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शुक्रवार, 26 जून 2026

ऑस्ट्रेलिया के बाद ब्रिटेन में भी लगाई गई ‘फादर ऑफ सर्जरी’ महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा

भारत की ज्ञान-परंपरा की प्रतिष्ठा : भारत के ज्ञान-विज्ञान की वैश्विक स्वीकृति, प्रत्येक भारतीय के लिए है गर्व की बात

स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग स्थित दुनिया के सबसे पुराने ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ में महर्षि सुश्रुत की भव्य प्रतिमा का स्थापित होना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। अब जरा कल्पना कीजिए कि यदि महर्षि सुश्रुत की यह प्रतिमा स्कॉटलैंड या मेलबर्न के बजाय भारत के एम्स या किसी अन्य प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में स्थापित की जाती, तो क्या होता? यह तय है कि देश के स्वघोषित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, वामपंथी विचारकों और लिबरल जमात के बीच एक भारी ‘हाय-तौबा’ मच जाती। इसे ‘शिक्षा के भगवाकरण’, ‘विज्ञान में धर्म के हस्तक्षेप’ और ‘अंधविश्वास को बढ़ावा देने’ का नाम दे दिया जाता। यह मानसिकता भारत के उस बौद्धिक वर्ग की सबसे बड़ी त्रासदी है, जो अभी तक ‘औपनिवेशिक हैंगओवर’ से बाहर नहीं आ पाया है। इस वर्ग की समस्या यह है कि वे ‘भारतीय ज्ञान-परंपरा’ को केवल कर्मकांडों और मिथकों के चश्मे से देखते हैं। उनका पैमाना यह बन गया है कि जो कुछ भी प्राचीन भारत का है, वह अवैज्ञानिक है; और जो कुछ भी पश्चिम से आता है, वही परम सत्य है। जब तक कोई विदेशी संस्थान या विदेशी वैज्ञानिक हमारे प्राचीन ज्ञान पर अपनी मुहर नहीं लगाता, तब तक हमारे अपने बुद्धिजीवी उसे सिरे से खारिज करते रहते हैं।

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस का सराहनीय निर्णय

 हमें  स्वाधीनता जरूर 15 अगस्त, 1947 को मिल गई थी, लेकिन हम औपनिवेशिक गुलामी की बेडिय़ाँ नहीं तोड़ पाए थे। अब तक हमें औपनिवेशिकता जकड़े हुए थी। पहली बार हम औपनिवेशिकता से मुक्ति की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। हम कह सकते हैं कि भारत नये सिरे से अपनी 'डेस्टिनी' (नियति) लिख रहा है। यह बात ब्रिटेन के ही सबसे प्रभावशाली समाचार पत्र 'द गार्जियन' ने 18 मई, 2014 को अपनी संपादकीय में तब लिखा था, जब राष्ट्रीय विचार को भारत की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ विजयश्री सौंपी थी। गार्जियन ने लिखा था कि अब सही मायने में अंग्रेजों ने भारत छोड़ा है (ब्रिटेन फाइनली लेफ्ट इंडिया)। आम चुनाव के नतीजे आने से पूर्व नरेन्द्र मोदी का विरोध करने वाला ब्रिटिश समाचार पत्र चुनाव परिणाम के बाद लिखता है कि भारत अंग्रेजियत से मुक्त हो गया है। अर्थात् एक युग के बाद भारत में सुराज आया है। भारत अब भारतीय विचार से शासित होगा।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

आयुर्वेद को प्रोत्साहन

 य ह सुखद बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के प्रति प्रतिबद्धता जताई है। केरल के कोझिकोड में वैश्विक आयुर्वेद महोत्सव को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आयुर्वेद की संभावनाओं का पूरा उपयोग अब तक नहीं हो सका है। जबकि इस भारतीय चिकित्सा पद्धति में अनेक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान की क्षमता है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार आयुर्वेद जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत इस संबंध में चीन जैसे दूसरे देशों के अनुभवों से सीखने का प्रयास करेगा, जिन्होंने अपनी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को प्रोत्साहित करने के लिए नीतियां बनाईं हैं। हम भली प्रकार जानते हैं कि अब तक भारत में अपनी ही उन्नत चिकित्सा पद्धति की अनदेखी क्यों की गई? अब तक के नीति निर्माताओं को भारतीय ज्ञान-परंपरा पर विश्वास नहीं था। कई अवसर पर आयुर्वेद सहित समस्त भारतीय ज्ञान परंपराओं की जानबूझकर अनदेखी की गई है। पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति के तीव्र विस्तार के कारण भी आयुर्वेद पर ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम, आयुर्वेद जैसी अद्भुत चिकित्सा पद्धति का विकास उसके अपने ही देश में अवरुद्ध हो गया।