जनता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसकी सामूहिक चेतना से बढ़कर कोई भी ताकत नहीं है। छल-बल और तुष्टीकरण से सत्ता हथियाने वाली ताकतों को जनता ने आईना दिखा दिया है। जैसे ही पश्चिम बंगाल में जनता को सुरक्षा का आश्वासन मिला, उसने निर्भय होकर बता दिया है कि लोकतंत्र में हिंसा, गुंडागर्दी और मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए कोई स्थान नहीं है। कहना होगा कि पाँच राज्यों (चार राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश) के चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। बंपर मतदान और मतदाताओं के अभूतपूर्व उत्साह के बीच जो परिणाम सामने आए हैं, वे न केवल चुनाव पश्चात आए सर्वेक्षण के अनुमानों पर मुहर लगाते हैं, बल्कि लोकतंत्र की जीत की कहानी भी धूमधाम से सुना रहे हैं।
यह चुनाव परिणाम भाजपा के लिए किसी ऐतिहासिक उपलब्धि से कम नहीं हैं। भाजपा के इतिहास में पश्चिम बंगाल की यह शानदार जीत प्रेरक कहानी के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो गई है। यह जीत भाजपा के उन कार्यकर्ताओं को प्रेरणा देगी, जहाँ उसकी जीत की संभावनाएं बहुत कमजोर हैं। पाँच साल पहले तक कोई नहीं कह सकता था कि पश्चिम बंगाल में कभी कमल खिलेगा, लेकिन पिछले चुनाव में भाजपा ने एक हुंकार भरी, जिसे इस चुनाव में उसके परिणाम तक पहुँचा दिया है। नि:संदेह, भाजपा की स्वीकार्यता अखिल भारतीय स्तर पर बढ़ रही है। अब वह दिन दूर नहीं जब, भारत की दक्षिणी हिस्सों में भी कमल खिलेगा। अभी इसका अनुमान ही लगा सकते हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व पश्चिम बंगाल की जीत के बाद तमिलनाडु, आंध्र, केरल या फिर अन्य किसी ऐसे राज्य की ओर मुख करेगा, जहाँ अब तक कमल नहीं खिला है।
असम में जहाँ भाजपा ने न केवल जीत की हैट्रिक लगाई है बल्कि एक विराट जीत दर्ज करके कीर्तिमान रचा है। पुदुचेरी में भी कार्यकर्ताओं के पसीने से फिर से कमल खिला है। वहीं, तमिलनाडु और केरलम में भाजपा का बढ़ा हुआ मत प्रतिशत उसका उत्साह बढ़ाने के लिए पर्याप्त है। यह मत प्रतिशत इस बात का संकेत है कि भविष्य में भाजपा का नेतृत्व इन राज्यों में सरकार बनाने को एक चुनौती के रूप में स्वीकार्य कर सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का सघन चुनाव प्रचार, कल्याणकारी योजनाओं पर जोर और भ्रष्टाचार एवं महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जनता का भाजपा के प्रति विश्वास इस जीत का मुख्य कारण बना। साथ ही, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ने भी जमीनी समीकरणों को पारदर्शी बनाया, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिला। बंगाल की जनता ने बदलाव के लिए स्पष्ट जनादेश देकर यह साबित कर दिया है कि सत्ता विरोधी लहर और सुशासन की आकांक्षा किसी भी मजबूत किले को भेद सकती है।
वहीं, असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने यह साबित कर दिया है कि अगर विकास और सांस्कृतिक अस्मिता को एक साथ लेकर चला जाए, तो जनता बार-बार आशीर्वाद देती है। कांग्रेस ने यहां सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने की कोशिश की, लेकिन भाजपा के सुशासन और कल्याणकारी योजनाओं के मजबूत नेटवर्क ने विपक्ष के हर दांव को विफल कर दिया। इधर, केरलम में एक दशक से सत्ता पर काबिज पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे की करारी हार हुई है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने शानदार वापसी की है। वामपंथियों के लिए यह हार किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है, क्योंकि अब भारत के राजनीतिक मानचित्र से उनका इकलौता गढ़ भी छिन गया है। जनता ने एक बड़ा उलट-फेर तमिलनाडु में किया है, जहां उसने अभिनेता विजय के पक्ष में जनादेश दिया है। इन चुनावों ने विपक्षी पार्टियों के लिए कड़ा संदेश दिया है।
पुनश्च:, यह जनादेश स्पष्ट करता है कि भारत का मतदाता अब केवल भावुकता पर नहीं, बल्कि सुशासन, विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के ठोस मुद्दों पर मतदान कर रहा है। पाँच राज्यों के इस चुनावी महासंग्राम ने भारत की राजनीति को एक नई दिशा दी है, जिसमें भाजपा का अखिल भारतीय विस्तार अब अपने चरम की ओर अग्रसर है। यह परिणाम भाजपा को 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए भी ताकत देगा।

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