शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

हिन्दू धर्म छोड़ने पर नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कन्वर्जन के बाद आरक्षण के लाभ पर रोक लगाने का ऐतिहासिक निर्णय भारतीय संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों की रक्षा करने वाला एक अत्यंत आवश्यक कदम है। मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए और तमिलनाडु सरकार की याचिका को खारिज कर शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि अनुसूचित जाति या अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई व्यक्ति अपना मूल धर्म छोड़कर इस्लाम या ईसाई मत अपना लेता है, तो वह अपने पुराने सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर संविधान के अनुच्छेद-16(4) के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। न्यायालय की यह टिप्पणी पूरी तरह से तार्किक और वस्तुनिष्ठ है कि कन्वर्जन से पहले की जाति या सामुदायिक पहचान को स्वतः किसी दूसरे धर्म के पिछड़े वर्ग में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अतिरिक्त अन्य पंथों में सैद्धांतिक रूप से जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जाता। ऐसे में, जो संगठन जातिविहीन समाज का दावा कर निर्धन और अशिक्षित लोगों को कन्वर्ट होने का प्रलोभन देते हैं, उनके द्वारा कन्वर्जन के बाद भी जातिगत आरक्षण की मांग करना उनके अपने ही दावों के विरोधाभासी है। 

इसके साथ ही, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी निजी धार्मिक संस्था या जमात के मात्र एक प्रमाण-पत्र के आधार पर सार्वजनिक लाभ की पात्रता तय नहीं हो सकती, और न ही पुनः मूल धर्म में लौटने पर बिना सक्षम प्राधिकारी की स्वतंत्र जांच के स्वतः आरक्षण बहाल किया जा सकता है। इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह वास्तविक वंचितों के अधिकारों में हो रही सेंधमारी को रोकेगा। लंबे समय से यह देखा जा रहा था कि मतांतरण करने वाले लोग अनुसूचित जाति या पिछड़े वर्ग के आरक्षण के साथ-साथ अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सुविधाओं का 'दोहरा लाभ' उठा रहे थे। यह स्थिति न केवल सनातन परंपरा के वास्तविक आरक्षित वर्गों के अधिकारों में कटौती कर रही थी, बल्कि छल-कपट और लोभ-लालच के माध्यम से कराए जाने वाले कन्वर्जन को भी बढ़ावा दे रही थी।

आरक्षित वर्ग को यह देखना चाहिए कि कैसे कांग्रेस की सरकारें उनके आरक्षण के अधिकार को छीनकर उसमें किसी और को हिस्सेदारी देना चाह रही हैं। अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए कांग्रेस सरकार अक्सर मुसलमानों और ईसाईयों को आरक्षित वर्ग में शामिल करने के प्रयास करती हैं। कांग्रेस सरकारों की यह चालाकी संविधान की मूल भावना और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के विरुद्ध है। 

इस अनीति के विरुद्ध अब समाज में भी जागृति आ रही है। लोग उठकर खड़े हो रहे हैं और डिलिस्टिंग की मांग कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के झाबुआ और आलीराजपुर जैसे जनजाति बाहुल अंचलों में कन्वर्टेड लोगों को अनुसूचित जनजाति की सुविधाओं से वंचित करने (डिलिस्टिंग) की मांग को लेकर पिछले 15 वर्षों से आंदोलन चलया जा रहा है। वहीं, छत्तीसगढ़ के बस्तर (जगदलपुर) में तो ग्रामीणों को बीमारी ठीक करने या चमत्कार के नाम पर होने वाली चंगाई सभाओं और धर्मांतरण के खिलाफ स्वयं एकजुट होना पड़ा है, जहाँ ग्राम सभाओं ने पेसा कानून की शक्तियों का प्रयोग करते हुए बाहरी प्रचारकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। 

सर्वोच्च न्यायालय का यह दूरगामी निर्णय निस्संदेह प्रलोभन आधारित कन्वर्जन की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएगा और आरक्षण व्यवस्था की शुचिता को बनाए रखेगा। अब यह केंद्र और राज्य सरकारों का दायित्व है कि वे न्यायालय के इस स्पष्ट मार्गदर्शन के आलोक में पंथ प्रचार की स्वतंत्रता के दुरुपयोग को रोकें और यह सुनिश्चित करें कि संवैधानिक सुविधाओं का लाभ केवल उन्हीं पात्र नागरिकों तक पहुँचे, जिनके उत्थान के लिए इनका प्रावधान किया गया है। आरक्षित वर्ग भी आँखें खोलकर देखे कि उनके आरक्षण के अधिकार में कौन-से राजनीतिक दल सेंध लगा रहे हैं?

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