शनिवार, 11 जुलाई 2026

तीजन बाई: भारतीय सांस्कृतिक विरासत की राजदूत

भारत की सांस्कृतिक विरासत की सशक्त पहचान और पंडवानी गायन की जादुई आवाज अब खामोश हो गई है, लेकिन उसकी गूंज सदियों तक भारतीय संस्कृति के आकाश में गूंजती रहेगी। पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का 70 वर्ष की आयु में 5 जुलाई, 2026 को रायपुर एम्स में निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक कला के एक सुनहरे अध्याय का विश्राम लेना है। अपने नाना से महाभारत की कथाएं सुनकर बड़ी हुई तीजन बाई ने जब तंबूरा हाथ में थामा, तो उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, बल्कि महाभारत के चरित्रों को अपनी सशक्त आवाज और प्रभावशाली अभिनय से मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी कला और जीवन यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो संघर्षों से पार पाना चाहता है। एक ऐसे दौर में जब महिलाओं का मंच पर आकर तेज स्वर में गाना और अभिनय करना आसान नहीं था, उन्होंने सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों की परवाह न करते हुए अपनी राह चुनी।

छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव गनियारी से शुरू हुआ तीजन बाई की यह यात्रा दुनिया के कई देशों तक पहुँची और वे भारतीय संस्कृति की एक मजबूत राजदूत बन गईं। अपनी अनोखी प्रस्तुति शैली से उन्होंने न केवल एक क्षेत्रीय कला को वैश्विक मंच पर स्थापित किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि सच्ची कला कभी भी भाषा और भूगोल की मोहताज नहीं होती। तीजन बाई का जीवन इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि यदि आप अपनी जड़ों से गहराई से जुड़े हैं, तो आसमान छूना मुश्किल नहीं है। भारतीय लोक कला में उनके इसी असाधारण और निस्वार्थ योगदान को नमन करते हुए राष्ट्र ने उन्हें समय-समय पर पद्मश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया। यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि माटी से जुड़ी उस हर लोक कला का सम्मान था जिसे उन्होंने जीवन भर सींचा। 

तीजन बाई का जीवन किस तरह हर वर्ग के लोगों के लिए प्रेरणा देने वाला है, उसकी अनुभूति उनके निधन के बाद आ रहे शोक संदेशों में की जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की संवेदनाएं हर उस भारतीय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं जो अपनी संस्कृति से प्रेम करता है। प्रधानमंत्री मोदी ने बड़े ही श्रद्धाभाव के साथ लिखा है, "उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में पहचान दिलाई। उनका जाना कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।" 

बहरहाल, तीजन बाई भले ही अब भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत अमर है। उनकी स्मृतियां सदैव हमारे मन में जिंदा रहेंगी। जब भी लोक कला के मंच सजेंगे, तंबूरे की झंकार गूंजेगी और महाभारत के शूरवीरों की गाथाएं गाई जाएंगी, तीजन बाई अपनी उसी ऊर्जा के साथ वहां मौजूद रहेंगी। उनका जीवन आने वाली कई पीढ़ियों के कलाकारों को अपनी संस्कृति से प्रेम करने और उसे पूरे गर्व के साथ दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की प्रेरणा देता रहेगा।

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