मंगलवार, 3 मार्च 2026

कहाँ है आपकी निष्ठा

खामेनेई की मौत : प्रदर्शन करनेवाले मुसलमानों की निष्ठा कहाँ है?


अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य पूर्व में जो भू-राजनीतिक भूचाल आया है, उसकी अनुगूंज भारत के कई हिस्सों में सुनाई दे रही है। लखनऊ से लेकर श्रीनगर तक कई क्षेत्रों में हजारों मुस्लिम प्रदर्शनकारियों का सड़कों पर उतरना, अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारेबाजी करना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह प्रदर्शन सवाल उठाता है कि भारत के मुसलमानों की निष्ठा आखिर कहाँ है? ईरान के सुप्रीम खामनेई की मौत के बाद भारत में प्रदर्शनों का क्या औचित्य है? अपने आप को इस्लामिक सत्ता/व्यवस्था से जोड़ने की यह बीमारी आज की नहीं है। खिलाफत आंदोलन को याद कीजिए और उसके उद्देश्य का विश्लेषण कीजिए। आखिर क्यों भारत के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन चलाया था? क्या उसका कोई संबंध भारत की स्वतंत्रता से था? 

आज से आठ दशक पूर्व संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस कड़वे सच की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया था, वह आज पूरी तरह प्रासंगिक नजर आता है। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि मुसलमानों की निष्ठा उस देश के प्रति नहीं होती जहाँ वे रहते हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक विश्वास पर निर्भर करती है जिसका वे हिस्सा हैं। लखनऊ से लेकर जम्मू-कश्मीर की सड़कों पर उतरकर मातम मनाने वाली भीड़ और खामेनेई को शहीद का दर्जा देने की कवायद, इसी मानसिकता का साक्षात प्रमाण है। 

भारत के प्रति निष्ठा रखनेवाले मुस्लिम युवा अकसर सवाल उठाते हैं कि उनकी देशभक्ति को लेकर संदेह क्यों किया जाता है? उनको विशेषरूप से इन घटनाओं का विश्लेषण करना चाहिए। इसमें ही उनके प्रश्नों का उत्तर छिपा है। संप्रदाय को देश से ऊपर रखने वाले मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी धड़े के कारण ही सभी मुस्लिमों की देशभक्ति को कसौटी पर कसा जाता है। पीपीडी प्रमुख महबूबा मुफ्ती और मीरवाइज उमर फारूक जैसे नेताओं ने खामेनेई की मौत पर वैश्विक इस्लामी उम्माह के प्रति अपनी निष्ठा का ही खुला प्रदर्शन किया। यह घटना एक बार फिर इस ज्वलंत प्रश्न को सतह पर ले आई है कि दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली घटना पर भारत के एक विशेष वर्ग का मजहबी उन्माद राष्ट्रहित पर भारी क्यों पड़ने लगता है।  

इन परिस्थितियों में देश के बहुसंख्यक समाज को अत्यधिक सावधान होने की आवश्यकता है। अगड़ा-पिछड़ा, सवर्ण, दलित और बहुजन जैसी पहचानों में बांटकर देश की विराट हिंदू चेतना को खंडित करने का जो सुनियोजित षड्यंत्र चल रहा है, वह अंततः इसी वैश्विक उम्माह की अवधारणा को मजबूत करता है। पाकिस्तान के निर्माण के समय ‘दलित-मुस्लिम एकता’ के पोस्टर बॉय रहे जोगेंद्रनाथ मंडल का हश्र इतिहास का वह क्रूर सत्य है, जिससे यदि आज भी सबक नहीं लिया गया तो भविष्य क्षमा नहीं करेगा। यह समझना होगा कि मजहबी कट्टरपंथियों के लिए जातियों में बंटा हिंदू समाज केवल तब तक एक राजनीतिक चारा है, जब तक वे स्वयं जनसांख्यिकीय रूप से अल्पसंख्यक हैं। 

इस समूचे घटनाक्रम में सबसे अधिक चौंकाने वाली और निराशाजनक भूमिका देश के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की रही है। यह विडंबना ही है कि जब भारत सरकार एक संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाए हुए है, तब कांग्रेस संविधान के अनुच्छेद 51 का हवाला देकर अंतरराष्ट्रीय नियमों की दुहाई दे रही है। कांग्रेस की यह छटपटाहट और खामेनेई के प्रति उनका यह प्रेम उनकी उसी पुरानी मजहबी तुष्टिकरण की नीति का विस्तार है, जो उन्हें भारत के आधिकारिक पक्ष के खिलाफ खड़ा कर देता है। बहरहाल, भारत के लोगों को ईश्वर का धन्यवाद ज्ञापित करना चाहिए कि आज जब पूरी दुनिया युद्ध की विभीषिका से त्राहिमाम कर रही है, तब हम हिमालय की तरह अविचल और शांत खड़े हैं। इसका कारण है कि भारत का नेतृत्व सक्षम हाथों में है।

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