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शनिवार, 16 जून 2012

उपनिषदगंगा : भारत में भारतीयता का प्रवाह

 भा रत के संदर्भ में देखा जाए तो सबसे अधिक सशक्त जनमाध्यम आज भी आकाशवाणी और दूरदर्शन ही है। दूरदर्शन का भौतिक विकास, पहुंच और तकनीकी तंत्र निजी चैनल्स के मुकाबले कहीं अधिक बेजोड़ है। भारत के सुदूर गांवों को तो छोड़ ही दीजिए महानगरों से कुछ दूर बसे गांवों में भी निजी चैनल्स की पहुंच नहीं है जबकि वहां धड़ल्ले से दूरदर्शन देखा जा रहा है। भारत आज भी गांवों में ही बसता है। देश में शहरी आबादी से कहीं अधिक ग्रामवासी हैं। स्पष्ट है, 'वास्तविक दर्शक संख्या' दूरदर्शन के मुकाबले किसी के पास नहीं। टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट) के नाम पर जो दर्शक संख्या प्रदर्शित की जाती है वह इने-गिने शहरों से प्राप्त आंकड़े हैं। यह भारत के टेलीविजन दर्शकों की वास्तविक संख्या नहीं है। यहां दूरदर्शन के सशक्त जनमाध्यम होने की चर्चा इसलिए की जा रही है क्योंकि हाल ही में दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल (डीडी-१) पर बहुचर्चित धारावाहिक 'उपनिषद गंगा' का प्रसारण शुरू हुआ है। ११ मार्च, २०१२ से प्रति रविवार सुबह १०:०० से १०:३० बजे तक यह प्रसारित हो रहा है। दरअसल, धारावाहिक उपनिषद गंगा भारतीय संस्कृति, परंपरा और चिंतन पर आधारित है। उपनिषद की विभिन्न कथाओं को लेकर डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने इसे बनाया है। इसके निर्माण में चिन्मय मिशन का अमूल्य योगदान है। डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी टेलीविजन जगत में 'चाणक्य' धारावाहिक से प्रसिद्ध हुए। ९० के दशक में चाणक्य भारतीय टेलीविजन का बेहद चर्चित और क्रांतिकारी धारावाहिक रहा है। आज भी इसकी उतनी ही मांग है। दूरदर्शन को नई ऊंचाईयां चाणक्य से मिलीं। डॉ. द्विवेदी मुंबई में उन विरले लोगों में से एक हैं जो भारतीय संस्कृति और साहित्य को लेकर काम कर रहे हैं। उन्होंने अमृता प्रीतम के उपन्यास 'पिंजर' पर इसी शीर्षक से फिल्म बनाई। इसे फिल्म समीक्षकों ने खूब सराहा। पिंजर के लिए डॉ. द्विवेदी को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। प्रसिद्ध उपन्यासकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' पर आधारित उनकी फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' तैयार है। फिलहाल तो डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी और दूरदर्शन का राष्ट्रीय चैनल डीडी-१ 'उपनिषद गंगा' को लेकर चर्चा में है। उपनिषद गंगा सभ्यता और संस्कृति के विकास की गाथा है। इसमें उपनिषद की कहानियों के साथ ही पुराण और इतिहास की कहानियों को भी सम्मिलित किया गया है। याज्ञवल्क्य-मैत्रैयी, नचिकेता, सत्यकामा-जाबाल, जनक, गार्गी, उद्दालक, श्वेतकेतु, अष्टावक्र, हरिशचंद्र, भृर्तहरि, जड़भरत, प्रह्लात, वाल्मीकि, भास्कराचार्य, वरहमिहिर, शंकराचार्य की कहानियां धारावाहिक में आधुनिक परिप्रेक्ष्य में दिखाई जाएंगी। इसमें चाणक्य, तुलसीदास, मीराबाई, पुंडलिक और दाराशिकोह तक की कहानियों को भी शामिल किया गया है।
      पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के कार्य में संलग्न संस्था 'स्पंदन' के कार्यक्रम में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी का भोपाल आना हुआ। इस दौरान सिनेमा, टेलीविजन और संस्कृति पर उनका व्याख्यान हुआ। उनसे एक सज्जन ने पूछा- आपने इतना बढिय़ा धारावाहिक बनाया है तो इसे किसी निजी चैनल पर प्रसारित क्यों नहीं करवाया? दूरदर्शन को आज कौन देखता है? इस पर डॉ. द्विवेदी ने बहुत ही गंभीर और सोचने को विवश करने वाला जवाब दिया। उन्होंने कहा- दूरदर्शन और निजी चैनल में रिमोट के एक बटन का ही तो फर्क है। इसके अलावा दूरदर्शन भारत का राष्ट्रीय चैनल है, इसकी पहुंच भी व्यापक है। स्पंदन के ही कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत में सिनेमा की शुरुआत सांस्कृतिक मूल्यों के साथ हुई। दादा साहेब फाल्के ने १९१३ में पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई। हालांकि आज मुंबई में साहित्य पर काम करने वाले लोग कम ही बचे हैं। दरअसल, पहले शिक्षा, प्रसार और प्रचार टेलीविजन के आधार थे लेकिन बाजारवाद ने सब कबाड़ा कर दिया है। आज टेलीविजन और सिनेमा से शिक्षा गायब है। वहीं, संस्कृति और साहित्य के लिए दूरदर्शन पर जितना गंभीर काम हो रहा है उतना कहीं और नहीं। यही कारण है कि हम टेलीविजन के सामने घंटेभर बैठे रहते हैं और लगातार चैनल बदलते रहते हैं, देखते कुछ नहीं।
    दूरदर्शन के प्रति डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के आग्रह को देखकर ही यह आलेख लिखने का संबल मुझे मिला। भारत में दूरदर्शन ५३ बरस का हो गया है। इस दौरान उसने तमाम अनुभव जुटाए। दूरदर्शन का काफी विकास और विस्तार हुआ। आज दूरदर्शन ३० चैनल का बड़ा परिवार है। १५ सितंबर, १९५९ को भारत में टेलीविजन की शुरुआत हुई थी। बाद में, निजी चैनल्स की बाढ़-सी आ गई। फिलवक्त देश में करीब ५०० निजी चैनल हैं। भारत में दूरदर्शन का स्वरूप कैसा हो? इस बात की चिंता के लिए समय-समय पर कमेटियां (चंदा कमेटी, बीजी वर्गीस कमेटी और पीसी जोशी कमेटी) बनी। पीसी जोशी कमेटी ने कहा था- टेलीविजन किसी भी देश का चेहरा होता है। अगर किसी देश का परिचय पाना है तो उसका टेलीविजन देखना चाहिए। वह राष्ट्र का व्यक्तित्व होता है। स्पष्ट है कि दूरदर्शन पर भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाले कार्यक्रम ही प्रसारित होना चाहिए, इस आशय की रिपोर्ट पीसी जोशी के नेतृत्व वाली कमेटी ने सरकार को सौंपी थी। संभवत: यही कारण रहा कि भारतीय संस्कृति, साहित्य और चिंतन को बचाए रखने, उसके संवर्धन और प्रोत्साहन में जो योगदान दूरदर्शन का है वह अन्य किसी का नहीं। निजी चैनल्स ने तो पैसा बनाया और इसके लिए संस्कृति को विद्रूप भी करना पड़ा तो किया, आज भी कर रहे हैं। भारत में जब निजी चैनल्स को प्रसारण के अधिकार मिले तो टेलीविजन और साहित्य से जुड़े लोगों को एक उम्मीद जगी थी, सोचा था प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इससे चैनल्स पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की गुणवत्ता में वृद्धि होगी। लेकिन, स्थिति विद्वानों की सोच के विपरीत है। आज देश में चैनल्स की भीड़ है। उनके बीच प्रतिस्पर्धा भी है लेकिन गुणवत्ता बढ़ाने की नहीं वरन गुणवत्ता गिराने की प्रतिस्पर्धा है।
    निजी चैनल्स पर प्रसारण के क्षेत्र में उतरे तो उनके पास दर्शकों का टोटा था। दूरदर्शन की दर्शक संख्या बेहद मजबूत थी। दूरदर्शन पर प्रसारित अर्थपूर्ण कार्यक्रमों ने दर्शकों को बांधे रखा था। ऐसे में निजी चैनल्स ने दूरदर्शन के दर्शकों को हड़पने के लिए बाकायदा षड्यंत्र रचा। उन्होंने हिटलर के मंत्री गोएबल्स के प्रोपेगण्डा सूत्र का उपयोग किया। 'दूरदर्शन घटिया है। दूरदर्शन पर प्रसारित सामग्री भी भला देखने वाली है क्या? दूरदर्शन आउटडेटेड हो गया है।' ऐसे झूठ निजी चैनल्स के गुटों ने जोर-जोर से चिल्लाकर और चालाकी से आमजन के अंतरमन में बैठा दिए। टीआरपी के झूठे खेल में दूरदर्शन को पिछड़ा दिखाया गया। यह सच है कि निजी चैनल्स यह भ्रम खड़ा करने में सफल रहे कि दूरदर्शन देखे जाने लायक चैनल नहीं है। महानगरों में यह भ्रम आज भी कायम है। लेकिन, असल स्थिति इसके उलट है। गोएबल्स का सूत्र 'एक झूठ को सौ बार बोलो वह सच लगने लगेगा' सफल नहीं क्योंकि झूठ सच भले ही प्रतीत करा दिया जाए लेकिन वह सच नहीं बन पाता। सच तो सच ही रहता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की पराजय का एक कारण गोएबल्स का यह सूत्र भी था। गोएबल्स अंत तक हिटलर को यही बताता रहा कि जर्मनी युद्ध जीत रहा है जबकि रणक्षेत्र में कुछ और ही घट रहा था। ठीक यही स्थिति दूरदर्शन और निजी चैनल्स की जंग के साथ है। १९८२ से १९९१ तक का समय भारतीय दूरदर्शन का स्वर्णकाल रहा। इस दौरान दूरदर्शन ने न सिर्फ नायक गढ़े वरन एक टेलीविजन संस्कृति का विकास भी किया। इस दौरान उसने कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड कायम किए। यह उसकी लोकप्रियता का दौर था। रंगीन प्रसारण (१९८२ में भार में आयोजित एशियाड गेम्स से) और सोप ऑपेरा ने इसे और विस्तार दिया। महाभारत और रामायण ने किंवदंतियां रचीं। कहते हैं कि महाभारत और रामायण के प्रसारण के वक्त भारत की सड़कें सूनी हो जाती थी। दूरदर्शन पर प्रसारित हुए धारावाहिक हमलोग, बुनियाद, ये जो जिंदगी है, विक्रम-बेताल, चंद्रकांता, करमचंद, तमस और चाणक्य को जो लोकप्रियता हासिल हुई वो किसी भी निजी चैनल्स के किसी भी धारावाहिक को नहीं मिल सकी। डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा निर्मित 'उपनिषद गंगा' धारावाहिक इसी श्रंखला को आगे बढ़ाएगा यह तय है। ११ मार्च, २०१२ से प्रति रविवार अब तक प्रसारित एपिसोड तो इसी बात की हामी भरते है। 
( त्रैमासिक पत्रिका मीडिया क्रिटिक में प्रकाशित आलेख )

शुक्रवार, 1 जून 2012

अन्याय हारेगा सत्य जीतेगा सबके साथ से, सत्यमेव जयते


 'टी वी और सिनेमा को हमेशा मनोरंजन के तौर पर नहीं देखा जा सकता है और न ही मनोरंजन का मतलब सिर्फ लोगों को हंसाना है। मैंने हमेशा कुछ अलग करने की कोशिश की है। भारत में जमीन से जुड़े इतने हीरो हैं, जिनकी जिंदगी से काफी प्ररेणा ली जा सकती है। सत्यमेव जयते एक कार्यक्रम नहीं भारत जोड़ो और समाज जागरण का अभियान है।' हाल ही में शुरू हुए चर्चित शो 'सत्यमेव जयते' को लेकर यह कहना है आमिर खान का। मनोरंजन के जगत, खबरों की दुनिया, आभासी दुनिया और जनमानस के बीच में शो काफी चर्चा बटोर रहा है। शो का आगाज दमदार रहा है। आमिर खान ने सत्यमेव जयते के पहले ही एपिसोड में सबसे चर्चित और जरूरी मुद्दा उठाया है। मुद्दा है कोख में कत्ल का। स्त्री अत्याचार का। बेटा-बेटी में झूठे भेद का। शो में सिर्फ मुद्दा उठाया भर नहीं गया बल्कि इस विकराल समस्या के जन्मने के कारण और इसके खात्मे के उपायों की भी चर्चा हुई। साथ ही अपने ही अंश की अपनी ही कोख में हत्या के दंश को झेल चुकी बहादुर महिलाओं के साहस को भी सलाम किया गया। उन्हें इस रूप में प्रस्तुत किया गया कि समाज की और भी महिलाएं कह उठें- 'बस, अब बहुत हुआ। ये अत्याचार सहन नहीं।' पहले एपीसोड के बाद सत्यमेव जयते की आधिकारिक वेबसाइट पर इतनी प्रतिक्रियाएं आईं की वेबसाइट क्रेश हो गई। फेसबुक, ऑरकुट, गूगल प्लस, ट्वीटर और अन्य सोशल साइटों पर समाजसेवियों, सोशल हस्तियों, साहित्यकारों, मनोरंजन जगत के लोगों और आम आदमी ने सत्यमेव जयते को एक क्रांति बताया, शो की भरपूर सराहना की।
    बेटा-बेटी का भेद समाज से अभी गया नहीं। जबकि समाज में शिक्षा बढऩे के साथ ही इसके जाने के कयास लगाए गए थे। लेकिन, घटनाओं को देखने से लगता है कि शिक्षा के प्रसार से भी अभी कोई अधिक फर्क नहीं आया है। शिक्षित लोग भी झूठी सामाजिक परंपरा में फंसे हैं। जबकि हम आसपास देखते हैं कि झूठ की बुनियाद पर खड़ी सभी सामाजिक परंपराएं दरक रहीं हैं। आज बेटी श्मशान घाट जाकर अपने माता-पिता को मुखाग्नि दे रही है तो नौकरी-व्यवसाय करके माता-पिता का भरण-पोषण कर रही है। एक सफेद झूठ समाज में प्रचारित किया गया है कि वंश बेटे से चलता है। जबकि वंश तो बेटी की कोख से ही पैदा होता है। बेटा चाहकर भी अकेले संतान पैदा नहीं कर सकता। इतना ही नहीं बेटियां सब क्षेत्रों में कामयाबी के झंडे गाड़ रही हैं। कार्यक्रम में मध्यप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा की घटनाओं के बारे में बताया गया। जो सच सामने आया वह दिल दहलाने वाला है। कन्याओं को जन्म देने वाली माताओं के साथ किस तरह का बर्बर सलूक किया जाता है यह देखकर तमाम लोगों की आंखों में अश्रूधार और धमनियों में रक्त प्रवाह तेज हुआ होगा। कोख में दम तोड़तीं बेटियां चीख-चीख कर कहती हैं कि आज भी सामंती युग कायम है। हमने दुनिया को दिखा दिया है कि हम बेटों के मुकाबले कहीं कमतर नहीं इसके बावजूद हमारा स्वागत नहीं किया जा रहा। जबकि इन्ही प्रदेशों की कई बेटियों ने मिशाल कायम की है। राजस्थान और मध्यप्रदेश की दो महिला सरपंचों को केन्द्र सरकार की ओर से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय गौरव ग्राम पंचायत पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राजस्थान के दौसा जिले की विमला देवी मीणा और मध्यप्रदेश के धार जिले की जामबाई मुनिया को यह सम्मान मिला। वहीं, पिछले साल मार्च में संयुक्त राष्ट्र संघ की इंफोपॉवर्टी वल्र्ड कॉन्फ्रेंस में लाजवाब भाषण देकर राजस्थान के टोंक जिले के सोड़ा गांव की सरपंच छवि राजावत ने दुनिया में नाम कमाया। एमबीए डिग्रीधारी छवि अपने गांव के विकास के लिए ऊंची नौकरी छोड़कर गांव आकर बस गई। मध्यप्रदेश की साध्वी और तेजतर्रार नेता उमा भारती ने तो राजनीति में तमाम प्रतिमान स्थापित किए। हाल ही में घोषित हुए संघ लोक सेवा आयोग के परीक्षा परीणाम में भी बेटियों ने अपनी योग्यता का लोहा मनवाया। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे आसपास मौजूद हैं।
    आमिर खान महज फिल्मी पर्दे पर समाज के लिए आवाज बुलंद करने वाले अभिनेता नहीं हैं। उन्होंने समय-समय पर प्रत्यक्ष रूप से समाज के लिए आगे आकर काम किया है। वे नर्मदा बांध के विस्थापितों के प्रति हमदर्दी रखते हैं। मेधा पाटकर के साथ आकर विस्थापितों की आवाज बुलंद करते हैं। भ्रष्टाचार रहित समाज के लिए प्रयासरत हैं। अण्णा के मंच से भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लोकपाल की सिफारिश करते हैं। बच्चों के प्रति समाज का रुख सकारात्मक रहे इसके लिए 'तारे जमीं' से संदेश देते हैं। ये तो चंद उदाहरण मात्र हैं, आमिर खान इनसे भी अधिक कार्य समाज के लिए करते हैं। आमिर सकारात्मक और सार्थक सिनेमा रचने में विश्वास रखते हैं। भारतीय सिनेमा को १००वां साल शुरू हो गया है। ऐसे में बॉलीवुड के अन्य दिग्गज अभिनेताओं और निर्देशकों को सोचना चाहिए कि मुनाफा फिल्मों में नंगापन दिखाने से ही नहीं कमाया जा सकता, आमिर की तरह सकारात्मक सिनेमा रचकर भी कमाया जा सकता है। ऐसे सिनेमा से प्रसिद्ध और सफलता मुनाफे के साथ बोनस के रूप में मिलती है।
    सत्यमेव जयते के पहले एपीसोड में मध्यप्रदेश के मुरैना जिले की परवीन खान की दास्तान दिखाई गई। परवीन साहस का प्रतिरूप है। परवीन की बेटियों को लगातार बेरहमी से मारा जाता रहा। आखिर वह इस सबसे तंग आ गई। उसने तय किया कि इस बार वह अपनी बेटी को दुनिया दिखाएगी, किसी भी कीमत पर। उसने ऐसा करके भी दिखा दिया। हालांकि बाद में उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ी। उसके पति (क्षमा करें उसे पति कहना गलत होगा, ऐसे आदमी को बहशी दरिंदा ही कहा जाना उचित होगा) ने मुंह से परवीन की नाक चबा ली। मुरैना भ्रूण हत्या और कन्या हत्या के लिए काफी कुख्यात है। एक समय में यहां कन्या हत्या के बेहद घृणित तरीके प्रचलित रहे हैं। यहां उनका जिक्र करना भी उचित न होगा। हालांकि अब पहले की तुलना में स्थिति में काफी सुधार आया है। फिर भी 2011 की जनगणना के आंकड़े भी बयां करते हैं कि 2001 की तुलना में लिंगानुपात में अंतर बढ़ा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक मुरैना ही मध्यप्रदेश में सबसे कम लिंगानुपात वाला जिला है। यहां छह साल तक की उम्र के बच्चों में 1000 लड़कों पर महज 825 लड़कियां हैं। जनगणना 2001 के मुताबिक यहां इस आयु वर्ग का लिंगानुपात 837 था। यानी एक दशक में यहां लिंगानुपात में 12 अंकों की गिरावट दर्ज हुई। जो निश्चिततौर पर चिंतनीय है। वैसे प्रदेश के हाल भी खराब ही हैं। जनगणना 2011 के आकंड़ों के मुताबिक प्रदेश में शून्य से छह वर्ष तक के आयु समूह का लिंगानुपात 912 है। यह 2001 की जनगणना के मुताबिक 932 था। यानी इस एक दशक में प्रदेश में भी 20 अंक की गिरावट हुई। प्रदेश में बेटी के यह हाल देखकर सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने बेटी बचाओ अभियान भी शुरू कर रखा है। लेकिन, बेटियों के प्रति सोच में बदलाव किसी एक के बूते आना संभव नहीं, हम सबके मिले-जुले प्रयास से ही संभव हो सकता है। पहले ही एपिसोड में आमिर खान ने पंजाब के एक गांव को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। जहां सभी ग्रामवासियों ने तय किया कि कोई भी भ्रूण हत्या नहीं करवाएगा। कोख में जिसे भी ईश्वर ने भेजा है दुनिया में उसका स्वागत किया जाएगा। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय में उस गांव का लिंगानुपात समान हो गया। वहां लड़के-लड़कियों की संख्या समान हो गई। हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए कि जितने भी सामाजिक बदलाव आए वे सब सामूहिक प्रयास से ही आए। इसलिए कन्या भ्रूण हत्या और कन्या शिशु हत्या को रोकना है तो सबको सामने आना होगा।
    चलते-चलते सत्यमेव जयते के बहाने दूरदर्शन की ताकत की भी बात कर ली जाए। यह शो आठ भाषाओं में नौ चैनलों पर १०० देशों में दिखाया जाएगा। इतना ही नहीं यह पहला शो है जो निजी चैनल्स पर प्रसारित होने के साथ ही साथ दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल (डीडी-१) पर भी प्रसारित होगा। दरअसल, तमाम टीआरपी के आंकड़ों के बाद भी यह व्यवहारिक सत्य है कि दूरदर्शन की जितनी पहुंच है उतनी किसी भी निजी चैनल की नहीं। टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) में भले ही दूरदर्शन पिछड़ा नजर आता हो, क्योंकि यह मनोरंजन बेच रहे लोगों की चालाकी है। आमिर खान कहते हैं कि मैं ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचना चाहता हूं इसलिए टेलीविजन का उपयोग कर रहा हूं। उन्हें पता है कि निजी चैनलों की पहुंच शहर और शहर से लगे कुछ कस्बों तक ही है। जबकि भारत तो गांवों में बसता है। समाज जागरण करना है तो मास तक पहुंचना होगा। मास तक पहुंचने का माध्यम सिर्फ दूरदर्शन ही है। दूरदर्शन की पहुंच शहर से लेकर दूरदराज के गांव तक है। सत्यमेव जयते को शुरुआत से मिल रही सफलताओं को देखकर कहा जा सकता है कि यह मनोरंजन के जगत से लेकर सामाजिक जगत में परिवर्तन ला सकता है। बस, इसके लिए आमजन के साथ ही जरूरत है।