अराजक तत्वों ने हड़प लिए छात्रों के जरूरी मुद्दे, उनके मंच पर कब्जाकर अपना नैरेटिव चलाने का किया प्रयास
देश में प्रमुख परीक्षाओं की पारदर्शिता और लाखों युवाओं का भविष्य अत्यंत संवेदनशील विषय हैं। परीक्षाओं के आयोजन में लगातार हो रही गड़बड़ियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को इस पर कोई ठोस रणनीति बनानी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि नीट परीक्षा को लेकर उठी चिंताएं पूरी तरह उचित हैं। एक अभिभावक की भाँति उन्होंने युवाओं को आश्वस्त किया है कि उनके भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी पर संज्ञान लेकर उसका फिर से व्यवस्थित आयोजन कराया है। इसके बावजूद, इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में जिस तरह दिल्ली की सड़कों पर हिंसा, उपद्रव और ‘चलो संसद’ के नाम पर अराजकता फैलाई गई, वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
लोकतंत्र में सरकारों पर दबाव बनाने के लिए आंदोलन और प्रदर्शन होने ही चाहिए। यह आंदोलन और प्रदर्शन लोकतंत्र को भी मजबूत करते हैं और सरकारों को भी जनभावनाओं से अवगत कराते हैं। लेकिन, जब आंदोलनों में मुद्दों का स्थान हिंसा ले लेती है, तब उसे नैतिक और उचित नहीं ठहराया जा सकता है। यदि पिछले एक दशक में हुए आंदोलनों का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो एक विशेष प्रकार की रणनीति साफ नजर आती है। चाहे वह शाहीनबाग का धरना हो, तथाकथित किसान आंदोलन हो या फिर हालिया कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन, इन सभी आंदोलनों की शुरुआत में यह दावा किया जाता है कि इनका स्वरूप पूरी तरह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक है। लेकिन समय बीतने के साथ ही इन आंदोलनों की बागडोर ऐसे अराजक तत्वों के हाथों में चली जाती है, जिनका मकसद किसी समस्या का समाधान निकालना नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था को चुनौती देना और लोकतांत्रिक सरकार को बदनाम करना होता है। शाहीनबाग और तथाकथित किसान आंदोलन में देश ने लाल किले पर उपद्रव, सड़कों की नाकेबंदी और भारी सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान देखा। ठीक यही ढर्रा कॉकरोच आंदोलन में भी दिखाई दिया, जहाँ नीट और परीक्षा धांधली जैसे छात्रों के मुद्दे पर शुरू हुए प्रदर्शन में 100 से अधिक पुलिस और पैरामिलिट्री जवान घायल हो गए और कई गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई। पुलिस की कार्रवाई में कुछ निर्दोष युवा भी घायल हो गए। पुलिस जवानों और युवाओं का जो रक्त बहा है, उसका जिम्मेदार कौन है? ‘अराजकता की व्याकरण’ रचने वाले समूह या फिर सरकार?
यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इस आंदोलन में छात्रों के मासूम चेहरे और उनके असंतोष को मोहरा बनाकर कोई और ही अपना एजेंडा साध रहा था। इस आंदोलन में जिस प्रकार से भगवान राम, भारत माता, हिन्दू धर्म के प्रतीकों, राष्ट्रीय संगठनों एवं पत्रकारों को निशाना बनाया गया, उससे कहीं भी प्रतीत नहीं होता कि यह आंदोलन छात्रों के हितों के लिए हो रहा था। दुर्भाग्यपूर्ण है कि अराजक समूहों ने महिला पत्रकारों को भी नहीं छोड़ा। उन्हें परेशान किया और उनकी सुरक्षा को खतरे में डाल दिया।
दरअसल, इस आंदोलन के पीछे कोई संगठन नहीं था, तो एक प्रकार से अराजक ताकतों ने इसे अपने प्रभाव में ले लिया। इन आंदोलनों की रूपरेखा, फंडिंग, सोशल मीडिया नैरेटिव और अचानक वामपंथी या चरमपंथी तत्वों के प्रवेश को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि इनके पीछे एक ही प्रकार की सोच और अदृश्य ताकतें सक्रिय हैं। जब भी देश में कोई संवेदनशील या नीतिगत विषय उभरता है, ये ताकतें तुरंत उस असंतोष को भुनाने पहुँच जाती हैं। न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासनिक प्रणाली जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर करना इनकी प्राथमिक रणनीति होती है। क्योंकि उनका काम समस्याओं का समाधान खोजना नहीं, बल्कि निरंतर असंतोष और अराजकता का माहौल बनाए रखना है। कम्युनिस्ट विचार की यही तो घोषित रणनीति है- वर्ग संघर्ष और अराजक वातावरण निर्मित करना। छात्रों के हित से जुड़े जरूरी मुद्दों को पीछे धकेलकर कम्युनिस्टों ने इस आंदोलन के साथ भी वही किया, जो वे करते आए हैं।
कुछ लोग इस आंदोलन में सोनम वांगचुक के शामिल होने के बाद से इसकी तुलना अन्ना हजारे के आंदोलन से कर रहे थे। वास्तव में इस आंदोलन का स्वरूप वैसा नहीं है। दोनों आंदोलनों में दृष्टिकोण और निष्ठा का फर्क साफ समझ आता है। अन्ना आंदोलन में प्रदर्शनकारियों ने कभी भी अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़ा। लाखों की भीड़ सड़कों पर उतरी, लेकिन पूरे आंदोलन के दौरान न तो संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया और न ही पुलिस पर हमले हुए।
इसके ठीक विपरीत, पिछले एक दशक के आंदोलनों में जरा सी सख्ती या रोके जाने पर पुलिस बल पर जानलेवा हमले करना, सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करना और अराजकता फैलाना आम बात बन गई है। लोकतंत्र में अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार हर नागरिक को है, लेकिन विरोध का अधिकार कभी भी अराजकता का अधिकार नहीं बन सकता। सब लोगों को यह समझना होगा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसक एजेंडे के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है, और जब आंदोलनजीवी उस रेखा को लांघते हैं, तो उसका खामियाजा अंततः देश के युवाओं और आम जनता को ही भुगतना पड़ता है।

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