गुरुवार, 16 जुलाई 2026

“जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के लिए कहा जाता था कि वे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमूर्ति थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस संघ की पहली शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर के मोहिते बाड़े में जो शाखा लगाई थी, बालासाहब उसी शाखा के स्वयंसेवक थे। डॉक्टर साहब के संपर्क में आने के बाद 1927 में केवल 11 वर्ष की आयु में बालासाहब देवरस ने शाखा जाना प्रारंभ कर दिया। संघ शिल्पी डॉक्टर साहब ने स्वयं अपने हाथों से बालासाहब के व्यक्तित्व को गढ़ा और उन्हें प्रशिक्षित किया। उन्होंने संघ रूपी बीज बालासाहब के हृदय में बोया। जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का सपना अपने मित्रों के हृदय में जैसे का तैसा उतार दिया था, उसी प्रकार डॉक्टर साहब ने भी स्वयंसेवकों के पहले समूह के मन-मस्तिष्क में संघ की विराट अवधारणा को उतार दिया था। देवरस जी ने डॉक्टर साहब की आँखों से ही संघ को देखा, उनकी दृष्टि के अनुरूप ही संघ की सृष्टि का विकास एवं विस्तार किया। 12 वर्ष से लेकर 70 वर्ष की आयु तक बालासाहब ने एक तपस्वी और सच्चे स्वयंसेवक की भाँति अपना जीवन जिया। उन्होंने सबके सामने उदाहरण प्रस्तुत किया कि राष्ट्र के लिए किस प्रकार जिया जाता है। संघ के स्वयंसेवक बालासाहब में संघ सृष्टि के निर्माता डॉक्टर साहब की छवि देखते थे। वर्ष 1943 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशिक्षण शिविर (संघ शिक्षा वर्ग) पुणे में चल रहा था, जहाँ एक दिन बालासाहब देवरस का बौद्धिक होना था। बौद्धिक से पहले वक्ता का परिचय कराने के लिए तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ खड़े हुए। बालासाहब के परिचय में उन्होंने कहा कि “आपमें से कइयों ने डॉ. हेडगेवारजी को नहीं देखा होगा। अगर आप बालासाहब देवरस को देखेंगे तो आपके सामने डॉ. हेडगेवारजी खड़े नजर आएंगे”।

बालासाहब देवरस का मध्यप्रदेश से गहरा नाता है। मध्यप्रदेश उनकी जन्मस्थली है। बालाघाट में 11 दिसंबर, 1915 को कारंजा नामक स्थान पर उनका जन्म हुआ। बालासाहब नौ भाई-बहन (चार लड़के और पाँच लड़कियाँ) थे। वे आठवें क्रमांक पर थे। उनसे दो वर्ष छोटे भाऊराव थे। वैसे बालासाहब का नाम रखा गया था ‘मधुकर’, लेकिन घर में सब उन्हें प्रेम से ‘बाल’ कहकर पुकारते थे। बाल अर्थात् बच्चा। इस प्रकार उनका नाम ‘बालासाहब’ पड़ गया। बालासाहब का जन्म भले ही मध्यप्रदेश में हुआ था, लेकिन उनकी पढ़ाई-लिखाई नागपुर के स्कूल और कॉलेज में ही हुई। कालांतर में उनके पिता दत्तात्रेय देवरस नागपुर में राजस्व विभाग में अधिकारी हो गए।

देखें यह वीडियो : क्या RSS ने आपातकाल का समर्थन किया था? | इंदिरा गांधी को लिखे पत्र का पूरा सच

बालासाहब और डॉक्टर साहब के बीच एक और संयोग है। दोनों महानुभावों के पूर्वज एक ही स्थान तेलंगाना से थे। देवरस परिवार तेलंगाना के चिन्नुरु ग्राम का रहने वाला था। पेशवा बाजीराव के समय देवरस परिवार महाराष्ट्र के भण्डारा में आकर बस गया। वहीं, डॉ. हेडगेवारजी के पूर्वज भी तेलंगाना के थे। गोदावरी नदी के तट पर स्थित ‘कंदकूर्ति’ ग्राम से निकलकर डॉक्टर साहब का परिवार नागपुर आया था। गोदावरी नदी महाराष्ट्र से तेलंगाना में प्रवेश करके उत्तर दिशा में मुड़ती है। उस मोड़ पर कंदकूर्ति है। यहाँ से गोदावरी पूर्ववाहिनी होकर रामगुंडम् तक जाती है। वहाँ से थोड़ा आगे जाने पर फिर से उत्तरवाहिनी होकर आगे बहती है। विदर्भ के चंद्रपुर से आने वाली ‘प्राणहिता’ नदी उसे वहाँ मिलती है। इस संगम स्थान पर ‘चिन्नुरु’ ग्राम स्थित है। जिस प्रकार गोदावरी दोनों महानुभावों को जोड़ती है, उसी प्रकार संघ सरिता भी डॉक्टर साहब और बालासाहब को जोड़ने वाली गर्भनाल की भाँति दिखाई देती है।

नियति ने तय किया था कि बालासाहब संघ कार्य के विस्तार का एक प्रमुख आधार बनेंगे, इसलिए वे बाल्यकाल में ही डॉक्टर साहब के संपर्क में आ गए। बालासाहब ने मोहिते बाड़े की शाखा में आना शुरू किया। स्वयंसेवकों के लिए सीखने की बात है कि बालासाहब अकेले शाखा नहीं आते थे। वे अपने साथ में छोटे भाई भाऊराव को भी लेकर जाते थे। अपने मित्रों को भी उन्होंने शाखा से जोड़ा। बालासाहब और भाऊराव, दोनों ही पढ़ने में बहुत होशियार थे। संस्कृत उनका प्रिय विषय था, इसमें उनके 100 प्रतिशत अंक आते थे। बाकी विषयों पर भी अच्छी पकड़ थी। इसलिए उनके पिता चाहते थे कि वे भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करें। परंतु उनके मन में तो संघ कार्य के लिए संपूर्ण जीवन देने का विचार घर कर गया था। दोनों भाइयों की जोड़ी अपने मोहल्ले में और संघ में भी प्रसिद्ध हो गई। आखिरकार बालासाहब और उनके भाई भाऊराव, प्रचारक हो गए। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

संगठन के कार्य को लेकर बालासाहब देवरस की स्पष्टता इतनी अच्छी थी कि द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी भी उन्हें बहुत महत्व देते थे। इसलिए जब बालासाहब को कलकत्ता से वापस बुलाया गया, तब श्रीगुरुजी ने उन्हें वापस नागपुर के बाहर प्रचारक बनाकर नहीं भेजा। नागपुर में संगठन का सारा कार्य बालासाहब के भरोसे छोड़ दिया गया। श्रीगुरुजी कहते थे कि “जिनके कारण मैं सरसंघचालक हूँ, उनका नाम है बालासाहब देवरस”। संघ के संविधान में एक समय में दो सरसंघचालक का प्रावधान नहीं है, अन्यथा इस समय मेरे साथ बालासाहब भी सरसंघचालक होते। एक बार ऐसे ही मजाक-मजाक में श्रीगुरुजी ने कह दिया था कि ‘वास्तविक सरसंघचालक तो बालासाहब जी ही हैं’। यह घटना 1944-45 के दौरान नागपुर के रेशिमबाग में हुई थी। एक दिन जब श्रीगुरुजी तांगे में बैठकर उत्सव में जा रहे थे, तब उन्होंने रास्ते में बालासाहब देवरस को अपने मित्रों के साथ पैदल जाते देखा। उन्हें देखकर श्रीगुरुजी ने तांगे वाले से कहा, “सच्चे सरसंघचालक पैदल जा रहे हैं, और नकली तांगे में”। बालासाहब देवरस 11 वर्ष की उम्र से संघ शिल्पी डॉ. हेडगेवार के प्रशिक्षण में रहे, इसलिए वे डॉक्टर साहब के साथ एकरूप हो गए थे। 

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 05 जुलाई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

पसंद करें, टिप्पणी करें और अपने मित्रों से साझा करें...
Plz Like, Comment and Share