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सोमवार, 10 जुलाई 2023

सामाजिक समरसता के लिए समर्पित श्रीगुरुजी का जीवन

श्रीगुरुजी और सामाजिक समरसता पर उनके विचार


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रद्धेय माधव सदाशिवराव गोलवलकर का जीवन हिन्दू समाज के संगठन, उसके प्रबोधन एवं सामाजिक-जातिगत विषमताओं को समाप्त करके एकरस समाज के निर्माण के लिए समर्पित रहा है। जातिगत ऊँच-नीच एवं अस्पृश्यता को समाप्त करने की दिशा में श्रीगुरुजी के प्रयासों से एक बड़ा और उल्लेखनीय कार्य हुआ, जब 13-14 दिसंबर, 1969 को उडुपी में आयोजित धर्म संसद में देश के प्रमुख संत-महात्माओं ने एकसुर में समरसता मंत्र का उद्घोष किया-  

“हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत्।

मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र: समानता।।”

अर्थात् सभी हिन्दू सहोदर (एक ही माँ के उदर से जन्मे) हैं, कोई हिन्दू नीच या पतित नहीं हो सकता। हिन्दुओं की रक्षा मेरी दीक्षा है, समानता यही मेरा मंत्र है।1 श्रीगुरुजी को विश्वास था कि देश के प्रमुख धर्माचार्य यदि समाज से आह्वान करेंगे कि अस्पृश्यता के लिए हिन्दू धर्म में कोई स्थान नहीं है, इसलिए हमें सबके साथ समानता का व्यवहार रखना चाहिए, तब जनसामान्य इस बात को सहजता के साथ स्वीकार कर लेगा और सामाजिक समरसता की दिशा में बड़ा कार्य सिद्ध हो जाएगा। विश्व हिन्दू परिषद की ओर से इस धर्म संसद में श्रीगुरुजी के आग्रह पर सभी संतों ने सर्वसम्मति से सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक का प्रस्ताव पारित किया। श्रीगुरुजी ने अपनी भूमिका को यहीं तक सीमित नहीं रखा अपितु अब उन्होंने विचार किया कि यह शुभ संदेश लोगों तक कैसे पहुँचे। क्योंकि उस समय आज की भाँति मीडिया की पहुँच जन-जन तक नहीं थी। सामाजिक समरसता के इस अमृत को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए श्रीगुरुजी ने 14 जनवरी 1970 को संघ के स्वयंसेवकों के नाम एक पत्र लिखा2, जिसमें उन्होंने कहा कि कर्नाटक में कार्यकर्ताओं की अपेक्षा से कई गुना अधिक सफल आयोजन हुआ। मानो हिन्दू समाज की एकता एवं परिवर्तन के लिए शंख फूंक दिया गया हो। परंतु हमें इससे आत्मसंतुष्ट होकर बैठना नहीं है। अस्पृश्यता के अभिशाप को मिटाने में हमारे सभी पंथों के आचार्य, धर्मगुरु और मठाधिपतियों ने अपना समर्थन दिया है। परंतु प्रस्ताव को प्रत्यक्ष आचरण में उतारने के लिए केवल पवित्र शब्द काफी नहीं हैं। सदियों की कुरीतियां केवल शब्द और सद्भावना से नहीं मिटती। इसके लिए अथक परिश्रम और योग्य प्रचार करना पड़ेगा। नगर-नगर, गाँव-गाँव, घर-घर में जाकर लोगों को बताना पड़ेगा कि अस्पृश्यता को नष्ट करने का निर्णय हो चुका है। और यह केवल आधुनिकता के दबाव में नहीं, बल्कि हृदय से हुआ परिवर्तन है। भूतकाल में हमने जो गलतियां की हैं, उसे सुधारने के लिए अंत:करण से इस परिवर्तन को स्वीकार कीजिए। श्रीगुरुजी के इस पत्र से हम समझ सकते हैं कि अस्पृश्यता को समाप्त करने और हिन्दू समाज में एकात्मता का वातावरण बनाने के लिए उनका संकल्प कैसा था? धर्माचार्यों से जो घोषणा उन्होंने करायी, वह समाज तक पहुँचे, इसकी भी चिंता उन्होंने की। संघ की शाखा पर सामाजिक समरसता को जीनेवाले लाखों स्वयंसेवक सरसंघचालक के आह्वान पर ‘हिन्दव: सोदरा: सर्वे’ के मंत्र को लेकर समाज के सब लोगों के बीच में गए।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

साधुओं की निर्मम हत्या, आक्रोश में हिंदू समाज

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से सटे पालघर में बीते गुरुवार को ऐसी घटना घटी, जिसने सभी को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। भीड़ द्वारा दो साधुओं सहित तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या करने की घटना से हिंदू समाज आक्रोश में है। उसका आक्रोश महाराष्ट्र सरकार की लचर कानून व्यवस्था के साथ ही उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के प्रति है, जिन्होंने साधुओं की हत्या पर चुप्पी साध रखी है। देश के किसी भी कौने में मुस्लिम समुदाय के किसी व्यक्ति के साथ यदि इस तरह की घटना हो जाती, तो देश में अब तक हंगामा मच गया होगा। अवार्ड वापसी गैंग और उनके सहयोगी आसमान सिर पर उठा लेते। सिनेमा जगत के कुछ चिह्नित कलाकारों को भारत में भय लगने लगता। लेकिन हैरत की बात है कि महाराष्ट्र के सबसे प्रमुख शहर मुंबई से सटे पालघर में दो साधुओं की हत्या हो जाती है और तीन दिन तक देश को इस घटना के विषय में पता ही नहीं चलता है। यह भी विचार करने की बात है कि एक और देशभर में कोरोना लॉकडाउन है तब पालघर में यह भीड़ एकत्र कैसे हो गई? 
          लगभग 200 लोगों की भीड़ ने निर्दोष और असहाय साधुओं सहित उनके वाहन चालक की हत्या की है। वीडियो देखने से साफ समझ आ रहा है कि भीड़ साधुओं की एक बात भी सुनने को तैयार नहीं थी। वीडियो में बर्बरता स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है। नि:संदेह उस भीड़ में कोई भी मनुष्य नहीं था, सब पर हैवानियत हावी थी। सबसे अधिक शर्मनाक बात यह है कि महाराष्ट्र पुलिस की भी परवाह भीड़ को नहीं थी। पुलिस के सामने उस भीड़ ने हिंदू साधुओं और वाहन चालक की निर्ममता से हत्या की। पुलिसकर्मियों ने अपने कर्तव्य पालन के लिए जरा भी साहस नहीं दिखाया है। यह स्थिति बताती है कि महाराष्ट्र सरकार में अराजक तत्व बेलगाम हैं। पुलिस तंत्र पूरी तरह फेल है। 
          साधु ने रक्षक समझकर बड़ी आशा के साथ पुलिसवाले का हाथ थामा था, लेकिन दुर्भाग्य है कि महाराष्ट्र की कायर पुलिस ने साधु को उन नरपिशाचों के बीच छोड़ दिया। इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध है। अपराधियों के साथ ही मौके पर उपस्थित पुलिसवालों के विरुद्ध भी कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए। जब वे किसी नागरिक की सुरक्षा ही नहीं कर सकते तब उन्हें पुलिस में रहने का कोई अधिकार नहीं है। 
          बताया जा रहा है कि उस क्षेत्र में बच्चा चोर की अफवाह फैली हुई थी। पुलिस ने कुछ दिन पूर्व ही दो चिकित्सकों को भी हिंसक भीड़ के चंगुल से बचाया था। प्रश्न है कि जब वह क्षेत्र इतना संवेदनशील था, तब पुलिस ने अतिरिक्त सतर्कता क्यों नहीं बरती? पुलिस ने पहले ही क्यों नहीं हिंसक भीड़ के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की। यदि पुलिस ने पहले ही वहाँ के लोगों को कानून का पाठ पढ़ा दिया होता तो आज निर्दोष हिंदू साधु जीवित होते। 
           दरअसल, पालघर के उस क्षेत्र में हिंदू विरोधी ताकतें सक्रिय हैं। इसलिए भी यह घटना हुई। वरना गेरूए वस्त्रधारी बुजुर्ग को देखकर भीड़ इस तरह अमानुष न होती। कम्युनिस्ट और ईसाई मिशनरियों ने वहाँ हिंदू विरोध को हवा दी है। विश्व हिंदू कोंकण प्रांत के सहमंत्री और प्रवक्ता श्रीराज नायर ने इस संबंध में बताया है कि यह क्षेत्र जनजाति बाहुत्य है। कुछ वर्ष पहले तक पालघर ठाणे जिले का हिस्सा हुआ करता था, अब पालघर जिला बन चुका है। यहाँ ईसाई मिशनरियां और वामपंथी ब्रिगेड हिंदुत्व के विरोध में वातावरण बनाने के लिए सक्रिय हैं। इसलिए किसी षड्यंत्र की बात से इनकार नहीं किया जा सकता। हिंदू साधुओं और उनके वाहन चालक के नृशंस हत्याकांड की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए, जो भी इस षड्यंत्र/हत्याकांड में शामिल हैं, उन्हें फांसी मिलनी चाहिए। बाला साहेब ठाकरे की विरासत पर रत्तीभर गौरव हो तो मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को हत्याकांड की जाँच में तीव्रता से करा कर हिंदू समाज को न्याय देना चाहिए। 

शनिवार, 13 मई 2017

धर्म की आड़ में अधर्म कब तक?

 तीन  तलाक के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने गुरुवार से सुनवाई शुरू कर दी है। तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन चला रही महिलाओं को उम्मीद है कि इस बार उन्हें न्यायालय से न्याय मिलेगा। (पढ़ें - महिलाओं के हित में आए निर्णय) मुस्लिम महिलाओं ने न्याय के लिए ईश्वर से प्रार्थना भी शुरू कर दी है। इस सिलसिले में उन्होंने हनुमान मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ भी किया है। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय भी महिला सम्मान और मुस्लिम धर्म से जुड़े इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहा है। पहले दिन की कार्यवाही यही बताती है। आश्चर्य है कि न्यायालय को मानवीय और संवैधानिक अधिकारों के मामले में धार्मिक तुष्टीकरण का ध्यान रखना पड़ रहा है। वरना क्या कारण था कि पाँच न्यायमूर्तियों की सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ को कहना पड़ा कि वह सबसे पहले यह तय करेगी कि क्या तीन तलाक की परंपरा इस्लाम धर्म का मूल तत्व है? पीठ ने यह भी कहा है कि हम इस मुद्दे पर भी विचार करेंगे कि क्या तीन तलाक सांस्कारिक मामला है और क्या इसे मौलिक अधिकार के रूप में लागू किया जा सकता है? हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय की आगे की कार्यवाही से उम्मीद बंध रही है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिलेगा। न्यायालय ने तीन तलाक के संबंध में अनेक कठोर टिप्पणियाँ की हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि 'तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं को जिंदा दफन करने जैसा है।' मुख्य न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि बहुविवाह मामले में फिलहाल बहस नहीं होगी। पीठ तीन तलाक की संवैधानिकता को परखेगी। कोर्ट ने कहा कि हम इस मुद्दे को देखेंगे कि क्या तीन तलाक इस्लाम धर्म का मूल हिस्सा है? क्या उसे मूल अधिकार के तौर पर लागू किया जा सकता है? कोर्ट ने कहा कि अगर यह साबित तय हो जाता है और कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचता है कि तलाक धर्म का मूल तत्व है तो वह इसकी संवैधानिक वैधता के सवाल को नहीं परखेगा।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

तीन तलाक पर बोर्ड का ढोंग

 तीन  तलाक शुद्ध तौर पर मुस्लिम महिलाओं के शोषण की व्यवस्था है। तीन तलाक को खत्म करने के लिए देश में व्यापक बहस चल रही है। इस बहस के दबाव का ही परिणाम है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को तीन तलाक पर विचार करने और इस संबंध में एक आचार संहिता जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। क्योंकि मुस्लिम धर्म के तथाकथित ठेकेदारों को पता है कि महिलाएं जागरूक हो चुकी हैं, उनका शोषण अब और नहीं किया जा सकता। देश में मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में वातावरण बन गया है। हालाँकि तीन तलाक पर बोर्ड ने महिलाओं के हित की चिंता करने की अपेक्षा ढोंग ही किया है। बोर्ड के ढोंग से उसकी महिला विरोधी मानसिकता की पोल और अधिक खुलकर सामने आ गई है।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

महिलाओं के हित में आए निर्णय

 पिछले  ढाई साल में तीन तलाक का मसला काफी बड़ा हो गया है। तीन तलाक पर व्यापक बहस प्रारंभ हो चुकी है। हालाँकि, मुस्लिम महिलाओं की ओर से लम्बे समय से तीन तलाक को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है। लेकिन, अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला। अब तक की सरकारों ने मुस्लिम महिलाओं की आवाज को न तो सुना और न ही उनका समर्थन किया। वरन् शाहबानो प्रकरण में तो तत्कालीन कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटकर एक तरह से मुस्लिम महिलाओं को उनकी बदहाली पर छोड़ दिया था। महिलाओं के संघर्ष को उस वक्त ताकत और सफल होने की उम्मीद मिली, जब मई-२०१४ में केंद्र में भाजपानीत सरकार का गठन हुआ। क्योंकि, भारतीय जनता पार्टी सदैव से समान नागरिक संहिता और मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी के लिए तीन तलाक को खत्म करने की हिमायती रही है। भाजपा के शीर्ष नेता अकसर अपने भाषणों में मुस्लिम महिलाओं के हित में तीन तलाक को खत्म करने की मांग उठाते रहे हैं। हाल में सम्पन्न उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी तीन तलाक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना था। माना जा रहा है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा को जो प्रचंड बहुमत मिला है, उसमें मुस्लिम महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

नये भारत की बात

 प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी अपने बहुचर्चित रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में हर बार समाजहित और देशहित की बातों को उठाते रहे हैं। संभवत: वह समाज को भी राष्ट्र निर्माण की भूमिका में सक्रिय करना चाहते हैं। क्योंकि, उनका प्रशिक्षण उस वैचारिक पृष्ठभूमि में हुआ है, जिसका मानना है सार्थक बदलाव समाज को जागरूक और सक्रिय करके ही आ सकते हैं। स्थायी बदलाव के लिए समाज को उसकी भूमिका का भान करना और उस भूमिका में उसे सक्रिय करना आवश्यक है। सरकार के बूते समाज में स्थायी बदलाव संभव नहीं है। सरकार सुविधा प्रदान करने में सक्षम है, लेकिन राष्ट्र निर्माण की वास्तविक शक्ति तो नागरिकों के हाथ में निहित है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री 'मन की बात' में बार-बार समाज को उसकी जिम्मेदारियों का ध्यान दिलाते हैं और नागरिकों से आग्रह करते हैं कि वह भी सरकार के साथ कदमताल करें।

शनिवार, 19 नवंबर 2016

दुर्भाग्य है नायसमंद की घटना

 नये  दौर में छूआछूत और भेदभाव की घटना किसी भी समाज के लिए कलंक से कम नहीं हैं। यह समूची मनुष्य जाति का दुर्भाग्य है कि समाज में कुछ लोग, कुछ लोगों को अपने से कमतर मानते हैं। उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं। किसी मनुष्य के खेत में पैर रखने से क्या सफल सूख सकती है? क्या उसके छूने से पवित्रता समाप्त हो सकती है? यदि इसका प्रश्न हाँ है तब समूची धरती तथाकथित सवर्णों के लिए रहने लायक नहीं है। समूची धरती एक है और उसका स्पर्श हजारों हजार तथाकथित निम्न जाति के लोग करते हैं। उस भूमि को वह अपनी माता मानते हैं। यह अधिकार और ज्ञान तथाकथित सवर्ण समाज को किसने दिया कि एक वर्ग विशेष नजरें उठाकर नहीं चल सकता, उनकी औरतें-बेटियाँ सज-धज नहीं सकतीं, उन्हें होटल या धर्मशाला में पानी चुल्लू में लेकर पीना चाहिए?

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

सुधार क्यों नहीं चाहता मुस्लिम समुदाय

 तीन  तलाक के मुद्दे पर सरकार का हलफनामा स्वागत योग्य है। मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक स्थिति और उनके संवैधानिक अधिकार को मजबूत करने के लिए केन्द्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में दायर अपने हलफनामे में स्पष्ट कहा है कि तीन तलाक महिलाओं के साथ लैंगिग भेदभाव करता है। केन्द्र सरकार ने उचित ही कहा है कि पर्सनल लॉ के आधार पर किसी को संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। महिलाओं की गरिमा के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। केन्द्र सरकार ने यहाँ तक कहा है कि तीन तलाक, हलाला निकाह और बहुविवाह इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। सरकार का यह कहना उचित ही है। यदि यह प्रथाएँ इस्लाम का अभिन्न अंग होती, तब इस्लामिक देशों में इन पर प्रतिबंध संभव होता क्या? दुनिया के अनेक प्रमुख इस्लामिक मुल्कों में तीन तलाक, हलाला निकाह और बहुविवाह प्रतिबंधित हैं। इसलिए भारत में भी महिलाओं के साथ धर्म और पर्सनल लॉ के नाम पर होने वाली ज्यादती रुकनी चाहिए।

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

दलित उत्पीडऩ : संवेदना कम, दिखावा और सियासत ज्यादा

 दलित  उत्पीडऩ की घटनाएं यकीनन मानव समाज के माथे पर कलंक हैं। देश के किसी भी कोने में होने वाली दलित उत्पीडऩ की घटना सबके लिए चिंता का विषय होनी चाहिए। जिस वक्त मानव सभ्यता अपने उत्कर्ष की ओर अपने कदम बढ़ा रही है, उस समय दलित उत्पीडऩ की घटनाएं पतन का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। मनुष्य-मनुष्य में भेद के इस अपराध से यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि आखिर हम कब जाति की बेडिय़ां तोड़ेंगे? कब मनुष्य को मनुष्य के तौर पर देखेंगे? सामाजिक समरसता के लिए जरूरी है कि इस तरह की घटनाओं पर कानून के हिसाब से कठोर से कठोर कार्रवाई हो, इस बात की चिंता सरकारों को करनी चाहिए। वहीं, इस संदर्भ में समाज की भी अपनी जिम्मेदारी है। बहरहाल, संसद भी दलित उत्पीडऩ पर चिंतित है, यह अच्छी बात है। भारतीय लोकतंत्र के मंदिर से यदि सामाजिक समरसता का रास्ता निकलता है, तब वह अधिक प्रभावी भी होगा। क्योंकि, हम जानते हैं कि सामाजिक समरसता में सबसे बड़ी बाधा कोई है तो वह राजनीति है, राजनीतिक पार्टियां हैं, उनके राजनीतिक स्वार्थ हैं। इसलिए यहाँ प्रश्न उठता है कि दलित उत्पीडऩ पर संसद में हो रही चिंता सामाजिक समरसता के लिए है, या फिर दलित विमर्श की आड़ में राजनीति खेली जा रही है?

गुरुवार, 9 जून 2016

हम कब ठुकराना सीखेंगे माल-ए-मुफ्त

 स्विट्जरलैंड  ने नागरिकों ने 'बिना काम किए घर बैठकर तनख्वाह प्राप्त करने के विचार' को नकार कर दुनिया के सामने श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया है। दुनिया में जब यह बहस चल रही है कि रोजगार की कमी, गरीबी और आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए घर बैठे प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम और एक समान वेतन दिया जाना चाहिए, उस वक्त में स्विट्जरलैंड के स्वाभिमानी नागरिकों ने इस विचार को खारिज कर संदेश दिया है कि इस व्यवस्था से समस्याएं सुलझने की जगह और अधिक उलझ जाएंगी। डेनियल और एनो ने स्विट्जरलैंड में यूनिवर्सल बेसिक सैलरी का अभियान शुरू किया था। उनके मुताबिक मशीनीकरण के कारण रोजगार के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं। रोबोट लोगों के पेट पर लात मार रहे हैं। ऐसे में स्विट्जरलैंड का प्रत्येक नागरिक या वहाँ पाँच साल से नियमित रहने वाला व्यक्ति सम्मानपूर्वक अपना भरण-पोषण कर सके, इसके लिए बच्चों को करीब 42 हजार रुपये और बड़ों को एक लाख 71 हजार रुपये प्रति महीना न्यूनतम वेतन दिया जाना चाहिए। डेनियल और एनो के इस प्रस्ताव को करीब डेढ़ साल में एक लाख से अधिक स्विस नागरिकों ने हस्ताक्षकर करके अपना समर्थन दिया। एक लाख लोगों का समर्थन हासिल होने के कारण स्विट्जरलैंड सरकार को बेसिक सैलरी के प्रस्ताव पर जनमत संग्रह (मतदान) करवाना पड़ा। हालांकि, मतदान के द्वारा न्यूनतम वेतन के विचार को खारिज करके 77 प्रतिशत स्विस नागरिकों ने स्पष्ट संदेश दिया कि मुफ्त का पैसा देश, समाज और व्यक्ति यानी किसी के लिए भी ठीक नहीं है। इन 77 प्रतिशत लोगों को अंदाजा था कि मुफ्त की कमाई के लिए उन्हें क्या कीमत चुकानी पड़ती।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

मन के रावण को मारो, राम बनो

 द शहरा प्रतीक का पर्व है। बुराई की हार और अच्छाई की जीत का प्रतीक पर्व। शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की साधना, उपासना के साथ ही आध्यात्मिक और सद्शक्तियों के जागरण के पर्व नवरात्र के दौरान ही बुराइयों के पिण्ड रावण को जलाने के लिए सब ओर तैयारियां शुरू हो जाती हैं। मोहल्लों में रहने वाले बच्चे खुद ही रावण तैयार कर रहे होते हैं जबकि बड़ी मंडलियां बाजार से बड़े से बड़ा 'रेडीमेड' रावण खरीदने के लिए चंदा जमा करते हैं। अंतत: छोटे-बड़े सभी रावणों को गली-मैदान में स्वाह कर उल्लास मनाते हैं कि बुराई का अंत कर दिया। सब माया है। सब कर्मकाण्ड है। गली-मैदानों में धूं-धूं कर पुतला ही जलता है, रावण तो जिन्दा रहता है। हम सबके भीतर। तैयारी उसे मारने की होनी चाहिए। भीतर का रावण एक तीर से नहीं मरता, उसके लिए रोज सजग रहना पड़ता है कमान खींचकर, जैसे ही सिर उठाए, तीर छोड़ देना होता है। कई दिन तो रोज उसे मारना पड़ता है। इसके बाद फिर समय-समय पर उसका वध करना होता है। यह सतत प्रक्रिया है। लेकिन, हम मार किसे रहे हैं, बाहर के रावण को, वह भी पुतले को। असल रावण तो जीते रहते हैं, हम में और तुम में। ये हम और तुम का रावण मर गया फिर सब ठीक हो जाएगा। अब सवाल यह है कि आखिर भीतर कौन-सा रावण बैठा है। जैसा कि हम जानते हैं कि रावण दस बुराइयों का प्रतीक है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी। ये रावण के दस सिर हैं। दशहरा इन्हीं दस प्रकार के पापों के परित्याग की प्रेरणा देता है। दशहरा दस पापों को हरने का पर्व है। भगवान श्रीराम का युद्ध इन्हीं दस पापों से था। रावण के इन्हीं दस पापों को परास्त कर श्रीराम महापराक्रमी बने। पूज्य और आराध्य बने। समाज के प्रेरणास्त्रोत बने। दस प्रकार के पापों के पिण्ड रावण को जलाना ही प्रत्येक मनुष्य की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि मनुष्य अंतर्मन में छिपकर बैठे इन रावणों को मार सका तो सही अर्थों में वह श्रीराम के दिखाए मार्ग पर चल रहा है। इन बुराइयों पर विजय पाने का सामथ्र्य हर किसी में है, हर किसी के भीतर राम भी बैठे हैं। तो अपने भीतर के राम को पहचानो। रोज रावण मारो और राम बनो। 
ध्यान देने की बात यह है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी, ये दस पाप ही मनुष्य को रावण बनाते हैं। ये पाप आपस में संबद्ध हैं। एक दूसरे से जीवन पाते हैं। इसके अलावा प्रत्येक पाप के भी दस-दस सिर हैं। एक भी पाप भीतर जिंदा है तो सब जिंदा हैं। इसलिए सबका अंत जरूरी है। काम में अंधा होकर ख्यातनाम व्यक्तित्व भी धूमिल हो जाता है, क्षणभर में। सिर्फ व्यक्तित्व ही धूमिल नहीं होता बल्कि उसके साथ जुड़े मानबिन्दुओं पर भी प्रश्न चिह्न खड़े होते हैं। यदि धार्मिक चोला ओढ़कर बैठा व्यक्ति काम का शिकार हो जाता है तो लोगों का विश्वास डिगता है। इसका फायदा धर्म-परंपरा विरोधी लोग उठाते हैं। धर्म-परंपरा के नाम पर अपना जीवनयापन कर रहे चारित्रिक रूप से कमजोर व्यक्ति की आड़ में धर्म विरोधी लोग हमलावर भूमिका में आ जाते हैं। वे संबंधित धर्म पर आक्षेप लगाते हैं। परंपराओं पर अंगुली उठाते हैं। हालांकि जिस धर्म और समाज पर अगुंली उठाई जा रही होती है, वह धर्म और समाज ही चारित्रिक रूप से पतित व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता है। रावण को प्रकांड ब्राह्मण बताया जाता है लेकिन इसके बावजूद हिन्दू समाज में उसका आदर नहीं है। कारण, उसका अमर्यादित आचरण। इसलिए आपने जीवनभर नाम रूपी जो पूंजी कमाई है, उसे बचाए रखना चाहते हैं, अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करना चाहते हैं तो वासना रूपी रावण का अंत बार-बार करते रहिए।
मनुष्य जब विवेकशून्य हो जाता है, तब उसे क्रोध आता है। क्रोध में वह सदैव ऐसा निर्णय लेता है जिस पर उसे बाद में पश्चाताप होता है। सच मायने में क्रोध के वक्त व्यक्ति सारी मनुष्यता खो देता है। वह रावण बन जाता है। क्रोध में ही मनुष्य अपनी सबसे प्रिय वस्तु का भी नाश कर देता है। हत्या तक कर देता है। समाज और राष्ट्र के संदर्भ में देखें तो हड़ताल, प्रदर्शन और दंगे में हम क्या करते हैं? क्रोध के गुलाम होकर मनुष्यों की क्षति, समाज की क्षति, राष्ट्रीय संपत्ति की क्षति, स्वयं की क्षति और अपनी आत्मा की क्षति। क्रोध पर विजय पाना हमारी प्राथमिकता में होना चाहिए। 
हम ध्यानपूर्वक देखें कि लोभ के कारण आज देश की क्या स्थिति है? आम समाज को क्या नुकसान हो रहा है? लोभ मनुष्य को भ्रष्टाचारी बनाता है। लोभ ही बेईमान भी बनाता है। लोभ पर शुरुआत से ही काबू नहीं किया गया तो यह बढ़ता ही जाता है। यह कभी-भी कम नहीं होता। लोभी मनुष्य ने पहले हजारों के घोटाले किए फिर लाखों के और अब लाखों के घोटाले उनके लिए घोटाले ही नहीं हैं। क्योंकि लोभ बढ़ गया। यानी भ्रष्टाचार की सीमा बढ़ गई। देश-समाज का नुकसान ज्यादा बढ़ गया। यही हाल मोह का है। मोह में पड़कर आदमी क्या नहीं कर रहा। अपनी जिम्मेदारी भूल गया है। स्वकेन्द्रित होकर रह गया है। अपने परिवार के लिए समाज और देश के साथ बेईमानी भी कर रहा है। 
दशहरा चूंकि शक्ति का पर्व है। इस दिन क्षत्रिय अपने हथियारों की पूजा करते हैं। पूर्वजों ने समाज को एक संदेश देने की कोशिश की है कि ताकत हासिल कीजिए। साथ में यह भी संकेत कर दिया कि इसका दुरुपयोग मत कीजिए। समाज में अपनी प्रतिष्ठा के मद में चूर मत होईए। प्रभावशाली होने का अंहकार मत पालिए। शक्ति का उपयोग हिंसा के लिए मत कीजिए। गरीब, असहाय पर अपनी ताकत का प्रदर्शन नहीं करें बल्कि उनकी रक्षा के लिए आगे खड़े रहें। लेकिन, समाजकंटकों को यह आभास भी दिलाते रहिए कि आप शक्तिशाली हैं ताकि वह आपकी ओर, आपके समाज और देश की ओर आंख दिखाने की हिम्मत न जुटा सके। दरअसल, कमजोर को हर कोई दबाना चाहता है। भारतीय राजनीति इसका अच्छा उदाहरण है। यहां बाहुबली नेतागिरी कर रहे हैं। कमजोर की कोई पूछ नहीं। जो शक्तिशाली है, संगठित वोट बैंक हैं उनकी भारतीय राजनीति में भारी पूछपरख है, मौज भी उनकी ही है। शासन की योजनाएं भी उनके लिए हैं जबकि असंगठित बहुसंख्यक समाज की फिक्र तक किसी को नहीं। उसकी भावनाएं भी जाती रहें चूल्हे में। 
        मजबूत और शक्तिशाली दिखने की जरूरत जितनी व्यक्तिगत स्तर पर है, उससे कहीं अधिक एक देश के लिए आवश्यक है। इजराइल के संबंध में इसे समझा जा सकता है। इजराइल छोटा-सा देश है लेकिन साहस उसका किसी ऊंचे पर्वत से भी विशाल है। सब ओर से शत्रु देशों से घिरा है लेकिन मजाल है कि कोई उसकी तरफ आंख उठाकर देख जाए। इजराइल ने अपनी शक्तिशाली छवि यूं ही नहीं बनाई है। उसने करके दिखाया है। अपने शत्रुओं को ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। जबकि भारत और पाकिस्तान में ऐसा नहीं दिखता। पाकिस्तान बार-बार गुर्राता है। भारत की ओर आंखें तरेरता है। चार युद्ध हारने के बाद भी उसकी इतनी हिम्मत भारत के कमजोर नेतृत्व के कारण है। भारत सरकार बार-बार उसके अमर्यादित व्यवहार को माफ करती है। जबकि होना यह चाहिए कि पाकिस्तान की ओर से कोई संदिग्ध गतिविधि की आशंका दिखे तो घटना घटने से पहले ही भारत की ओर से कार्रवाई कर दी जानी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने आ जाए। वह भारत विरोधी कदम उठाने से पहले सौ बार सोचेगा। अब समय चीन को भी चेताने का आ गया है। वह भी बार-बार सीमा का उल्लंघन कर रहा है। 
         दशहरा महज उल्लास का पर्व नहीं है। बल्कि बहुत कुछ संकेत की भाषा में बताने की कोशिश करता है। अपने भीतर के तमाम रावणों को मारो-जलाओ बाकि बाहर सब ठीक हो जाएगा। खुद सशक्त बनो तो समाज ताकतवर बनेगा और देश को भी मजबूती मिलेगी। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने अपने वार्षिक उत्सव में लघु नाटक 'प्रतीकात्मक रामायण' का मंचन किया। यह उद्देश्यपूर्ण, सार्थक और प्रभावशाली प्रस्तुति रही। 'प्रतीकात्मक रामायण' के निर्देशक और लेखक मयंक मिश्रा ने रावण के दस सिरों को दस बुराइयों का प्रतीक माना। राम ने एक-एक कर इन बुराइयों का सर्वनाश कर रावण पर विजय प्राप्त की। रावण दरअसल हम सबके भीतर बैठे पापों का ही नाम है। जब ये पाप हावी हो जाते हैं तो मनुष्य रावण बन जाता है। मनुष्य रावण न बने इसलिए रोज इन बुराइयों को मारते रहे। प्रतीकों के माध्यम से दशहरे का यही संदेश है।

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

रोज बिकती हैं औरतें और मासूम भी

सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्त्ता नीरू सिंह ज्ञानी। 
 भ गवान ने इंसान को इंसान बनाते समय कोई भेदभाव नहीं बरता। लेकिन मनुष्य ने अपनी बुद्धि का दुरुपयोग करते हुए आदमी-आदमी के बीच भेदभाव की तमाम दीवारें खड़ी कर दीं। किसी को जाति के आधार पर बांट दिया। किसी को काले-गोरे के भेद में रंग दिया। किसी को धन-दौलत के तराजू में तौल दिया। खुद इंसान ने इंसान को इंसान नहीं रहने दिया। अपनी दुष्ट बुद्धि के उपयोग से उसने इंसानों के साथ जानवरों-सा बर्ताव किया और कर रहा है। पैसे और रसूख के जोर पर कमजोर आदमी को अपना गुलाम बनाया। उसे अपनी जागीर समझा। उससे कोहलू तक चलवाया और दो वक्त का खाना तक नसीब नहीं होने दिया। इंसानों के द्वारा ही इंसानों की खरीद-फरोख्त का धंधा चलाया जा रहा है। यह देख मानवता के रचियता को भी रोना आता होगा। 
       अपने निहित स्वार्थों के चलते इंसान ने कई काले टीके अपने माथे पर लगा रखे हैं। मानव तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग) इंसानों की दुनिया का विद्रूप सत्य है। यह एक तरह से इंसानों की मण्डी है। जहां इंसानों की खरीद-फरोख्त होती है। इसमें सबसे अधिक औरतें और मासूम बेटियां बेची जाती हैं। ह्यूमन ट्रैफिकिंग के जरिए सबसे अधिक महिलाओं और बच्चों का शोषण, उनके साथ दुराचार और अनैतिक व्यवहार किया जाता है। दुनिया ह्यूमन ट्रैफिकिंग की समस्या से जूझ रही है। भारत में भी यह गंदा धंधा संगठित रूप से चल रहा है। पड़ोसी मुल्कों के अलावा उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश सहित भारत के अन्य राज्यों से महानगरों में लाकर महिलाओं को अनैतिक तरीके से देह व्यापार में इस्तेमाल किया जाता और बच्चों को बंधुआ मजदूर की तरह रखा जाता है। दिल्ली, बैंगलूरू, गोवा, मुंबई और चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों में रसूखदार और तथाकथित ऊंचे तबके के लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए मासूम बच्चों और लड़कियों की खरीद-फरोख्त करते हैं। उन्हें अपने घर में बंधक बनाकर रखते हैं। जानवरों की तरह काम कराते हैं। बर्ताव भी घोर आपत्तीजनक रहता है। छोटे बच्चों से जोखिम भरे काम कराए जाते हैं। खाने को बचा-खुचा दिया जाता है। लड़कियों से देह व्यापार कराया जाता है। उन्हें नर्क की ऐसी आग में झौंक दिया जाता है कि वे वर्षों तक उसमें झुलसती रहती हैं। हालांकि भारत में भी सरकार ने मानव तस्करी के खिलाफ कानून बना रखा है। अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम-१९५६ किसी भी प्रकार से इंसान को अनैतिक व्यापार में लगाने का सख्ती से विरोध करता है। इसके बावजूद भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग रुकने का नाम नहीं ले रही। 
समाज से ह्यूमन ट्रैफिकिंग जैसे भद्दे दाग को हटाने के लिए सरकार के साथ-साथ तमाम एनजीओ भी अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। दुनिया में ह्यूमन ट्रैफिकिंग की समस्या खत्म हो, इसके लिए एमटीवी एक्जिट (एण्ड एक्सप्लोएशन एण्ड ट्रैफिकिंग) अपने स्तर पर कार्य कर रही है। खासकर इस समस्या को लेकर जनजागृति लाने की दिशा में उनके प्रयास को सार्थक कहा जा सकता है। ट्रैफिकिंग की समस्या को लेकर २८ फरवरी से एमटीवी पर आधे-आधे घंटे की पांच शॉर्ट डाक्युमेंट्री का प्रसारण किया जाएगा। सोशल मीडिया पर इसके प्रोमो आने लगे हैं। लीक से हटकर फिल्में बनाने के लिए ख्यात बॉलीवुड के डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने इन फिल्मों का निर्देशन किया है। ग्वालियर की समाजसेवी नीरू सिंह ज्ञानी और उनकी प्रतिभाशाली बेटी प्रांजुल एक-एक फिल्म में दिखेंगी। प्रांजुल ने पांचों फिल्मों में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया है। नीरू सिंह एक फिल्म में समाजसेवी की भूमिका में दिखेंगी। दिल्ली का एक परिवार है, जहां एक मासूम को अवैध रूप से खरीदकर रखा गया है। वह परिवार उस मासूम से घर के सभी काम कराता है। समाजसेवी रागिनी (नीरू सिंह ज्ञानी) उस मासूम को मुक्त कराती हैं। उसके पुनर्वास की व्यवस्था करती हैं। यह तो फिल्म की बात हुई। असल जिन्दगी में भी नीरू सिंह ज्ञानी अपने स्तर पर समाजसेवा के काम करती रही हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी ऐसी ही है। श्रीमती सिंह के श्वसुर ने ग्वालियर के नजदीक रायरू में बेशकीमती जमीन पर गांव के बच्चों के पढऩे के लिए स्कूल शुरू किया। वे हमेशा स्थानीय लोगों के लिए मददगार के रूप में मौजूद रहते थे। अब उनके बेटे-बहू उनकी सोच और काम को आगे बढ़ा रहे हैं। नीरू सिंह ज्ञानी अपने एनजीओ प्रांजुल आटर््स के जरिए सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रही हैं। उनके प्रयास प्रसंशनीय हैं। सार्थक हैं। उनकी सोच सकारात्मक है। समाजसेवा के उनके प्रयास तब और महत्वपूर्ण हो जाते हैं जबकि वे सक्रिय राजनीति से जुड़ी हैं। उनका अधिकतम समय महिलाओं और गांवों में भाजपा संगठन को मजबूत करने में जाता है। राजनीति कोयले की कोठरी है। इसमें सब काले ही काले लोग हैं। साफ-सुथरे लोग भी इसमें आकर काले हो जाते हैं। सब अपने लोभ-स्वार्थ को लेकर राजनीति में आते हैं। अब वो दौर नहीं रहा जब राजनीति को समाजसेवा का जरिया माना जाता था। अब तो राजनीति शुद्ध रूप से करियर हो गई है। ऐसा करियर जिसमें अकूत धन-दौलत कमाने का मौका मिलता है, बेईमान होकर। उम्दा और क्रियेटिव लोगों की यहां कमी है। भारतीय राजनीति और राजनेताओं के बारे में अमूमन हम यह सब सुनते रहते हैं। नीरू सिंह ज्ञानी जैसे लोगों से मिलकर यह मिथक टूटता-सा महसूस होता है। राजनीति में सब बुरे हैं, यह पूरा सच नहीं है। सच तो यह है कि बहुत से लोग भाजपा सहित अन्य पार्टियों में भी ऐसे हैं, जो निहायत ईमानदार हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। बिना किसी शोर-शराबे के अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। कुछ क्रियेटिव वर्क। कुछ नया गढ़ रहे हैं। कुछ नई राहें बना रहे हैं। 
       ह्यूमन ट्रैफिकिंग को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में नीरू सिंह बताती हैं कि मनुष्यों द्वारा मनुष्यों के साथ यह भेदभाव किसी एक देश में नहीं अपितु पूरी दुनिया में हुआ। प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का अंश मानने वाली परम्परा का देश भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। दुनिया में रोज कई औरतें और बेटियां खरीदी-बेची जा रही हैं। स्त्री के मान का मर्दन किया जा रहा है। दुनिया इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर गई है। पारदर्शिता का जमाना आ गया है। दुनियाभर में जनजाग्रति के अभियान चलाए जा रहे हैं। मनुष्य खुलकर, अपने हिसाब से, स्वस्थ वातावरण में जी सके इसके लिए दुनियाभर में तमाम कानून बन गए हैं। १० दिसम्बर १९४८ को संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा हो चुकी है। तब से अब तक मानवाधिकारों पर लम्बी-लम्बी सार्थक बहस हो चुकी हैं, ठोस कदम उठाए जा चुके हैं। इस सबके बावजूद आज भी मनुष्य अपनी दुष्टतई से बाज नहीं आ रहा। किसी व्यक्ति से, चाहे वो पुरुष हो, महिला हो या फिर छोटा बच्चा, उसकी मर्जी के खिलाफ  या उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर, उनका शोषण करना, उन पर अत्याचार करना, उन्हें बंधुआ मजदूरों की तरह रखना, अनैतिक काम में लगाना, मानवाधिकारों का सीधा-सीधा उल्लंघन है। दरअसल, कुछ पैसे वाले लोग, रसूखदार, सफेदपोश और तथाकथित सभ्य समाज के लोग ह्यूमन ट्रैफिकिंग को बढ़ावा देते हैं। मनुष्य होकर मनुष्यों के साथ दुराचार करते हैं। मानव सभ्यता को लज्जित करते हैं। किसी की गरीबी का फायदा उठाकर मासूम बच्चों के साथ अनाचार करते हैं। ये ही पढ़े-लिखे रईस लोग सार्वजनिक मंचों से समानता की बात करते हैं और घर में किसी को गुलाम बनाकर रखते हैं। यह समाज का असली चेहरा है। यह समाज का घिनौना चेहरा है। वे बताती हैं कि अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी के कारण ही बहुत से लोग इंसानों की मण्डी में अपनों को बेचते हैं। मानव तस्करी रोकने के लिए समाज जागरण के साथ ही सरकारी स्तर पर बहुत से प्रयास होने जरूरी हैं। शिक्षा और रोजगार के अवसर बढऩे से काफी हद तक ह्यूमन ट्रैफिकिंग को रोका जा सकता है। 
      ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर आधारित पांचों शॉर्ट फिल्मस् सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं। इनमें पहली फिल्म सेक्सुल ट्रैफिकिंग है। इसके अलावा डोमेस्टिक सर्विट्यूट, बांडेड लेबर और चाइल्ड लेबर में भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग का स्याह चेहरा दिखाया गया है। इन फिल्मों की ज्यादातर शूटिंग बनारस, मुंबई, गोवा और दिल्ली में हुई है। ह्यूमन ट्रैफिकिंग को लेकर जनजागृति लाने में ये फिल्में मील का पत्थर साबित हों, इसी उम्मीद के साथ। 

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

रावण मारो, शक्तिशाली बनो

 द शहरा आने को है। सब ओर तैयारियां चल रही हैं। मोहल्लों में रहने वाले बच्चे खुद ही रावण तैयार कर रहे हैं जबकि बड़ी मंडलियां चंदा जमा कर रही हैं, बाजार से रेडीमेड बड़ा रावण खरीदा जाएगा। छोटे-बड़े सभी रावणों को गली-मैदान में स्वाह कर दिया जाएगा। उल्लास मनाएंगे कि बुराई का अंत कर दिया। सब माया है। रावण तो जिन्दा है। हम सबके भीतर। तैयारी उसे मारने की होनी चाहिए। भीतर का रावण एक तीर से नहीं मरता, उसके लिए रोज सजग रहना पड़ता है कमान खींचकर, जैसे ही सिर उठाए, तीर छोड़ देना होता है। कई दिन तो रोज उसे मारना पड़ता है। इसके बाद फिर समय-समय पर उसका वध करना होता है। यह सतत प्रक्रिया है। लेकिन, हम मार किसे रहे हैं, बाहर के रावण को, वह भी पुतले को। असल रावण तो जीते रहते हैं, हम में और तुम में। ये हम और तुम का रावण मर गया फिर सब ठीक हो जाएगा। 
अब सवाल यह है कि आखिर भीतर कौन-सा रावण है। लोभ, वासना, बेईमानी, कायरता, आलस, क्रोध, स्वार्थ, कपट, झूठ और फरेब। ये सब भीतर के रावण हैं। इनसे युद्ध मनुष्य की प्राथमिकता होनी चाहिए। लोभ मनुष्य को भ्रष्टाचारी बनाता है। लोभ ही हमे बेईमान भी बनाता है। अब हम देखें कि लोभ के कारण आज देश की क्या स्थिति है और आम समाज को क्या नुकसान है। लोभ पर शुरुआत से ही काबू नहीं किया गया तो यह बढ़ता ही जाता है। यह कभी-भी कम नहीं होता। लोभी मनुष्य ने पहले हजारों के घोटाले किए फिर लाखों के और अब लाखों के घोटाले उनके लिए घोटाले ही नहीं हैं। क्योंकि लोभ बढ़ गया। यानी भ्रष्टाचार की सीमा बढ़ गई।  देश-समाज का नुकसान ज्यादा बढ़ गया। यही हाल वासना रूपी रावण का है। वासना के फेर में फंसकर अच्छे से अच्छा व्यक्तित्व धूमिल हो जाता है, क्षणभर में। सिर्फ व्यक्तित्व धूमिल नहीं होता बल्कि उसके साथ जुड़े मानबिन्दुओं पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। यदि धार्मिक चोला ओढ़कर बैठा व्यक्ति काम का शिकार हो जाता है तो लोगों का विश्वास डिगता है। इसका फायदा धर्म-परंपरा विरोधी लोग उठाते हैं। धर्म-परंपरा के नाम पर अपना जीवनयापन कर रहे चारित्रिक रूप से कमजोर व्यक्ति की आड़ में धर्म विरोधी लोग हमलावर भूमिका में आ जाते हैं। वे संबंधित धर्म पर आक्षेप लगाते हैं। परंपराओं पर अंगुली उठाते हैं। हालांकि जिस धर्म और समाज पर अगुंली उठाई जा रही होती है, वह धर्म और समाज ही चारित्रिक रूप से पतित व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता है। रावण को प्रकांड ब्राह्मण बताया जाता है लेकिन इसके बावजूद हिन्दू समाज में उसका आदर नहीं है। कारण, उसका अमर्यादित आचरण। इसलिए आपने जीवनभर में नाम रूपी जो पूंजी कमाई है, उसे बचाए रखना चाहते हैं, अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करना चाहते हैं तो वासना रूपी रावण का अंत बार-बार करते रहिए। 
दशहरा चूंकि शक्ति का पर्व है। इस दिन क्षत्रिय अपने हथियारों की पूजा करते हैं। पूर्वजों ने समाज को एक संदेश देने की कोशिश की है कि ताकत हासिल कीजिए। साथ में यह भी संकेत कर दिया कि इसका दुरुपयोग मत कीजिए। गरीब, असहाय पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं करें बल्कि उनकी रक्षा के लिए आगे खड़े रहें। साथ ही अन्य लोगों को भी यह आभास बना रहना चाहिए कि यह शक्तिशाली है ताकि वह आप पर हावी न हो सके। कमजोर को हर कोई दबाना चाहता है। भारतीय राजनीति इसका अच्छा उदाहरण है। यहां बाहुबली नेतागिरी कर रहे हैं। कमजोर की कोई पूछ नहीं। जो शक्तिशाली है, संगठित वोट बैंक हैं उनकी भारतीय राजनीति में भारी पूछपरख है, मौज भी उनकी ही है। शासन की योजनाएं भी उनके लिए हैं जबकि असंगठित बहुसंख्यक समाज की फिक्र तक किसी को नहीं। उसकी भावनाएं भी गईं चूल्हे में। 
मजबूत और शक्तिशाली दिखने की जरूरत जितनी व्यक्तिगत स्तर पर है, उससे कहीं अधिक एक देश के लिए आवश्यक है। इजराइल के संबंध में समझा जा सकता है। इजराइल छोटा-सा देश है लेकिन साहस उसका किसी ऊंचे पर्वत से भी विशाल है। चारों तरफ से शत्रु देशों से घिरा है लेकिन मजाल है कि कोई उसकी तरफ आंख उठाकर देख जाए। इजराइल ने अपनी शक्तिशाली छवि यूं ही नहीं बनाई है। उसने करके दिखाया है। अपने शत्रुओं को ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। जबकि भारत और पाकिस्तान के संबंध में ऐसा नहीं दिखता। पाकिस्तान बार-बार गुर्राता है। भारत की ओर आंखें तरेरता है। चार युद्ध हारने के बाद भी उसकी इतनी हिम्मत भारत की सुरक्षात्मक नीति के कारण है। भारत सरकार बार-बार उसके अमर्यादित व्यवहार को माफ करती है। जबकि होना यह चाहिए कि पाकिस्तान की ओर से कोई संदिग्ध गतिविधि की आशंका दिखे तो घटना घटने से पहले ही भारत की ओर से कार्रवाई कर दी जानी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने आ जाए। वह भारत विरोधी कदम उठाने से पहले सौ बार सोचेगा। 
दशहरा महज उल्लास का पर्व नहीं है। बल्कि बहुत कुछ संकेत की भाषा में बताने की कोशिश करता है। अपने भीतर के तमाम रावणों को मारो-जलाओ बाकि बाहर सब ठीक हो जाएगा। खुद सशक्त बनो तो समाज ताकतवर बनेगा और देश को भी मजबूती मिलेगी। आखिर लोकतंत्र है भारत में, नेता इसी समाज से चुनकर जाने हैं। जैसा हम समाज बनाएंगे, वैसे ही नेता चुने जाएंगे। लोभ, लालच, स्वार्थ सहित अन्य सारे रावणों पर विजय पा लेंगे तभी तो हम आने वाले वक्त में सही चुनाव कर सकेंगे। तो खींच लो कमान अब ज्यादा वक्त नहीं बचा।  

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

थैंक्स अ लॉट जेन

 ज र्मन युवती जेन वॉन रेबनाउ ने भारत के संदर्भ में अपने अनुभव साझा किए हैं। जेन के अनुभव भारत और भारतीय समाज को सुखद और गर्व की अनुभूति कराते हैं। सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जेन ने अमेरिकन युवती मिशेल क्रॉस को करारा जवाब दिया है। स्टडी ट्रिप पर भारत आई मिशेल ने यहां से जाने के बाद भारत को औरतों के लिए नरक बताया था। खासकर विदेशी युवतियों के लिए भारत को एक तरह से वाहियात बताया था। मिशेल ने ब्लॉग पर अपने अनुभव लिखे थे कि किस तरह भारतीय पुरुष लंपटों की तरह उसके रंग और सीने को घूरते थे। कभी-कभी तो पीछे ही पड़ जाते थे। इतना ही नहीं कुछ मौकों पर तो उसका रेप होते-होते बचा। मिशेल के अनुभवों से सभ्य भारतीय समाज ने लज्जा का अनुभव किया। शर्म से भारत का सिर झुक गया था। हालांकि हम भी जानते हैं कि मिशेल ने जो लिखा वह सच है लेकिन यह पूरे भारत का सच नहीं। इस तरह के लोग तो सभी देशों में पाए जाते हैं। ब्रिटेन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, चीन, अफ्रीका, अफगानिस्तान और अरब देश सहित अन्य देशों में भारतीय महिला-पुरुषों के साथ भी कई मौकों पर अभद्र व्यवहार होता है। खासकर सिख समाज को कई बार बेहद लज्जाजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन, यह तो कभी किसी ने नहीं कहा कि ये देश महिलाओं के लिए नरक हैं। लेकिन, भारत के प्रबुद्ध वर्ग की ओर से मिशेल को कोई जवाब नहीं दिया गया। अच्छा ही रहा। एक तो स्वयं अपनी वकालात करते तो शायद तथ्यों को उतनी स्वीकार्यता नहीं मिलती जितनी कि जर्मन युवती जेन की कथ्य से मिली है। दूसरा यह कि चलो अच्छा हुआ मिशेल ने अपने अनुभव साझा किए, इससे हमें आत्म चिंतन करने का मौका मिला। 
मिशेल की तरह ही जेन वॉन रेबनाउ भी भारत स्टडी टूर पर आई। महीनों भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहीं। दर्शन की छात्रा जेन भारत ही नहीं दुनिया के अन्य देशों की सैर भी कर चुकी हैं। जेन लिखती हैं कि वे मिशेल क्रॉस के अनुभवों को कई बार पढ़ चुकी हैं। मेरे लिए भारत के अनुभव सकारात्मक और रोमांचक हैं। भारतीयों के आतिथ्य से मैं काफी प्रभावित हूं। इसके बाद जेन ने अपने ब्लॉग पर मिशेल के अनुभवों का जवाब बिन्दुवार दिया है। वे कहती हैं कि हम आम भारतीयों से अलग दिखते हैं तो स्वाभाविक है कि वे हमें घूरेंगे ही। हम भी तो उन्हें घूरते हैं। वे हमारे फोटो खींचते हैं, मोबाइल में वीडियो बनाते हैं तो इसे हम अपनी निजता का हनन मानते हैं जबकि हम तो उनसे भी अधिक फोटो बिना इजाजत खींचते हैं। फिर इसमें फर्क क्यों? जेन लिखती हैं कि इटली में पुरुष महिलाओं को घूरते हैं तो इसे तारीफ समझा जाता है जबकि भारत में यौन शोषण, यह दोहरा मापदण्ड क्यों? जेन ने इस तरह से मिशेल के तमाम आपत्तियों को सिरे से खारिज किया है। वे भारतीयों की मेहमाननवाजी की कायल हो गईं और तारीफ करते नहीं थकतीं। उनका कहना है कि उनके बाकी दोस्तों के अनुभव भी भारत के संदर्भ में ऐसे ही सकारात्मक हैं। भारतीय संस्कृति से अभिभूत जेन बार-बार भारत आने की इच्छा जाहिर करती हैं। भारत के सकारात्मक पक्ष को दुनिया के सामने रखने के लिए हम भारतवासी उनका धन्यवाद करते हैं। भारत में जेन, उनके दोस्त और मिशेल सहित अन्य विदेशी पर्यटकों, छात्रों का स्वागत है। जरा-सी सावधानी आप बरतें तो भारत सभी के लिए स्वर्ग ही होगा। हम राम-कृष्ण के हामी है, प्रेम में भरोसा करते हैं। 
हाल के दिनों में कुछेक बेहद दर्दनाक और शर्मनाक घटनाएं भारत में हुईं। दिल्ली गैंगरेप और मुबंई रेपकाण्ड सहित अन्य घटनाओं ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर नारी को देवी के समान आदर देने वाले देश में उसे रौंदा जा रहा है। आखिर देश में चल क्या रहा है? मीडिया से लेकर प्रबुद्ध वर्ग की चिंताओं में भारत की जो छवि सामने आई वह वाकई सोचने वाली थी कि क्या सिर्फ इसी देश में महिलाओं की बदतर स्थिति है? बाकि दुनिया महिलाओं के लिए मुफीद है। अगर हम ऐसा मानते हैं तो यह एक झूठ के सिवा कुछ न होगा। सउदी अरब में महिलाएं अकेली घर के बाहर भी नहीं निकल सकतीं, उनके साथ किसी पुरुष को होना जरूरी है। यहां तक की घर में घुसने-निकलने के लिए महिला-पुरुषों के दरवाजे भी अलग-अलग हैं। तालिबान ने तो महिला शिक्षा की बात कर रही महज १५ साल की बच्ची मलाला यूसुफजई को गोली मार दी थी, उसकी किस्मत थी कि वह बच गई। पाकिस्तान में ९० फीसदी से ज्यादा महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार रहती हैं। माली में भी महिलाओं को घर से बाहर जाने के लिए पुरुष की इजाजत लेनी पड़ती है। सोमालिया भी महिलाओं के लिए एक बुरा देश माना जाता है। माली और सोमालिया में ९० फीसदी महिलाओं के गुप्तांग के अंग-भंग करने की बात सामने आई है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो को दुनिया की 'रेप की राजधानी' कहा जाता है। यहां महिलाओं का उपयोग युद्ध में भी किया जाता है। इसके अलावा भी कई देश हैं जहां महिलाओं को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ब्राजील, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूजीलैण्ड में भी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं आम हैं। 
दूसरे देशों के हाले-बयां करके यहां इस बात की तरफदारी करने की कोशिश कतई नहीं की जा रही है कि जब सब जगह ऐसा है तो भारत में ऐसी घटनाओं पर चिल्ला-तौबा क्यों? और न ही महिलाओं की अस्मिता पर नजर गड़ाने वाले भेडिय़ों का बचाव किया जा रहा है। बल्कि यह कहने का प्रयास है कि भारत को इसी रूप में पेश न किया जाए, भारत के सकारात्मक पक्षों पर भी बात की जाए। साथ ही महिलाओं के प्रति दुराचार की एक घटना भी न घट सके इसके लिए ठोस काम करने की जरूरत है। भारत दुनिया की श्रेष्ठ सभ्यता और संस्कृतियों के मालिकों में से एक है। भारत के मान को बनाए रखना और उसके गौरव को बढ़ाने की जिम्मेदारी  हम सभी भारतीयों के कंधों पर है। पूरी कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि देश की ही नहीं विदेश से आने वाली एक भी महिला को अपमानजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। बाहर से आने वाली प्रत्येक महिला जर्मन छात्रा जेन वॉन रेबनाउ की तरह भारत में मिले मान-सम्मान से अभिभूत होकर जाए और बार-बार यहां की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठाने के लिए आती रहे। जब भी भारत का जिक्र चले, वे धन्यवाद भारत कहें और हमें थैंक्स अ लॉट जेन की जगह वेलकम जेन कहने की आदत पड़ जाए।
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मिशेल क्रॉस के अनुभव -
http://aajtak.intoday.in/story/the-india-you-will-ashamed-to-know-us-students-haunting-account-1-740198.html
जेन वॉन रेबनाउ के अनुभव -
http://aajtak.intoday.in/story/india--a-blonde-tourist-an-alternate-account-1-740836.html

बुधवार, 10 जुलाई 2013

भाजपा के सेक्स लीडर

मध्यप्रदेश की राजनीति में कई बड़े सेक्स स्कैंडल हुए हैं, जिनके कारण ताकतवर नेताओं की राजनीति खत्म हो गई या उन्हें हाशिए पर जाना पड़ा और पार्टी की साख भी खराब हुई। संस्कारी नेताओं की फौज होने का दंभ भरने वाली भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों में सेक्स लीडर हैं। प्रदेश में पहला सेक्स स्कैंडल संभवत: १९६९ में चर्चा में आया था, तब कांग्रेसनीत प्रदेश सरकार में श्रम मंत्री गंगाराम तिवारी एक नर्स के साथ पाए गए थे। तब से अब तक कई नेताओं के उजले पाजामे के नाड़े खुल चुके हैं। फिलहाल तो मध्यप्रदेश की राजनीति में राघवजी सीडी काण्ड से बवंडर आया हुआ है। नौकर के साथ व्यभिचार में लिप्त राघवजी की सीडी फुल स्पीड से प्रदेश में चल रही है। मोबाइल-दर-मोबाइल राघवजी की नंगई ब्लूटूथ और व्हाट्अप से शेयर कर देखी जा रही है। नौकर ने पुलिस से शिकायत में राघवजी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसने कहा है कि राघवजी के एक अन्य कर्मचारी की पत्नी से भी १५ साल से शारीरिक संबंध हैं। राघवजी उस पर दबाव डालते थे कि उनकी खातिर वह गर्लफ्रेंड बनाए और शादी भी कर ले। आरोप और भी हैं। 
भाजपा के वयोवृद्ध नेता और प्रदेश सरकार में वित्तमंत्री राघवजी की घिनौनी हरकत पर भारतीय जनता पार्टी के चाल, चरित्र और चेहरे के सिद्धांत पर अंगुली उठाई जा रही है। ७९ वर्षीय राजनेता ने अपनी जमा पूंजी एक झटके में राजनीतिक ढलान पर चुका दी है। अपना मुंह तो काला किया ही पार्टी को भी परेशानी में डाल दिया। हालांकि राघवजी को पहले मंत्री पद से बर्खास्त करके और फिर दूसरे दिन पार्टी से निष्कासित कर भाजपा ने अपना चेहरा बचाने की कोशिश की है। इस त्वरित एक्शन से उसको अपना बचाव करने में मदद मिल रही है और आगे भी मिल सकती है। भाजपा कह सकती है पार्टी का चाल, चरित्र और चेहरा वही है जो पहले था। गलत कार्यों में लिप्त नेताओं के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि ५८ साल पार्टी की सेवा करने वाले राघवजी को घिनौने कृत्य पर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन, सवाल उठता है कि क्या पार्टी को यह कदम पहले नहीं उठा लेना चाहिए था? क्या पार्टी को अब तक राघवजी की रंगीन रातों और काले दिनों की खबर नहीं थी? दूसरे नेताओं के खाते में भी तो इस तरह के गंभीर आरोप हैं, उन्हें क्यों नहीं पार्टी से बाहर किया गया? क्या सिर्फ इसलिए कि उनकी सीडी बाहर नहीं आई है? क्या सीडी बाहर आना ही कार्रवाई के लिए जरूरी है? नेता में उच्च चारित्रिक गुणों की अपेक्षा रखने वाली भारतीय जनता पार्टी में आखिर सेक्स लीडर घुस कैसे जाते हैं? और जानकर भी क्यों पार्टी के आला नेता कार्रवाई से बचते हैं?
राघवजी के काले चेहरे को भाजपा के ही कार्यकर्ता शिवशंकर पटैरिया ने सीडी में कैद किया है। पटैरिया के मुताबिक उन्होंने राघवजी की २३ सीडी बनाई हैं। प्रदेश के अन्य नेताओं की सीडी होने का भी दावा पटैरिया ने किया है। उनका दावा है कि वे लम्बे समय से पार्टी में गंदे नेताओं की शिकायत करते रहे हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होते देख उन्होंने सीडी बनाने का फैसला किया। पटैरिया के इस दावे में सच्चाई है। प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री अरविन्द मेनन, मंत्री बाबूलाल गौर, कुंवर विजय शाह, नरोत्तम मिश्रा, अजय विश्नोई, विधायक ध्रुवनारायण सिंह जैसे कई नाम शामिल हैं, जिनके खिलाफ भाजपा में ऊपर तक चारित्रिक दोष की शिकायतें पहुंची हैं। मीडिया में आए दिन ऐसे मामलों को लेकर भाजपा के कई सेक्स लीडर सुर्खियों में रहे हैं। अरविन्द मेनन के खिलाफ जबलपुर की सुशीला मिश्रा ने शोषण के आरोप लगाए हैं। इस मामले में मानवाधिकार आयोग में भी शपथ-पत्र दायर किया गया है। लेकिन, भाजपा आरोप साबित नहीं होने के बहाने अपने संगठन मंत्री को बचाने में लगी है। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का नाम भी भाजपा की ही कार्यकर्ता शगुफ्ता कबीर के साथ जोड़ा गया। शगुफ्ता कबीर के पति ने प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाया था कि गौर उनकी गृहस्थी उजाड़ रहे हैं। इसके बाद पार्टी के अंदरखाने में काफी बवाल मचा और बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी। इतना सब होने के बाद भी उन्हें पार्टी से निष्कासित नहीं किया गया। विधानसभा में भी कांग्रेसी नेता महिलाओं के साथ गौर के आपत्तिजनक फोटो लहरा चुके हैं। आरटीआई कार्यकर्ता शहला मसूद मर्डर के बाद तो भाजपा के विधायक ध्रुवनारायण सिंह से लेकर सांसद व राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय का नाम सेक्स संबंधों में सामने आया। तरुण विजय के शहला मसूद से करीबी संबंध उजागर हुए तो शहला-ध्रुवनारायण-जाहिदा ट्रायएंगल लव के किस्से तो प्रदेशभर में नमक-मिर्च लगाकर सुने-सुनाए जाने लगे। लेकिन, राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया। जबकि गंभीर सबूत होने के बावजूद ध्रुवनारायण सिंह को पार्टी से निष्कासित न करके, दिखावे के लिए उनका प्रदेश उपाध्यक्ष का पद छीन लिया गया। कामक्रीड़ा में डूबे मंदसौर के जिलाध्यक्ष कारूलाल सोनी को जरूर बाजार में सीडी आने के कारण पार्टी से चलता कर दिया गया। ऐसे में कारूलाल सोनी और राघवजी का मामला यह स्पष्ट करता है कि जब तक सीडी बाजार में नहीं आ जाती, तब तक पार्टी खूब अय्याशी की छूट देती है। यही कारण है कि करीब एक साल पहले ही इन्हीं राघवजी की महिला के साथ सीडी बनने की चर्चा जोरों पर थी लेकिन बाजार में नहीं आने के कारण भाजपा ने कोई कार्रवाई नहीं की बल्कि मामले को दबा दिया। यदि तब ही राघवजी पर कार्रवाई हो जाती तो आज भाजपा को राघवजी के कारण लज्जित नहीं होना पड़ता। 
असल में पार्टी संगठन को सब जानकारी रहती है कि कौन सेक्स लीडर है। लेकिन, कार्रवाई करने वाले नेताओं के पाजामे के नाड़े भी उतने ही ढीले हैं। उनका नाड़ा भी किसी ने थाम रखा है, ऐसे में खुद के नंगे होने का भी डर रहता है। यही कारण है कि आला नेता भी सब हकीकत जानकर भी चुप रहते हैं। लेकिन भाजपा को खुद को कांग्रेस या कांग्रेस से भी गया बीता होने से बचाना है तो कठोर नियम बनाने होंगे। औरों से अलग दिखने की धारणा को साबित करने के लिए गंदगी तो रोकनी ही होगी। नेता-कार्यकर्ता के खिलाफ शुरुआती शिकायतों की पार्टी स्तर पर ही जांच करा लेनी चाहिए। शिकायतें सही पाए जाने पर तालाब गंदा हो, कमल मुरझाए उससे पहले ही सड़ी मछली को बाहर फेंक देना चाहिए। इसका असर यह होगा कि बीमार मानसिकता और नैतिक रूप से पतित नेता भाजपा में आने की सोच ही नहीं सकेंगे क्योंकि उन्हें ध्यान रहेगा कि भाजपा औरों से अलग है। यहां गंदे काम पर राजनीतिक करियर किसी भी मोड़ पर चौपट होने में देर नहीं लगेगी। राघवजी प्रकरण से भाजपा को सबक लेना चाहिए कि नेता का जनाधार, लोकप्रियता, सीट जिताऊ क्षमता और धन की नदी बहाने की काबिलियत के आधार पर कार्रवाई में पक्षपात न हो, देर न हो, इसकी भी पार्टी स्तर पर चर्चा की जाने की जरूरत है। नेता कोई भी हो कठोर नियम पूरी कठोरता से लागू किया जाए। 
गंदगी कहां से आ रही है : समस्या सिर्फ राजनीति की ही नहीं है। आम समाज भी सेक्स और पैसे के पीछे अंधे घोड़े की तरह भाग रहा है। उसी समाज के बीच से नेता चुनकर राजनीति में आ रहे हैं। हालांकि राजनीति में प्रवेश के समय सभी नेता सात्विक, चारित्रिक और सेवाभावी छवि का मुखौटा लगाए रहते हैं लेकिन सत्ता पाते ही औकात पर आ जाते हैं। चूंकि राजनेता मीडिया की निगाहों में रहते हैं इसलिए उनके सेक्स शौक के चर्चे आम आदमी की तुलना में बेहद चर्चित हो जाते हैं। यूं भी राजनेताओं से आम नागरिक की तरह व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जाती है। असल में समाज के नेता की भूमिका में बने रहने के लिए तपस्वी जीवन जरूरी है। लोकतांत्रिक राजनीति के विकास और विस्तार के लिए भी चरित्रवान लोगों का होना बुनियादी शर्त है। चूंकि भाजपा से जनमानस की अधिक अपेक्षाएं हैं, समाज भाजपा को भारतीय मूल्यों के प्रतिनिधि के रूप में देखता है, भाजपा की छवि राष्ट्रवादी पार्टी की है, ऐसे में भाजपा के बड़े लीडरान को इस मसले पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। 

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

मनुष्य जाति में स्त्री सबसे ज्यादा कामुक?

 भा रत में बाजार यौन फंतासियों के इर्द-गिर्द सिमट रहा है। विज्ञापन जगत मनुष्य की यौनिक संवेदनाओं को कुरेद-कुरेद कर जगा रहा है और पैसा बना रहा है। क्या नैतिक और क्या अनैतिक, इससे उसे कोई वास्ता नहीं। विज्ञापन बाजार बस मनुष्य की मनुष्यता का दोहन कर रहा है। यौन व्यवहार को जीवन की प्राथमिकता और सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। टेल्क पाउडर से लेकर सोड़ा पाउडर तक बेचने के लिए नग्नता बेधड़क परोसी जा रही है। ऐसा नहीं है कि विज्ञापन के क्षेत्र में सृजन की कमी है। यहां कई रचनाधर्मी काम कर रहे हैं। नतीजतन, कई बेजोड़ विज्ञापन देखने में आ रहे हैं, जो समाज की बुराई पर सीधी चोट कर रहे हैं, मनुष्य के कलेजे को फड़कने का बंदोबस्त कर रहे हैं। फिर भी, बाजार के चूल्हे पर गंदगी क्यों उबल रही है? समझ से परे है। ऐसे में कई बार साजिश की बू आती है। जैसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को पीछे धकेलने का षड्यंत्र रचा जा रहा हो। मनुष्य से उसकी मनुष्यता छीनने की साजिश हो। इंसान को यौन संदर्भ में जानवर बनाने की व्यवस्था हो। जो भी है यह, बेहद घातक है। संभलना होगा हमें, निगरानी संस्थाओं और नीति निर्माताओं को भी। उत्पादन बेचने के लिए विज्ञापन कंपनियों की मनमानी अधिक दिन तक नहीं चलनी चाहिए। इस मनमानी को रोकने में ही सबकी भलाई।
    एक दिन मेरे परिवार का नन्हा सदस्य (तीन वर्ष) अपने बालों को सीधा करते हुए बुदबुदा रहा था। मैंने उससे पूछा क्या कर रहा है? इस पर उसने इतराते हुए कहा- मामा, ऐसा करने से लड़कियां फिदा हो जाएंगी। दरअसल, वह कोमल हृदय का बालक 'बालों में लगाए जाने वाले जैल' के विज्ञापन की नकल कर रहा था यानी वह उक्त भौंड़े विज्ञापन से सीख रहा था लड़की पटाने का फंडा। कुछ समय पहले एक जेंट्स अण्डरवियर का विज्ञापन आता था। इसमें अण्डरवियर को धोते वक्त महिला को अतिकामुक होते दिखाया जाता था। इस विज्ञापन पर बड़ा बवाल मचा। मचना भी चाहिए था। बाद में इसका प्रसारण बंद हो गया। लेकिन, ऐसे विज्ञापन तो अब भी बड़ी संख्या में बन रहे हैं और दिख रहे हैं।
स्त्रीत्व का निरादर : बॉडी स्प्रे की खुशबू से मदहोश होकर सारी वर्जनाएं तोड़कर युवक के पीछे युवती का चले आना, बिस्तर से अंतवस्त्रों को उतार फेंकना। कपड़े (जींस) के विज्ञापन में नग्न पुरुषों को दिखाना। यहां भी उक्त कंपनी के जींस पहनने के बाद पुरुषों का संसर्ग पाने के लिए स्त्री को लंपट होते दिखाया गया है। डर्टी विज्ञापन नग्नता ही नहीं परोस रहे बल्कि स्त्री अस्मता से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। यह अधिक चिंता की बात है। डर्टी कैटेगरी के सभी विज्ञापन यही दिखाते हैं कि मनुष्य जाति में स्त्री सबसे ज्यादा कामुक है। काम इच्छाओं पर उसका जोर नहीं, वह इनके आगे हार जाती है। स्त्री की सोच सेक्स से शुरू होकर सेक्स पर ही खत्म हो जाती है। डर्टी विज्ञापन में भारत में शीर्ष पर बैठी स्त्री को दोयम दर्जे पर धकेलने का षड्यंत्र साफ दिखता है।
सकारात्मकता ही है हिट फार्मूला : सामान बेचने के लिए डर्टी विज्ञापन ही एकमात्र सफल फार्मूला नहीं है। निरमा, एमडीएच मसाला, टाटा चाय, बजाज स्कूटर सहित कई उदाहरण हैं। इन कंपनियों के ऐसे कई विज्ञापन हैं जो इतिहास के पृष्ठ पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गए हैं। एक भी डर्टी विज्ञापन उतना बड़ा हिट नहीं हुआ जितना कि ये साफ-सुथरे विज्ञापन रहे। आजकल प्रसारित हो रहा चाय कंपनी का विज्ञापन - देश उबल रहा है। उबलेगा तभी तो आएगा जोश, बढ़ेगी मिठास, बदलेगा देश का रंग....  भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में चल रही मुहिम का हिस्सा लगता है। इस विज्ञापन को देखकर लगता है कि समाज जागरण का काम तो सामान बेचने के साथ भी किया जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक यह विज्ञापन अन्य डर्टी विज्ञापन से कही अधिक हिट है। ग्राहक को उत्पाद की ओर आकर्षित तो करता ही है उसके मन में कुछ करने का जज्बा भी भरता है। इस तरह के विज्ञापन मनुष्य देह के उन्नत शिखर (मस्तिष्क) में स्पंदन करते हैं। यहां स्पष्ट कर हूं कि मेरा ऐसा मानना कतई नहीं है कि आप सामान न बेंचे या हर सामान बेचने के साथ समाज सृजन करें। लेकिन, कम से कम समाज को दूषित तो न करें। हर कोई आगे जाना चाहता है। बाजार में अपनी 'आवाज' सबसे ऊंची रखना चाहता है। लेकिन, इसके लिए समाज को क्या कीमत चुकानी पड़ रही है यह तो सोचना ही पड़ेगा।

प्रतिक्रियाओं पर देना होगा ध्यान :  समाज जागरण में लगी संस्थाओं के प्रयासों के चलते नागरिक जागरूक हुए हैं, वे अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराने के लिए आगे आने लगे हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में डर्टी विज्ञापनों के खिलाफ काफी शिकायतें हुई हैं। विज्ञापनों पर नजर रखने वाली स्वयंसेवी स्वनियंत्रित संस्था एडवरटाइजिंग काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) के पास प्रतिदिन डर्टी विज्ञापनों को लेकर हजारों शिकायतें पहुंचती हैं। अफसोस की बात है कि इसके बाद भी इस तरह के विज्ञापनों पर रोक लगना तो दूर इनमें कमी नहीं आई है। हालांकि इस बीच एएससीआई ने सूचना प्रसारण मंत्रालय को इस संबंध में एक प्रस्ताव भेजा है। इस प्रस्ताव में डर्टी विज्ञापनों का प्रसारण रात ११ से सुबह ६ बजे के बीच करने की सिफारिश की गई है। एएससीआई ने बाकायदा ऐसे विज्ञापनों की सूची भी मंत्रालय को भेजी है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भी इस मसले को गंभीरता से लिया है। विभाग की मंत्री अंबिका सोनी ने हाल ही में लोकसभा के प्रश्नकाल में बताया था कि विज्ञापनों की नीति निर्धारण के लिए मंत्रियों का एक समूह बनाया गया है। यह समूह जल्द ही इस मसले पर अपनी राय देगा। डर्टी विज्ञापनों का प्रसारण रात ११ से सुबह ६ बजे के बीच करने से समस्या का हल नहीं होगा। क्योंकि आजकल की जीवनशैली ऐसी है कि बच्चे भी देर रात तक टेलीविजन देखते हैं। डर्टी विज्ञापनों को लेकर लोगों में कितना आक्रोश है, उनकी क्या प्रतिक्रियाएं हैं और वे क्या चाहते हैं, मंत्रियों के समूह को यह जरूर जानना चाहिए। मंत्री समूह की राय कुछ ऐसी हो जो लोगों को पसंद आए न कि कंपनियों के मालिकों को। मंत्री समूह को इस दिशा में अपनी राय बनाने से पहले उन तमाम प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करना चाहिए जो एएससीआई पर प्रसारण मंत्रालय तक लोगों ने पहुंचाईं हैं।

सोमवार, 11 मार्च 2013

समान अधिकार और सम्मान चाहिए, विशेषाधिकार नहीं

 बैं क में भारी भीड़ थी। लोग घंटों से लाइन में लगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। तभी कॉलेज की एक लड़की आती है। उम्र २०-२२ साल। तंग कपड़े पहने हुए और आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ाए हुए थी। भीड़ देखकर परेशान थी। लेडीज फर्स्ट जुमले का फायदा उठाने के लिए लाइन खड़ी न होकर काउंटर पर आगे चली गई। तभी एक युवक ने उसे आवाज दी- ओ दोस्त लाइन में आ जाओ। हम भी बहुत देर से यहां खड़े हैं। क्या हो जाएगा? यदि मैं तुमसे पहले ड्राफ्ट बना लूंगी तो। अकेली ही तो हूं, बस पांच मिनट का ही तो अंतर आएगा। अब दूसरा दृश्य देखिए रेलवे स्टेशन टिकट के लिए लंबी कतार। ठीक बैंक वाली लड़की जैसी ही टिप-टॉप लड़की यहां भी आती है। आगे की ओर खड़े लोगों से अपना टिकट लेने का निवेदन करती है। इस पर एक युवक ने उससे कहा - अरे बहन, तुम खुद ही पहले टिकट ले लो। कहां लड़कों के साथ लाइन में फंसोगी। लकड़ी मुस्काती हुई आगे जाती है और टिकट ले लेती है। एक और दृश्य देखिए। मल्टीप्लेक्स सिनेमा का टिकट काउंटर। टिकट लेने के लिए लंबी लाइन लगी है। यहां भी महिलाओं की अलग से लाइन नहीं है। वह दो पल के लिए खड़ी होकर सोच ही रही थी कि टिकट ले या नहीं। इसके बाद वह लाइन में लगने लगी। लाइन में खड़े एक-दो लड़कों ने कहा- अरे आप कहां लाइन में लग रही हो। आप तो लड़की हो, आगे चली जाओ। वह पहले टिकट मिल जाएगा। यहां लड़की का जवाब गौर करने लायक था। उसने कहा- मुझे जरूरत नहीं। लड़की होने के कोई विशेषाधिकार नहीं चाहिए। जितने विशेषाधिकार देने थे, ऊपर वाले ने दे दिए हैं। धरती पर तो बस सम्मान और समान अधिकार चाहिए।
    तीनों लड़कियों में आखिरी वाली लड़की ने पते की बात कही। विशेषाधिकार तो कमजोर होने की निशानी है। स्त्रियां सदैव से यह सिद्ध करती आई हैं कि कम से कम वे पुरुषों के मुकाबले किसी काम में कमजोर तो नहीं ही है। बल्कि की आगे ही हैं। व्यक्तिगत गुणों के मुकाबले भी पुरुष उनके सामने कहीं नहीं टिकता। अब देखें तो नारी आंदोलन के नाम पर हो उल्टा रहा है।  स्त्री के लिए विशेषाधिकार की मांग की जा रही है। जिसकी उसे कतई जरूरत नहीं है। उसके जीवन में कमी है तो समान अधिकार की। सम्मान की। ये उसे मिल जाए तो फिर किसी विशेषाधिकार की उसे जरूरत नहीं रह जाती। बलात्कार के खिलाफ दिल्ली में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ। कानून में भी फेरबदल किया गया। लेकिन, क्या इससे बलात्कार की घटनाओं में कमी आई। जवाब है नहीं। लड़कियों को उसी रफ्तार से रौंदा जा रहा है। महानगर से लेकर कस्बे तक एक जैसे हालात हैं। सवाल उठता है कि तो कैसे बदलाव आएगा? क्या कानूनों को कड़ा नहीं किया जाना चाहिए? जरूर आएगा बदलाव। कानून भी कड़े होने चाहिए सभी तरह के अपराधियों के लिए। यह अलग बात है कि बदलते दौर में कड़े कानून स्त्रियों के सहायक तो हो सकते हैं लेकिन उसके प्रति समाज की सोच नहीं बदल सकते। स्त्री को देखने, सोचने और समझने का नजरिया बदलना होगा। इसकी शुरुआत किसी कानून के बनने से नहीं हो सकती। मन बनाना होगा। समाज यानी स्त्री-पुरुष दोनों को खुद से करनी होगी शुरुआत। स्त्री को कदम-कदम पर क्षणिक लाभ लेने के लिए खुद को कमजोर साबित करने से बचना होगा। उसे लेडीज फर्स्ट के जुमले को छोडऩा होगा। मैं नारी हूं इसलिए मेरी मदद कीजिए, यह भी नहीं चलने देना होगा। पुरुष को भी यह खयाल दिल से निकालना होगा कि नारी को उसकी जरूरत है। देखने में आता है कि कोई लड़का गाड़ी धकेलकर ले जा रहा है तो कोई उससे नहीं पूछता कि क्या दिक्कत है? मैं क्या मदद कर सकता हूं? लेकिन, स्थिति इसके उलट हो यानी जब कोई लड़की गाड़ी धकेलकर ले जा रही हो तो राह चलते सौ लोग रुककर उससे पूछते हैं, क्या हुआ? कोई मदद तो नहीं चाहिए? पुरुषों को हर काम में लड़कियों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाने की मानसिकता से भी पीछा छुड़ाना होगा। इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। अपनी बहन-बेटी को स्कूल-कॉलेज छोडऩे जाने की बजाय उसे स्वयं जाने दिया जाए। घर में बेटे के समान ही बेटी को भी पढ़ाई का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए। उसे सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ाना चाहिए कि ब्याह करने में दिक्कत न आए। उसे अच्छा नौकरीपेशा वर मिल सके। जिस तरह लड़के को अफसर बनाने के लिए पढ़ाई पर पैसा खर्च किया जाता है वैसी ही बिटिया को भी अफसर बनाने का सपना देखना चाहिए। घर की संपत्ति में भी पुत्र के बराबर पुत्री को हक देना चाहिए। इस मामले में अभी समाज बहुत रूढि़ है। घर की सबसे लाड़ली सदस्य से पिता, मां और भाई भी उस समय खपा हो जाते हैं, जब वह शादी के बाद पैतिृक संपत्ति में से अपना हिस्सा मांग ले। इस वक्त घरवालों का एक ही कहना होता है कि दहेज तो दे दिया, अब क्या भाइयों का हिस्सा भी चाहिए। खून के रिश्ते बिगडऩे से बचाने के लिए घर की बेटी छोटी-मोटी नौकरी करके गुजारा कर लेती है लेकिन किसी भी आपात स्थिति में वह पिता की संपत्ति में से हिस्सा नहीं मांगती। यहां समानता लाने के लिए काफी प्रयास करने होंगे। असमानता और विभेद की लकीर घर में बेटा और बेटी को दी जाने वाली अलग-अलग नैतिक शिक्षा से भी बनती है। बेटे के लिए भरपूर आजादी। बेटी को ये नहीं करना चाहिए, वो नहीं करना चाहिए, तमाम बंदिशें। जबकि नैतिकता और मर्यादा का पाठ लड़की के साथ-साथ लड़कों को भी पढ़ाया जाए तो ठीक बनेगा आने वाला समाज।
    दिक्कत कहां है? क्यों तमाम प्रयास के बावजूद हम वहीं के वहीं खड़े हैं? इसके लिए हम सबके साथ-साथ बहुत हद तक नारी को आधुनिक बनाने के नाम पर चल रहे तमाम नारी आंदोलन भी जिम्मेदार हैं। मशहूर नारीवादी चिंतक जर्मेन ग्रीयर का कथन याद आता है कि नारीवादी आंदोलनों ने भारतीय नारी को बस तीन चीजें दी हैं- लिपस्टिक, हाईहील सैंडल और ब्रा। हम सबकी नजर में भी आधुनिक स्त्री की छवि लाली-पाउडर पोते, स्टाइलिश बाल कटवाए और जींस-टीशर्ट पहनने वाली लड़की की है। इतना ही नहीं नारीवादी आंदोलनों से जुड़े लोग नारी की आजादी के नाम पर सिर्फ यौनिक आजादी की ही प्रमुखता से चर्चा करते हैं। जिसका खामियाजा स्त्री को ही उठाना पड़ रहा है। यौनिक आजादी की आड़ में बाजार ने उसे अपना गुलाम बना लिया है। बाजार ने आधुनिक नारी का समूचा व्यक्तित्व उसके शरीर पर केन्द्रित कर दिया है। नारी देह दिखाकर साबुन से लेकर सीमेंट तक बेचा जा रहा है। बाजार अपने मतलब के लिए नारी देह से सारे लिबास नोंच लेना चाहता है।
    बाजार और नारीवादी आंदोलन के नाम पर आए भटकाव से तो स्वत: नारी को ही बचना होगा। उसे तय करना चाहिए कि उसकी पहचान कैसे हो? उसे जरूरत नहीं पुरुषों की नजरों में सुंदर दिखने की। उसे ही तय करना होगा कि बाजार की ओर से सुझाए कपड़े उसे पहनने हैं या फिर देह और देश-काल के अनुरूप। उसे जरूरत नहीं किसी का सामान बेचने के लिए अपना शरीर बेचने की। उसे घर से लेकर बाजार तक स्वयं को मजबूत साबित करना होगा। कहीं भी अगर पुरुष उसे कमजोर समझ कर आगे जाने का अवसर दे या दया भाव दिखाए तो स्त्री को ताकत के साथ उसका प्रतिरोध करना चाहिए। बराबर ताकत वाले का सब सम्मान करते हैं।

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

दामिनी कह गई- अब सोना नहीं

 दु: खद, बेहद दु:खद 2012 का आखिरी शनिवार। दामिनी चली गई। हमेशा के लिए इस बेदर्द दिल्ली से। बेहया दुनिया से, जहां उसे सिर्फ मांस की तरह देखा गया। भेडिय़ों ने नोंचा था, 13 दिन पहले उसका जिस्म। १३ दिन बाद मौत हो गई भारत की अस्मिता की। घनघोर शर्मनाक दिन था 16 दिसंबर, जब भारत के दिल में महज रात 9 बजे, चलती बस में दामिनी की आत्मा का बलात्कार किया ६ हरामखोर भेडिय़ों ने। 17 दिसंबर की सुबह लज्जा से सिकुड़ गया था सारा देश (युवा), जमा हो गया राजपथ पर, इंडियागेट पर और संसद के माथे पर। आक्रोशित, उद्ेलित, बेबस देश अपनी ही सरकार से पूछ रहा था- नारी को पूजने वाले देश में अब नारी कहां सुरक्षित रह गई है? सरकार आखिर करती क्या है? कब तक यूं ही तार-तार होती रहेगी मर्यादा, आजादी और दामिनी?
    शर्मनाक आंकड़ा है- भारत में हर 20 मिनट में एक दामिनी के साथ बलात्कार होता है और हवस का शिकार बनाया जाता है। हर 25 मिनट में किसी न किसी सार्वजनिक जगह, बस, ट्रेन, चौराहा, मॉल, स्कूल-कॉलेज या बाजार में दामिनी को छेड़ा जाता है। उस पर अश्लील फब्तियां कसी जाती हैं। ये इस हद तक अश्लील और अमर्यादित होती हैं कि कई दामिनी घर जाकर जिंदगी ही खत्म कर लेती हैं। वर्ष 2009 में 23 हजार 996, वर्ष 2010 में 25 हजार 215, वर्ष 2011 में 26 हजार 436 और वर्ष 2012 में भी लगभग बीते वर्ष के बराबर दामिनी भूखे जानवरों का ग्रास बनीं। लेकिन, देश अब जागा। देर से ही सही जागा तो सही वरना और देर हो जाती। ये मामले ऐसे हैं, जिनमें चार्जशीट दाखिल हुई। इसके इतर कई मामले तो थाने ही नहीं पहुंच पाते तो कई मामले थाने में ही समझौते के बाद खत्म हो जाते हैं। इतना ही नहीं उक्त मामलों में महज 22 फीसदी बलात्कारियों को ही सजा हुई। जबकि बलात्कार की शिकार प्रत्येक दामिनी रोज सजा पा रही है। जिंदगीभर भेडिय़े की हरकत उसे भीतर ही भीतर खाये जाती है।
    देश इस बार जागा था कि अपराधियों को फांसी से कम सजा पर नहीं मानेगा, चुप नहीं बैठेगा। देश की यह स्व स्फूर्त जाग्रति है। सोशल मीडिया की इसमें अहम भूमिका है। निरुत्तर सरकार देश को जवाब देने की जगह पुलिस को देश पर लाठियां भांजने का हुक्म देती है। लेकिन, इस बार गुस्सा पानी का बुलबुला नहीं था। युवा राजपथ पर डट गए, सह गए पानी की तेज धार। आंसू गैस के गोले क्या रूलाते आंखें तक 16 दिसंबर को ही सूख गईं थी। युवा जोश के सामने बेकार साबित हुए पुलिस के अश्रु गोले। पीठ, पैर और सीने पर लाठी खाकर भी मुंह से उफ नहीं निकली, निकली तो बस एक आवाज- वी वांट जस्टिस। बलात्कारियों को फांसी दो। देश की अस्मित की सुरक्षा की गारंटी दो..... सरकार फिर भी खामोश रही। सोनिया के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी आज भी कायम रही। युवराज हमेशा की तरह लापता थे। मंत्री फितरत के मुताबिक आज भी देश को टरकाने के मूड में दिखा। दिल्ली की महारानी एक बार भी पीडि़त के हाल जानने नहीं पहुंची। सब दूर से निराश युवा इंसाफ की आस लिए नए नवेले राष्ट्रपति प्रणव दा के पास भी गया था लेकिन वहां भी सन्नाटा ही पसरा था। न्याय नहीं मिलता देख आखिर युवा मन उखड़ गया। लेकिन, हारा नहीं। अब तो मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल.... मुंबई यानी सारा देश साथ खड़ा हो गया दामिनी के हक के लिए। आधी आबादी के लिए। सृष्टि के शक्ति केन्द्र के सम्मान में सब दूर आवाज बुलंद हो उठी। जज्बा, उत्साह, उमंग, हौसला, गुस्सा और आक्रोश ऐसा दिखा कि सरकार से आर-पास की लड़ाई हो ही जाए। नारा बुलंद हुआ- कितना दम है दमन में तेरे, देखा है और देखेंगे। गूंजी मांग - जब तक इंसाफ नहीं होता ये आक्रोश ठंडा नहीं पड़ेगा। कानून कड़े बनाए। सुधार लाओ। सुरक्षा पुख्ता करो। बलात्कारियों को फांसी दो। 13 दिन से आक्रोश बरकरार था। अब अलविदा कह गई दामिनी। तो क्या गुस्से को ठंडा होने दिया जाए। सरकार तो यही चाहती है। लेकिन, आज फिर युवा देश ने कह दिया- अभी न्याय बाकी है, गुस्सा बाकी है, लड़ाई जारी है और जारी रहेगी इंसाफ होने तक। 29 दिसंबर को दामिनी चली गई हमें बेशर्म व्यवस्था से अपने अधिकार के लिए लडऩा सिखाकर। उसकी सीख जाया नहीं होने देना है, गुस्सा खत्म नहीं होने देना है। कभी नहीं जागने वाली नींद में जाने से पहले कह गई वो- अब और कोई दामिनी नहीं बननी चाहिए। न्याय चाहिए। मेरे हक में उठे हाथ, आवाज अब खामोश नहीं होने चाहिए। युवा मन में जो उबाल आया है वह ठंडा नहीं होना चाहिए। नींम बेहोशी से जो देश जागा है तो अब सोना नहीं चाहिए।
    इन १३ दिन में राजनीति के पतन का शीर्ष भी दिखा तो हड़बड़ाए नेताओं का मानसिक दिवालियापन भी सामने आया। लोमहर्षक, बीभत्स, नृशंस अपराध के बाद भी नेता जुबान संभालकर बात नहीं कर पाते। प्रणव दा के बेटे अभिजीत कहते हैं कि कैंडल मार्च फैशन हो गया है। दिन में प्रदर्शन, शाम को कैंडल जलाने के बाद ये रंगी-पुती युवतियां पब में मौज उड़ाती हैं। एक महिला नेता कहती है कि जब छह लोगों ने घेर लिया था तो उसे वीरता दिखाने की क्या जरूरत थी, सरेंडर कर देना चाहिए था। महिला अधिकारी की हितैषी एक अन्य महिला कहती है कि इतनी रात फिल्म देखने जाएंगी तो यही होगा। घोर आपत्तिजनक हैं ये बयान। चाय की गुमठी और चौराहे पर पान की पीक थूकते लोग भी शायद इस समय ऐसी बात कर रहे हों। दूसरे नेता कहते हैं कि देश में अराजक स्थितियां हैं। सवाल उठता है कि इन स्थितियों के लिए कौन जिम्मेदार है? कौन संभालेगा देश? एक ने कहा कि माहौल ऐसा है कि मेरी बेटियां भी सुरक्षित नहीं। महोदय यह सफेद झूठ है। आपकी बेटियां जिस दिन असुरक्षित हो जाएंगी तो झट से कड़े कानून आ जाएंगे। तब दरिंदे 13 दिन तक जीवित नहीं रहेंगे। शर्म करो... संसद और विधानसभा में बैठकर काम करने की जगह अश्लील फिल्म देखते हो, दामिनी पर बहस होती है तो खीसें निपोरकर हंसते हो। कुछ काम करो ताकि आम आदमी की बेटी, पत्नी, बहू घर से बिना संकोच निकले, शान से सिर उठाकर सड़क पर चले और बिना किसी अपमानजनक स्थिति का सामना किए खुशी मन से घर लौट सके। कानून में सुधार लाओ। वैज्ञानिक तरीके से सबूत जुटाए जाएं। पुलिस को संवेदनशील बनाओ। गवाहों को सरंक्षण दो। फास्ट ट्रैक कोर्ट पर सुनवाई हो ताकि अपराधी बचकर न निकल सकें। उनमें खौफ पैदा हो। गलत काम की कीमत उन्हें चुकानी पड़े।
    आखिर में लंबी नींद से जागे हुए देश से अपील है। जिंदगी की जंग हारने से पहले दामिनी जगा गई है देश को। 13 दिन देश सोया नहीं, थका नहीं, डरा नहीं सरकार के वार से। इस जज्बे को बनाए रखना होगा वरना फिर किसी चलती बस में, होटल में, पब में या फिर किसी चाहरदीवारी के भीतर तार-तार कर दी जाएगी दामिनी।

शुक्रवार, 1 जून 2012

अन्याय हारेगा सत्य जीतेगा सबके साथ से, सत्यमेव जयते


 'टी वी और सिनेमा को हमेशा मनोरंजन के तौर पर नहीं देखा जा सकता है और न ही मनोरंजन का मतलब सिर्फ लोगों को हंसाना है। मैंने हमेशा कुछ अलग करने की कोशिश की है। भारत में जमीन से जुड़े इतने हीरो हैं, जिनकी जिंदगी से काफी प्ररेणा ली जा सकती है। सत्यमेव जयते एक कार्यक्रम नहीं भारत जोड़ो और समाज जागरण का अभियान है।' हाल ही में शुरू हुए चर्चित शो 'सत्यमेव जयते' को लेकर यह कहना है आमिर खान का। मनोरंजन के जगत, खबरों की दुनिया, आभासी दुनिया और जनमानस के बीच में शो काफी चर्चा बटोर रहा है। शो का आगाज दमदार रहा है। आमिर खान ने सत्यमेव जयते के पहले ही एपिसोड में सबसे चर्चित और जरूरी मुद्दा उठाया है। मुद्दा है कोख में कत्ल का। स्त्री अत्याचार का। बेटा-बेटी में झूठे भेद का। शो में सिर्फ मुद्दा उठाया भर नहीं गया बल्कि इस विकराल समस्या के जन्मने के कारण और इसके खात्मे के उपायों की भी चर्चा हुई। साथ ही अपने ही अंश की अपनी ही कोख में हत्या के दंश को झेल चुकी बहादुर महिलाओं के साहस को भी सलाम किया गया। उन्हें इस रूप में प्रस्तुत किया गया कि समाज की और भी महिलाएं कह उठें- 'बस, अब बहुत हुआ। ये अत्याचार सहन नहीं।' पहले एपीसोड के बाद सत्यमेव जयते की आधिकारिक वेबसाइट पर इतनी प्रतिक्रियाएं आईं की वेबसाइट क्रेश हो गई। फेसबुक, ऑरकुट, गूगल प्लस, ट्वीटर और अन्य सोशल साइटों पर समाजसेवियों, सोशल हस्तियों, साहित्यकारों, मनोरंजन जगत के लोगों और आम आदमी ने सत्यमेव जयते को एक क्रांति बताया, शो की भरपूर सराहना की।
    बेटा-बेटी का भेद समाज से अभी गया नहीं। जबकि समाज में शिक्षा बढऩे के साथ ही इसके जाने के कयास लगाए गए थे। लेकिन, घटनाओं को देखने से लगता है कि शिक्षा के प्रसार से भी अभी कोई अधिक फर्क नहीं आया है। शिक्षित लोग भी झूठी सामाजिक परंपरा में फंसे हैं। जबकि हम आसपास देखते हैं कि झूठ की बुनियाद पर खड़ी सभी सामाजिक परंपराएं दरक रहीं हैं। आज बेटी श्मशान घाट जाकर अपने माता-पिता को मुखाग्नि दे रही है तो नौकरी-व्यवसाय करके माता-पिता का भरण-पोषण कर रही है। एक सफेद झूठ समाज में प्रचारित किया गया है कि वंश बेटे से चलता है। जबकि वंश तो बेटी की कोख से ही पैदा होता है। बेटा चाहकर भी अकेले संतान पैदा नहीं कर सकता। इतना ही नहीं बेटियां सब क्षेत्रों में कामयाबी के झंडे गाड़ रही हैं। कार्यक्रम में मध्यप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा की घटनाओं के बारे में बताया गया। जो सच सामने आया वह दिल दहलाने वाला है। कन्याओं को जन्म देने वाली माताओं के साथ किस तरह का बर्बर सलूक किया जाता है यह देखकर तमाम लोगों की आंखों में अश्रूधार और धमनियों में रक्त प्रवाह तेज हुआ होगा। कोख में दम तोड़तीं बेटियां चीख-चीख कर कहती हैं कि आज भी सामंती युग कायम है। हमने दुनिया को दिखा दिया है कि हम बेटों के मुकाबले कहीं कमतर नहीं इसके बावजूद हमारा स्वागत नहीं किया जा रहा। जबकि इन्ही प्रदेशों की कई बेटियों ने मिशाल कायम की है। राजस्थान और मध्यप्रदेश की दो महिला सरपंचों को केन्द्र सरकार की ओर से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय गौरव ग्राम पंचायत पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राजस्थान के दौसा जिले की विमला देवी मीणा और मध्यप्रदेश के धार जिले की जामबाई मुनिया को यह सम्मान मिला। वहीं, पिछले साल मार्च में संयुक्त राष्ट्र संघ की इंफोपॉवर्टी वल्र्ड कॉन्फ्रेंस में लाजवाब भाषण देकर राजस्थान के टोंक जिले के सोड़ा गांव की सरपंच छवि राजावत ने दुनिया में नाम कमाया। एमबीए डिग्रीधारी छवि अपने गांव के विकास के लिए ऊंची नौकरी छोड़कर गांव आकर बस गई। मध्यप्रदेश की साध्वी और तेजतर्रार नेता उमा भारती ने तो राजनीति में तमाम प्रतिमान स्थापित किए। हाल ही में घोषित हुए संघ लोक सेवा आयोग के परीक्षा परीणाम में भी बेटियों ने अपनी योग्यता का लोहा मनवाया। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे आसपास मौजूद हैं।
    आमिर खान महज फिल्मी पर्दे पर समाज के लिए आवाज बुलंद करने वाले अभिनेता नहीं हैं। उन्होंने समय-समय पर प्रत्यक्ष रूप से समाज के लिए आगे आकर काम किया है। वे नर्मदा बांध के विस्थापितों के प्रति हमदर्दी रखते हैं। मेधा पाटकर के साथ आकर विस्थापितों की आवाज बुलंद करते हैं। भ्रष्टाचार रहित समाज के लिए प्रयासरत हैं। अण्णा के मंच से भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लोकपाल की सिफारिश करते हैं। बच्चों के प्रति समाज का रुख सकारात्मक रहे इसके लिए 'तारे जमीं' से संदेश देते हैं। ये तो चंद उदाहरण मात्र हैं, आमिर खान इनसे भी अधिक कार्य समाज के लिए करते हैं। आमिर सकारात्मक और सार्थक सिनेमा रचने में विश्वास रखते हैं। भारतीय सिनेमा को १००वां साल शुरू हो गया है। ऐसे में बॉलीवुड के अन्य दिग्गज अभिनेताओं और निर्देशकों को सोचना चाहिए कि मुनाफा फिल्मों में नंगापन दिखाने से ही नहीं कमाया जा सकता, आमिर की तरह सकारात्मक सिनेमा रचकर भी कमाया जा सकता है। ऐसे सिनेमा से प्रसिद्ध और सफलता मुनाफे के साथ बोनस के रूप में मिलती है।
    सत्यमेव जयते के पहले एपीसोड में मध्यप्रदेश के मुरैना जिले की परवीन खान की दास्तान दिखाई गई। परवीन साहस का प्रतिरूप है। परवीन की बेटियों को लगातार बेरहमी से मारा जाता रहा। आखिर वह इस सबसे तंग आ गई। उसने तय किया कि इस बार वह अपनी बेटी को दुनिया दिखाएगी, किसी भी कीमत पर। उसने ऐसा करके भी दिखा दिया। हालांकि बाद में उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ी। उसके पति (क्षमा करें उसे पति कहना गलत होगा, ऐसे आदमी को बहशी दरिंदा ही कहा जाना उचित होगा) ने मुंह से परवीन की नाक चबा ली। मुरैना भ्रूण हत्या और कन्या हत्या के लिए काफी कुख्यात है। एक समय में यहां कन्या हत्या के बेहद घृणित तरीके प्रचलित रहे हैं। यहां उनका जिक्र करना भी उचित न होगा। हालांकि अब पहले की तुलना में स्थिति में काफी सुधार आया है। फिर भी 2011 की जनगणना के आंकड़े भी बयां करते हैं कि 2001 की तुलना में लिंगानुपात में अंतर बढ़ा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक मुरैना ही मध्यप्रदेश में सबसे कम लिंगानुपात वाला जिला है। यहां छह साल तक की उम्र के बच्चों में 1000 लड़कों पर महज 825 लड़कियां हैं। जनगणना 2001 के मुताबिक यहां इस आयु वर्ग का लिंगानुपात 837 था। यानी एक दशक में यहां लिंगानुपात में 12 अंकों की गिरावट दर्ज हुई। जो निश्चिततौर पर चिंतनीय है। वैसे प्रदेश के हाल भी खराब ही हैं। जनगणना 2011 के आकंड़ों के मुताबिक प्रदेश में शून्य से छह वर्ष तक के आयु समूह का लिंगानुपात 912 है। यह 2001 की जनगणना के मुताबिक 932 था। यानी इस एक दशक में प्रदेश में भी 20 अंक की गिरावट हुई। प्रदेश में बेटी के यह हाल देखकर सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने बेटी बचाओ अभियान भी शुरू कर रखा है। लेकिन, बेटियों के प्रति सोच में बदलाव किसी एक के बूते आना संभव नहीं, हम सबके मिले-जुले प्रयास से ही संभव हो सकता है। पहले ही एपिसोड में आमिर खान ने पंजाब के एक गांव को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। जहां सभी ग्रामवासियों ने तय किया कि कोई भी भ्रूण हत्या नहीं करवाएगा। कोख में जिसे भी ईश्वर ने भेजा है दुनिया में उसका स्वागत किया जाएगा। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय में उस गांव का लिंगानुपात समान हो गया। वहां लड़के-लड़कियों की संख्या समान हो गई। हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए कि जितने भी सामाजिक बदलाव आए वे सब सामूहिक प्रयास से ही आए। इसलिए कन्या भ्रूण हत्या और कन्या शिशु हत्या को रोकना है तो सबको सामने आना होगा।
    चलते-चलते सत्यमेव जयते के बहाने दूरदर्शन की ताकत की भी बात कर ली जाए। यह शो आठ भाषाओं में नौ चैनलों पर १०० देशों में दिखाया जाएगा। इतना ही नहीं यह पहला शो है जो निजी चैनल्स पर प्रसारित होने के साथ ही साथ दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल (डीडी-१) पर भी प्रसारित होगा। दरअसल, तमाम टीआरपी के आंकड़ों के बाद भी यह व्यवहारिक सत्य है कि दूरदर्शन की जितनी पहुंच है उतनी किसी भी निजी चैनल की नहीं। टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) में भले ही दूरदर्शन पिछड़ा नजर आता हो, क्योंकि यह मनोरंजन बेच रहे लोगों की चालाकी है। आमिर खान कहते हैं कि मैं ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचना चाहता हूं इसलिए टेलीविजन का उपयोग कर रहा हूं। उन्हें पता है कि निजी चैनलों की पहुंच शहर और शहर से लगे कुछ कस्बों तक ही है। जबकि भारत तो गांवों में बसता है। समाज जागरण करना है तो मास तक पहुंचना होगा। मास तक पहुंचने का माध्यम सिर्फ दूरदर्शन ही है। दूरदर्शन की पहुंच शहर से लेकर दूरदराज के गांव तक है। सत्यमेव जयते को शुरुआत से मिल रही सफलताओं को देखकर कहा जा सकता है कि यह मनोरंजन के जगत से लेकर सामाजिक जगत में परिवर्तन ला सकता है। बस, इसके लिए आमजन के साथ ही जरूरत है।

रविवार, 4 मार्च 2012

हे! उज्ज्वला, क्यों दामन मैला कर रही है?

 हा ल ही में एक समाचार पढ़ा-मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में कुछ महिलाएं जुआ खेलते पकड़ी गईं। उनके पास से लाखों रुपए और प्लास्टिक के ताश बरामद किए गए हैं। मन ने मन में ही उद्घोष किया-हे! उज्ज्वला, पतित पुरुष की होड़ में तू कितना और गर्त में गिरेगी। उसके रचे व्यूह में फंसकर तेरे धवल वस्त्रों पर पहले ही बहुत कीचड़ लग गया है। उसने तुझे बाजारवाद और बुद्धिवाद में ऐसा फंसाया है कि तेरी पवित्रता को वह सरे बाजार बेच रहा है तेरी ही सहमति से। तुझे इसमें भी नारी स्वतंत्रता दिखती है। हां, तथाकथित नारी स्वतंत्रता के नाम पर ही यह सब किया जा रहा है। तुझे बहकाया जा रहा है। दरअसल, कुछ दंभी पुरुष स्त्री की उच्च सत्ता को स्वीकार नहीं करते। उस प्रवृत्ति के पुरुष सदैव से उसको अपने जैसा पतित बनाने के लिए षड्यंत्र करते आ रहे हैं। उनकी संतति आज भी इस कर्म में संलग्न है। दंभी पुरुष ने एक अरसा पहले उज्ज्वल नारी को कीचड़ में धकेलने के लिए स्त्री स्वतंत्रता और सम-अधिकार नाम का अस्त्र विकसित किया। नारी स्वतंत्रता अस्त्र का दुरुपयोग वह जमकर कर रहा है। इसका प्रतिसाद भी मिल रहा है।
    पतित पुरुष (सभी नहीं) और उसके फेर में फंसी दिग्भ्रमित नारी ने स्त्री स्वतंत्रता के नाम पर उज्ज्वला के मन में कचरा भी भर दिया। नारी से कहा गया कि मनुष्य जितना पतित कर्म कर सकता है तुम भी कर सकती हो। पुरुष तौलिया लपेटकर सड़क पर घूम सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? पुरुष शराब पीकर नाली में पड़ा रह सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? पुरुष स्त्रियों को छल सकता है उन्हें क्षणिक दैहिक सुख के लिए इस्तेमाल कर सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? पुरुष गाली-गलौज कर सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? इन सवालों के जवाब कुछ नहीं है। क्योंकि ये स्त्री स्वतंत्रता से जुड़े सवाल नहीं। ये तो उसकी गुलामी के लिए बुने गए जाल के तार हैं। दंभी और कुंठित पुरुष तो चाहता ही था कि वह स्त्री की मांसल देह को देख सके। इधर, कथित स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री देह दिखाऊ वस्त्र पहनकर उसकी मंशा पूरी कर रही है। पुरुष तो वर्षों से चाहता था कि स्त्री होश खो दे और उसके बाहुपाश में आ गिरे। ताकि वह उससे जैसे चाहे वैसे खेल सके। स्त्री आज हर तरह का नशा कर रही है। होश गंवाकर उसने पुरुष के धूर्त पुरुष के साथ जो किया, उसके तमाम एमएमएस आज बाजार में हैं। स्त्री जब तक श्रेष्ठ थी या है लंपट पुरुष की पहुंच से बहुत दूर थी या है। हालात बदल गए। पुरुषों का उपभोग करने के नाम पर खुद ही उपभोग हो रही है।
    भारत एक ऐसा देश है जहां नारी को श्रेष्ठ सत्ता माना गया है। वंदनीय, पूजनीय माना गया। स्त्री पर कई तरह की बंदिशें लगाई जाती रही हैं यह एक सफेद झूठ है। जो स्त्री की आबरू लूटने बैठे समाज के द्वारा लगातार बोला गया। इतनी बार बोला गया कि वह सच के जैसा लगने लगा। लेकिन, यह सच नहीं है। सच तो यह है कि श्रेष्ठता के साथ ही उसे सम्मान के साथ जीने के पूरी आजादी थी और है। पाबंदी इतनी-सी थी कि वह कुछ मैले कामों से दूर रहे। इसे पाबंदी कहना ठीक नहीं। इसे तो अपेक्षा कह सकते हैं, भरोसा भी कह सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि यह अपेक्षा और भरोसा सिर्फ स्त्री से ही है, पुरुष को भी बुराइयों से उतना ही दूर रहना चाहिए। चूंकि स्त्री को ईश्वर ने विशिष्ट बनाया है। उसे कुछ विशेष ताकतें दीं। ईश्वर पवित्र लोगों को सृष्टि के संचालन की शक्तियां प्रदान करता है। स्त्री की कोख से जीवन का अंकुर फूटता है। गंदली जमीन पर विषैली पौध ही उगेगी। इससे समाज दूषित होगा। समाज स्वच्छ रहे। अच्छाई बढ़े ताकि बुराई को हराया जा सके। इसके लिए अच्छी पौध की जरूरत है। अच्छी पौध साफ और पवित्र जमीन पर उगेगी। इसलिए स्त्री को अपनी जमीन साफ रखने की जरूरत है। और फिर स्वच्छता में जो आनंद है वह गंदगी में कहां। तो फिर क्यों वह आंख बंद किए अंधेरे में दौड़े जा रही है। क्यों नहीं वह समझती की अच्छे समाज के निर्माण की उसकी भूमिका अहम है, पुरुष से भी अधिक जिम्मेदारी उसके ऊपर है। पुरुष आवारा है। ऐसे में स्त्री भी उच्छृंखल हो जाएगी तो कैसे समाज चलेगा।
    मायावी पुरुष ने तुझे फंसाने के लिए कैसे-कैसे खेल रचे हैं। तू देख क्यों नहीं रही उज्ज्वला। उसने बाजारवाद का ऐसा मोहपाश फेंका है कि तू उसमें उलझ गई है। वह फैशन के नाम पर तुझसे नग्न परेड कराता है। कला के नाम पर तेरा जिस्म दिखाता है। सीमेंट का ही विज्ञापन क्यों न हो तेरा शरीर बेचकर पैसा बनता है। कथित आजादी के नाम पर तुझसे स्लट वॉक कराता है। देवी, मां, बहन, भाभी, पत्नी तेरी ये सारी पहचान छीनकर उसने तुझे सेक्स सिंबल बनाकर रख दिया है। तू पता नहीं किस आजादी और सम-अधिकार के भ्रमजाल में फंसकर यह सब किए जा रही है। खुद को खोए जा रही है। याद रखना पतित के पास समाज ताकत नहीं रहने देता। जब तेरे पास सत्य की ताकत नहीं होगी तो अधम पुरुष तुझसे जो उसका जी चाहेगा कराएगा। तुझे करना होगा तब चाहे तेरी मर्जी हो या न हो। तू अभी जिसे स्वतंत्रता मान रही है वह तब धरी रह जाएगी।
    हे! उज्ज्वला, धवला अब भी समय है, सम्भल जा। रोक ले अपने कदमों को जो पुरुष के इशारे पर दलदल की ओर बढ़ रहे हैं। अब भी तू अपनी देवीमय गरिमा को बनाए रख सकती है। अब भी तू पवित्रता और श्रेष्ठता के मामले में पुरुष को चुनौती दे सकती है। तुम नहीं संभली तो वह दिन दूर नहीं जब तुम कीचड़ में सनी होगी और पुरुष तुम पर हंस रहा होगा।
    आखिर में स्पष्ट कर देता हूं कि मैं इस बात का पक्ष कतई नहीं ले रहा कि पुरुष के लिए कोई मर्यादा नहीं, कोई बंधन नहीं। उच्छृंखल व्यवहार उसका भी बर्दाश्त नहीं। वह भी समाज के संचालन का अभिन्न हिस्सा है। उसे भी उन तमाम बुराइयों से दूर रहना चाहिए जो उसके पतन का कारण बनती हैं। जिस तरह समाज में व्यसन में लिप्त स्त्री का सम्मान नहीं है उसी तरह उदण्ड पुरुष को भी समाज हिकारत की नजरों से देखता है। उसकी आजादी वहीं तक है जहां तक दूसरों को परेशानी न हो। एक चेतावनी उसके लिए भी है। वह भी भौतिक चकाचौंध में अपनी जिम्मेदारी भूल रहा है।
    अपनी बात : एक व्यवहारिक कहावत है कि :-
     यदि एक लड़का शिक्षित होता है तो एक व्यक्ति शिक्षित होता है।
    जबकि एक लड़की शिक्षित होती है तो एक पीढ़ी शिक्षित होती है।
यह भी व्यवहारिक सत्य है :-
यदि एक लड़का आवारा होता है तो एक व्यक्ति आवारा होता है।
जबकि एक लड़की आवारा होती है तो एक पीढ़ी आवारा होती है।
स्मिता सिल्क और विद्या बालन। स्मिता शिल्क के जीवन पर आधारित फिल्म डर्टी फिक्चर भी यही संदेश देती है कि अमर्यादित व्यवहार से तात्कालिक प्रसिद्धी तो पाई जा सकती है लेकिन अनंतसुख नहीं।