संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने कांग्रेस में शामिल होकर राजनीतिक आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था
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| यह प्रतीकात्मक चित्र AI से निर्मित है। |
नागपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में लोकमान्य तिलक का बहुत प्रभाव था। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार प्रारंभ से ही तिलक जी को आदर्श राजनेता और स्वतंत्रतासेनानी के तौर पर देखते थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नागपुर इकाई में तिलक के समर्थकों का प्रभाव था, उन्होंने मिलकर अलग से ‘राष्ट्रीय मंडल’ भी बना रखा था। इस राष्ट्रीय मंडल की ओर से नागपुर में राजनीतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाता, जिनमें डॉ. हेडगेवार भी हिस्सा लेते थे। एक ओर जहाँ अन्य कांग्रेसी नेता एवं कार्यकर्ता ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वतंत्र औपनिवेशिक राज्य की माँग करते थे, वहीं डॉ. हेडगेवार इकलौते थे जो पूर्ण स्वराज्य की माँग को आगे बढ़ाते थे। डॉक्टर जी अपने भाषणों से युवाओं के मन में पूर्ण स्वतंत्रता की भावना को प्रज्वलित कर रहे थे। बहुत कम समय में डॉ. हेडगेवार नागपुर कांग्रेस के प्रमुख नेता बन गए। कांग्रेस की नागपुर शहर इकाई के संयुक्त सचिव की जिम्मेदारी डॉक्टर साहब के पास आ गई थी। वर्ष 1919 में कांग्रेस के अधिवेशन में भी शामिल होने डॉक्टर साहब अमृतसर भी गए और वहाँ उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी को माथे से लगाकर देश को अंग्रेजों के अत्याचार से मुक्त कराने के अपने संकल्प को और दृढ़ किया।
कांग्रेस का 35वां अधिवेशन 1920 में नागपुर में होना तय था। सबके मन में था कि इस अधिवेशन की अध्यक्षता लोकमान्य तिलक से करायी जाएगी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 31 जुलाई, 1920 की रात में तिलक जी का निधन हो गया। तिलक समर्थकों के सामने प्रश्न था कि अब अधिवेशन की अध्यता कौन करेगा? तब डॉक्टर साहब ने श्री अरविंद घोष को अधिवेशन का अध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव रखा, जिसे स्वीकार कर लिया गया। डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे और डॉ. हेडगेवार, दोनों श्री अरविंद से मिलने के लिए पुदुच्चेरी (पूर्व में पांडिचेरी) गए। दोनों ने उन्हें सक्रिय राजनीति में लौटने एवं कांग्रेस की कमान संभालने के लिए मनाने का प्रयास किया परंतु संन्यासी जीवन व्यतीत कर रहे श्री अरविंद ने विनम्रतापूर्वक उनके प्रस्ताव को इनकार कर दिया। बार-बार आग्रह के बाद श्री अरविंद ने डॉ. मुंजे को 30 अगस्त 1920 को पत्र लिखकर अपनी असमर्थता व्यक्त की। डॉ. हेडगेवार ने लोगों से श्री अरविंद घोष को पत्र एवं टेलीग्राम भेजकर अपने निर्णय पर पुनर्विचार का आग्रह करने के लिए प्रेरित किया। तब उन्होंने 20 सितंबर 1920 को टेलीग्राम द्वारा जवाब दिया-‘पुनर्विचार असंभव है’। यानी अब पूरी तरह स्पष्ट हो गया था कि श्री अरविंद के स्थान पर अन्य किसी विकल्प पर विचार करना होगा।
प्रांतीय कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए विजयराघवाचार्य, चित्तरंजन दास, मुहम्मद अली और क्रांतिकारी श्यामसुंदर चक्रवर्ती के नामों पर भी विचार किया जा रहा था। इनमें से विजयराघवाचार्य के नाम पर पंजाब, बिहार, दिल्ली, मध्यप्रांत, मद्रास, मुंबई और संयुक्त प्रांत ने अपना भारी समर्थन जताया। यहाँ तक कि डॉ. मुंजे भी उन्हीं के पक्ष में थे। परंतु, डॉ. हेडगेवार इस नाम से बिल्कुल सहमत नहीं थे। 10 अक्टूबर 1920 को नागपुर में स्वागत समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई, जिसमें पूरे प्रांत के लगभग 550 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस बैठक में डॉ. हेडगेवार ने विजयराघवाचार्य की उम्मीदवारी का कड़ा विरोध किया। अपने विरोध का कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि “जब जलियांवाला बाग नरसंहार की बर्बरता के कारण पूरा देश ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारी आक्रोश में डूबा था, ठीक उसी वक्त विजयराघवाचार्य मद्रास के राज्यपाल के निमंत्रण पर उनकी ‘चाय पार्टी’ में शामिल हो रहे थे”। भरी सभा में डॉ. हेडगेवार ने एक चुभता हुआ सवाल किया- “जो व्यक्ति देश की जनभावनाओं और साम्राज्यवाद के क्रूर चरित्र को ही नहीं समझता, वह भला कांग्रेस का अध्यक्ष कैसे हो सकता है?” हालांकि, डॉक्टर जी का विरोध काम नहीं आया। डॉ. मुंजे के प्रभाव के कारण विजयराघवाचार्य को अध्यक्ष चुन लिया गया। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. हेडगेवार के पक्ष में स्वागत समिति के युवा सदस्यों ने समर्थन किया, जो उनके प्रभाव को रेखांकित करता है। उनके समर्थन में कई समाचार पत्रों ने संपादकीय लिखे। मुंबई में प्रकाशित ‘संदेश’ ने विजयराघवाचार्य के नाम पर बहुमत होने को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए लिखा था- “एक अयोग्य व्यक्ति कांग्रेस का अध्यक्ष हो गया”।
बहरहाल, जब विजयराघवाचार्य अध्यक्ष निर्वाचित हो गए, तो डॉ. हेडगेवार ने अपनी शंकाओं को अधिवेशन की तैयारी में अवरोध नहीं बनने दिया। डॉ. हेडगेवार और डॉ. परांजपे को प्रतिनिधियों के भोजन तथा रहने की व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने इस कार्य को कुशलता से संपादित करने के लिए लगभग 1200 स्वयंसेवकों की भर्ती एवं प्रशिक्षण देने का कार्य किया। नागपुर अधिवेशन अब तक का सबसे बड़ा अधिवेशन था। इसमें तीस हजार लोगों ने भाग लिया था, जिसमें बीस हजार प्रतिनिधि थे। डॉ. हेडगेवार एक सफल संगठनकर्ता के रूप में सामने आए। देशभर से आए प्रतिनिधि भोजन और आवास की व्यवस्थाएं देखकर आश्चर्यचकित थे।
इस अधिवेशन में विषय समिति की बैठक में डॉ. हेडगेवार ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि “कांग्रेस का उद्देश्य भारतीय गणतंत्र की स्थापना करना एवं पूंजीवादी अत्याचार से राष्ट्रों को मुक्त कराना है”। डॉ. हेडगेवार ने कांग्रेस के बड़े नेताओं से आग्रह किया कि अधिवेशन में इस प्रस्ताव को पारित किया जाए, जो पूर्ण स्वराज्य की माँग करता है। लेकिन, तब तक कांग्रेस के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज्य को लेकर कोई स्पष्टता नहीं थी। इसलिए यह प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। मॉडर्न रिव्यू ने प्रस्ताव को खारिज करने के निर्णय की आलोचना की। इस समाचारपत्र ने यह भी लिखा कि नागपुर कांग्रेस स्वागत समिति में ‘रिपब्लिकन’ चरित्र वाले लोग विद्यमान हैं। उल्लेखनीय है कि डॉ. हेडगेवार ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को विश्व के सभी पीड़ित, शोषित एवं साम्राज्यवादी शिकंजे में आए राष्ट्रों से जोड़ने का प्रयास किया था। इस घटनाक्रम से उनके दृष्टिकोण की विशालता का पता भी चलता है।
नागपुर अधिवेशन के बाद डॉ. हेडगेवार प्रांत के महत्वपूर्ण नेताओं में गिने जाने लगे थे। कैसा अनूठा संयोग है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के एक सप्ताह पूर्व डॉ. हेडगेवार एवं उनके सहयोगी हरेकृष्ण (आप्पाजी) जोशी प्रांतीय कांग्रेस समिति के लिए चुने गए थे। डॉक्टर साहब को संयुक्त सचिव नियुक्त किया गया। तब से लेकर 1928 के अंत तक डॉ. हेडगेवार प्रांतीय कांग्रेस समिति से जुड़े रहे। डॉ. हेडगेवार का प्रांतीय कांग्रेस के कार्यक्रमों के निर्धारण एवं कार्यान्वयन में महत्त्वपूर्ण योगदान होता था। अंग्रेज सरकार भारतीय सेना को चीन भेज रही थी। इसके विरोध में 30 जनवरी 1927 को नागपुर शहर कांग्रेस ने जनसभा बुलाई। इस सभा में सरकार के इस कदम के खिलाफ एक कड़ा प्रस्ताव पास किया गया। प्रस्ताव की रूपरेखा डॉ. हेडगेवार ने तैयार की थी और इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता ल. वा. परांजपे ने सभा के सामने प्रस्तुत किया था। प्रस्ताव के माध्यम से देश के सभी नागरिकों से अपील की गई थी कि “सरकार अपने सैन्य स्वार्थों के लिए भारतीयों का जो इस्तेमाल कर रही है, हम सबको मिलकर उसका डटकर विरोध करना चाहिए। इस विरोध के लिए जन-प्रदर्शन, प्रचार-प्रसार और निंदा प्रस्तावों जैसे सभी उचित तरीकों का सहारा लिया जाना चाहिए”। कहना होगा कि राजनीतिक क्षेत्र में भी डॉ. हेडगेवार प्रखर सोच के साथ सक्रिय रहे। भारत की पूर्ण स्वतंत्रता ही उनके मन-मस्तिष्क में थी। उसके लिए ही वे दिन-रात प्रयत्न करते थे।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 05 अप्रैल, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ |


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