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शनिवार, 7 सितंबर 2024

कांग्रेसी मंत्री ने स्वीकारा अवैध घुसपैठ और लव जिहाद का सच

हिमाचल प्रदेश के संजौली में मस्जिद के अवैध निर्माण, घुसपैठ और लव जिहाद की जानकारी विधानसभा के पटल पर रखते हुए कांग्रेस के मंत्री अनिरुद्ध सिंह

भारतीय राजनीति में वोटबैंक की राजनीति के चलते कांग्रेस ने सांप्रदायिक चुनौतियों को हमेशा नजरअंदाज किया है। अपितु जिसने भी अवैध घुसपैठ और लव जिहाद जैसे मुद्दों को उठाया है, कांग्रेस ने उन्हें ही सांप्रदायिक ठहराने पर जोर दिया है। जबकि होना यह चाहिए था कि कांग्रेस जैसा राजनीतिक दल समाज की इन चुनौतियों को स्वीकार करके उनके समाधान पर चर्चा करता। सच को अस्वीकार करके सेकुलरिज्म को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। अवैध घुसपैठ, अतिक्रमण, लव जिहाद, लैंड जिहाद जैसे मुद्दों की अनदेखी करके या उनका बचाव करके सेकुलरिज्म नहीं अपितु सांप्रदायिकता का ही पोषण होता है। जिसकी अनुभूति अब हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता एवं मंत्रीगण कर रहे हैं।

बुधवार, 29 अगस्त 2018

सिख विरोधी दंगा : जब एक व्यक्ति के अपराध का बदला पूरे समुदाय से लिया गया


- लोकेन्द्र सिंह 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 1984 के सिख विरोधी दंगों पर गलत बयानी कर अपने लिए और अपनी पार्टी के लिए नया संकट खड़ा कर लिया है। राहुल गांधी ने उन पीडि़त परिवारों के जख्म भी हरे कर दिए हैं, जिन्होंने उन दंगों में अपनों को खोया था। इतिहास में ऐसा उदाहरण शायद ही कोई दूसरा मिले, जब एक सिर-फिरे व्यक्ति के अपराध की कीमत एक संप्रदाय से वसूली गई। यूरोप में घूम-घूम कर भारत और भारतीयता के संदर्भ में गलत बयानी कर रहे राहुल गांधी ने बहुत ही आसानी से कह दिया कि 1984 के सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं है। जबकि उनके पिताजी राजीव गांधी ने खुले मंच से 19 नवंबर, 1984 को अप्रत्यक्ष रूप से दंगों में कांग्रेस की भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा था- 'जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।' राजीव गांधी के इस बयान का अभिप्राय अपनी पार्टी के नेताओं द्वारा किए गए सिख बंधुओं के कत्लेआम को सामान्य की प्रतिक्रिया बता कर मामले को रफा-दफा करने से था।

सोमवार, 27 अगस्त 2018

भ्रम के जाले हटाएं राहुल गांधी

- लोकेन्द्र सिंह 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को उनके किसी सलाहकार ने भ्रमित कर दिया है। जिसके कारण वह समझ नहीं पा रहे हैं कि राजनीति के मैदान में उन्हें भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करना है या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से। अपने इस भ्रम के कारण वह उस संगठन का प्रचार-प्रसार करते रहते हैं, जो प्रसिद्धपरांगमुखता का पालन करते हुए सामाजिक कार्य में संलग्न है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बार-बार अनर्गल टिप्पणी करने से न तो राहुल गांधी को कोई लाभ होने वाला है और न कांग्रेस के खाते में राजनीतिक लाभ आएगा। संघ समाज के बीच में काम करता है। इसलिए आमजन संघ को भली प्रकार जानते और समझते हैं। उसके प्रति घृणा और नफरत पैदा करने के कांग्रेस के सब प्रयत्न विफल होना तय है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर झूठा आरोप लगाने के एक मामले में राहुल गांधी न्यायालय के चक्कर काट रहे हैं।

रविवार, 26 अगस्त 2018

भारत, भारतीयता और भारत के देशभक्त नागरिकों के प्रति नकारात्मक विचार


- लोकेन्द्र सिंह 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर अपनी अपरिपक्वता जाहिर की है। यूरोप के दौरे के दौरान विदेशी जमीन पर उन्होंने जिस प्रकार के विचार प्रकट किए हैं, उससे भारत और भारतीय संस्कृति के प्रति उनके दृष्टिकोण का पता भी चलता है। इससे पहले भी वह अमेरिका में कह चुके हैं कि भारत को इस्लामिक आतंकी समूहों से नहीं, बल्कि 'हिंदू आतंकवाद' से अधिक खतरा है। पहले उन्होंने भारत के हिंदू समाज और हिंदू संस्कृति की छवि को धूमिल किया और अब भारत के मुस्लिम, अनुसूचित जाति-जनजाति और गरीब वर्ग को बदनाम करने का प्रयास किया है। जर्मनी के हैम्बर्ग में विद्यार्थियों से बात करते हुए उन्होंने आतंकवाद को गरीबी से जोड़कर एक तरह से आतंकी संगठनों के पैरोकार की भूमिका का निर्वहन किया है। क्या उनके इस तर्क से सहमत हुआ जा सकता है कि गरीबी और बेरोजगारी के कारण आईएसआईएस जैसे आतंकी समूह निर्मित होते हैं? उन्होंने कहा  कि अगर दलित और अल्सपसंख्यक जैसे समुदायों की विकास की दौड़ में अनदेखी हुई तो देश में आईएस की तरह आतंकवादी समूह बन सकते हैं? इस कथन का क्या आशय निकाला जाए? आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या पर यह किस स्तर का चिंतन है? भारत से लेकर दुनिया में जहाँ भी आतंकी घटनाएं हो रही हैं, उसके पीछे क्या वास्तव में गरीबी है? आईएसआईएस के जो उद्देश्य हैं, उसमें क्या गरीबी उन्मूलन शामिल है? कोई भी आतंकी समूह देश-दुनिया से गरीबी को समाप्त करने के लिए उद्देश्य से काम नहीं कर रहा है। आखिर किस तरह के अध्ययन के आधार पर राहुल गांधी ने यह विचार रखा है?

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

हामिद अंसारी का शरीयत और जिन्ना प्रेम

- लोकेन्द्र सिंह 
पूर्व उपराष्ट्रपति और कांग्रेस के मुस्लिम नेता हामिद अंसारी एक बार फिर अपनी संकीर्ण सोच के कारण विवादों में हैं। कबीलाई समय के शरीयत कानून और भारत विभाजन के गुनहगार मोहम्मद अली जिन्ना के संदर्भ में उनके विचार आश्चर्यजनक हैं। यह भरोसा करना मुश्किल हो जाता है कि हामिद अंसारी कभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के उपराष्ट्रपति रहे हैं। किंतु, यह सच है। समय-समय पर उनके विचार जान कर यह सच ही प्रतीत होता है कि पूर्व उपराष्ट्रपति को भारत के संविधान और कानून व्यवस्था में भरोसा नहीं है। वह मुस्लिम समाज को मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने की जगह उनके लिए आधुनिक समय में आदम युग का कानून चाहते हैं। वह देश के प्रत्येक जिले में ऐसी शरिया अदालतों की स्थापना के पक्षधर हैं, जिनमें महिलाओं के लिए न्याय की कोई व्यवस्था नहीं है। शरिया अदालतों पर हामिद अंसारी के वक्तव्य से यह क्यों नहीं समझा जाए कि उन्हें भारत के आम मुसलमानों के मन में भारत की न्याय व्यवस्था के प्रति संदेह उत्पन्न करना चाहते हैं। शरिया कानून के साथ ही मोहम्मद अली जिन्ना के प्रति प्रेम भी संविधान के प्रति हामिद अंसारी की निष्ठा को संदिग्ध बनाता है।

रविवार, 15 जुलाई 2018

कांग्रेस से छूट नहीं पा रही हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति


- लोकेन्द्र सिंह 
कोई भी व्यक्ति या संगठन बनावटी व्यवहार अधिक दिन तक नहीं कर सकता है। क्योंकि, उसका डीएनए इसकी अनुमति नहीं देता है। यदि स्वभाव के विपरीत चलने का प्रयास किया जाए तो अंतर्मन में बनावटी एवं वास्तविक आचरण में एक प्रकार का संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। कांग्रेस के साथ भी यही हो रहा है। अपने कथित सेकुलर (मुस्लिम तुष्टीकरण और हिंदुओं की उपेक्षा) के कारण ही कांग्रेस कथित 'सॉफ्ट हिंदुत्व' (सुविधाजनक हिंदू समर्थन) की राह पर चलने में असहज है। कांग्रेस के शीर्ष नेता अकसर ऐसे बयान दे देते हैं, जिससे सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर साध-साध कर रखे जा रहे उसके कदम डगमगा जाते हैं। या यह कहना उचित होगा कि कांग्रेस के नेता सुनियोजित ढंग से समय-समय पर अपने परंपरागत मुस्लिम वोटबैंक को यह भरोसा दिलाते रहते हैं कि उसका 'सॉफ्ट हिंदुत्व' सिर्फ भ्रम है, वास्तविकता में कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण पर ही दृढ़ता से टिकी हुई है। मुस्लिम समुदाय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मंदिर यात्राओं से खिन्न न हो जाए, इसलिए उसे भरोसे में बनाए रखने के लिए कांग्रेस ने पी. चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, सैफुद्दीन सोज, सुशील कुमार शिंदे, सलमान खुर्शीद और पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी को यह जिम्मेदारी दे रखी है। अब इस सूची में शशि थरूर का नया नाम और जुड़ गया है।

सोमवार, 21 मई 2018

जरा सोचिए, लोकतंत्र जीता, या फिर हारा

 कर्नाटक  के राजनीतिक 'नाटक' का फिलहाल पटाक्षेप हो चुका है। हालाँकि, चुनाव परिणाम बाद मजबूरी और भाजपा विरोध में जिस प्रकार का गठबंधन हुआ है, उसके कारण निकट भविष्य में भी 'उठा-पटक' की आशंका बनी हुई है। भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस ने उस पार्टी (जनता दल सेक्युलर) को समर्थन दिया है, जिस पर चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी 'जनता दल (संघ)' कह कर हमला किया था। संघ के प्रति राहुल गांधी का दुराग्रह जगजाहिर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति वह यहाँ तक द्वेष से भरे हुए हैं कि संघ की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए अनर्गल और झूठ बोलने में भी संकोच नहीं करते हैं।

शनिवार, 19 मई 2018

कांग्रेस अपने गिरेबां में भी तो झांके

 पूर्व  प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सहित कांग्रेस के दूसरे नेताओं ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को चिट्ठी लिखकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाषण-शैली पर आपत्ति दर्ज कराई है। कर्नाटक के हुबली में दिए गए भाषण को आधार बनाकर पत्र में उन्होंने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वह प्रधानमंत्री को कांग्रेस नेताओं या अन्य किसी पार्टी के लोगों के खिलाफ अवांछित और धमकाने वाली भाषा का इस्तेमाल करने से रोकें। इसके साथ ही डॉ. मनमोहन सिंह और अन्य नेताओं ने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी का व्यवहार प्रधानमंत्री पद की मर्यादा के अनुकूल नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाषा की मर्यादा और संयम पर चिंतित हो रहे हैं, यह अच्छी बात है। राजनेताओं को अपने प्रतिद्वंद्वी नेताओं के प्रति मर्यादित भाषा का उपयोग करना चाहिए। देश का सामान्य व्यक्ति भी यही मानता है और चाहता है कि हमारे नेता भाषा में संयम बनाएं। किंतु,  विचार करने की बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेसी नेताओं को अब जाकर यह चिंता हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाषण-शैली पर आपत्ति दर्ज कराने वाले पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेसी नेता क्या अपने वक्तव्यों के लिए खेद प्रकट करेंगे? कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध जिस प्रकार के अपशब्दों को उपयोग किया है, क्या उन सबके लिए मनमोहन सिंह खेद प्रकट करेंगे?

रविवार, 13 मई 2018

राहुल गांधी देख रहे हैं एक हसीन ख्वाब

 कांग्रेस  के अध्यक्ष राहुल गांधी ने अंतत: अपने मन की इच्छा देश की जनता के सामने खुलकर प्रकट कर दी है। कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने साफ कहा कि यदि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस बड़ी पार्टी बन कर सामने आती है, तो वह प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे। राहुल गांधी की इस स्वाकारोक्ति में कुछ भी आश्चर्य जैसा नहीं है। सब जानते हैं कि राहुल गांधी भारत का प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य होने के नाते उनकी स्वाभाविक सोच यही है कि भारत का प्रधानमंत्री बनना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के आपत्तिजनक बयान 'देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है' की तर्ज पर राहुल गांधी के मन में यह बात गहरे बैठी है कि 'कांग्रेस की ओर से संगठन और सत्ता के शीर्ष पद पर पहला हक उनके परिवार का है।'

शुक्रवार, 11 मई 2018

झूठ क्यों बोलते हैं राहुल गांधी?

 कांग्रेस  के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकारों का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में अध्ययन ठीक नहीं है। इसलिए जब भी राहुल गांधी संघ के संबंध में कोई टिप्पणी करते हैं, वह बेबुनियाद और अतार्किक होती है। संघ के संबंध में वह जो भी कहते हैं, सत्य उससे कोसों दूर होता है। एक बार फिर उन्होंने संघ के संबंध में बड़ा झूठ बोला है। अब तक संघ की नीति थी कि वह आरोपों पर स्पष्टीकरण वक्तव्य से नहीं, अपितु समय आने पर अपने कार्य से देता था। संचार क्रांति के समय में संघ ने अपनी इस नीति को बदल लिया है। यह अच्छा ही है। वरना, इस समय झूठ इतना विस्तार पा जाता है कि वह सच ही प्रतीत होने लगता है। झूठ सच का मुखौटा ओढ़ ले, उससे पहले ही उसके पैर पकड़ कर पछाडऩे का समय आ गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में राहुल गांधी के हालिया बयान पर संघ ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

महाभियोग की तुच्छ राजनीति

 मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग लाने का निर्णय कर कांग्रेस ने न्यायपालिका पर आखिरकार सीधा हमला कर ही दिया है। अपने इस निर्णय से कांग्रेस ने देश की जनता में ही नहीं, बल्कि अपने भीतर भी किरकिरी करा ली है। भले ही कांग्रेस ने भाजपा पर हमला करने के लिए महाभियोग को राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया है, किंतु इस बार यह हथकंडा कांग्रेस को भारी पड़ सकता है। जज बीएच लोया की कथित संदिग्ध मौत के मामले को खारिज करते समय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि इस मामले की आड़ में न्यायपालिका की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता पर प्रहार करने का प्रयास किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय का यह अंदेशा सत्य साबित हुआ। 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा मत करो महाराज

 देश  में राजनीतिक विरोध का ऐसा माहौल पहले कभी नहीं देखा गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के बीच अपनी राजनीतिक लड़ाई हारे हुए समस्त विपक्षी दल अब भाजपा और केंद्र सरकार को घेरने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को भी निशाना बनाने में संकोच नहीं कर रहे हैं। जज बीएच लोया की कथित संदिग्ध मौत के मामले में जाँच की माँग को जब सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया, तो कांग्रेस सहित विपक्षी दलों एवं उनके समर्थक कथित बुद्धिजीवियों ने जिस प्रकार न्यायपालिका पर अविश्वास जताया है, वह घोर आश्चर्यजनक तो है ही, निंदनीय भी है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर अन्य प्रमुख नेताओं ने न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करने का प्रयत्न किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं यह माना है कि इस प्रकरण के माध्यम से न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर हमला बोला गया है। सर्वोच्च न्यायालय का यह कथन कांग्रेस नेताओं के वक्तव्यों ने सही साबित कर दिया।

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

सामने आया 'भगवा आतंकवाद' का सच


'सत्य कभी पराजित नहीं होता।' 
'कितने भी काले बादल हों, सूरज को अधिक समय तक ढंक नहीं सकते।' 
'सच सामने आ ही जाता है।' 
'न्याय में देर है, अंधेर नहीं।' 
            यह लोकोक्तियां बताती हैं कि सच को परास्त करने के लिए कोई कितने भी षड्यंत्र रच ले, किंतु एक दिन आता है जब सत्य की ही जीत होती है और झूठों का मुंह काला। मक्का मस्जिद बम धमाके मामले में स्वामी असीमानंद समेत सभी आरोपियों के बरी होने के बाद 'हिंदू आतंकवाद' पर रचा गया षड्यंत्र पूरी तरह उजागर हो गया है। यह देश का दुर्भाग्य है कि वोटों की खातिर एक पार्टी ने इस देश की पहचान को आतंकवाद से जोडऩे का भयंकर षड्यंत्र रचा था। विश्व में जिस 'हिंदू' की उदारता, मानवता और करुणा के उदाहरण दिए जाते हैं, उस हिंदू को सिर्फ इसलिए बदनाम करने का षड्यंत्र रचा गया ताकि अपनी राजनीतिक बिसात बची रहे, ताकि एक समुदाय का तुष्टीकरण किया जा सके। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने 'भगवा आतंकवाद' और 'हिंदू आतंकवाद' जैसे शब्द दिए हैं। इस पर विचार किया जाना चाहिए कि आतंकवाद को धर्म और रंग से न जोडऩे की वकालत करने वाली कांग्रेस ने ही आखिर क्यों हिंदू और भगवा आतंकवाद की अवधारणा रची?

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

मणिशंकर का पाकिस्तान प्रेम

 पूर्व  कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर की पहचान विवादित वक्तव्यों के लिए हो गई है। आपत्तिजनक बयान के कारण ही कांग्रेस ने कुछ समय पहले उन्हें पार्टी से निलंबित किया है। उनकी दूसरी पहचान पाकिस्तान भक्त और पाकिस्तान प्रेमी की भी बन गई है। अकसर उनकी जुबान से पाकिस्तान के लिए प्रेम टपक आता है। एक बार फिर मणिशंकर अय्यर का पाकिस्तान प्रेम प्रकट हुआ है। उन्होंने कहा है कि उन्हें पाकिस्तान में मिले प्यार से ज्यादा भारत में नफरत मिलती है। यह बयान उन्होंने कराची जाकर दिया है। जिस समय भारत पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से जूझ रहा है, उसी समय भारत के नेता का यह कहना कि वह पाकिस्तान से प्रेम करते हैं, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। मणिशंकर का यह बयान उन परिवारों के जख्मों पर नमक की तरह है, जिन्होंने सुंजवान एवं श्रीनगर में हुए आतंकी हमलों में अपने बेटों को सदैव के लिए खो दिया है। पाकिस्तान के प्रति प्रेम प्रकट करने का यह सर्वथा अनुचित समय अय्यर ने चुना है।

रविवार, 24 दिसंबर 2017

भारत में 2004 से लेकर 2014 तक की राजनीति का हाल-ए-बयां करती पुस्तक

- विनय कुशवाह 

प्राचीन भारत में सारी सत्ता राजा के इर्द-गिर्द घूमती थी। शासन की प्रणाली प्रजातांत्रिक न होकर राजतंत्र वाली होती थी, जिसमें राजा ही सर्वोपरि होता था। राजा का आदेश ही सबकुछ होता था। राज्य की प्रजा राजा के माध्यम से ही देश के लिए कार्य करती थी। प्रजा से कर वसूला जाता था और राज्य के विकास, राजा के महल और सेना पर बड़ी मात्रा में खर्च किया जाता था। कर की राशि कहां और कितनी खर्च की गई, इसका हिसाब-किताब लगभग नगण्य ही होता था। ना तो उस जमाने में लोकपाल था, ना ही कैग, ना ही ईडी था और ना ही सीबीआई। राजा अपने राज्य में स्वयं ही न्यायालय होता था। यदि ऐसा कुछ आज के समय यानी इक्कीसवीं शताब्दी में हो कि प्रजातंत्र से चुनी गई सरकार अपनी मनमानी करें और शासन को बपौती समझ ले। ऐसा ही कुछ भारत में सन् 2004 से लेकर 2014 तक के शासन में हुआ। इसी समय का हाल-ए-बयां करती एक पुस्तक " देश कठपुतलियों के हाथ में "।

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

पूर्व प्रधानमंत्री के 'सम्मान' की लड़ाई

 संसद  में कांग्रेस जिस प्रकार का व्यवहार कर रही है, वह बचकाना है। कांग्रेस का व्यवहार बताता है कि उसे जनहित के मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं है। एक ऐसी घटना के लिए कांग्रेस ने संसद को बाधित किया हुआ है, जिसका पटाक्षेप गुजरात चुनाव के साथ ही हो जाना चाहिए था। किंतु, ऐसा लगता है कि कांग्रेस पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की शालीन छवि को उसी तरह भुनाना चाहती है, जिस प्रकार उनकी 'ईमानदार छवि' को संप्रग सरकार के दौरान भुनाने का प्रयास किया था। परंतु, कांग्रेस को समझना चाहिए कि वह उस समय भी जनता की नजर में पकड़ी गई और आज भी पूरा देश उसके व्यवहार को देख रहा है। कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कथित अपमान को आधार बना कर संपूर्ण संसद को ठप कर दिया है। कांग्रेस के नेताओं की माँग है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अपमान किया है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी को सदन में आकर क्षमा माँगनी चाहिए।

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

रसातल में पहुंची राजनीतिक बयानबाजी

 गुजरात  का चुनावी महासंग्राम विकास पर बहस के साथ प्रारंभ हुआ था। किंतु, जैसे-जैसे यह बहस आगे बढ़ी, विकास के मुद्दे कहीं गायब हो गए। भाषा का स्तर लगातार गिरता गया। कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर का बयान इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक बयानबाजी पूरी तरह से रसातल में पहुंच चुकी है। मणिशंकर अय्यर कोई अनपढ़ नेता नहीं है, बल्कि बेहतरीन संस्थानों में पढ़े-लिखे और कांग्रेस के प्रबुद्ध वर्ग में शुमार हैं। किंतु, नरेन्द्र मोदी के प्रति उनकी नफरत एवं घृणा, उनके भाषाई स्तर को निम्नतम स्तर पर पहुंचा देती है। अय्यर ने देश के प्रधानमंत्री के लिए जिस प्रकार के शब्द का उपयोग किया है, वह न केवल घोर आपत्तिजनक है, बल्कि आपराधिक भी है। 'नीच' शब्द को गाली के रूप में उपयोग किया जाता है। अय्यर ने प्रधानमंत्री को 'नीच' और 'असभ्य' कह कर अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया है। उन्होंने यह भी बताया है कि वह प्रधानमंत्री मोदी से किस हद तक घृणा करते हैं।

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

कांग्रेस की ओछी सोच

'तू जा चाय बेच... ' कह कर कांग्रेस ने किसका अपमान किया?
 प्र धानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर कांग्रेसी नेताओं के मन में किस प्रकार के भाव हैं, यह एक बार फिर प्रकट हो गया है। गुजरात में जारी चुनाव प्रचार के बीच यूथ कांग्रेस की ऑनलाइन मैगजीन के ट्विटर हैंडल से बहुत आपत्तिजनक फोटो (मीम) जारी किया है। यूथ कांग्रेस की ऑनलाइन मैगजीन के ट्विटर हैंडल 'युवा देश' के जरिए पोस्ट किए गए मीम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चायवाला बताकर उनका मजाक बनाया गया था। इस मीम में प्रधानमंत्री मोदी के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेजा की तस्वीर है। तस्वीर पर काल्पनिक संवाद लिखे गए हैं। मीम में ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेजा से मोदी को कहलवाया गया है- 'तू जा चाय बेच।'

शनिवार, 18 नवंबर 2017

कांग्रेस की दृष्टि में धर्मनिरपेक्षता अर्थात् हिंदू विरोध

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी नई किताब में लिखा, दीपावली पर हिंदू संत को गिरफ्तार कर लिया, परंतु क्या ईद पर मौलवी को पकडऩे का साहस किया जा सकता है?
 भारत  के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक 'कोअलिशन इयर्स 1996-2012' के एक अध्याय में कांग्रेस के हिंदू विरोध एजेंडे और छद्म धर्मनिरपेक्षता को उजागर किया है। वैसे तो यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है। दोनों आरोपों को लेकर कांग्रेस अकसर कठघरे में खड़ी दिखाई देती है। परंतु, जब प्रणब मुखर्जी इस संबंध में लिख रहे हैं, तब इसके मायने अलग हैं। वह खांटी कांग्रेसी नेता हैं। वह कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी राजनेता हैं। उन्होंने कांग्रेस को बहुत नजदीक से देखा है। कांग्रेस का उत्थान एवं पतन दोनों उनकी आँखों के सामने हुए हैं। आज कांग्र्रेस जिस गति को प्राप्त हुई है, उसके संबंध में भी उनका आकलन होगा। पूर्व राष्ट्रपति प्र्रणब मुखर्जी ने अपनी नई किताब में लिखा है- 'मैंने वर्ष 2004 में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी पर सवाल उठाए थे। एक कैबिनेट बैठक के दौरान मैंने गिरफ्तारी के समय को लेकर काफी नाराजगी जताई थी। मैंने पूछा था कि क्या देश में धर्मनिरपेक्षता का पैमाना केवल हिन्दू संतों महात्माओं तक ही सीमित है? क्या किसी राज्य की पुलिस किसी मुस्लिम मौलवी को ईद के मौके पर गिरफ्तार करने का साहस दिखा सकती है? '

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

जम्मू-कश्मीर पर कांग्रेस का अलगाववादी सुर

 कांग्रेस  के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने जम्मू-कश्मीर पर भारत विरोधी टिप्पणी करके अपनी पार्टी को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। जम्मू-कश्मीर पर चिदंबरम का बयान अलगाववादियों और पाकिस्तानियों की बयानबाजी की श्रेणी का है। यदि चिदंबरम का नाम छिपा कर किसी से भी यह पूछा जाए कि जम्मू-कश्मीर की आजादी का नारा कौन लगाता है, तब निश्चित ही उत्तर में अलगाववादियों और पाकिस्तानी नेताओं का नाम ही आएंगे। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का नाम भी अनेक लोग ले सकते हैं। कांग्रेस के शीर्ष श्रेणी के नेता पी. चिदंबरम ने बीते शनिवार को कहा था कि जब कश्मीरी कहें आजादी तो समझिए स्वायत्तता। उन्होंने कहा कि 'कश्मीर घाटी में अनुच्छेद 370 का अक्षरश: सम्मान करने की मांग की जाती है। इसका मतलब है कि वो अधिक स्वायत्तता चाहते हैं। चिदंबरम का यह बयान भारतीय हित को नुकसान पहुँचाता है।