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सोमवार, 8 जून 2026

रजनीश अग्रवाल: पत्रकारिता के प्रांगण से राज्यसभा के पटल तक

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के प्रांगण से पत्रकारिता की पढ़ाई करके राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहे पूर्व विद्यार्थी रजनीश अग्रवाल अब राज्यसभा के सम्मानित सदस्य होंगे। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें मध्यप्रदेश से देश की सबसे बड़ी पंचायत के उच्च सदन हेतु अपना उम्मीदवार बनाया है। विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव की बात है कि उसके विद्यार्थी दादा माखनलाल चतुर्वेदी के आंगन में संचार कौशल सीखकर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया जाना यह संदेश भी देता है कि राजनीतिक क्षेत्र में बौद्धिक क्षमता, वैचारिक स्पष्टता और उत्कृष्ट संचार कौशल वाले नेताओं को महत्व दिया जा रहा है। रजनीश अग्रवाल का व्यक्तित्व एक राजनेता से कहीं अधिक एक कुशल रणनीतिकार और प्रखर संचारक का है, जिसकी जड़ें पत्रकारिता के मजबूत धरातल से जुड़ी हैं।

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

ऐसा शिखालेख आपने देखा नहीं होगा

माखनलालजी का समाचारपत्र ‘कर्मवीर’ बना अनूठा शिलालेख

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के परिसर में स्थापित पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की प्रतिमा और उस पर लगा अनूठा शिलालेख

स्मारक, भवन, परिसर इत्यादि के भूमिपूजन या उद्घाटन प्रसंग पर पत्थर लगाने (शिलालेख) की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। यह इस बात का दस्तावेज होता है कि वास्तु का भूमिपूजन/ उद्घाटन / लोकार्पण कब और किसके द्वारा सम्पन्न किया गया। ये शिलालेख एक प्रकार से इतिहास और महत्वपूर्ण घटनाओं के विवरण को समझने में सहायता करते हैं। इन शिलालेखों का एक तयशुदा प्रारूप है, हम सबने देखे ही हैं। किंतु, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के नवीन परिसर में स्वतंत्रतासेनानी एवं प्रखर संपादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के प्रतिमा अनावरण प्रसंग पर लगाया गया शिलालेख अनूठा है और अपने आप में अद्भुत है। मुझे विश्वास है कि ऐसा शिलालेख आपने पहले नहीं देखा होगा। माखनलालजी की प्रतिमा के ‘पेडस्टल’ पर आपको समाचारपत्र का प्रथम पृष्ठ चस्पा दिखायी देगा। दरअसल, समाचारपत्र का यह ‘फ्रंट पेज’ ही दादा माखनलाल चतुर्वेदी की इस प्रतिमा का ‘शिलालेख’ है। यह रचनात्मक और अभिनव शिलालेख अपने सृजनात्मक लेखन के लिए पहचाने जानेवाले विश्वविद्यालय के कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी की सुंदर कल्पना है। अगर आप माखनलालजी की प्रतिमा के समीप आ रहे हैं, तो यह शिलालेख आपको विश्वविद्यालय की 35 वर्ष की यात्रा, उसकी उपलब्धियों और भविष्य के स्वप्नों से भेंट करा देगा।

सोमवार, 4 जुलाई 2022

पत्रकारिता की शक्ति को बताने वाली दस्तावेजी पुस्तक है ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’

 

- डॉ. गजेन्द्र सिंह अवास्या

भारत में पत्रकारिता का एक गौरवशाली इतिहास है। समाज जागरण से लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता की चेतना जगाने में पत्रकारों एवं समाचारपत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। भारत में पत्रकारिता के विजयी प्रसंगों में से एक है-‘रतौना आन्दोलन’। गो-संरक्षण के जुड़ा यह आन्दोलन वर्ष 1920 में मध्यप्रदेश के सागर जिले के समीप रतौना नामक स्थान से शुरू हुआ, जिसे प्रखर संपादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के कलम ने शीघ्र ही राष्ट्रव्यापी आन्दोलन में परिवर्तित कर दिया। पत्रकारिता के सशक्त भूमिका के कारण यह आन्दोलन अपने परिणाम को प्राप्त कर सका। तत्कालीन मध्यभारत प्रान्त में अंग्रेजों को पहले बार पराजय का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश सरकार को अपने निर्णय को वापस लेना पड़ा। जिस जगह प्रतिमाह ढाई लाख गोवंश के क़त्ल की योजना थी, आज वहां गोवंश की नस्ल सुधार का बड़ा केंद्र है। जहाँ गोवंश के खून की नदी बहनी थी, वहां आज इतना दुग्ध उत्पादन हो रहा है कि आस-पास के लोग शुद्ध दूध पी रहे हैं। इस सम्पूर्ण विवरण को हमारे सामने लेकर आती है, पुस्तक ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’।

गुरुवार, 21 मई 2020

'की-बोर्ड का सिपाही' प्रो. संजय द्विवेदी बने पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति


देश के जाने-माने पत्रकार एवं मीडिया शिक्षक प्रो. संजय द्विवेदी को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का प्रभारी कुलपति नियुक्त किया गया है। इससे पहले वे विश्वविद्यालय के कुलसचिव की जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे थे। प्रो. द्विवेदी 10 वर्ष से अधिक समय तक विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष भी रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि कुलपति प्रो. संजय द्विवेदी लंबे समय तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे हैं। उन्हें प्रिंट, बेव और इलेक्ट्रॉनिक, तीनों ही मीडिया में कार्य करने का वृहद अनुभव है। उन्होंने दैनिक भास्कर, हरिभूमि, नवभारत, स्वदेश, इंफो इंडिया डाट काम और छत्तीसगढ़ के पहले सेटलाइट चैनल जी-24 छत्तीसगढ़ जैसे मीडिया संगठनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली। मुंबई, रायपुर, बिलासपुर और भोपाल में लगभग 14 साल सक्रिय पत्रकारिता में रहने के बाद प्रो. द्विवेदी शिक्षा क्षेत्र से जुड़े।

प्रो. द्विवेदी 12 वर्षों से नियमित जनसंचार के सरोकारों को केंद्रित पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ के कार्यकारी संपादक भी हैं। वे विभिन्न विश्वविद्यालयों की अकादमिक समितियों एवं मीडिया से संबंधित संगठनों में सदस्य एवं पदाधिकारी भी हैं।

निश्चित ही उनके सुदीर्घ अनुभव का लाभ विश्वविद्यालय को मिलेगा। यह विश्वविद्यालय के लिए भी सुखद है कि यहीं के विद्यार्थी को विश्वविद्यालय का नेतृत्व करने का अवसर मिला है। फरवरी-2009 में वे विश्वविद्यालय से जुड़े थे। विश्वविद्यालय में उन्होंने विभागाध्यक्ष एवं कुलसचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों कार्य किया।

मेरे उनका पहला परिचय ब्लॉगिंग के माध्यम से हुआ। सर 'की-बोर्ड के सिपाही' के नाम से ब्लॉग लिखते हैं। वर्ष 2007 में जब अपन ने ब्लॉग लिखना शुरू किया तब से सर का ब्लॉग पढ़ते आ रहे हैं। वे नियमित तौर पर राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया के मुद्दों पर लेखन करते हैं। उनका लिखा विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में भी नियमित प्रकाशित होता है। उनकी सक्रियता सदैव प्रेरणा देती है। उन्होंने अब तक 25 पुस्तकों का लेखन और संपादन भी किया है।

उनके साथ काम करने का पहला अवसर 2013 में मिला। विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में वे विभागाध्यक्ष थे और मैंने प्रोडक्शन सहायक के तौर पर ज्वाइन किया था। विश्वविद्यालय जैसे संस्था में काम करने का यह मेरा पहला अवसर था, लेकिन संजय सर की उपस्थिति ने हौसला दिया। वे लगातार प्रोत्साहित करते रहते हैं।
जनसंचार के विभागाध्यक्ष रहते हुए और कुलसचिव के रूप में भी उन्होंने सदैव विद्यार्थियों के हित में अच्छे निर्णय लिए हैं। जनसंचार विभाग में एक समृद्ध विभागीय पुस्तकालय की स्थापना उन्होंने की। विद्यार्थियों को व्यवहारिक प्रशिक्षण देने के लिए प्रायोगिक समाचार-पत्र का प्रकाशन हमने उनके मार्गदर्शन में किया। न्यूज़ बुलेटिन निकलना और अन्य गतिविधियाँ वे लगातार विद्यार्थियों के लिए आयोजित करते रहे। सार्थक शनिवार जैसी अनूठी परम्पर उन्होंने शुरू की। यह विद्यार्थियों का सांस्कृतिक मंच था।

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

बौद्धिकता पर हमला पतन का संकेत

 लो कतंत्र की सबसे अनूठी बात यह है कि इसमें सबको समान रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। अन्य तरह की किसी भी शासन व्यवस्था में इस कदर आजादी नहीं है। दरअसल, लोकतंत्र की ताकत आम जनता में निहित है। लोकतंत्र के संचालन का सूत्र लोगों के हाथ में होता है। लोकतंत्र की सफलता और विफलता भी जनता के हाथ में ही है। इसलिए समय-समय पर अपने लोकतंत्र को ठोक-बजाकर देखते रहना जरूरी है। उसकी समालोचना और प्रशंसा दोनों ही जरूरी हैं। प्रबुद्धवर्ग अगर सरकार या फिर शासन व्यवस्था में शामिल किसी राजनीतिक दल की नीतियों की आलोचना करता है तो इसमें गलत क्या है? क्या राजनीतिक विमर्श करने वाले प्रबुद्ध लोगों पर राजनीतिक हमला उचित है? क्या बौद्धिक बहस और आवाज का गला घोंटने के प्रयास की निंदा नहीं की जानी चाहिए? मध्यप्रदेश में मुद्दों की राजनीति छोड़कर कांग्रेस इसी तरह की दोयम दर्जे की राजनीति कर रही है। मध्यप्रदेश के ही नहीं देश के जाने-माने पत्रकार, लेखक, राजनीतिक विचारक और मीडिया शिक्षक संजय द्विवेदी को मध्यप्रदेश कांग्रेस ने अपने निशाने पर लिया है। उनके एक लेख को प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला बताकर नाहक हंगामा खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। उन्हें एक खास विचारधारा के प्रभाव का लेखक बताने की बेहद छोटी हरकत की गई है। 
       कांग्रेस के आरोप पढ़-सुनकर समझा कि मध्यप्रदेश में अपना वजूद खो रही कांग्रेस या तो बहुत हड़बड़ी में है, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा, जो उल्लू की लकड़ी उसे किसी ने पकड़ा दी, उसी पर हंगामा खड़ाकर अपनी राजनीति की दुकान चलाने की कोशिश कर रही है। या फिर उन्हें अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं है। संजय द्विवेदी पर आरोप लगाने वाले और उन्हें नौकरी से हटाने की मांग करने वाले कांग्रेस के प्रवक्ता या तो लेखक संजय द्विवेदी को जानते नहीं है या फिर उन्होंने जानबूझकर यह खिलदंड किया है। पत्रकारिता में निष्पक्षता का नाम ही संजय द्विवेदी है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में दैनिक भास्कर, नवभारत, हरिभूमि और जी न्यूज के संपादक, समाचार संपादक और एंकर के रूप में देश ने उनके काम को जाना है, उनकी विश्वसनीयता को परखा है। आज तक उनकी लेखनी पर किसी ने अंगुली नहीं उठाई। संजय द्विवेदी जितने प्रिय राष्ट्रवादी विचारधारा के पैरोकारों के हैं, वामपंथी खालिस कॉमरेड भी उन्हें उतना ही प्रेम करते हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के शीर्षस्थ नेताओं से उनके आत्मीय ताल्लुक हैं। दोनों ही दल के गंभीर नेता उनका और उनकी लेखनी का सम्मान करते हैं। शिद्दत से उन्हें याद करते हैं। खास विचारधारा का लेखक होने के आरोप तो उनके काम के कुछ अध्याय देखने पर ही खाजिर हो जाते हैं। मध्यप्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह (भाजपा और राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग इनके धुर विरोधी हैं) के अभिनंदन ग्रंथ के संपादन में संजय द्विवेदी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बीआर यादव पर लिखी किताब 'कर्मपथ' का संजय द्विवेदी ने संपादन ही नहीं किया वरन उसके विमोचन में दिग्विजय सिंह (राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग अपने घोर शत्रु के रूप में दिग्विजय सिंह को देखते हैं) को सादर बुलाया। जब राहुल गांधी ने सकारात्मक राजनीति के प्रयास किए तो संजय जी ने खुलकर उनकी तारीफ में लिखा। अन्ना हजारे ने सामाजिक क्रांति की अलख जगाई तो उन्होंने अन्ना के समर्थन में जागरण पत्रिका तक प्रकाशित कर दी। अरविंद केजरीवाल ने जब तक आम आदमी को अभिव्यक्त किया श्री द्विवेदी उनके साथ थे, उनकी प्रशंसा में लिखा लेकिन अरविन्द जब राह भटके तो उनकी आलोचना भी शिद्दत से की। संजय द्विवेदी किसी के इशारे पर नहीं लिखते। जब मन उद्देलित होता है तो मनोभाव कागज पर उतरते हैं। वे समालोचक हैं, किसी के निंदक या प्रशंसक नहीं। 
        देश के प्रधानमंत्री और कांग्रेस की नीति की आलोचना पीएम के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू और पूर्व कोल सेक्रेटरी पीसी पारिख ने तथ्यों के आधार पर किताब लिखकर की है। दोनों किताबों पर खूब हंगामा हुआ। कांग्रेस ने विरोध किया। मनमोहन सिंह हमेशा की तरह चुप रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा क्योंकि वे सब जानते हैं। वे लोकतंत्र की मर्यादा भी समझते हैं। लेकिन शायद मध्यप्रदेश कांग्रेस ने राजनीति की अलग ही राह तय की है। इसीलिए महज एक समालोचना पर ही बिफर गए और एक बुद्धिजीवि पर राजनीतिक हमला कर दिया। लोकतंत्र में गलत कार्यों की आलोचना और अच्छे कार्यों की तारीफ करने का सबको अधिकार है। 
       किसी राष्ट्र और राज्य को पतन के मार्ग पर ले जाना बहुत आसान है, उस राष्ट्र और राज्य की बौद्धिक परंपरा-संपदा पर आघात करना शुरू कर दो। रामायण के किस्से सबके जेहन में होंगे। राक्षस किस तरह ऋषियों के आश्रम पर आक्रमण कर उनकी हत्याएं कर रहे थे। वे उस राज्य की बौद्धिक संपदा को खत्म कर हमेशा के लिए उस पर अपना अधिपत्य जमाना चाहते थे। राक्षस जानते थे कि जब तक बुद्धिजीवि जीवित रहेंगे किसी भी राज्य पर गलत ढंग से शासन करना संभव नहीं। बुद्धिजीवि गलत होता देख खामोश नहीं बैठते, वे वैचारिक क्रांति का बिगुल फूंकते हैं, स्वाभिमान और आत्मगौरव के लिए लडऩे के लिए समाज को जागृत करते हैं। विख्यात साहित्यकार नरेन्द्र कोहली भी कहते हैं कि कि राजा देश बनाते हैं और ऋषि राष्ट्र बनाते हैं। हमें ऋषियों की जरूरत है। समर्थ राष्ट्र के लिए चिंतनशील पत्रकारों और शिक्षकों की जरूरत है। ऐसे में लेखक संजय द्विवेदी पर कांग्रेस के राजनीतिक हमले को राष्ट्र पर हमले के रूप में क्यों नहीं देखा जाना चाहिए? कांग्रेस शायद भूल गई है कि इंदिरा गांधी जैसी सशक्त राजनेता के माथे पर महज एक कलंक है, आपातकाल का। यह भयंकर कलंक है। आपातकाल में भी कांग्रेस ने सबसे पहले बौद्धिक जगत पर हमला किया था। बौद्धिक जगत पर हमले की इस भयंकर गलती के कारण इंदिरा गांधी के तमाम अच्छे कार्यों पर पर्दा पड़ जाता है। अगर आपको देश की चिंता है तो मुद्दों की राजनीति करो। विचार करो कि संजय द्विवेदी ही नहीं देशभर के लेखकों को क्यों आपकी आलोचना करने पर विवश होना पड़ा है। संजय द्विवेदी जैसे लेखकों का तो काम ही है, आईना दिखाना। आईने में दिख रही तस्वीर गंदी है तो उसे सुधारने का दायित्व हमारा है। हमें अपने चेहरा धोने की जरूरत है न कि आईना दिखाने वाले को गरियाने की। 
      संजय द्विवेदी एक संतुलित लेखक हैं। उन्हें मैं कोई छह-आठ माह से नहीं जानता। लम्बे अरसे से उन्हें पढ़ता आ रहा हूं। 'की-बोर्ड के सिपाही' के नाते उनका लेखन की दुनिया में बड़ा सम्मान है। आदर के साथ उनको पढ़ा जाता है। वे सच को सच लिखते हैं। अपने लेखन से राजनीति ही नहीं समाज को दिशा देने का कार्य संजय द्विवेदी कर रहे हैं। उनकी लेखनी की धार को कुंद करने का कांग्रेस का यह कुत्सित प्रयास ठीक नहीं है। इस प्रयास की निंदा होनी चाहिए और विरोध भी।

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

मीडिया पर नहीं पूरा भरोसा

 स माचार-पत्र और न्यूज चैनल्स धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। लोगों को अब समाचार-पत्र में प्रकाशित होने वाली सामग्री पर पूरा-पूरा भरोसा नहीं रहा। अलग-अलग न्यूज चैनल्स पर आने वाले समाचारों को लेकर भी दर्शकों का मानना है कि सब सच नहीं है। एक ही खबर का लगभग पूरा सच जानने के लिए चार-छह अखबार पढऩे पड़ते हैं। तब भी कुछ न कुछ सवाल बाकी रह जाते हैं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से चुनावी परिप्रेक्ष्य में लोक विमर्श का अध्ययन करने के लिए जब छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में जाना हुआ और लोगों से बातचीत हुई तो मीडिया को लेकर एक कड़वा सच सामने आया। हालांकि मीडिया से लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है, इस सच से मैं पहले भी वाकिफ था। लेकिन बरसों-बरस पत्रकारों ने खुद को खपा-खपा कर विश्वसनीय पत्रकारिता की जो इमारत बुलंद की थी, वह कितनी तेजी से दरक रही है, यह जानकर अच्छा नहीं लगा। समाचार-पत्र और टेलीविजन से राजनीतिक मुद्दों पर आपको जो जानकारी मिलती है, उस पर आपका कितना विश्वास हैं? लगभग पूरा विश्वास करते हैं, उक्त सवाल का ऐसा जवाब देने वाला एक भी जागरूक पाठक और दर्शक नहीं मिला। हां, दस-पांच लोगों ने जरूर कहा कि अस्सी फीसदी तक विश्वास करते हैं। लेकिन, तीन सौ लोगों में दस-पांच ऐसे नामों की कोई गिनती नहीं की जा सकती। पत्रकारिता के भविष्य के लिए यह एक चुनौती है। मीडिया संस्थानों को अब चेत जाने की जरूरत है। अभी भी लोग अखबार और टेलीविजन पर आधा-आधा विश्वास कर रहे हैं लेकिन ऐसा ही चलता रहा तो यह आधा-आधा विश्वास भी जाता रहेगा। लोगों का मानना है कि पेड न्यूज की बीमारी की वजह से पत्रकारिता की विश्वसनीयता को सर्वाधिक क्षति हुई है। पेड न्यूज यानी नोट के बदले खबर छापना। वर्ष २००९ में लोकसभा के चुनाव के दौरान पेड न्यूज के कई मामले सामने आए थे। पहली बार पेड न्यूज एक बड़ी बीमारी के रूप में सामने आई थी। अखबारों और न्यूज चैनल्स ने बकायदा राजनीतिक पार्टी और नेताओं की खबरें प्रकाशित/प्रसारित करने के लिए पैकेज लांच किए थे। यानी राजनीति से जुड़ी खबरें वास्तविक नहीं थीं। जिसने ज्यादा पैसे खर्च किए उस पार्टी/नेता के समर्थन में उतना बढिय़ा कवरेज। जिसने पैसा खर्च नहीं किया उसके लिए कोई जगह नहीं थी। इस दौरान कई राजनेताओं ने सबूत के साथ मीडिया पर आरोप लगाए कि उनके समर्थन में खबरें छापने के लिए पैसा वसूला गया है या वसूला जा रहा है। पेड न्यूज की खबरों से बड़े मीडिया घरानों की साख पर भी बट्टा लगा। नतीजा यह हुआ कि इन विधानसभा चुनाव में स्वयं को विश्वसनीय दिखाने के लिए कई बड़े समाचार-पत्रों और चैनल्स ने पेड न्यूज के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। सही मायने में कह सकते हैं कि खुद को पेड न्यूज के खिलाफ खड़ा दिखाया। समाचार-पत्रों ने तो 'नो पेड न्यूज' के लोगो तक प्रतिदिन प्रकाशित करना शुरू कर दिया। यानी हम विश्वसनीय अखबार हैं। हम नोट लेकर खबर नहीं छापते। लेकिन, पूर्व के कारनामे इतने बड़े हैं कि लोगों को 'नो पेड न्यूज' के मुखौटे पर आसानी के साथ विश्वास नहीं हो रहा है। वह तो खबरों से समाचार-पत्र और न्यूज चैनल की विश्वसनीयता को आंकता है। 
मध्यप्रदेश के जिले दतिया में चाय-नाश्ते की दुकान पर मैंने देखा कि एक व्यक्ति अखबार पढऩे में काफी रुचि ले रहा है। वह दो-तीन समाचार-पत्र पढ़ चुका था। अमूमन भागदौड़ भरे इस समय में आदमी एक अखबार भी ढंग से नहीं पढ़ता है। ऐसे में समाचार-पत्रों को इतनी रुचि लेकर पढऩे वाले सुधी पाठक से बात करना मैंने उचित समझा। 
'यहां, दतिया में कौन-से अखबारों की स्थिति अच्छी है।' मैं अपनी चाय का गिलास लेकर उसके नजदीक पहुंचा और उससे यह सवाल पूछा। उसने कहा- सब एक जैसे हैं। 'राजनीति के विषय में आपको समाचार-पत्रों से कितनी जानकारी प्राप्त होती है और आप उस पर कितना विश्वास करते हैं?' अखबार को मोड़ते हुए उसने मेरे इस सवाल का जवाब दिया- सब पैसा लेकर खबर छाप रहे हैं। ऐसे में सही जानकारी कहां मिल पा रही है। जो प्रत्याशी पैसा अखबार के दफ्तर पैसा पहुंचा देता है, अखबार के पन्नों पर उसकी वाहवाही और जीत दिखने लगती है। किसी एक अखबार की यह स्थिति नहीं है, सब के सब यही कर रहे हैं। अब अखबार और पत्रकार पहले जैसे नहीं रहे। यही कारण है कि अब अखबार में बड़ी-बड़ी खबरें प्रकाशित होने पर भी उनका कोई असर नहीं होता। 'आपको कैसे पता कि किस अखबार ने, कौन-सी खबर पैसा लेकर छापी है?' मेरे इस सवाल पर वह मुस्कुराया और बोला- स्थानीय आदमी को सब समझ में आता है साहब। अब अखबार वाले पैसा लेकर किसी बहुत ही कमजोर प्रत्याशी को जिताऊ प्रत्याशी बताएंगे तो स्थानीय लोगों को समझ नहीं आएगा क्या? यही कारण है कि लोग अब समाचार-पत्र की सभी खबरों पर पूरा भरोसा नहीं करते। मैं रोज तीन-चार अखबार पढ़ता हूं, क्योंकि तभी किसी खबर की पूरी जानकारी मिल पाती है। 
       उसने नाम लेकर कई प्रतिष्ठित अखबारों की नीति-रीति पर भी अंगुली उठाई। पैसा कमाने की भूख में सभी अखबार एक ही रंग में रंग गए हैं। उसने आगे कहा कि लोकतंत्र में मीडिया खुद को चौथा स्तम्भ मानता है। यह काफी हद तक सही भी है। लोकतंत्र को मजबूत करने में समाचार-पत्र और न्यूज चैनल्स की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। समाचार-पत्र और टेलीविजन की खबरें पढ़/सुनकर आज भी कई लोग अपनी चुनावी राय बनाते हैं। मीडिया के माध्यम से ही अलग-अलग नेताओं और पार्टियों के बारे में लोगों की धारणा बनती-बिगड़ी है। ऐसे में मीडिया यदि गलत और पक्षपातपूर्ण खबरें प्रकाशित करेगा तो लोकतंत्र को भारी नुकसान होने वाला है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए मीडिया को भ्रष्टाचार से मुक्त रखना जरूरी है। उसकी भूमिका ठीक रहना जरूरी है। फिलहाल तो मीडिया जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह काफी खतरनाक है, मीडिया के लिए भी और लोकतंत्र के लिए भी। मीडिया पर लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है। यह चिंता का विषय है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले और राजस्थान के चित्तौडग़ढ़ में भी लगभग सभी लोगों का यही कहना था कि मीडिया में आ रही खबरें पूरी तरह सच नहीं है। सच के प्रहरी अब ताकत और धन लोलुपता के नशे में हैं। मार्केटिंग से जुड़े श्रीमान जाड़ावत ने बताया कि आम जनता के सरोकारों से अब मीडिया को उतना लेना-देना नहीं रहा है। सच यह है कि अब व्यावसायिक हित प्राथमिक हो गए हैं। चुनाव के समय में अखबार राजनीतिक विज्ञापनों की दर व्यावसायिक विज्ञापन से भी कहीं अधिक कर देते हैं। मीडिया की विश्वसनीयता की स्थिति क्या है, इसे समझने के लिए, ये महज उदाहरण नहीं हैं। बल्कि चेतावनी है कि मीडिया को लेकर बन रहे लोगों के इस मानस को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

रविवार, 17 नवंबर 2013

मन बस गया बस्तर में

 छ त्तीसगढ़ की राजनीतिक राजधानी जरूर रायपुर है लेकिन छत्तीसगढ़ का असली रंग तो बस्तर में ही है। संभवत: यही कारण है कि बस्तर को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है। अहो बस्तर, तुम भाग्यशाली हो, अभी भी प्रकृति की गोद में हो। इंद्रावति नदी तुमको सिंचित करती है। वरना तो विकास के नाम पर कितने शहर कांक्रीट के जंगल बन गए। सघन वन, ऊंचे-नीचे पहाड़ और आदिवासी लोकरंग से समृद्ध है बस्तर। बस्तर का जिला मुख्यालय जगदलपुर शहर है। जगदलपुर राजधानी रायपुर से करीब 305 किलोमीटर दूर स्थित है। सड़क मार्ग से जगदलपुर पहुंचने में 5 से 6 घंटे का सफर तय करना पड़ता है। सड़क मार्ग के दोनों और हरे-भरे, ऊंचे और घने पेड़ हैं, जो खूबसूरत बस्तर की तस्वीर दिखाते हैं। ये नजारे कहते हैं कि अगर आप घुमक्कड़ हो तो सही जगह आए हो, स्वागत है तुम्हारा। 
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से एक शोध कार्य के संदर्भ में बस्तर जाने का मौका मिला। पांच दिन बस्तर की वादियों और बस्तर के सरल स्वभाव के लोगों के बीच रहना हुआ। बस्तर की ज्यादातर आबादी वनवासी (आदिवासी) है। कुछ आबादी देश के अन्य प्रान्तों से आकर बस गई है या बसाई गई है। ग्वालियर-चंबल संभाग के भिण्ड जिले के प्रेम भदौरिया बताते हैं कि काफी पहले उनका परिवार भिण्ड से कारोबार के लिए जगदलपुर आया था। यहां की आबोहवा इतनी रास आई कि वे यहीं बस गए। वे बताते हैं कि बस्तर के एक राजा ने ग्वालियर-चंबल संभाग के कई ठाकुरों को यहां लाकर बसाया था। वनवासी समाज के बीच यहां एक गांव ठाकुरों का भी है। व्यापार करने के लिए मारवाडिय़ों ने भी यहां दुकानें जमा रखी हैं। उड़ीसा से बस्तर बेहद नजदीक है। यही कारण है कि उड़ीसा के लोग भी यहां आकर बस गए हैं। बस्तर के लोग भी कामकाज और बेहतर इलाज के लिए विशाखापट्नम जाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश रावल बताते हैं कि मूलत: वे भी उड़ीसा के हैं। काफी पहले यहां आकर बस गए हैं। बस्तर को समझने और देखने में श्री सुरेश रावल का बहुत सहयोग मिला। एक ढाबा पर, एक ही टेबल पर हम चार लोग खाना खा रहे थे। इनमें से एक पंजाब, दूसरा उड़ीसा, तीसरा उत्तरप्रदेश और चौथा यानी मैं मध्यप्रदेश का मूल निवासी था। मुझे छोड़कर बाकी के तीन सज्जन बस्तर में ही रच-बस गए थे। यानी कह सकते हैं बस्तर छत्तीसगढ़ी संस्कृति का गढ़ तो है ही देशभर की साझा संस्कृति की झलक भी यहां देखने मिलती है।