गुरुवार, 8 जनवरी 2026

हिन्दुओं के मानवाधिकारों पर वैश्विक चुप्पी

गरिमामयी जीवन जीने के लिए मनुष्य होने के नाते हमारे कुछ अधिकार हैं। वैश्विक स्तर पर मनुष्यों के अधिकारों की रक्षा हो सके, इस उद्देश्य के साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर, 1948 को ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ की। यह दस्तावेज मानव जीवन, स्वतंत्रता, विचार की अभिव्यक्ति, धर्म, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को परिभाषित करता है। भारत के संविधान में भी कई अनुच्छेद मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। मानवाधिकारों का हनन रोकने, उनकी निगरानी करने एवं इससे जुड़े अन्य मामलों पर हस्तक्षेप करने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएँ भी गठित की गई हैं। परंतु, विडंबना यह है कि इन संस्थाओं को अन्य समुदायों के मानवाधिकारों की चिंता तो होती है, लेकिन हिंदुओं के मानवाधिकार इन्हें संभवतः दिखाई ही नहीं देते। विश्व के विभिन्न देशों में हिंदुओं के मानवाधिकारों का खुलेआम हनन हो रहा है, लेकिन कहीं कोई घोर आपत्ति सुनाई नहीं देती। एक प्रकार से वैश्विक चुप्पी छाई हुई है। यह स्थिति चिंताजनक है। यह चुप्पी हिंदू समाज के मन में आक्रोश पैदा करती है और सांप्रदायिक भेद भी बढ़ाती है।

दुनिया के कई देशों में जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हैं, वहाँ उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और जीवन के मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। भारत के पड़ोसी देशों, विशेषकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में स्थिति बहुत चिंताजनक है। इन देशों में इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतों ने प्रारंभ से ही हिंदुओं को अपने निशाने पर लिया है, जिसका परिणाम यह है कि यहाँ हिंदुओं की संख्या में तेजी से कमी आई है। हिंदुओं की बड़ी संख्या का धर्मांतरण करा लिया गया है या फिर उन्हें पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है।

बांग्लादेश में पिछले कुछ समय से हिंदुओं पर हमलों के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है। तख्तापलट के बाद वहाँ कट्टरपंथी समूह सत्ता के करीब आ गए हैं, जिसके कारण अतिवादी ताकतों ने हिंदुओं पर हमले तेज कर दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में हिंदुओं के घरों, संपत्ति और मंदिरों पर व्यापक हमले, तोड़फोड़ और लूटपाट की गई। इस्कॉन मंदिर जैसी पवित्र जगहों को भी निशाना बनाकर आग लगा दी गई। कट्टरपंथी समूहों द्वारा अल्पसंख्यक हिंदुओं पर जानबूझकर देशद्रोह और हिंसक प्रदर्शन जैसे गंभीर मामलों के फर्जी केस दर्ज करवाए जाते हैं, ताकि उन्हें कानूनी उलझनों में फंसाया जा सके।

चूँकि भारत में हिंदुओं के हितों की चिंता करने वाली केंद्र सरकार है, इसलिए सरकार ने बांग्लादेश के हालात पर तत्काल संज्ञान लेकर वहाँ की सरकार पर दबाव बनाया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में अगस्त 2024 से मार्च 2025 तक हिंसा की 2400 से अधिक घटनाएँ दर्ज हुई हैं। भारत ने उम्मीद जताई है कि बांग्लादेश इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच करेगा और हत्या, आगजनी व हिंसा के सभी दोषियों को सजा देगा। हालांकि, इसकी उम्मीद कम ही है कि बांग्लादेशी प्रशासन हिंदुओं के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा।

इसी प्रकार, पाकिस्तान में भी हिंदू समुदाय प्रारंभ से ही उत्पीड़न का सामना कर रहा है। वहाँ की बिगड़ती अर्थव्यवस्था, सांप्रदायिक ताकतों और सेना के बढ़ते प्रभुत्व के बीच तथाकथित लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर हो गई हैं। पाकिस्तान में हिंदू और अन्य गैर-इस्लामिक समुदायों की युवतियों और लड़कियों का जबरन धर्मांतरण, अपहरण, तस्करी और बाल विवाह की घटनाओं में वृद्धि हुई है। विडंबना यह है कि पुलिस अक्सर अपहरण के मामलों को ‘प्रेम विवाह’ बताकर खारिज कर देती है। अदालतों द्वारा भी जबरन विवाह को अक्सर धार्मिक कानूनों का सहारा लेकर वैध करार दिया जाता है। पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोपों का उपयोग हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए किया जाता है; भीड़ महज आरोप के आधार पर हत्या कर देती है और दोषियों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं होती।

मोदी सरकार ने पड़ोसी देशों में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हिंदुओं एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को स्वाभिमान से जीवन देने के लिए ‘नागरिकता संशोधन कानून’ लागू किया था, लेकिन भारत के तथाकथित प्रगतिशील मानवतावादियों को ही यह पहल चुभ गई। रोहिंग्या जैसे समुदायों की अवैध घुसपैठ के लिए विलाप करने वाले इन 'सेकुलर' धुरंधरों को हिंदुओं के मानवाधिकारों की चिंता नहीं है। यह साबित करता है कि वैश्विक स्तर पर ही नहीं, बल्कि भारत में भी कई ऐसे समूह हैं जो हिंदुओं के मानवाधिकारों की जानबूझकर अनदेखी करते हैं।

पश्चिम बंगाल से लेकर केरल तक हिंदुओं के उत्पीड़न पर तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और संस्थाएँ चुप्पी साधे रहती हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा की जाँच के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देश पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम ने अपनी रिपोर्ट में राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया था। आयोग ने स्पष्ट कहा कि राज्य में “कानून का शासन नहीं, बल्कि शासक का कानून चल रहा है”। यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या हिंदुओं के कोई मानवाधिकार नहीं हैं? उनकी चिंता कौन करेगा?

हमें स्मरण रखना चाहिए कि मानवाधिकारों का संरक्षण एक सार्वभौमिक प्रतिबद्धता है। अन्य समाजों की तरह ही हिंदू समुदाय को भी भय और उत्पीड़न से मुक्त जीवन जीने की गारंटी मिलनी चाहिए। यह केवल संबंधित सरकारों की ही नहीं, बल्कि वैश्विक बौद्धिक समुदाय का भी नैतिक दायित्व है कि मानवाधिकारों के सिद्धांतों को हर जगह निष्पक्षता से लागू किया जाए। जहाँ भी हिंदुओं के मानवाधिकारों का हनन हो, वहाँ भी उनके पक्ष में आवाज बुलंद की जानी चाहिए ताकि वैश्विक संस्थाओं पर दबाव बने। याद रहे कि “मानवाधिकार कोई चुनिंदा अधिकार नहीं हैं जिन्हें सुविधानुसार लागू किया जाए; यदि ये ‘सार्वभौमिक’ हैं, तो इनमें हिंदू समाज की पीड़ा को भी समान स्थान मिलना चाहिए”।

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