संघ शताब्दी वर्ष : वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्वयंसेवकों को किया था संबोधित
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आयोजित शिक्षा वर्गों में स्वयंसेवक क्या सीख रहे हैं, इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कराने के लिए संघ-सृष्टि के बाहर के महानुभावों को वर्ग में आमंत्रित करने की परंपरा प्रारंभ से रही है। प्रारंभ में बौद्धिक या समापन समारोह की अध्यक्षता के लिए महानुभावों को आमंत्रित किया जाता था, लेकिन अब तो वर्ग के बीच में भी समाज के प्रमुखजनों को ‘वर्ग दर्शन’ कराने की योजना रहती है। जब स्वयंसेवक सामूहिक रूप से मैदान पर अभ्यास कर रहे होते हैं या भोजन कर रहे होते हैं, उस समय विशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित करके उन्हें वर्ग दर्शन कराया जाता है। आपको यह जानकर अच्छा लगेगा कि संघ शिक्षा वर्ग का दर्शन करने के लिए महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर तक आ चुके हैं। सामाजिक क्रांति के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर संघ शिक्षा वर्ग की प्रत्यक्ष अनुभूति करने के लिए वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में आए थे। शिक्षा वर्ग की व्यवस्थाएँ, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और उनके व्यक्तित्व में आए परिवर्तन देखकर बाबा साहब अत्यंत प्रसन्न हुए थे।
देखें वीडियो : आरएसएस की शाखा में आए डॉ. भीमराव अंबेडकर
सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए अथक प्रयास कर रहे बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने यह सुन रखा था कि अस्पृश्यता निवारण में आरएसएस को उल्लेखनीय सफलता मिली है। इस बात की अनुभूति बाबा साहब ने संघ शिक्षा वर्ग में बहुत समीप से की। पुणे के संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में डॉ. अंबेडकर आए थे। उस समय वर्ग में संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भी उपस्थित थे। वर्ग में लगभग 525 स्वयंसेवक संघ कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। डॉ. अंबेडकर ने डॉ. हेडगेवार से सबसे पहला प्रश्न यही किया कि इन 525 स्वयंसेवकों में से अस्पृश्य कितने हैं? डॉ. हेडगेवार ने उनसे कहा कि आप स्वयं ही इनसे पूछ लीजिए। बाबा साहब स्वयंसेवकों के बीच में गए, लेकिन पूर्ण गणवेश पहने सभी स्वयंसेवक एक समान ही दिख रहे थे। उनमें कौन स्पृश्य (सवर्ण) है और कौन अस्पृश्य, यह पहचाना ही नहीं जा सकता था। बाबा साहब भी नहीं पहचान पाए। तब बाबा साहब ने स्वयंसेवकों से कहा कि आपमें से जो अस्पृश्य हों, वे एक कदम आगे आएँ। लेकिन कतारबद्ध स्वयंसेवकों के बीच कोई हलचल नहीं हुई। एक भी स्वयंसेवक पंक्ति से बाहर नहीं आया।
इस पर बाबा साहब ने डॉ. हेडगेवार की ओर देखा और कहा कि मैं पहले ही कहता था कि संघ में अस्पृश्य नहीं हैं। डॉ. हेडगेवार ने मुस्कुराते हुए कहा कि हाँ, संघ में कोई अस्पृश्य नहीं है। संघ में किसी को भी अस्पृश्य होने का अनुभव ही नहीं कराया जाता। यदि आप चाहें तो उपजातियों के नाम लेकर पूछ सकते हैं। इसके बाद जब डॉ. अंबेडकर ने ‘चमार, महार, मांग, मेहतर’ जैसी जातियों का नाम लेकर स्वयंसेवकों को आगे आने को कहा, तो लगभग सौ स्वयंसेवक एक साथ आगे आ गए। इसका अर्थ यही है कि संघ में सभी जाति-बिरादरी के बंधु आते हैं, लेकिन वहाँ आकर सब एक हो जाते हैं। उनके बीच जाति-भेद समाप्त हो जाता है।
बाबा साहब डॉ. अंबेडकर के संघ शिक्षा वर्ग में जाने के इस प्रसंग का वर्णन संघ के साहित्य में तो आता ही है, संघ साहित्य के इतर भी इसके प्रमाण मिलते हैं। डॉ. अंबेडकर के नजदीकी रहे पूर्व लोकसभा सांसद बालासाहेब सालुंके ने इसका उल्लेख किया है। उनके पुत्र काश्यप सालुंके ने भानुदास गायकवाड़ के साथ मिलकर बालासाहेब सालुंके के संस्मरणों एवं विचारों का संकलन किया है- ‘आमचं सायेब : दिवंगत खासदार बालासाहेब सालुंके’। इस पुस्तक के पृष्ठ 25 और 53 पर डॉ. अंबेडकर और आरएसएस के संदर्भ में उपरोक्त उल्लेख आते हैं। पुस्तक में बालासाहेब सालुंके के हवाले से लिखा गया है- “पुणे में भाऊसाहेब गडकरी के बंगले पर डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार की मुलाकात हुई। फिर भाऊसाहेब अभ्यंकर, बालासाहेब सालुंके के साथ बाबा साहब डॉ. अंबेडकर को भावे स्कूल में लगे स्वयंसेवकों के ग्रीष्मकालीन शिविर में भेंट के लिए ले गए। बाबा साहब ने यहाँ सैन्य अनुशासन और संगठन पर भाषण दिया।”
बाबा साहब डॉ. अंबेडकर पर संघ के प्रचारक की पुस्तक
स्वयंसेवकों का अनुशासन और सामाजिक समरसता का अद्भुत प्रयोग देखकर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर संघ कार्य से प्रभावित हुए, क्योंकि सामाजिक समरसता स्थापित करना बाबा साहब के हृदय का कार्य था। अपनी स्थापना के साथ ही संघ ने बिना किसी घोषणा के सामाजिक समरसता लाने का कार्य अपने हाथों में ले लिया था। शाखा और संघ शिक्षा वर्ग में स्वयंसेवकों ने सामाजिक समरसता को व्यावहारिक रूप से साकार करके दिखा दिया। हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘संघ शिक्षा वर्ग’ केवल शारीरिक या बौद्धिक प्रशिक्षण का केंद्र नहीं हैं, अपितु ये ऐसी प्रयोगशालाएँ हैं जहाँ सामाजिक समरसता के सिद्धांतों को नारों से निकालकर जीवन के आचरण में ढाला जाता है।
सामाजिक समरसता ऐसा विषय है, जिसे भाषण से नहीं सिखाया जा सकता। यह तो व्यवहार से सीखने का विषय है। संघ शिक्षा वर्ग में अलग-अलग क्षेत्रों से विभिन्न जातियों के स्वयंसेवक आते हैं। वर्ग में उनके प्रशिक्षण, रहने और खाने की व्यवस्था एकसाथ होती है। जब कोई स्वयंसेवक भोजन करने बैठता है तो यह नहीं देखता कि उसके आसपास कौन बैठा है, या उसे भोजन परोसने वाले की जाति क्या है। सब एकसाथ मिलकर प्रेम से भोजन करते हैं, मानो सब एक ही परिवार के भाई-बंधु हों। इसी प्रकार, अपने आवास, बौद्धिक सभागार, परिसर, शौचालय, स्नानागार और मैदान की स्वच्छता सब मिलकर करते हैं। मैदान पर खेल से लेकर परेड तक में सब समान दिखाई देते हैं। इन सब प्रयोगों से स्वयंसेवक के मन में कब समरसता का भाव गहरे बैठ जाता है और व्यवहार में उतर आता है, उसे भी पता नहीं चलता।
कह सकते हैं कि संघ शिक्षा वर्ग में समरसता पढ़ाई नहीं जाती, बल्कि स्वयंसेवक इसे जीते हैं। यही कारण है कि जब यहाँ से कोई युवा निकलता है, तो वह केवल एक अनुशासित नागरिक नहीं होता, बल्कि एक ऐसे समाज का शिल्पकार होता है जो भेदभाव से मुक्त और आत्मीयता से युक्त हो। संघ संस्कार से दीक्षित इसी प्रकार के स्वयंसेवकों को बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संघ शिक्षा वर्ग में प्रवास के दौरान देखा था।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 31 मई, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ |
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