रविवार, 1 अप्रैल 2018

जल रहा बंगाल, बंसी बजा रहीं ममता

 पश्चिम  बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के कारण सांप्रदायिक हालात खतरे के निशान तक पहुँच गए हैं। पिछले दिनों में भले ही ममता बनर्जी पूजा-पाठ में शामिल होती हुई और मंदिर की परिक्रम लगाती हुई दिखाई दी हों, परंतु अब भी उनके लिए हिंदू प्राथमिकता में नहीं हैं। चार वर्ष में राजनीतिक परिदृश्य बदला है। अब हिंदू भी राजनीतिक एकजुटता दिखा रहे हैं। इस एकजुटता से डर कर ममता बनर्जी ने कुछ दिन से मस्जिद-दरगाह की गली के साथ मंदिर का मार्ग भी पकड़ लिया है। हालाँकि, पश्चिम बंगाल के हालात और तृणमूल कांग्रेस सरकार की नीति को देखकर स्पष्ट समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिखावे के लिए भगवा चूनर ओढ़ी है। यदि वास्तव में उन्हें हिंदू समाज की चिंता होती तो पश्चिम बंगाल में हिंदू बिना किसी बाधा के अपने धार्मिक कार्यक्रम सम्पन्न कर पा रहे होते। बंगाल की सरकार की प्राथमिकता में हिंदू समाज होता, तो रामनवमी के जुलूस पर पत्थर और बम नहीं फेंके जाते।
          यह दुर्भाग्य है कि माँ काली की भूमि पर ऐसे समाजकंटक सरकार के संरक्षण में पल रहे हैं, जो रामनवमी के जुलूस में बाधा उत्पन्न करते हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और देश के तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि रामनवमी की शोभायात्रा पर हुए हमले के लिए हिंदू समाज ही जिम्मेदार है। उनका कहना है कि आखिर रामनवमी की शोभायात्रा में तलवार और अन्य हथियार लेकर निकलने का क्या औचित्य है? सरकार की मनाही के बाद भी हिंदू समाज के लोग हथियार लेकर शोभायात्रा में शामिल क्यों हुए? यह तर्क अपने आप में अजब हैं। क्या तलवार लेकर निकलने से दूसरे समुदाय के लोगों को रामनवमी की शोभायात्रा पर पथराव करने का अधिकार मिल जाता है? शोभायात्रा में शामिल हिंदू क्या अपनी तलवार से किसी को नुकसान पहुँचा रहे थे? निश्चित तौर पर इसका जवाब होगा- नहीं। 
          हम सब जानते हैं कि कई धार्मिक परंपराएं ऐसी हैं, जिनमें समुदाय अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। ठीक उसी प्रकार, जैसे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर भारत राजपथ पर हथियारों का प्रदर्शन कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। जिस तरह राजपथ पर तोप, बंदूकें और मिसाइलों का प्रदर्शन किसी को हानि पहुँचाने के लिए नहीं किया जाता, ठीक उसी तरह रामनवमी या विजयादशमी के पर्व में हिंदू समाज केवल शक्ति की उपासना हेतु हथियारों का प्रदर्शन करता है। 'लोग तलवार लेकर क्यों निकले? ' यह प्रश्न पूछने वाले दूसरे समुदायों के धार्मिक जुलूस में होने वाले हथियारों के प्रदर्शन पर चुप क्यों रह जाते हैं? जब धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत उन्हें अपनी परंपरा का निर्वहन करने की छूट है, तब हिंदू समाज के लिए प्रतिबंध लगाना कितना उचित है? हिंदू समाज की शोभायात्रा में कम से कम सड़कों पर मनुष्यों का खून तो नहीं गिराया जाता, स्वयं को और छोटे बच्चों को लहूलुहान कर हिंसा का सार्वजनिक प्रदर्शन भी नहीं किया जाता। 
          पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की नीति हिंदू विरोधी है। बंगाल की पहचान माँ काली पूजा के लिए है। हम सब जानते हैं कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन की शोभायात्रा को भी प्रतिबंधित कर चुकी हैं। इसके लिए उन्हें न्यायालय से फटकार भी मिली है। ममता बनर्जी की राजनीति से मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति की बू इसलिए भी आती है कि एक ओर पश्चिम बंगाल सांप्रदायिक हिंसा में जल रहा है और हिंदू समुदाय पर हमले हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वह दिल्ली में बैठ कर 2019 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हराने के लिए राजनीति कर रही हैं। उन्हें राज्य की चिंता नहीं है, बल्कि 2019 के चुनाव की फिक्र है। राज्य में हिंदुओं को सुरक्षा देना उनकी प्राथमिकता में नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी में मोदी विरोधी नेताओं को एकजुट करना उनके लिए अत्यंत आवश्यक है। 
          भारतीय जनता पार्टी के नेता और केंद्र सरकार में मंत्री प्रकाश जावड़ेकर उचित ही कहते हैं कि 'बंगाल जल रहा है और ममता हैं कि दिल्ली में राजनीति कर रही हैं। यह उसी तरह है कि रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था। भगवान राम के निर्दोष अनुयायियों पर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने हमला किया है और पश्चिम बंगाल सरकार इस बारे में कुछ नहीं कर रही है।' जब केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री के कथन का विश्लेषण करेंगे तो ममता बनर्जी की राजनीति सवालों के कठघरे में किसी दोषी की तरह खड़ी दिखाई देती है। संकट की घड़ी में अपने राज्य के प्रति ममता की यह उदासीनता गंभीर है। इस समय उन्हें पश्चिम बंगाल में होना चाहिए था। मुख्यमंत्री होने के नाते सांप्रदायिक हिंसा को बुझाने के लिए यथासंभव प्रयास करने चाहिए थे। ममता बनर्जी को आगे आकर जनता से संवाद स्थापित करना था, जनता को समझाना था। किंतु, वह अपना राजधर्म भूल गईं। यकीनन उन्होंने जनादेश का अपमान किया है। उन्हें जनादेश राज्य को सुचारू ढंग से चलाने के लिए मिला था, किंतु वह राज्य को जलता छोड़ कर अपनी राजनीति चमकाने में व्यस्त हैं।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन न्यायालय के विरोध की राजनीति : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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