भारत की ज्ञान-परंपरा की प्रतिष्ठा : भारत के ज्ञान-विज्ञान की वैश्विक स्वीकृति, प्रत्येक भारतीय के लिए है गर्व की बात
स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग स्थित दुनिया के सबसे पुराने ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ में महर्षि सुश्रुत की भव्य प्रतिमा का स्थापित होना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। अब जरा कल्पना कीजिए कि यदि महर्षि सुश्रुत की यह प्रतिमा स्कॉटलैंड या मेलबर्न के बजाय भारत के एम्स या किसी अन्य प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में स्थापित की जाती, तो क्या होता? यह तय है कि देश के स्वघोषित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, वामपंथी विचारकों और लिबरल जमात के बीच एक भारी ‘हाय-तौबा’ मच जाती। इसे ‘शिक्षा के भगवाकरण’, ‘विज्ञान में धर्म के हस्तक्षेप’ और ‘अंधविश्वास को बढ़ावा देने’ का नाम दे दिया जाता। यह मानसिकता भारत के उस बौद्धिक वर्ग की सबसे बड़ी त्रासदी है, जो अभी तक ‘औपनिवेशिक हैंगओवर’ से बाहर नहीं आ पाया है। इस वर्ग की समस्या यह है कि वे ‘भारतीय ज्ञान-परंपरा’ को केवल कर्मकांडों और मिथकों के चश्मे से देखते हैं। उनका पैमाना यह बन गया है कि जो कुछ भी प्राचीन भारत का है, वह अवैज्ञानिक है; और जो कुछ भी पश्चिम से आता है, वही परम सत्य है। जब तक कोई विदेशी संस्थान या विदेशी वैज्ञानिक हमारे प्राचीन ज्ञान पर अपनी मुहर नहीं लगाता, तब तक हमारे अपने बुद्धिजीवी उसे सिरे से खारिज करते रहते हैं।


