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सोमवार, 30 जनवरी 2017

इतिहास को विकृत करने की जिद

 भारतीय  फिल्म उद्योग में जब भी किसी ऐतिहासिक घटना या व्यक्तित्व पर फिल्म बनाने का विचार प्रारंभ होता है, तब उसके साथ विवाद भी उत्पन्न हो जाते हैं। दरअसल, हमारे निर्देशकों में एक बड़ी बीमारी है कि वह इतिहास को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत न करके अपने ढंग से छेड़छाड़ करके प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। जहाँ मान्य सत्य के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास किया जाता है, वहीं विवाद खड़ा होता है। निर्देशक अपने चश्मे से इतिहास को देखने और दिखाने की जिद में समाज को आहत करने की गलती कर बैठते हैं। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक-निर्माता संजय लीला भंसाली को थप्पड़ मारने की घटना इसी आहत समाज के आक्रोश का प्रकटीकरण है। करणी सेना के लोगों ने जयपुर में 'पद्मावती' फिल्म के शूटिंग स्थल पर पहुंच कर विरोध किया और भंसाली को थप्पड़ मार दिया। करणी सेना के इस कृत्य की निंदा की जानी चाहिए। लेकिन, जितनी निंदा करणी सेना की करना जरूरी है, उससे कहीं अधिक निंदा और आलोचना संजय लीला भंसाली की भी करना  आवश्यक है।

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

पाकिस्तानी कलाकारों से इतना प्रेम क्यों?

 आतंकवादी  हमलों से आहत भारत के नागरिक चाहते हैं कि पाकिस्तान का समूचा बहिष्कार किया जाए। इस सिलसिले में बॉलीवुड से पाकिस्तानी कलाकारों को बाहर करने और उन्हें काम नहीं देने की माँग जोर पकड़ रही है। यह माँग स्वाभाविक है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन, बॉलीवुड से लेकर अन्य कला और तथाकथित बौद्धिक जगत इस विषय पर भी दो हिस्सों में बँटा नजर आ रहा है। देश का सामान्य आदमी समझ नहीं पा रहा है कि आखिर पाकिस्तानी कलाकारों से इतना प्रेम क्यों है? पाकिस्तानी कलाकारों का समर्थन क्या देशहित से बढ़कर है? पाकिस्तानी कलाकार बॉलीवुड में काम नहीं करेंगे, तब क्या बॉलीवुड ठप हो जाएगा? इन सवालों के जवाब कोई नहीं दे रहा। हद है कि कुछेक लोग पाकिस्तानी कलाकारों को देश से ऊपर रखने का प्रयास कर रहे हैं। उनके लिए कलाकार किसी भी प्रकार की सीमा से ऊपर हैं। वह पूछ रहे हैं कि क्या पाकिस्तानी कलाकारों को भगा देने से आतंकवाद समाप्त हो जाएगा? नहीं होगा, आतंकवाद समाप्त। लेकिन, क्या आप भरोसा दिलाते हैं कि पाकिस्तानी कलाकारों को काम देने आतंकवाद समाप्त हो जाएगा? भारत में आप अभिव्यक्ति की आजादी का बेजा इस्तेमाल करते हैं, इसलिए आप खुद को खुदा समझते हो। यदि वाकई कलाकार संवेदनशील हैं और उनके लिए देश की सीमाएँ कोई मायने नहीं रखती, तब क्या पाकिस्तानी कलाकार बेकसूर लोगों का खून बहाने वाले आतंकवादियों का विरोध कर सकते हैं? पाकिस्तानी कलाकारों के समर्थक क्या इतना भर करा सकते हैं कि कोई फवाद खान पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ बयान जारी कर दे? यह संभव नहीं है। इसलिए पाकिस्तानी कलाकारों के लिए विधवा विलाप बेमानी है।

रविवार, 16 सितंबर 2012

ज्ञान है तो जहान हैं

 कौ न बनेगा करोड़पति का छठवां सीजन शुरू हो गया है। तीसरे ही एपिसोड में जम्मू कश्मीर के मनोज कुमार करोड़पति भी बन गए हैं। अमिताभ बच्चन ने केबीसी को और केबीसी ने अमिताभ बच्चन को, दोनों ने एक-दूसरे को नई ऊंचाई पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस बार केबीसी की टैग लाइन लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है। साथ ही एक सकारात्मक संदेश भी दे रही है। 'आपका ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है' वाकई हॉट सीट पर बैठे व्यक्ति को तो उसका ज्ञान ही रुपया जितवा सकता है। हमारे बड़े-बुजुर्ग भी कहते हैं- 'पढ़-लिख लो बेटा ज्ञान ही तुम्हारे काम आएगा। जमीन, मकान और दुकान सब बंट जाएगा लेकिन बुद्धि का बंटबारा नहीं होता। वह निजी संपत्ति है। सब कुछ छीना जा सकता है, लूटा जा सकता है, हड़पा जा सकता है लेकिन बुद्धि नहीं। बुद्धि के बल पर फिर से सब हासिल किया जा सकता है। ज्ञान है तो जहान है यानी ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है।' हालांकि यह एक अलग बात है कि केबीसी में हॉट सीट तक पहुंचने के लिए कहीं न कहीं किस्मत कनेक्शन की जरूरत होती है। अब मुझे ही लीजिए इस सीजन में मैंने करीब ५०० रुपए के मैसेज भेजे और हां सभी सही जवाब। लेकिन, हॉट सीट तक पहुंचना तो दूर एक बार पलट कर फोन भी नहीं आया। खैर, छोडि़ए अपनी बात में क्या रखा, कुछ बच्चन साहब की बात की जाए और कुछ केबीसी की।
    'आपका ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है' टैग लाइन का विचार कहां से आया? इस सवाल का जवाब है - सुशील कुमार। याद आया बिहार, मोतीहारी के सुशील कुमार, जिन्होंने पिछले सीजन में पांच करोड़ रुपए की रकम जीती थी। केबीसी के अब तक के इतिहास में इतनी बड़ी रकम कोई नहीं जीत सका। लेकिन, मोतीहारी के एक साधारण शिक्षक ने अपने ज्ञान के बूते पर यह कामयाबी हासिल करके दिखाई। अमिताभ बच्चन मीडिया को बताते हैं कि सुशील कुमार के उदाहरण से ही शो को थीम मिली। यह शो महज एक गेम शो नहीं है बल्कि इसके माध्यम से कहीं न कहीं अमिताभ या कहें शो निर्माता कंपनी सामाजिक मुद्दे भी उठाने की कोशिश करते हैं। बहरहाल, केबीसी-६ के अलग-अलग विज्ञापन कई संदेश देते दिखे। बेटा-बेटी में अंतर न किया जाए। खासकर सबको पढऩे के समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं। समाज में अकसर देखने को मिलता है कि लोग सोचते हैं बेटी को पढ़ाने से पैसा जाया हो रहा है क्योंकि कल तो यह ससुराल चली जाएगी। स्त्री इस देश की आधी शक्ति है, उसे उसका अधिकार मिलना ही चाहिए। एक और महत्वपूर्ण विज्ञापन है जो हिन्दी के महत्व को उजागर करता है। विज्ञापन साफ संदेश देता है कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होना ही श्रेष्ठता की पहचान नहीं है। एक भारतीय हिन्दी में कहीं अधिक सहजता से ज्ञार्नाजन करता है। ज्ञान किसी भाषा के बंधन में नहीं बंधा। शिक्षा की राष्ट्रीय परिचर्या-२००५ की रूपरेखा में भी इस बात को स्वीकारा गया है कि अपनी भाषा में इंसान बेहतर सीख सकता है। इसलिए हिन्दी को हीनभावना से देखने वाले निरे मूर्ख हैं। हिन्दुस्तान की बिन्दी है हिन्दी। इस बिन्दी पर हमें नाज होना चाहिए। भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां विदेशी भाषा को देशी भाषा से अधिक मान सरकारी स्तर पर दिया गया है। अध्ययन-अध्यापन, व्यापार, संवाद और लेखन अंग्रेजी में होता है। जबकि चीन, जापान, इजराइल और ब्रिटेन सहित दुनियाभर के तमाम देशों में वहीं की मूल भाषा में शिक्षा, संवाद से लेकर व्यापार तक होता है। कई बार देशभर में अमिताभ बच्चन की आलोचना होती है कि बच्चन ने देश और समाज को क्या दिया है? बाकी तो मुझे ज्ञात नहीं लेकिन बच्चन ने हिन्दी की बड़ी सेवा की है। शायद ही कोई बॉलीवुड सितारा होगा जो पर्दे के बाहर शुद्ध हिन्दी में बात करता हो। केबीसी के जितने भी सीजन बच्चन ने होस्ट किए हैं सबमें उनकी हिन्दी ने लोगों को खासा आकर्षित किया है।
     हिन्दी सिनेमा की १५० से अधिक फिल्मों अभिनय कर चुके अमिताभ बच्चन ११ अक्टूबर को ७० वर्ष को हो जाएंगे। इसके अगले दिन ही केबीसी-६ का १६वां एपिसोड होगा। निश्चित ही यह एपिसोड खास होगा। अमिताभ बच्चन को इस सदी का महानायक कहा जाता है। उनके होनेभर से केबीसी सफलता के शिखर चूम लेता है। केबीसी और बिग बी एक-दूसरे के पर्याय हो गए हैं। अमिताभ केबीसी को होस्ट करने के लिए काफी मेहनत भी करते हैं। केबीसी ही है जिसने लगभग कंगाल हो चुके अमिताभ बच्चन को भी करोड़पति बनाया बल्कि बच्चन की एक नई पारी को शुरुआत दी। और वह अमिताभ बच्चन ही हैं जो केबीसी की सफलता की अनिवार्य शर्त हैं। सभी जानते हैं एक बार शाहरूख खान भी गेम शो होस्ट कर चुके हैं जो बुरी तरह फ्लोप हुआ था। उम्मीद है कि कौन बनेगा करोड़पति-६ सफलता के नए प्रतिमान स्थापित करेगा। हॉट सीट तक पहुंचने वाले के ज्ञान का हक अदा करेगा।

रविवार, 24 जून 2012

लायक से नालायक तक का सफर

 भा रतीय हिन्दी सिनेमा यानी बॉलीवुड को १००वां साल लग गया है। पता नहीं यह बॉलीवुड का शैशव काल ही चल रहा है या फिर वो जवानी की दहलीज पर है, यह भी संभव है कि वह सठियाने के दौर में हो। खैर जो भी हो, इन ९९ सालों में भारतीय सिनेमा में कई बदलाव देखे गए। कई मौके ऐसे आए जब बॉलीवुड के कारनामे से हमारा सीना चौड़ा हो गया। कई बार बॉलीवुड ने लज्जित भी खूब कराया। शुरुआती दौर में भारतीय सिनेमा लायक बना रहा। समाज को शिक्षित करता रहा। देश-दुनिया को भारतीय चिंतन, पंरपरा और इतिहास से परिचित कराता रहा। लेकिन, नई शताब्दी के पहले दशक की शुरुआत से ही इसके कदम बहकने लगे। धीरे-धीरे यह नालायक हो गया। फिलवक्त इस नालायक बॉलीवुड की रील बेहद डर्टी है।
      यह तो सभी जानते हैं कि भारत में सिनेमा की शुरुआत दादा साहब फाल्के ने की। दादा साहब फाल्के का सही नाम धुन्दीराज गोविंद फाल्के था। १९११ में उन्होंने ईसा मसीह के जीवन पर बनी फिल्म देखी। इसके बाद उनके मन में विचारों का ज्वार उमडऩे लगा। भारत के महापुरुषों और इतिहास को आधार बनाकर फिल्म बनाने के विचार दादा साहब के मन में आने लगे। जब विचारों ने मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया तो उन्होंने फिल्म बनाने का संकल्प लिया। फिल्म निर्माण की कला सीखने के लिए वे लंदन पहुंच गए। लंदन में दो साल रहकर उन्होंने सिनेमा निर्माण की तकनीकी सीखी। वहां से कुछ जरूरी उपकरण लेकर वे भारत वापस आए। काफी मेहनत-मशक्कत के बाद उन्होंने भारतीय जन-जन में रचे-बसे चरित्र राजा हरिशचन्द्र पर फिल्म बनाई। ३ मई १९१३ को भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म प्रदर्शित हुई। यह मूक फिल्म थी। दादा साहब को उनके साथियों ने खूब कहा कि फिल्म का आइडिया बकवास है, तुम्हारी फिल्म कोई देखने नहीं आएगा, भारत की जनता को फिल्म देखने का सऊर नहीं। लेकिन, 'राजा हरिशचन्द्र' की लोकप्रियता ने सारे कयासों को धूमिल कर दिया। इस तरह भारत में दुनिया के विशालतम फिल्म उद्योग बॉलीवुड की नींव पड़ी।
    यहां गौर करने लायक बात है कि दादा साहब जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति ने एक सुने-सुनाए, जन-जन में रचे-बसे चरित्र पर फिल्म क्यों बनाई? संभवत: उन्हें सिनेमा के प्रभाव का ठीक-ठीक आकलन था। सिनेमा लोगों के अंतर्मन को प्रभावित करता है। उनके जीवन में बदलाव लाने का सशक्त माध्यम है। इसके अलावा उनके मन में सिनेमा से रुपयों का ढेर लगाने खयाल नहीं था। ईसा मसीह के जीवन पर बनी फिल्म को देखकर उनके मन में पहला विचार यही कौंधा कि भारत के महापुरुषों पर भी फिल्म बननी चाहिए। ताकि लोग उनके जीवन से प्रेरणा लेकर स्वस्थ्य समाज का निर्माण कर सकें। हरिशचन्द्र सत्य की मूर्ति हैं। सत्य मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी, उपलब्धी और सर्वोत्तम गुण है। 'राजा हरिशचन्द्र' के बाद भी लंबे समय तक भारत में बनाई जाने वाली फिल्में संस्कार और शिक्षाप्रद थीं। १४ मार्च १९३१ को प्रदर्शित पहली बोलती फिल्म आलमआरा और १९३७ में प्रदर्शित पहली रंगीन फिल्म किसान कन्या की कहानी साहित्य से उठाई गई थी। भारतीय सिनेमा लंबे समय तक सीधे तौर पर भारतीय साहित्य से जुड़ा रहा। बंकिमचन्द्र और प्रेमचंद की कृतियों पर सिनेमा रचा गया, जिसने समाज को दिशा दी। रचनात्मक सिनेमा गढऩे के लिए गुरुदत्त, हिमांशु रॉय, सत्यजीत रे, वी. शांताराम, विमल रॉय, राजकपूर, नितिन बॉस, श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों को हमेशा याद किया जाएगा। लेकिन, २१ वीं सदी की शुरुआत से ही बॉलीवुड के रंग-ढंग बदलने लगे। महेश भट्ट जैसे तमाम भटके हुए निर्देशकों ने भारतीय सिनेमा की धुरी साहित्य और संस्कृति से हटाकर नग्नता पर टिका दी। मनुष्य के दिमाग को शिक्षा देने वाले साधन को दिमाग में गंदगी भरने वाला साधन बना दिया। 'आज बन रहीं फिल्में परिवार के साथ बैठकर देखने लायक नहीं है' यह वाक्य बॉलीवुड के लिए आज हर कोई कहता है। इसके बावजूद भट्ट सरीखे निर्देशक कहते हैं कि हम वही बना रहे हैं जो समाज देखना चाहता है। अब ये किस समाज से पूछकर सिनेमा बनाते हैं यह तो पता नहीं। लेकिन, मेरे आसपास और दूर तक बसा समाज तो इस तरह की फिल्म देखना कतई पसंद नहीं करता। खासकर अपने माता-पिता, भाई-बहन और बच्चों के साथ तो नहीं ही देखता। ऐसी फिल्में समाज देखना नहीं चाहता इसका ताजा उदाहरण है- टेलीविजन पर डर्टी फिक्चर के प्रसारण का विरोध। यहां इस बात को भी समझिए कि समाज घर में तो ऐसी फिल्म नहीं देखना चाहता लेकिन घर के बाहर उसे परहेज नहीं है। इसी डर्टी फिक्चर की कमाई यह सच बताती है। लेकिन, इस सब में एक बात साफ है कि डर्टी टाइप की फिल्में समाज हित में नहीं हैं। डेल्ही बेल्ही, लव सेक्स और धोखा, ब्लड मनी, मर्डर, हेट स्टोरी, जिस्म और आने वाली फिल्म जिस्म-२ (इसमें पॉर्न एक्ट्रेस नायिका है) जैसी फिल्में समाज में क्या प्रभाव छोड़ रहीं हैं कहने की जरूरत नहीं है। इनके प्रभाव से निर्मित हो रहा समाज भारत के लोगों की चिंता जरूर बढ़ा रहा है लेकिन वे भी हाथ और मुंह बंद किए बैठे हैं। भारतीय सिनेमा के पिछले पांच-छह सालों को देखकर इसका आने वाला भविष्य उज्वल नहीं दिखता। आज बॉलीवुड १००वें साल में प्रवेश कर रहा है, इसकी और समाज की बेहतरी के लिए निर्माताओं, निर्देशकों और दर्शकों को विचार करना होगा। निर्माता-निर्देशकों को विचार करना होगा क्या कैमरे को नंगई के अलावा कहीं और फोकस नहीं किया जा सकता? दर्शकों को विचार करना होगा कि जिस सिनेमा को हम अपने परिवार के साथ नहीं देख सकते या जिसे हम अपने बच्चों को नहीं दिखा सकते, उसका बहिष्कार क्यों न किया जाए?
आधी हकीकत, आधा फ़साना :  डेली न्यूज़ के एफएम में प्रकाशित लीड आर्टिकल.