मंगलवार, 9 जून 2026

विश्व का नेतृत्व करेगा संगठित भारत

संघ शताब्दी वर्ष : सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि कुमार मंगलम बिरला ने दिखाई भविष्य के भारत की तस्वीर, वर्तमान की तैयारियों की ओर किया संकेत

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 के समापन समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और मुख्य अतिथि प्रसिद्ध उद्योगपति एवं पद्मभूषण से सम्मानित कुमार मंगलम बिरला के वक्तव्य भविष्य के भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो स्वयं सशक्त और आत्मनिर्भर होकर विश्व बंधुत्व की भावना का प्रवर्तक बनेगा। जिस समय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी-बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष चल रहा है, शांति की कोई राह दिखाई नहीं देती, तब भारत का दर्शन सबका मार्ग प्रशस्त कर सकता है। दुनिया को सुख-शांति से जीना है, तब उसे भारत की ओर देखना ही होगा। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उचित ही कहा कि “भारत का समय आ गया है। कलह और स्वार्थ में फँसकर लड़खड़ाती हुई इस दुनिया को आज केवल भारत की ही आवश्यकता है”। भारत दुनिया को इस कलह से बाहर निकाल सकता है, उसके लिए सबसे पहले हमें अपने देश को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना पड़ेगा। दुनिया भी उसी के सत्य को सुनती है, जो शक्ति सम्पन्न होता है। 

सरसंघचालक डॉ. भागवत ने वैश्विक परिदृश्य को सामने रखकर, भारत की भूमिका की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “आज विश्व की शक्तियां मनमानी कर रही हैं; वे देशों पर कब्ज़ा करने, युद्ध थोपने या संसाधनों को रोकने का काम करती हैं। परंतु, भारत जब शक्ति-सम्पन्न होगा, तो वह बल प्रयोग नहीं करेगा, बल्कि सबको साथ लेकर चलेगा”। प्राचीन इतिहास में पलटकर जब हम देखते हैं तब भारत की इसी प्रकार की भूमिका हमें दिखाई पड़ती है। सब प्रकार से दुनिया का नेतृत्व करने वाले भारत ने विश्व को ज्ञान और व्यापार ही दिया, युद्ध नहीं। भारत ने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। यह भारत का स्वभाव और प्रकृति है। प्रत्येक देश का अपना स्वभाव होता है, इसलिए जब वह शक्तिशाली होता है, तब दुनिया के कैनवास पर वैसे ही रंग भरता है। इसलिए पुन: जब भारत प्रभावशाली होगा, तब वह दुनिया को फिर से ज्ञान, धर्म, कला, संस्कृति, शांति का उपहार भेंट में देगा। सरसंघचालक जी ने भारतीय दर्शन की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि दुनिया व्यक्ति, समाज और सृष्टि को अलग-अलग देखती है, लेकिन सबका एक साथ पोषण करना केवल भारत जानता है। जीवन में ‘अर्थ’ और ‘काम’ के साथ ‘मोक्ष’ का समन्वय कैसे हो, यह दुनिया को भारत ही सिखा सकता है। यह इसलिए भी संभव है क्योंकि भारत दुनिया को परिवार मानता है। भारत के निर्माण की नींव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर रखी गई है।

हमें अपनी तैयारी प्रारंभ कर देनी चाहिए :

एक महत्वपूर्ण नैरेटिव की ओर भी सरसंघचालक जी ने न केवल हमारा ध्यान खींचा है अपितु उसका सटीक उत्तर भी दिया है। भारत के प्रति श्रद्धा भाव नहीं रखने वाले लोग अक्सर पूछते हैं कि समृद्ध संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान के बावजूद भारत ने लगभग 1000 वर्षों की गुलामी क्यों झेली? अपने उद्बोधन के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया है कि “आक्रमणकारी हमसे श्रेष्ठ या संख्या में अधिक नहीं थे, बल्कि वे हमसे बदतर ही थे। हम इसलिए गुलाम हुए क्योंकि हमने अपनी परम्पराओं और तैयारी को विस्मृत कर दिया था”। इसलिए जब पुन: भारत का समय आ रहा है, तब हमें अपने इतिहास से सबक लेकर अपनी संस्कृति का गौरव मन में रखकर संगठित होना होगा, अपनी तैयारी उसी ढंग से करनी होगी। यह सुखद है कि हिन्दू समाज अब संगठित और जागृत हो रहा है। स्मरण रखें कि हिन्दू संगठित होगा, तब स्वाभाविक ही भारत अपने स्वबोध के साथ मजबूती से पुन: उठकर खड़ा होगा।

केवल दर्शक न बनें, राष्ट्रहित में कार्य करें:

हमें ज्ञात है कि यह संघ कार्य की शताब्दी का वर्ष है। सरसंघचालक जी ने स्वाभाविक ही इस संदर्भ में आवश्यक जानकारी लोगों को दी और संघ की अपेक्षा से भी अवगत कराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का उद्देश्य मात्र व्याख्यान देना नहीं है, बल्कि ‘स्वभाव’ और ‘आदत’ में बदलाव लाना है। संघ द्वारा एक ऐसी कार्यपद्धति विकसित की गई है जो सारी विभिन्नताओं के बावजूद समाज को एकजुट कर रही है। स्वार्थ और भेद को तिलांजलि देने वाले कार्यकर्ताओं का निर्माण ही संघ का लक्ष्य है। संघ का लक्ष्य है कि भारत यथाशीघ्र परम वैभव को प्राप्त करे। भारत माता जल्द ही विश्वगुरु के सिंहासन पर आरूढ़ होकर विश्व का मार्गदर्शन करे। इसलिए उन्होंने समाज की सज्जनशक्ति से आग्रह किया कि केवल दर्शक न बनें; संघ की शाखा में आएं, सहयोग करें या स्वतंत्र रूप से राष्ट्रहित में कार्य करें। 

हर परिस्थिति में राष्ट्र के साथ खड़ा रहा है संघ :

मुख्य अतिथि कुमार मंगलम बिरला ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विशाल स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि 83 हजार शाखाएं, 60 लाख स्वयंसेवक और 1 लाख 77 हजार सेवा कार्य अभूतपूर्व हैं। स्वतंत्रता से पहले का समय हो या भूकंप एवं सुनामी जैसी आपदाएं, संघ सदैव देश और समाज के साथ खड़ा रहा है। श्री बिरला के यह विचार संघ की वास्तविक तस्वीर को प्रस्तुत करते हैं। जिसके मन में भी देशभक्ति की भावना है, वह जानता है कि संघ के स्वयंसेवक प्रत्येक परिस्थिति में देश के साथ खड़े हैं। श्री बिरला ने अप्रत्यक्ष रूप से उन लोगों को भी आईना दिखाया है, जो गाहे-बगाहे उद्योगपतियों को कोसते रहते हैं। भारत को आत्मनिर्भर बनाने में उद्योग जगत की सबसे बड़ी भूमिका रहने वाली है। इसलिए उन्होंने अपने उद्बोधन में आर्थिक और औद्योगिक दृष्टिकोण से राष्ट्र निर्माण की बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘आत्मनिर्भरता’ कोई सामान्य आर्थिक नीति नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र निर्माण का मूल आधार है। उन्होंने युवा उद्यमियों को संदेश दिया कि “भारत में बनाएं, भारत के लिए बनाएं और भारत में रहकर पूरी दुनिया के लिए बनाएं”। आज के युवाओं के लिए यह एक बड़ा और जरूरी संदेश है। हमें अपनी मेधा का उपयोग अपने देश को बनाने के लिए करना चाहिए। अपने दादाजी (जीडी बिड़ला) का संस्मरण साझा करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे विभाजन के समय जब कपास के खेत पाकिस्तान में रह गए थे, तब उस भारी चुनौती को भी अवसर में बदला गया था। आज भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और प्रधानमंत्री मोदी जी के ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है। इस बड़े सपने को पूरा करने में बड़े उद्योगों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

आखिर में कहना होगा कि कार्यकर्ता विकास वर्ग का यह समापन समारोह इस बात का स्पष्ट संदेश था कि भारत की अनुकूलता का समय आ गया है। जहाँ एक ओर संघ व्यक्ति-निर्माण और समाज-संगठन के माध्यम से राष्ट्र की आंतरिक शक्ति को मजबूत कर रहा है, वहीं औद्योगिक जगत आत्मनिर्भरता के माध्यम से देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने को तत्पर है। समाज की सज्जन शक्ति और युवाओं का सामूहिक प्रयास ही वह मार्ग प्रशस्त करेगा, जिससे भारत विश्व का मार्गदर्शन कर सकेगा।

देखें यह वीडियो : आरएसएस में कब कौन आया- महात्मा गांधी, अंबेडकर और इंदिरा गांधी से अरविंद नेताम तक

लघु भारत की तस्वीर है कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 :

नागपुर में लगने वाला संघ का कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 एक प्रकार से लघु भारत की तस्वीर है। इस वर्ग को देखकर संपूर्ण भारत में संघ कार्य का अनुमान सहज लगाया जा सकता है। यह अखिल भारतीय वर्ग होता है, जिसमें प्रत्येक राज्य से स्वयंसेवक संघ कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त करने आते हैं। वर्ग में लगभग 850 संख्या रहती है। इस बार 880 स्वयंसेवकों ने प्रशिक्षण लिया है। यह वर्ग 25 दिन का रहता है। इन स्वयंसेवकों को अलग-अलग समूह में विभाजित किया जाता है, जिन्हें ‘गण’ कहते हैं। एक गण में 18 से 22 स्वयंसेवक रहते हैं। कार्यकर्ता विकास वर्ग के गण की रचना करते समय ध्यान रखा जाता है कि प्रत्येक गण भी अपने आप में लघु भारत का प्रतिनिधित्व करे। 

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 7 जून, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

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