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शनिवार, 18 जून 2016

स्कूल चलें हम : सब पढ़ें, सब बढ़ें

 प्रत्येक  सरकार का प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए कि वह प्रत्येक व्यक्ति को गुणवत्ता युक्त शिक्षा उपलब्ध कराए। किसी भी राज्य/देश के नागरिक सरकार से बुनियादी जरूरतों में रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ गुणवत्ता युक्त शिक्षा और स्वास्थ्य भी चाहते हैं। बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि उनके लिए शिक्षा सबसे पहली बुनियादी जरूरत होनी चाहिए। शिक्षा न केवल व्यक्ति के विकास में सहायक होती है, बल्कि संस्कारित समाज के निर्माण के लिए भी जरूरी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि किसी भी देश की तरक्की में उसके शिक्षित नागरिकों की अहम हिस्सेदारी होती है। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश सरकार ने अपने राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षित करने का संकल्प लिया है। अपने संकल्प की पूर्ति के लिए सरकार राज्य में 'स्कूल चलें हम' अभियान का संचालन करती है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं इस अभियान का नेतृत्व करते हैं इसलिए अपेक्षित परिणाम भी प्राप्त हो रहे हैं।

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

अपनी भाषा में हो शिक्षा

 ज ब किसी राष्ट्र पर विदेशी भाषा हावी हो जाती है तो उसकी संस्कृति, परंपरा और उसके जीवन मूल्यों के समक्ष गहरा संकट खड़ा हो जाता है। उस राष्ट्र की संतति भ्रम की स्थिति में होती है। बाहरी भाषा के प्रभुत्व के कारण एक ही राष्ट्र में भाषाई आधार पर भेदभाव की दीवार खड़ी हो जाती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में तो एक विदेशी भाषा ने भारतीय भाषाओं को आमने-सामने शत्रु की तरह खड़ा करवा दिया है। इसके साथ ही विदेशी भाषा के प्रभाव में वह राष्ट्र स्वभाविक प्रगति भी नहीं कर पाता है। अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण यह स्थिति भारत के साथ दिखती है। दरअसल, भाषा महज संवाद की सेतु नहीं है। संवाद सेतु से कहीं अधिक, भाषा संस्कृति की धुरी है। संस्कृति भाषा पर ही टिकी रहती है। भाषा बदलने पर संस्कृति बदल जाती है, मूल्य बदल जाते हैं। बात सांस्कृतिक मूल्यों तक भी सीमित नहीं है बल्कि सार्वभौमिक सत्य है कि कोई भी राष्ट्र अपनी भाषा के साथ ही आगे बढ़ता है। हम दुनिया के उन्नत और प्रगतिशील राष्ट्रों का इतिहास-वर्तमान उलट-पलट कर जब देखेंगे तो ज्ञात होगा कि उन्होंने निज भाषा को नहीं त्यागा। लोक व्यवहार से लेकर पठन-पाठन और शोध तक अपनी मातृभाषा में किए। मातृभाषा में शिक्षा का क्या महत्व है, इसे दुनिया के उन्नत राष्ट्रों जापान, जर्मनी, रूस, अमरीका और चीन से लेकर इजराइल तक ने साबित करके दिखाया है। दुनिया के शिक्षाविद् भी यही मानते हैं कि शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। महामना मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, रविन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महापुरुषों ने भी मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिया है। भारत में समय-समय पर गठित शिक्षा आयोगों राधाकृष्णन आयोग और कोठारी आयोग सहित अन्य आयोगों ने भी मातृभाषा में ही शिक्षा की अनुशंसा की है।

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय का पूरा देश करे पालन

 शि क्षा व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला ऐतिहासिक है। लगातार अनदेखी से दुर्दशा के शिकार हुए सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने का यह प्रभावी रास्ता हो सकता है। हाईकोर्ट के फैसले को महज उत्तरप्रदेश के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि स्कूली शिक्षा की हालत तो पूरे देश में लगभग एकसमान है। अच्छा होगा यदि सभी राज्य स्वत: पहल करके अपने यहां भी इस फैसले को लागू करें। हाईकोर्ट ने कहा है कि जनप्रतिनिधि, नौकरशाह और न्यायाधीश अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि जिन नेताओं, अधिकारियों और न्यायाधीशों के बच्चे सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ें, उनके वेतन से स्कूल की फीस के बराबर राशि काटकर सरकारी स्कूलों के कल्याण पर खर्च की जाए। प्राथमिक स्कूलों की दयनीय हालत के संदर्भ में दायर की गई जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। फैसला सुनाते वक्त न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि खराब हालत होने के बाद भी करीब 90 फीसदी बच्चे इन्हीं सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, ऐसे में इनकी दशा सुधारना बहुत जरूरी है।

सोमवार, 1 जून 2015

व्यक्ति और राष्ट्र हित में मूल्यपरक शिक्षा

 शि क्षा के अभाव से कितनी समस्याएं और विसंगतियां उत्पन्न होती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। विशेषकर मूल्यहीन शिक्षा व्यवस्था के कारण तो कई प्रकार की नई समस्याएं जन्म ले लेती हैं। अपनी बौद्धिक और तर्क क्षमता से दुनिया पर विजय प्राप्त करने वाले युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द तो यहां तक कहते हैं- 'यदि शिक्षा से सम्पन्न राष्ट्र होता तो आज हम पराभूत मन:स्थिति में न आए होते।' इस देश का सबसे अधिक नुकसान शिक्षा के अभाव के कारण ही हुआ है। भारत के संदर्भ में शिक्षा का अभाव ही एकमात्र चुनौती नहीं है बल्कि उचित शिक्षा का अभाव ज्यादा गंभीर मसला है। इस बात से किसी को इनकार नहीं है कि एक समर्थ राष्ट्र के निर्माण में शिक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह कहना ज्यादा उचित होगा कि राष्ट्र निर्माण में शिक्षा पहली और अनिवार्य आवश्यकता है। लेकिन, यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत को कैसी शिक्षा की आवश्यकता है? सब लोग पढऩा-लिखना सीख लें, अंगूठे की जगह हस्ताक्षर करना सीख लें, केवल इतना भर शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए क्या? मनुष्य अपने हित-अहित के संबंध में जागरूक हो जाए, उसे इतना शिक्षित करने मात्र से काम चलेगा क्या? अच्छे-भले मनुष्य को पैसा कमाने की मशीन बना देना, शिक्षा है क्या? अच्छी नौकरी पाने के योग्य हो जाना, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाना, किताबें पढऩा-लिखना सीख लेना ही शिक्षा और शिक्षा का उद्देश्य नहीं है, तो भला क्या है?