गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

हिंदू राष्ट्र पर उच्च न्यायालय का अभिमत

- लोकेन्द्र सिंह -
मेघालय के उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय नागरिकता पंजीयन प्रकरण की सुनवाई करते हुए भारत के संदर्भ में जो कहा, उसके बाद देशव्यापी विमर्श खड़ा हुआ। एक ओर कथित सेकुलर बिरादरी उच्च न्यायालय की टिप्पणी से असहज हो गई। उसे संविधान की याद आई। वहीं, दूसरी ओर उच्च न्यायालय की टिप्पणी ने भारत के 'हिंदू राष्ट्र' होने की अवधारणा को पुष्ट किया। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एसआर सेन ने विभाजन और हिंदुओं पर हुए अत्याचार का जिक्र करते हुए कहा- 'पाकिस्तान ने स्वयं को इस्लामिक देश घोषित किया। चूंकि विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। इसलिए भारत को भी स्वयं को हिंदू राष्ट्र घोषित करना चाहिए था।' स्पष्ट है कि इस टिप्पणी के बाद देश में दो तरह का विमर्श प्रारंभ होना ही था। जो लोग उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी की निंदा कर रहे हैं, उन्हें जरा निरपेक्ष भाव से न्यायमूर्ति के कहे पर चिंतन करना चाहिए। क्या उन्होंने उचित नहीं कहा कि इस देश का विभाजन धर्म के नाम पर किया गया? एक हिस्सा इस्लामिक राष्ट्र के नाम पर बनाया गया तो दूसरा स्वत: ही हिंदू राष्ट्र नहीं बनना चाहिए था?
           वैसे भी भारत प्रारंभ से 'हिंदुस्थान' ही है। जो लोग इस देश को हिंदू राष्ट्र नहीं मानते, उनकी सोच मकडज़ाल में उलझी हुई। वास्तविकता तो यही है कि इस देश की पहचान हिंदू राष्ट्र के नाते ही रही है। इसलिए दुनिया से आए लोगों ने भारत को 'हिंदुस्थान' ही कहा। उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय विचारधारा के उन लोगों/संगठनों की मान्यता को भी अभिमत दिया है, जो भारत को हिंदू राष्ट्र मानते हैं। एक पक्ष यह भी है कि भारत हिंदू राष्ट्र है इसलिए ही पंथनिरपेक्ष भी है। इसलिए जो लोग भारत के धर्मनिरपेक्ष या पंथनिरपेक्ष होने की बात कर रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि पूरी स्वतंत्रता के साथ अपने मत का पालन करने की व्यवस्था हिंदू राष्ट्र भारत में ही है। भारत से ही टूटकर इस्लामिक राष्ट्र बने पाकिस्तान और बांग्लादेश में गैर-मुस्लिमों के साथ किस तरह का व्यवहार होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। उन सबकी चिंता करते हुए भी न्यायमूर्ति एसआर सेन ने केंद्र सरकार से ऐसे नियम बनाने की अपील की है, जिससे पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों में रहने वाले गैर-मुस्लिम समुदाय और समूह को भारत में आकर बसने की इजाजत हो। उन्होंने कहा है कि भारत में कहीं से भी आकर बसे हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी, इसाई, खासी, जयंतिया और गारो समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिक घोषित किया जाए। अभी किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं होने के कारण पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले हिंदू यहाँ-वहाँ दिन गुजार रहे हैं। हालांकि उनके हित में केंद्र सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं, किंतु यह प्रयास नाकाफी हैं। 
           मेघालय के उच्च न्यायालय ने 'इस्लामिक देश' के खतरों की तरफ भी आगाह किया है। न्यायमूर्ति सेन ने कहा है- 'मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि कोई भारत को इस्लामिक देश बनाने की कोशिश न करे। अगर यह इस्लामिक देश हो गया तो, भारत और दुनिया में कयामत आ जाएगी। मुझे इसका पूरा भरोसा है कि मोदीजी की सरकार मामले की गंभीरता को समझेगी।' उनकी यह टिप्पणी इतिहास में उपलब्ध संदर्भों के प्रकाश में देखी जाए तो ठीक से समझ आएगी, वरना तो देश में एक वर्ग ऐसा है जो इस प्रकार की बातों को विचार किए बिना ही खारिज करने के लिए कुख्यात है। किसी देश की स्वाभाविक पहचान को बदलकर उस पर दूसरी पहचान थोपी जाती है, तब अनेक प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार इसके सबसे अच्छे और नजदीकी उदाहरण हैं। कुल मिलाकर मेघालय के उच्च न्यायालय की टिप्पणी को संविधान के विरुद्ध कह कर खारिज करना और न्यायमूर्तियों के लिए बनी आचार संहिता के विरुद्ध बता कर आवश्यक विमर्श से बचना, चलताऊ प्रवृत्ति होगी। आवश्यक है कि देशहित में विमर्श हो और इस प्रकार के खतरे जहाँ भी दिखाई दे रहे हैं, उनसे निपटने की ठोस प्रयास प्रारंभ हों।

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