शनिवार, 1 अगस्त 2026

सावधान! अब ई20 पर भड़काने की तैयारी

नीट परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की गर्मी अभी शांत भी नहीं हुई है कि आंदोलनजीवियों ने जनता को भ्रमित करने एवं भड़काने के लिए दूसरा विषय खोजना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ महीनों से एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर एक नकारात्मक नैरेटिव खड़ा करने का प्रयास किया गया है। परिणामस्वरूप, एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति को लेकर उठ रही आपत्तियों और राजनीतिक बयानों ने एक बार फिर ऊर्जा संक्रमण की इस प्रक्रिया को व्यापक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक तरफ जहां सरकार इसे पर्यावरण संरक्षण, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों की आय बढ़ाने वाले दूरगामी कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों, ट्रांसपोर्ट यूनियनों और आम वाहन चालकों के विरोध प्रदर्शनों ने नीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

ई20 को लेकर जनता के बीच बने भ्रम के वातावरण एवं आक्रोश का लाभ उठाने की दृष्टि से कॉकरोच आंदोलन से निवृत्त हुए आंदोलनजीवियों ने अब ई20 पेट्रोल को लेकर मोर्चाबंदी की तैयारी शुरू कर दी है। इस मुद्दे पर भी आंदोलन आग पकड़ सकता है क्योंकि वर्तमान में इस पूरे विवाद को लेकर आम जनता के भीतर एक अजीब तरह के संशय और असुरक्षा की भावना पनप रही है। वाहन मालिकों, विशेषकर अप्रैल 2023 से पहले निर्मित पुरानी गाड़ियों का उपयोग करने वाले लोगों के बीच यह डर घर कर गया है कि एथनॉल मिश्रित ईंधन उनकी गाड़ियों के इंजन को नुकसान पहुंचा सकता है। माइलेज में कमी, इंजन पार्ट्स में क्षरण और बार-बार मरम्मत की जरूरत जैसी शिकायतों ने लोगों के मन में इस नीति के प्रति एक नकारात्मक धारणा बना दी है। 

चूंकि देश में एक बड़ा वर्ग अपनी गाड़ियां सालों-साल चलाता है, इसलिए उनके लिए यह मुद्दा सीधे तौर पर वित्तीय बोझ से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, पेट्रोल पंपों पर पुरानी गाड़ियों के लिए सामान्य (बिना मिश्रित या कम मिश्रित) ईंधन का स्पष्ट विकल्प उपलब्ध न होना जन-असंतोष को और हवा दे रहा है। लोगों को लग रहा है कि तकनीकी स्पष्टता और पूर्व तैयारी के बिना यह बदलाव उन पर जबरन थोपा गया है। 

सरकार के लिए यह स्थिति बेहद नाजुक है, क्योंकि यदि जनता का भरोसा ही डिग जाएगा तो इतना बड़ा सुधार अपनी साख खो देगा। ऐसे में सरकार को समय रहते और बिना किसी देरी के बहुस्तरीय तैयारियां करनी होंगी। सबसे पहले, सरकार को पारदर्शिता और जन-जागरूकता का रास्ता अपनाना चाहिए। केवल आंकड़ों के आधार पर नीति को सही ठहराने के बजाय, एक निष्पक्ष तकनीकी रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाए, जो पुरानी और नई गाड़ियों पर ई20 के प्रभाव को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ करे। इसके अलावा, सरकार को ईंधन विकल्पों के मामले में लचीला रुख अपनाना होगा। जब तक देश का बड़ा वाहन बेड़ा ई20 के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हो जाता, तब तक उपभोक्ताओं को पुरानी गाड़ियों के लिए वैकल्पिक या कम-एथनॉल युक्त ईंधन चुनने का अधिकार मिलना आवश्यक है। ऑटोमोबाइल निर्माताओं के साथ मिलकर पुरानी गाड़ियों को इस ईंधन के अनुकूल बनाने वाली किट उपलब्ध कराने या सुरक्षा उपायों को तय करने पर भी काम किया जाना चाहिए। नीतिगत बदलाव तभी टिकाऊ और सफल हो सकते हैं जब वे जन-विश्वास के धरातल पर टिके हों, अन्यथा प्रशासनिक जिद से उपजा आक्रोश किसी भी बेहतर उद्देश्य को पटरी से उतार सकता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

पसंद करें, टिप्पणी करें और अपने मित्रों से साझा करें...
Plz Like, Comment and Share