लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार चर्चा के बीच आखिरकार परीक्षा सुधार का विधेयक ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो गया। देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य को देखते हुए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा था। उम्मीद यह थी कि जब प्रश्न पत्र लीक जैसे गंभीर विषय पर संसद में बहस होगी, तो देश को एक ठोस और सर्वसम्मति वाला समाधान देखने को मिलेगा। लेकिन संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला, वह बेहद निराशाजनक रहा। जो विपक्ष कल तक पर्चा लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हो-हल्ला मचा रहा था, जब विधेयक पर रचनात्मक चर्चा और सुझाव देने का सही समय आया, तब वह पूरी तरह दिशाहीन नजर आया। बहस का रुख परीक्षा प्रणाली के तकनीकी एवं प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित रहने के बजाय ऐसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया, जिनका आम छात्रों की समस्याओं और उनके भविष्य से कोई दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास यह एक बड़ा अवसर था कि वह परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लीक-मुक्त बनाने के लिए अपने ठोस और व्यावहारिक सुझाव पटल पर रखती। इससे देश की जनता और युवाओं के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष के पास महज विरोध करने के बजाय समस्याओं का समाधान करने का एक स्पष्ट एजेंडा भी है। परंतु इस रचनात्मक भूमिका को निभाने के स्थान पर बहस को धार्मिक प्रतीकों, गोमूत्र और मनुस्मृति जैसे विषयों पर लाकर खड़ा कर दिया गया।
संसद जैसे गरिमामय मंच पर नीतिगत सुधारों को पीछे छोड़कर ऐसी टिप्पणियां करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए रणनीतिक और वैचारिक दृष्टि से चिंतन का विषय होना चाहिए। विपक्ष के रवैये को देखकर यह भी प्रश्न जनता के मन में आए हैं कि गोमूत्र और मनुस्मृति पर सवाल उठाने वाले विपक्षी दलों के नेता क्या कभी इसी तरह कुरान, बाइबिल, खतना, हलाला और बपतिस्मा पर सवाल उठाएंगे? इसका उत्तर है- नहीं। क्योंकि उनके निशाने पर हिन्दू धर्म, उनकी मान्यताएं एवं परंपराएं हैं। मनुस्मृति के संबंध में मिथ्या बातें कह रहे नेताओं से जब कहा गया कि वे जो कह रहे हैं, उसे प्रमाणित करें, तब उनके पास कोई प्रमाण नहीं था। वहीं, भाजपा के सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने प्रमाण सहित बताया कि मनुस्मृति में ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है, जो यहाँ संसद में कहा जा रहा है। वास्तव में मनुस्मृति का उल्लेख करके हिन्दू समाज में आपस में द्वेष बढ़ाने के प्रयास किए जाते हैं। देश की जनता हैरान है कि छात्रों के हितों की जगह विपक्षी नेता गोमूत्र और मनुस्मृति पर चर्चा क्यों कर रहे हैं?
संसद परिसर में शुक्रवार को जिस तरह श्रीराम मंदिर के दानपात्रों से चोरी के प्रकरण पर नौटंकी की गई, उससे संपूर्ण हिन्दू समाज और संत-महात्माओं में विपक्षी दलों के प्रति गहरी नाराजगी घर कर गई है। श्रीराम मंदिर के दानपात्रों से चोरी होना, सबके लिए दु:खद और हतप्रभ करने वाली घटना थी। इस घटना को वहाँ काम करने वाले कुछ कर्मचारियों ने अंजाम दिया। परंतु विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में नौटंकी करके पुजारियों एवं संत-महात्माओं को चोर के रूप में दिखाकर घोर अपराध किया है। इस घटिया प्रदर्शन को लेकर हिन्दुओं के साथ-साथ साधु-संतों में आक्रोश देखा जा रहा है। इसकी सहज कल्पना की जा सकती है कि भविष्य में इसका बड़ा नुकसान विपक्षी दलों को उठाना पड़ सकता है। जनता के बीच फिर वही प्रश्न है कि इससे पहले कब किसी राजनीतिक दल या सांसदों ने अन्य धर्म-संप्रदायों पर इस तरह की नौटंकी की थी? अपितु, एक संप्रदाय विशेष से जुड़े आतंकियों के लिए आँसू अवश्य बहाए गए।
बहरहाल, लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की घेराबंदी करना या हंगामा खड़ा करना नहीं होता, बल्कि एक मजबूत और जिम्मेदार विकल्प प्रस्तुत करना भी होता है। जब देश के युवा एक विश्वसनीय और मजबूत परीक्षा प्रणाली की उम्मीद लगाए बैठे थे, तब संसद का कीमती समय बुनियादी मुद्दों से भटक गया। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि अपने पारंपरिक वोटबैंक को साधने या वैचारिक बयानबाजी के चक्कर में जब-जब राष्ट्रीय महत्व के नीतिगत मुद्दे पीछे छूटते हैं, तब-तब लोकतंत्र और देश की युवा शक्ति का ही नुकसान होता है। यह भी याद रखें कि ऐसा करने से राजनीति दलों का भी नुकसान ही होता है।

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