गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015
धर्मनिरपेक्ष है समान नागरिक संहिता, सब करें समर्थन
शुक्रवार, 16 जुलाई 2021
समान नागरिक संहिता की आवश्यकता
उच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद जैसा कि तय था- देश में स्वयं को सेकुलर एवं संविधान हितैषी कहलाने वाला वर्ग समान नागरिक संहिता के विरोध में उतर आया। बुद्धिजीवियों का यह वर्ग आज तक इस बात को नहीं समझा सका है कि समान नागरिक संहिता भला किस प्रकार से किसी संप्रदाय के विरुद्ध हो सकती है? एक तरफ यह वर्ग संविधान से देश चलना चाहिए, इस बात की रट लगाता है, वहीं दूसरी ओर अनेक विषयों में संविधान को दरकिनार करना चाहता है। यह दकियानूसी सोच उस समय भी सक्रिय हो गई थी, जब बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर देश की आधी आबादी (महिलाओं) को उनके अधिकार देने के लिए समान नागरिक संहिता का विधेयक प्रस्तुत करना चाहते थे। विरोध को देखते हुए डॉ. अंबेडकर ने प्रस्ताव किया कि समान नागरिक संहिता पर एक राय बनाकर उचित समय पर इसे लागू किया जाना चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आज तक इस पर एक राय नहीं बन सकी है। अब तक सत्ता के केंद्र में रहे राजनीतिक दलों ने कभी इस दिशा में आम सहमति बनाने के प्रयास भी नहीं किए। बल्कि उन्होंने तो इस माँग को वोटबैंक की राजनीति का माध्यम बना लिया।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय भी समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कह चुका है। उस समय तो अल्पसंख्यक समुदाय (ईसाई) के एक व्यक्ति ने ही सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई थी कि एक देश में अलग-अलग कानून क्यों हैं? विरोध करने वाले कूपमंडूकों को समझना चाहिए कि समान नागरिका संहिता सबको समान अधिकार देगी। इसलिए इसका स्वागत किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार से अपेक्षा है कि वह जल्द ही इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए।
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बुधवार, 31 जुलाई 2024
समान नागरिक संहिता की आवश्यकता
देशभर में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जनता की ओर से माँग उठ ही रही थी कि अब न्यायालय ने भी इस आशय की टिप्पणी की है। तीन तलाक से जुड़े मामले की सुनवाई करते समय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने समान नागरिक संहिता का पक्ष लेते हुए टिप्पणी की है कि “समय आ गया है कि अब देश समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को समझे। समाज में आज भी आस्था और विश्वास के नाम पर कई कट्टरपंथी, अंधविश्वासी और अति-रूढ़िवादी प्रथाएं प्रचलित हैं। इससे अंधविश्वास और बुरी प्रथा पर रोक लगेगी”। समान नागरिक संहिता पर इससे बड़ी टिप्पणी नहीं हो सकती। न्यायालय की ओर से कहा जा रहा है कि देश को यह बात समझनी चाहिए कि समान नागरिक संहिता की माँग किसी संप्रदाय विशेष के विरुद्ध नहीं है अपितु यह तो सच्चे अर्थों में ‘सेकुलर स्टेट’ की पहचान है।
गुरुवार, 26 जनवरी 2017
जायज है समान नागरिक संहिता की माँग
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इस्लामिक कानूनों की माँग का औचित्य
गुरुवार, 26 जनवरी 2023
कर्तव्य पथ पर ‘गणतंत्र’
हम भारत के लोग अपना 74वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। हमारा गणतंत्र बीते 73 वर्षों में किस ओर बढ़ा है, विद्वान लोग अकसर इसकी समीक्षा/चर्चा करते रहते हैं। वैसे तो भारत के लिए गणतंत्र कोई आधुनिक व्यवस्था नहीं है। जब हम अपने इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ पलटकर देखते हैं, तो हमें भारत में गणतंत्र की समृद्ध परंपरा दिखाई देती है। फिलहाल हम अपने वर्तमान गणतंत्र की बात करें तो ध्यान आता है कि अपनी चर्चाओं में अकसर विद्वान कहते हैं कि भारत का ‘तंत्र’ अभी पूरी तरह से ‘गण’ केंद्रित नहीं हुआ है। कहीं न कहीं औपनिवेशिक मानसिकता ही हमारे तंत्र पर हावी है। परंतु पिछले दस वर्षों में जिस तरह से भारत के गणतंत्र ने करवट बदली है, उससे स्पष्टतौर पर परिलक्षित हो रहा है कि हमारा तंत्र अब गण की ओर सम्मुख हुआ है। इसलिए पिछले कुछ वर्षों में शासन स्तर पर हुए निर्णय, नीतिगत बदलाव एवं सांकेतिक व्यवस्थाएं गण की मंशा के अनुरूप दिखाई देती हैं। अब अंतरराष्ट्रीय ताकतों के दबाव में नहीं अपितु जनता के हित में नीतियां बनती हैं। हमारा शासन किसी का पिछलग्गू नहीं है, वह भारतीय दृष्टिकोण से नीतियां बना रहा है। भारत अब बैशाखियां छोड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ चला है।











