संघ शताब्दी वर्ष
"श्रद्धा, आशा और उत्साह से भरा संगठित बल यदि देश में निर्माण कर सकें, तो सारे संकटों को हँसते-खेलते ठुकरा सकेंगे। यही विजयादशमी का संदेश है"। – श्री गुरुजी
भारतीय संस्कृति में विजयादशमी केवल बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह आत्मविस्मृति से आत्मबोध, बलोपासना और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का पावन पर्व है। यह पर्व ‘विजिगीषु वृत्ति’ अर्थात् जीतने की आकांक्षा के भाव को प्रबल करता है। यही कारण है कि स्वतंत्रतासेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने हिंदू समाज को संगठित करने, उसके भीतर विजिगीषु वृत्ति और आत्मबोध का भाव जागृत करने के उद्देश्य से जिस संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की संकल्पना को देश के सामने रखा, उसको प्रारंभ करने के लिए विजयादशमी के पावन अवसर को चुना। इसलिए संघ में विजयादशमी पर्व का विशेष महत्व है। हालांकि, संघ ने विजयादशमी उत्सव को छह उत्सवों में केवल इसलिए शामिल नहीं किया है कि यह उसका स्थापना दिवस है। दरअसल, विजयादशमी का पर्व समाज को सब प्रकार से सबल होने की प्रेरणा देता है। जिस दौर में डॉ. हेडगेवार के मन में भारत की अक्षुण्ण स्वतंत्रता का स्वप्न पल रहा था, उस समय हिंदू समाज आत्मदैन्य की अवस्था में था। हिन्दुओं को आत्मदैन्य की अवस्था से बाहर निकालकर विजिगीषु वृत्ति के समाज में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक था कि भारत के लोगों तक विजयादशमी का संदेश वास्तविक अर्थों में पहुँचे। विजय की आकांक्षा रखने वाला और संगठित हिंदू समाज ही देश की सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान कर सकता है।
राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत और प्रेरणादायी 'संघ गीत' सुनने के लिए क्लिक करें
विजयादशमी भारतीय इतिहास की उस परंपरा को संजोए हुए है जहाँ सज्जन-शक्ति ने दुर्जन-शक्ति पर विजय पाई। जब रावण के अत्याचारों और अनैतिक शासन से संपूर्ण जगत त्रस्त था, तब भगवान श्रीराम ने समाज के सामान्य लोगों को संगठित कर उस महाबलशाली राक्षसराज का अंत किया। जरा सोचिए संगठन में कितनी शक्ति है? कल तक जो समाज रावण के आतंक से भयाक्रांत था, जिसके पास रावण के अन्याय से बचने का कोई मार्ग नहीं था, संगठित होकर उसी समाज ने सब प्रश्नों का समाधान कर दिया। यह प्रसंग सिखाता है कि बड़े-बड़े भौतिक संसाधनों से संपन्न शत्रु को भी निष्ठा और संगठित बल से परास्त किया जा सकता है। विजयादशमी पर हम महाभारत के एक प्रसंग को भी याद करते हैं। अज्ञातवास के समय पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष के कोटर में सुरक्षित रख दिए थे। अज्ञातवास पूर्ण होने पर अर्जुन ने उन्हीं शस्त्रों को निकाल कर विधिवत पूजन किया और विराट नगर पर आक्रमण करने वाली कौरव सेना को पराजित किया। तभी से विजयादशमी पर शस्त्र-पूजन की परंपरा चली आ रही है। विजयादशमी शक्ति की अभिव्यक्ति का भी पर्व है। विजयादशमी से पूर्व हम विजय की कामना के साथ नौ दिन तक भगवती की उपासना करके शक्ति का संचयन करते हैं। हम स्मरण करते हैं कि शक्ति स्वरूपा देवी ने महिषासुर का संहार करके सृष्टि का कल्याण किया था। इसी दिन राजा रघु और कौत्स ऋषि के प्रसंग की स्मृति में शमी पत्रों को ‘सोना’ मानकर परस्पर बांटने और सामाजिक सौहार्द एवं आत्मीयता को सुदृढ़ करने की परंपरा रही है।
संगठित शक्ति का संदेश :
द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ के अनुसार, विजयादशमी का मूल मर्म संगठित शक्ति में निहित है। उनका मानना था कि रावण नवग्रहों, राजा-महाराजाओं और देवताओं तक को भयभीत करने वाला महापराक्रमी था। उसके पास उस काल की सभी संहारक भौतिक शक्तियाँ थीं। परंतु भगवान श्रीराम ने उन वनवासियों को, जिनके पास वृक्ष और पत्थरों के अतिरिक्त कोई साधन नहीं था, एक सूत्र में पिरोया और एक ऐसी अजेय संगठित शक्ति खड़ी की जिसके आगे रावण का अहंकार टिक न सका। श्रीगुरुजी का स्पष्ट मत था कि यदि समाज में श्रद्धा, आशा और उत्साह से भरा संगठित बल निर्माण हो जाए, तो देश हर आंतरिक और बाह्य संकट को हँसते-खेलते पार कर सकता है। उन्होंने विजयादशमी को आत्मविस्मृत और पराभूत हिंदू राष्ट्र में पुनः चैतन्य और बलोपासना की आकांक्षा जगाने का परंपरा-सम्मत साधन माना।
जब हेडगेवार ने समझाया सीमोल्लंघन का अर्थ :
विजयादशमी पर्व पराक्रम का संदेश भी देता है। यह पर्व सिखाता है कि अपनी सीमाओं का विस्तार करके हम अच्छे कार्यों को सर्वत्र पहुँचाएं। प्राचीन काल में राजा और वीर योद्धा इस दिन विजय-अभियान के लिए ‘सीमोल्लंघन’ करते थे। डॉ. हेडगेवार की दृष्टि में सीमोल्लंघन का अर्थ केवल राज्य की सीमाओं का विस्तार नहीं था। मध्यप्रदेश के रामपायली में वर्ष 1908 में आयोजित विजयादशमी के उत्सव में शामिल होकर युवा हेडगेवार ने बहुचर्चित भाषण दिया था, जिसके लिए उन पर अंग्रेजों ने मुकदमा भी चलाया था। सीमोल्लंघन का देश–काल–परिस्थिति के अनुरूप अर्थ समझाते हुए उन्होंने भाषण दिया कि “अंग्रेजों को सात समुद्र पार भेज देना ही सीमोल्लंघन का वास्तविक अर्थ होगा। रावण-वध का आज तात्पर्य अंग्रेजी राज का अंत करना है”।
अनुशासन की शक्ति और पथ-संचलन की परंपरा :
लेखक ना.ह. पालकर के अनुसार, प्रत्येक वर्ष विजयादशमी पर संघ ने अपनी कार्य-परिधि का विस्तार करके ‘सीमोल्लंघन’ का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया। नागपुर में जब डॉ. हेडगेवार ने पथ-संचलन और घोष विभाग (बैंड) की योजना बनाई, तब लगभग पाँच-छह सौ स्वयंसेवक अनुशासित रूप से संचलन कर रहे थे। उस अवसर पर स्वतंत्रता सेनानी श्री विट्ठलभाई पटेल नागपुर आए और डॉक्टर जी के निमंत्रण पर मोहिते संघस्थान पहुँचे। स्वयंसेवकों के अनुशासन को देखकर वे अत्यंत प्रभावित हुए। तब विट्ठलभाई पटेल ने स्वयंसेवकों को पाथेय देते हुए कहा था कि यह कार्य उनके लिए नवीन है, लेकिन इसने उनके विचारों को नई दिशा दी है। जगत् में ईश्वर को छोड़कर किसी से डरो मत तथा अपने कार्य पर अविचल निष्ठा रखकर तीव्र गति से कार्य का विस्तार करो।
राष्ट्रहित में समर्पित होने का आह्वान :
आज जब समाज जाति-भेद, क्षेत्रीयता, स्वार्थ, भ्रष्टाचार और धर्मांतरण जैसी विसंगतियों से जूझ रहा है और सीमा पार से अनेक चुनौतियाँ मुँह बाए खड़ी हैं, तब विजयादशमी का यह पर्व समाज के क्षात्रतेज और सुप्त चेतना को जगाने का माध्यम बनता है। विजयादशमी पर स्वयंसेवकों द्वारा किया जाने वाला पूर्ण गणवेश में पथ-संचलन और शस्त्र-पूजन वास्तव में समाज की सज्जन-शक्ति को संगठित और निर्भय होकर राष्ट्रहित में समर्पित होने का प्रत्यक्ष आह्वान है।
![]() |
| स्वदेश ज्योति में प्रकाशित साप्ताहिक कॉलम 'साधना के 100 वर्ष' में 18 अक्टूबर, 2026 को प्रकाशित लेख |


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
पसंद करें, टिप्पणी करें और अपने मित्रों से साझा करें...
Plz Like, Comment and Share