संघ शताब्दी वर्ष : “सरसंघचालक का दायित्व विक्रमादित्य के सिंहासन जैसा है। अगर कोई अज्ञानी लड़का भी इस पर बैठता है, तो वह भी इस पर बैठकर एक बराबर न्याय करेगा” - श्रीगुरुजी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर साहब) के बाद इस राष्ट्रीय विचार के आंदोलन की बागडोर कौन संभालेगा? अगला सरसंघचालक कौन होगा? यह प्रश्न जब किसी के मन में भी नहीं आया था, तब से डॉक्टर साहब ने सरसंघचालक के लिए योग्य व्यक्ति की खोज प्रारंभ कर दी थी। यह बहुत आवश्यक था कि संघ का नेतृत्व ऐसे व्यक्तित्व को सौंपा जाए, जिसके प्रति श्रद्धा हो। जिसके नेतृत्व में संघ सरिता का वेग बढ़े, न कि उसमें बहता पानी ही सूख जाए। डॉक्टर साहब की आँखों के सामने से ऐसे अनेक संगठनों की कहानियां गुजर रही थीं, जो एक व्यक्ति की संकल्पना के साथ शुरू हुए और उनके जाने के साथ ही धुंधले पड़ गए। हालांकि, डॉक्टर साहब ने राष्ट्रीय आंदोलन की जो कहानी लिखी थी, उसके बीज उन्होंने अनेक लोगों के मन में बो दिए थे। अब भारत को परम वैभव पर पहुँचाने का संघ का सपना केवल डॉक्टर साहब का सपना नहीं रह गया था, यह सपना सबका अपना सपना बन गया था। डॉ. हेडगेवार व्यक्तियों के बड़े पारखी थे। कोई हीरा व्यापारी भी असली हीरा पहचानने में धोखा खा सकता है लेकिन डॉक्टर साहब व्यक्ति की पहचान में सिद्ध थे। संन्यास जीवन से वापस सामाजिक क्षेत्र में लौटे माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को अपना उत्तरदायित्व सौंपने का निर्णय वे अपने मन में कर ही चुके थे। डॉक्टर साहब ने संघ में सामूहिक निर्णय की कार्यपद्धति का निर्माण किया था, इसलिए उन्होंने अपने निर्णय को संघ पर थोपा नहीं अपितु उस समय के अन्य दायित्ववान कार्यकर्ताओं से भी इस संबंध में परामर्श किया। श्रीगुरुजी के संबंध में जो विचार डॉक्टर साहब के थे, अन्य साथियों के मन में भी उन्होंने वही भाव पाया।
संघ के इतिहास में सिंदी की बैठक का बहुत महत्व है। फरवरी 1939 में हुई इस बैठक में प्रार्थना और शाखा में प्रयुक्त आज्ञाओं से लेकर संघ की आगे की दिशा के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इसी बैठक के दौरान डॉक्टर साहब ने पहली बार सरसंघचालक के दायित्व के लिए श्रीगुरुजी को लेकर वरिष्ठ स्वयंसेवकों का मन टटोला। उन्होंने हरिकृष्ण जोशी (अप्पाजी जोशी) से पूछा कि “आप संघ के अगले सरसंघचालक के रूप में श्रीगुरुजी को कैसे देखते हैं?” अगले ही पल में अप्पाजी जोशी ने उत्साहित होकर कहा कि “डॉक्टर जी, यह तो आपने मेरे मन की बात कह दी”। याद रहे कि अप्पाजी जोशी को डॉक्टर साहब का दाहिना हाथ माना जाता था। सब यह मानते थे कि डॉक्टर साहब के बाद संघ के द्वितीय सरसंघचालक अप्पाजी जोशी ही बनेंगे। सरसंघचालक के रूप में डॉ. हेडगेवार की घोषणा करने का श्रेय अप्पाजी जोशी को ही था। जंगल सत्याग्रह में भी अप्पाजी जोशी, डॉक्टर साहब के साथ गए थे। स्वयंसेवक भी अप्पाजी को बहुत मानते थे। इसलिए जब अप्पाजी को सरसंघचालक नहीं बनाया गया, तो स्वाभाविक ही कुछ स्वयंसेवक थोड़े नाराज भी थे। ऐसे सभी स्वयंसेवकों को समझाते हुए उन्होंने बहुत सुंदर बात कही थी, जो संघ की रीति बन गई कि जो भी दायित्व में आएगा, उसका साथ सबको देना है- “मैं डॉक्टर साहब का दाहिना हाथ था, ये सत्य है परंतु श्रीगुरुजी तो डॉक्टरजी का हृदय हैं। ये उचित ही हुआ कि वे सरसंघचालक बने, अब वे ही अपने डॉक्टर हेडगेवार हैं। मैं डॉक्टरजी का दाहिना हाथ था और नए सरसंघचालक का भी मैं दाहिना हाथ ही हूं”।
अपने गिरते स्वास्थ्य को देखकर जब डॉक्टर हेडगेवार को लगने लगा था कि उनके पास अधिक समय नहीं है, तब उन्होंने अपना पक्का मन बना लिया कि श्रीगुरुजी को सरसंघचालक का दायित्व सौंप दिया जाए। अप्रैल, 1940 में डॉ. हेडगेवार पुणे में संघ के प्रशिक्षण वर्ग में थे, तभी उनका स्वास्थ्य अप्रत्याशित रूप से गिर गया। उन्होंने श्रीगुरुजी को बुलावा भेजा और संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के समक्ष उनसे कहा- “अब संघ की संपूर्ण जिम्मेदारी आपको सौंपी जाती है। पहले आप इसे स्वीकार करें और फिर आप मेरे शरीर का जो करना चाहें करें”। श्रीगुरुजी ने कहा कि “आप क्यों ऐसा कह रहे हैं? आप जल्द ही स्वस्थ हो जाएंगे”। परंतु ईश्वर के घर से बुलावा आ चुका था। दो दिन अत्यंत पीड़ा सहने के बाद अंतत: 21 जून, 1940 को डॉक्टर साहब का स्वर्गवास हो गया। डॉक्टर साहब ने श्रीगुरुजी को सरसंघचालक बनाने का निर्णय करने से पहले उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपकर उनकी संगठन कार्य की कुशलता का परीक्षण भी किया था। डॉ. हेडगेवार ने 1939 में नागपुर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग का ‘सर्वाधिकारी’ श्रीगुरुजी को नियुक्त किया। यह प्रशिक्षण वर्ग श्रीगुरुजी के लिए निर्णायक मोड़ था। उन्होंने कुशलता से वर्ग का संचालन किया। स्वयंसेवकों के सामने स्वयं को अनुकरणीय आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया। श्रीगुरुजी की कुशलता देखकर डॉक्टर साहब ने 1939 में ही रक्षाबंधन पर्व मनाने के लिए आयोजित एक समारोह में ‘सरकार्यवाह’ के रूप में उनकी घोषणा कर दी थी।
देखें यह वीडियो : जातिवाद और छुआछूत को लेकर गोलवलकर के विचार
डॉक्टर साहब के अंतिम निर्णय को अमलीजामा पहनाने के लिए उनके निधन के बाद अकोला में पाँच संघचालकों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस बैठक में सर्वसम्मति से तय हुआ कि श्रीगुरुजी बिल्कुल सही उत्तराधिकारी हैं। उन्होंने निर्णय लिया कि डॉक्टर हेडगेवार के निधन के 13वें दिन होने वाली श्रद्धांजलि सभा में श्रीगुरुजी की सरसंघचालक के रूप में आधिकारिक घोषणा की जाए। इसी बैठक में इस नियम की आधारशिला रखी गई कि सरसंघचालक ही अपना उत्तराधिकारी चुनेंगे। नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉक्टर साहब की समाधि स्थल पर आयोजित कार्यक्रम में नागपुर जिले के संघचालक बाबासाहब पाध्ये ने नए सरसंघचालक के रूप में श्रीगुरुजी के नाम की घोषणा की- “हमारे प्रथम सरसंघचालक की अंतिम इच्छा के अनुसार आदरणीय श्री माधवराव गोलवलकर को हमारा नया सरसंघचालक नियुक्त किया जाता है और अब वे हम सबके लिए डॉ. हेडगेवार के स्थान पर हैं। मैं उन्हें नए सरसंघचालक के रूप में अपना प्रथम प्रणाम निवेदित करता हूँ”।
विनम्रतापूर्वक सरसंघचालक के दायित्व को स्वीकार करते हुए श्रीगुरुजी ने इस अवसर पर जो भाषण दिया, वह सबको पढ़ना चाहिए। डॉक्टर साहब के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने के बाद उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बात कही- “डॉक्टरजी ने मुझे सरसंघचालक की जिम्मेदारी निभाने का मुश्किल काम दिया है, परंतु यह विक्रमादित्य के सिंहासन जैसा है। अगर कोई अज्ञानी लड़का भी इस पर बैठता है, तो वह भी इस पर बैठकर एक बराबर न्याय करेगा”। हम सब जानते हैं कि श्रीगुरुजी ने डॉक्टर साहब के रोपे पौधे को अपने पसीने से सींचा और दसों दिशाओं में उसके विस्तार के लिए वातावरण बनाया।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 14 जून, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ |



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