संघ शताब्दी वर्ष : हिन्दू एकता एवं समरसता पर बालासाहब के क्रांतिकारी विचार
हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के विचार अत्यंत स्पष्ट, प्रखर और क्रांतिकारी थे। ‘वसंत व्याख्यानमाला’ का उनका भाषण विश्व के ऐतिहासिक एवं महान भाषणों में शामिल किया जा सकता है। 8 मई, 1974 में पुणे में हुए अपने इस भाषण में छुआछूत (अस्पृश्यता) को लेकर बालासाहब ने जो कहा, वैसा खरा-खरा शायद ही किसी ने बोला हो। अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध विचार- “अगर गुलामी अनैतिक या गलत नहीं है, तो फिर कुछ भी गलत नहीं है”- का उल्लेख करते हुए बालासाहब ने कहा- “अगर छुआछूत गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है”। जातिगत भेदभाव के निर्मूलन के लिए काम करने वाले महानुभाव अक्सर इस ओर या उस ओर खड़े दिखाई देते हैं। उनके विचारों में राजनीति, परस्पर द्वेष और कटुता रहती है। लेकिन बालासाहब के विचारों में स्पष्टता के साथ-साथ आत्मीयता और बंधुता की झलक दिखाई देती है। सामाजिक समरसता पर उनके विचार समाधानमूलक और व्यावहारिक हैं। बालासाहब जी का मानना था कि “विषमता नष्ट करने के प्रयासों में सभी का सहभाग अपेक्षित है। संयम के साथ उत्तम व्यवहार के द्वारा यह प्रयास होंगे तभी उसमें सफलता मिलेगी”।
बालासाहब देवरस जी का यह भाषण हिन्दू एकता और सामाजिक समरसता के लिए जमीनी स्तर पर संघ का जो ‘मौन’ कार्य चलता है, उसकी ही ‘मुखर अभिव्यक्ति’ थी। सामाजिक समरसता के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को देखकर महात्मा गांधी से लेकर डॉ. भीमराव अंबेडकर तक प्रभावित हो गए थे। परंतु, संघ ने कभी अपने प्रयासों का ढिंढोरा नहीं पीटा। इसका लाभ लेकर कम्युनिस्टों एवं अन्य वितंडावादियों ने संघ को लेकर समाज में अनेक विसंगतियां फैलाने का प्रयास किया था। उन्होंने समाज के मन में यह बात बिठाने का प्रयास किया कि संघ छुआछूत को मानता है और देश में वर्ण व्यवस्था लाना चाहता है। संघ के सरसंघचालक बालासाहब ने अपने भाषण से ऐसे सभी वितंडावादियों के झूठे प्रपंच को भी समाप्त करने का काम किया। इसके साथ ही समाज की सज्जनशक्ति का प्रबोधन भी किया कि हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता के लिए किस प्रकार की दृष्टि रखना आवश्यक है।
हिन्दू एकता के लिए आवश्यक है विषमता समाप्त हो :
बालासाहब देवरस का स्पष्ट मानना था कि अस्पृश्यता समाज की विषमता का एक अत्यंत दुःखद और दुर्भाग्यजनक पहलू है, जिसका पूरी तरह से उन्मूलन होना ही चाहिए। हिन्दू समाज की अक्षुण्ण एकता के लिए यह आवश्यक है कि जाति के आधार पर भेदभाव समाप्त हो। वे कहते थे कि जब तक समाज में ऊँच-नीच और छोटे-बड़े की विषमता रहेगी, तब तक पूरा समाज कभी भी संगठित और सामर्थ्यवान नहीं हो सकता। जो लोग जाति के खोखले स्वाभिमान के कारण इस ‘अव्यवस्था’ को अपनी ‘व्यवस्था’ या ‘परंपरा’ मानते हैं, उनको भ्रम के जाल से बाहर निकालने के लिए अपने सार्वजनिक वक्तव्यों में उन्होंने अक्सर स्पष्ट किया कि प्राचीन काल में अस्पृश्यता का कोई अस्तित्व नहीं था और न ही यह हमारी मूल व्यवस्था का हिस्सा थी। यह एक रूढ़ि और बीमारी की तरह बाद के कालखंड में समाज में समाविष्ट हो गई, जिसे समय के साथ हमें बाहर कर देना चाहिए।
आरक्षित वर्ग को सुविधाएं कब तक :
सामान्य तौर पर हम जातिगत भेदभाव के प्रश्न से बचकर निकलने का प्रयास करते हैं। यह आचरण ठीक नहीं है। बालासाहब का कहना था कि हमें नि:संकोच यह मानना चाहिए कि हमारे ही अपने बंधुओं के साथ एक समय में ठीक व्यवहार नहीं हुआ है। यह बात उचित ही है यदि हम यह नहीं मानेंगे तो सामाजिक समरसता के लिए किए जाने वाले प्रयास और उपायों को लेकर संशय रहेगा। चूँकि हिन्दू समाज का एक वर्ग लंबे समय तक पीछे रहा है इसलिए उसके उत्थान के लिए सरकारें समय-समय पर विशेष प्रावधान करती हैं, उनके प्रति हमारी सम्यक दृष्टि रहे। इस संदर्भ में बालासाहब का मत अनुकरणीय है- “अब तक उनके पिछड़े रहने के कारण उन्हें सब प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध कराना आवश्यक है। ऐसी सुविधाओं की यदि वे माँग कर रहे हैं तो वह उनका अधिकार है। तथा ऐसी सुविधाएँ कब तक जारी रहें यह भी तय करना उनकी इच्छा पर निर्भर हो”।
एक-दूसरे का करें सम्मान :
सामाजिक समरसता के बारे में एक और महत्वपूर्ण संकेत उन्होंने किया कि “दलित बंधु किसी की कृपा नहीं चाहते, वे बराबरी का स्थान चाहते हैं और वह भी अपने पुरुषार्थ से ही”। इस विचार में तथाकथित सवर्ण एवं दलित वर्ग, दोनों के लिए ही संदेश है। किसी भी व्यक्ति को बराबरी का स्थान देना और उसे उचित सम्मान देना, किसी प्रकार की कृपा नहीं है। जिस वर्ग के साथ उपेक्षा का व्यवहार होता है, वह भी कृपा नहीं चाहता है। वह अपने पुरुषार्थ से जो हासिल कर रहा है, उसके लिए स्थान और सम्मान चाहता है। इसी प्रकार, जो लोग दलित हितों की आड़ में दूसरे वर्ग को कोसते हैं, उसे अपमानित करने का प्रयास करते हैं, उनको भी बालासाहब सीख देते हैं- “समाज के किसी भी वर्ग को अन्याय का पुतला कहकर कोसना, अपमानित करना या उनका मनोबल गिराना कदापि उचित नहीं है”। इस प्रकार का नकारात्मक दृष्टिकोण रखने से भी सामाजिक समरसता के विचार को व्यवहार में साकार नहीं किया जा सकता है। किसी के भी स्वाभिमान को ठेस पहुँचाना ठीक नहीं है। वे कहते थे कि सामाजिक समरसता के लिए ऐसा मार्ग निकालना आवश्यक है, जिसमें किसी के प्रति कटुता न हो।
समाज के समझदार लोगों पर बड़ा दायित्व :
सामाजिक एकता और समरसता स्थापित करने के प्रयास सौहार्दपूर्ण ढंग से आगे बढ़ें इसलिए बालासाहब ने समाज की सज्जनशक्ति से आह्वान किया। इस कार्य के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने के लिए उन्होंने धर्माचार्यों (धर्मगुरुओं, संतों, महात्माओं और विद्वानों) से विशेष रूप से आगे आने का आग्रह किया, क्योंकि उनका मानना था कि इन महापुरुषों का जनमानस पर बहुत गहरा प्रभाव होता है। बालासाहब कहते हैं- “समाज के अन्य समझदार लोगों पर भी बड़ा दायित्व है। उन्हें ऐसे मार्ग सुझाने चाहिए कि जिनसे काम तो बनेगा किन्तु समाज में कटुता उत्पन्न नहीं होगी। ‘उपायं चिन्तयन् प्राज्ञः अपायमपि चिन्तयेत्’। समाज में सौहार्द, सामंजस्य और परस्पर सहयोग का वातावरण स्थापित करने के लिए ही हमें समानता चाहिए। इस बात को भूलकर अथवा इसे न समझते हुए जो लोग बोलेंगे, लिखेंगे और आचरण करेंगे, वे निश्चय ही अपने उद्देश्यों को बाधा पहुँचाएंगे”। उन्होंने धर्मगुरुओं से आग्रह किया कि वे अपने प्रवचनों एवं उपदेशों के माध्यम से लोगों को यह स्पष्ट करें कि हमारे धर्म के ‘शाश्वत मूल्य’ (हमेशा बने रहने वाले सिद्धांत) कौन से हैं और ‘कालानुरूप परिवर्तनीय’ (समय के साथ बदलने योग्य) बातें कौन सी हैं। हम सब जानते हैं कि हमारा समाज धर्माचार्यों की बातों का अनुसरण करता है। यदि धर्माचार्य लोगों को समझाएंगे कि अस्पृश्यता हमारा जीवन मूल्य नहीं है, यह किसी कालखंड में बुराई के रूप में हमारे समाज में घर कर गया होगा, अब इसे छोड़ना ही हितकारक है। तब निश्चित ही उसके अच्छे परिणाम आएंगे। जब भी इस प्रकार के प्रयास हुए हैं, उनके सार्थक परिणामों की अनुभूति हम सबने की ही है।
प्रेरक प्रसंग :
बालासाहब सामाजिक समरसता के अपने विचारों को बाल्यकाल से ही जीते थे। एक बार बालासाहब ने अपनी मां से कहा, ‘‘संघ के मेरे कुछ मित्र भोजन करने के लिए आएंगे, परंतु मैं चाहता हूं कि उन सबको मेरी तरह सम्मान प्राप्त हो, चाहे वे किसी भी जाति से संबंध रखते हों। उन्हें भोजन उन्हीं बर्तनों में परोसा जाए, जिनमें हमारा परिवार खाता है। वे सब मेरे साथ रसोई में बैठकर भोजन करेंगे। मैं जाति के नाम पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं चाहता।’’ इस पर मां ने अपनी सहमति प्रदान कर दी और उसी दिन से जब वे उनके घर खाना खाने के लिए आए, देवरस परिवार में स्वयंसेवकों की जाति को लेकर कभी कोई प्रश्न नहीं पूछा गया। उस काल में देश में यह एक असाधारण बात थी, उन दिनों जाति-संबंधी भेदभाव अत्यधिक प्रचलित था।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 19 जुलाई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ |
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