मंगलवार, 29 सितंबर 2015

सकारात्मक ऊर्जा के केन्द्र हैं मंदिर

 फे सबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग ने 'मंदिर' की चर्चा करके विशेषतौर पर 'हिन्दू धर्म को अफीम' मानने वाली 'प्रगतिशील जमात' को चौंका दिया है। फेसबुक मुख्यालय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बातचीत करते हुए उन्होंने बताया कि फेसबुक कठिन दौर से गुजर रहा था। बिकने की कगार पर पहुंच गया था, तब उनके प्रेरणास्रोत एप्पल के पूर्व सीईओ स्टीव जॉब्स ने भारत के मंदिर की यात्रा करने की सलाह दी थी। मार्क बताते हैं कि मंदिर दर्शन के बाद फेसबुक को अरबों रुपये की कंपनी में तब्दील करने का भरोसा फिर से पैदा हुआ। जकरबर्ग ने कहा कि मंदिरों से आशा मिलती है। कुछ भी करने से पहले मंदिर जाना चाहिए। आशा लेकर मंदिर जाइए फिर देखिए आप कहाँ पहुंच जाते हैं। संकट की घड़ी से उबरने में मंदिर की भूमिका का जिक्र करके जकरबर्ग किसी अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं दे रहे थे, बल्कि अध्यात्म और सकारात्मक वातावरण की महत्ता को स्थापित कर रहे थे। मंदिर के देवता से प्रार्थना करने भर से फेसबुक अरबों की कंपनी बन गई, ऐसा भी नहीं है। निश्चित तौर पर इसके पीछे मार्क जकरबर्ग की मेहनत, लगन और सूझबूझ है।
       वैज्ञानिक सोच रखने वाले स्टीव जॉब्स ने मार्क जकरबर्ग को भारत और भारत में मंदिर की यात्रा के लिए इसलिए भेजा था क्योंकि वे भली-भाँति जानते थे कि कठिन परिस्थितियों के कारण जकरबर्ग का चित्त स्थिर नहीं है। वह बेचैन है। अपनी कंपनी को संकट में देखकर वह नकारात्मक भावों से भर गया है। जकरबर्ग को श्रेष्ठ निर्णय लेने के लिए आत्मिक शांति और सकारात्मक वातावरण की आवश्यकता है। हम जानते हैं कि मंदिर निर्माण वास्तु के आधार पर होता है। इसलिए वहां सकारात्मक ऊर्जा अधिक रहती है। प्राचीन मंदिर धरती के महत्वपूर्ण स्थलों पर हैं। वास्तुशास्त्र के जानकार बहुत सोच-विचारकर और वैज्ञानिक आधार पर पड़ताल करने के बाद ही चिह्नित जगहों पर मंदिरों का निर्माण करते थे। इसलिए ये प्राचीन मंदिर धनात्मक ऊर्जा के केन्द्र हैं।
        ऐसा कहा जाता है कि व्यक्ति मंदिर में नंगे पाँव जाता है, इससे शरीर अर्थ हो जाता है। मूर्ति के समक्ष जब हाथ जोड़ता है तो शरीर का ऊर्जा चक्र चलने लगता है। जब वह सिर झुकाता है तो मूर्ति से परावर्तित होने वाली पृथ्वी और आकाशीय तंरगें मस्तक पर पड़ती हैं और मस्तिष्क पर मौजूद आज्ञा चक्र पर असर डालती हैं। इससे शान्ति मिलती है और सकारात्मक विचार आते हैं। मंदिर में शंख नाद और घंटियों से आने वाली संगीतमयी ध्वनि भी मन को सुकून पहुंचाने वाले वातावरण का निर्माण करती हैं। मंदिर पहुंचने के बाद प्रत्येक व्यक्ति अपनी सारी समस्या देवता के आगे प्रस्तुत कर हल्का अनुभव करता है। उसे अंदर से संबल मिलता है कि अब देवता उसकी सभी समस्याओं को दूर कर देंगे। व्यक्ति के मन को शांति मिलती है। बेचैनी खत्म हो जाती है। 
        यही कारण है कि मंदिर पहुंचने के बाद व्यक्ति सकारात्मक भाव से भर जाता है, नई उम्मीदें जाग जाती हैं, अध्यात्म की सकारात्क ऊर्जा से आत्मिक शांति प्राप्त होती है। मंदिर में आने के बाद व्यक्ति की नकारात्मक ऊर्जा का क्षय होता है। नई आशाओं से भरा व्यक्ति रचनात्मक सोचता है। यही मार्क जकरबर्ग ने अनुभव किया। उसी अनुभव को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ साझा किया है। इसलिए 'धर्म को अफीम' मानने वाले सोचें कि प्रत्येक धर्म अफीम नहीं है। कुछ धर्म दवा का काम भी करते हैं। मंदिर कर्मकांड के स्थल नहीं हैं बल्कि वैज्ञानिक चेतना के केन्द्र हैं।

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