जुड़ाव को ताजा करने के लिए प्रधानमंत्री 13 साल बाद श्रीराम कॉलेज पहुँचे थे। याद रखना होगा कि 2014 में नरेंद्र मोदी को पहली बार केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने में पहली बार वोट डालने वाले युवाओं की निर्णायक भूमिका थी। आज एक दशक से अधिक समय बाद भारत में एक पूरी पीढ़ी बदल चुकी है। यह वह ‘जेन-जी’ पीढ़ी है जो डिजिटल युग में सांस लेती है, जिसका सोचने का नजरिया पूरी तरह बदला हुआ है।
देश में 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 22.78 प्रतिशत है, यानी हर चौथा वोटर युवा है। आगामी विधानसभा चुनावों, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां 2.8 करोड़ युवा मतदाता हैं, यह वर्ग चुनावी नतीजों का रुख मोड़ने की ताकत रखता है। जंतर-मंतर पर हुए हालिया विरोध-प्रदर्शनों के बाद युवा विमर्श को साधने की जो चुनौती उभरी, उसे प्रधानमंत्री ने सीधे अपने हाथ में लिया है। संवाद के दौरान प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी और कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ जैसे अभियानों पर सीधा वार करते हुए युवाओं को ‘झूठ की गूंज’ से सावधान रहने की जो नसीहत दी, वह विपक्षी नैरेटिव की काट पेश करती है। अपने चिरपरिचित अंदाज में विकास योजनाओं के विरोधियों पर ‘नाराज फूफाजी’ वाला तंज कसते हुए उन्होंने डेडिकेटेड फ्रंट कॉरिडोर की रफ्तार और आर्थिक प्रभाव को युवाओं की भाषा में समझाया। यह बताना कि 2014 से पहले फाइलों में अटका प्रोजेक्ट अब 2,000 किलोमीटर का नेटवर्क बन चुका है और यात्रा समय 30 घंटे से घटकर 10 घंटे रह गया है, आंकड़ेबाज़ी नहीं बल्कि परिणाम-आधारित राजनीति का प्रमाण है। साथ ही, केवल डिग्री के बजाय स्किल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सुपरपावर बनने के लिए जरूरी इकोसिस्टम पर बात करना सीधे युवाओं के भविष्य से जुड़ता है।
यह समय भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं के लिए भी आत्ममंथन का है। जहां कांग्रेस ‘आस्क मी एनीथिंग’ और कैंपस कार्यक्रमों के जरिए जमीन तलाश रही है, वहीं भाजपा का संगठन भी शॉर्ट वीडियो और रील्स के दौर में युवाओं तक पहुंचने की जद्दोजहद में है। लेकिन तकनीक से ज्यादा जरूरी है वह जीवंतता और दृष्टि, जो प्रधानमंत्री मोदी के संवाद में नजर आती है। पार्टी के अन्य नेताओं को भी सिर्फ पारंपरिक रैलियों के भरोसे रहने के बजाय प्रधानमंत्री की तरह युवा वर्ग की प्राथमिकताओं, उनकी आकांक्षाओं और उनकी भाषा को समझकर सीधे मैदान में उतरने की सक्रियता दिखानी होगी।


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