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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

धर्मनिरपेक्ष है समान नागरिक संहिता, सब करें समर्थन

 सु प्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता को लेकर भाजपानीत केन्द्र सरकार से सवाल पूछकर एक जरूरी बहस को जन्म दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट में क्रिश्चयन डायवोर्स एक्ट की धारा 10ए (1) को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई चल रही थी। याचिका दायर करने वाले अलबर्ट एंथोनी का सवाल है कि एक देश में एक ही मामले में अलग-अलग कानून क्यों हैं? ईसाई दंपती को तलाक लेने के लिए दो साल तक अलग-अलग रहना जरूरी है। जबकि हिन्दू मैरिज एक्ट में एक साल अलग रहने पर तलाक दे दिया जाता है। बात इसके आगे करें तो मुस्लिम पुरुष महज 'तलाक-तलाक-तलाक' कहकर ही महिला को छोड़ सकता है। वाट्सअप पर भी वह तीन बार तलाक लिख-बोल कर अपनी पत्नी को बता दे तो तलाक हो जाता है। हिन्दू और ईसाई दंपती को तलाक के लिए वाजिब कारण साबित करना होता है जबकि मुसलमानों में यह जरूरी नहीं है।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

समान नागरिक संहिता की आवश्यकता


देश में लंबे समय से समान नागरिक संहिता की माँग हो रही है, लेकिन वोटबैंक की राजनीति करने वालों ने इस मामले को मुस्लिम समुदाय से जोड़कर अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है। मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति का ही असर है कि देश में सबके लिए समान नागरिक संहिता नहीं है, जबकि संविधान में इसका आग्रह किया गया है। समान नागरिक संहिता नहीं होने से सर्वाधिक नुकसान उसी मुस्लिम संप्रदाय का है, जिसके नाम पर समान नागरिक संहिता का विरोध किया जाता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी कर लंबे समय से चली आ रही माँग को तेज कर दिया है। मीणा जनजाति की एक महिला और उसके पति के बीच तलाक के प्रकरण की सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है और इसे लाने का यही सही समय है। उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से इस मामले में जरूरी कदम उठाने को कहा है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि भारतीय समाज में जाति, धर्म और समुदाय से जुड़े अंतर समाप्त हो रहे हैं। इस बदलाव की वजह से दूसरे धर्म और दूसरी जातियों में शादी करने और फिर तलाक होने में दिक्कतें आ रही हैं। आज की युवा पीढ़ी को इन दिक्कतों से बचाने की जरूरत है। इस समय देश में समान नागरिक संहिता होनी चाहिए। अनुच्छेद-44 में समान नागरिक संहिता को लेकर जो बात कही गई है, उसे हकीकत में बदलना होगा। 

उच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद जैसा कि तय था- देश में स्वयं को सेकुलर एवं संविधान हितैषी कहलाने वाला वर्ग समान नागरिक संहिता के विरोध में उतर आया। बुद्धिजीवियों का यह वर्ग आज तक इस बात को नहीं समझा सका है कि समान नागरिक संहिता भला किस प्रकार से किसी संप्रदाय के विरुद्ध हो सकती है? एक तरफ यह वर्ग संविधान से देश चलना चाहिए, इस बात की रट लगाता है, वहीं दूसरी ओर अनेक विषयों में संविधान को दरकिनार करना चाहता है। यह दकियानूसी सोच उस समय भी सक्रिय हो गई थी, जब बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर देश की आधी आबादी (महिलाओं) को उनके अधिकार देने के लिए समान नागरिक संहिता का विधेयक प्रस्तुत करना चाहते थे। विरोध को देखते हुए डॉ. अंबेडकर ने प्रस्ताव किया कि समान नागरिक संहिता पर एक राय बनाकर उचित समय पर इसे लागू किया जाना चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आज तक इस पर एक राय नहीं बन सकी है। अब तक सत्ता के केंद्र में रहे राजनीतिक दलों ने कभी इस दिशा में आम सहमति बनाने के प्रयास भी नहीं किए। बल्कि उन्होंने तो इस माँग को वोटबैंक की राजनीति का माध्यम बना लिया। 

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय भी समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कह चुका है। उस समय तो अल्पसंख्यक समुदाय (ईसाई) के एक व्यक्ति ने ही सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई थी कि एक देश में अलग-अलग कानून क्यों हैं? विरोध करने वाले कूपमंडूकों को समझना चाहिए कि समान नागरिका संहिता सबको समान अधिकार देगी। इसलिए इसका स्वागत किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार से अपेक्षा है कि वह जल्द ही इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए। 

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बुधवार, 31 जुलाई 2024

समान नागरिक संहिता की आवश्यकता

देशभर में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जनता की ओर से माँग उठ ही रही थी कि अब न्यायालय ने भी इस आशय की टिप्पणी की है। तीन तलाक से जुड़े मामले की सुनवाई करते समय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने समान नागरिक संहिता का पक्ष लेते हुए टिप्पणी की है कि “समय आ गया है कि अब देश समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को समझे। समाज में आज भी आस्था और विश्वास के नाम पर कई कट्टरपंथी, अंधविश्वासी और अति-रूढ़िवादी प्रथाएं प्रचलित हैं। इससे अंधविश्वास और बुरी प्रथा पर रोक लगेगी”। समान नागरिक संहिता पर इससे बड़ी टिप्पणी नहीं हो सकती। न्यायालय की ओर से कहा जा रहा है कि देश को यह बात समझनी चाहिए कि समान नागरिक संहिता की माँग किसी संप्रदाय विशेष के विरुद्ध नहीं है अपितु यह तो सच्चे अर्थों में ‘सेकुलर स्टेट’ की पहचान है।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

जायज है समान नागरिक संहिता की माँग

 प्र ख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन ने जयपुर साहित्य उत्सव (जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल) के मंच से एक महत्त्वपूर्ण बहस को हवा दी है। सदैव चर्चा में रहने वाली बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने साहित्य उत्सव में माँग की है कि देश में तुरंत समान नागरिक संहिता लागू की जाए। तसलीमा बेबाकी से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर अपनी बात रखने के लिए जानी जाती हैं। इस कारण वह मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर भी रहती हैं। समान नागरिक संहिता की माँग करते वक्त उन्होंने कहा भी कि जब वह हिंदुत्व का विरोध करती हैं तब किसी को कोई परेशानी नहीं होती है, लेकिन जब इस्लाम की आलोचना करती हैं या फिर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करती हैं, तब उन्हें जान से मारने की धमकी दी जाती है। उन्हें खत्म करने के लिए गैरकानूनी फतवा तक जारी कर दिया जाता है।

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

समान नागरिक संहिता से रुकेगा जनसंख्या असंतुलन

 भा रत सरकार ने जनगणना-2011 के धर्म आधारित आंकड़ों का लेखा-जोखा जारी कर दिया है। आंकड़ों के मुताबिक देश की आबादी में भारत के मूल धर्मावलम्बी हिंदुओं की जनसंख्या लगभग 96.63 करोड़ है यानी कुल आबादी का 79.8 प्रतिशत। ऐसा पहली बार हुआ है कि देश की जनसंख्या में हिंदुओं की भागीदारी 80 प्रतिशत से नीचे पहुंची हो। जबकि मुस्लिम आबादी 24.6 प्रतिशत की वृद्धि दर से बढ़ रही है। मुसलमानों की जनसंख्या 14.2 प्रतिशत हो गई है। यानी देश में करीब 17.22 करोड़ मुसलमान रह रहे हैं। जनगणना-2001 के आंकड़ों में मुसलमानों की आबादी 13.4 प्रतिशत थी, जिसमें 0.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। मुस्लिम जनसंख्या का वास्तविक आंकड़ा इससे अधिक हो सकता है। क्योंकि, बांग्लादेश से घुसपैठ करके भारत में आकर बस गए मुस्लिम आमतौर पर वापस बांग्लादेश भेजे जाने के डर से अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर खुद को हिन्दू बिहारी या हिन्दू बंगाली बताते हैं। धर्म की जानकारी नहीं देने वालों की भी संख्या करीब 29 लाख है। यह आंकड़ा भी इस ओर संकेत देता है कि वास्तविक मुस्लिम जनसंख्या सरकारी रिकॉर्ड में दिखाए गए आंकड़ों से अधिक हो सकती है। तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवी जनसंख्या के आंकड़ों पर शुतुरमुर्ग की तरह व्यवहार कर सकते हैं। तेजी से हो रहा जनसंख्या असंतुलन उन्हें दिखाई न दे या हिन्दुओं की घटती और मुसलमानों की बढ़ती आबादी से उन्हें किसी प्रकार की समस्या न हो। लेकिन, भारत का बहुसंख्यक समाज इन आंकड़ों से जरूर चिंतित है।

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

उपराष्ट्रपति बताएं, कौन-सा भेदभाव दूर करना होगा?

 उ पराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-मुशावरत के स्वर्ण जयंती समारोह से मुसलमानों को लेकर केन्द्र सरकार को नसीहत दी है। उन्होंने कहा है कि सबका साथ-सबका विकास अच्छा, लेकिन सरकार को मुसलमानों के साथ हो रहे भेदभाव को दूर करना चाहिए। मुसलमानों का भरोसा जीतने के लिए सरकार उन गलतियों को जल्द सुधारे, जो सरकार या उसके एजेंटों ने की हैं। किसी सांप्रदायिक राजनेता की तरह उप राष्ट्रपति ने सरकार को मुस्लिम आबादी की भी धौंस देने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि देश की आबादी में 14 फीसदी से अधिक मुसलमान हैं, सरकार उनकी अनदेखी न करे। भारत के उप राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर बैठे हामिद अंसारी के बयान को लेकर सियासी और सामाजिक विरोध शुरू हो गया है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रवादी सामाजिक संगठन उप राष्ट्रपति के बयान को असंवैधानिक तथा सांप्रदायिक बताया है। मुस्लिम राजनीति करने वाले दल, कांग्रेस और वामपंथी सहित अन्य पार्टियां उनका समर्थन भी कर रही हैं।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

महिलाओं के हित में आए निर्णय

 पिछले  ढाई साल में तीन तलाक का मसला काफी बड़ा हो गया है। तीन तलाक पर व्यापक बहस प्रारंभ हो चुकी है। हालाँकि, मुस्लिम महिलाओं की ओर से लम्बे समय से तीन तलाक को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है। लेकिन, अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला। अब तक की सरकारों ने मुस्लिम महिलाओं की आवाज को न तो सुना और न ही उनका समर्थन किया। वरन् शाहबानो प्रकरण में तो तत्कालीन कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटकर एक तरह से मुस्लिम महिलाओं को उनकी बदहाली पर छोड़ दिया था। महिलाओं के संघर्ष को उस वक्त ताकत और सफल होने की उम्मीद मिली, जब मई-२०१४ में केंद्र में भाजपानीत सरकार का गठन हुआ। क्योंकि, भारतीय जनता पार्टी सदैव से समान नागरिक संहिता और मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी के लिए तीन तलाक को खत्म करने की हिमायती रही है। भाजपा के शीर्ष नेता अकसर अपने भाषणों में मुस्लिम महिलाओं के हित में तीन तलाक को खत्म करने की मांग उठाते रहे हैं। हाल में सम्पन्न उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी तीन तलाक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना था। माना जा रहा है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा को जो प्रचंड बहुमत मिला है, उसमें मुस्लिम महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है।

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

सांप्रदायिक निर्णय के बाद भी कांग्रेस सेक्युलर!

 जुमे  की नमाज के लिए मुस्लिम कर्मचारियों को 90 मिनट का अवकाश देकर उत्तराखंड सरकार ने सिद्ध कर दिया है कि कांग्रेस ने सेक्युलरिज्म का लबादा भर ओढ़ रखा है, असल में उससे बढ़ा सांप्रदायिक दल कोई और नहीं है। कांग्रेस के साथ-साथ उन तमाम बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों के सेक्युलरिज्म की पोलपट्टी भी खुल गई है, जो भारतीय जनता पार्टी या किसी हिंदूवादी संगठन के किसी नेता की 'कोरी बयानबाजी' से आहत होकर 'भारत में सेक्युलरिज्म पर खतरे' का ढोल पीटने लगते हैं, लेकिन यहाँ राज्य सरकार के निर्णय पर अजीब खामोशी पसरी हुई है। उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के घोर सांप्रदायिक निर्णय के खिलाफ तथाकथित प्रगतिशील और बुद्धिजीवी समूहों से कोई आपत्ति नहीं आई है। सोचिए, यदि किसी भाजपा शासित राज्य में निर्णय हुआ होता कि सोमवार को भगवान शिव पर जल चढ़ाने के लिए हिंदू कर्मचारियों-अधिकारियों को 90 मिनट का अवकाश दिया जाएगा, तब देश में किस प्रकार का वातावरण बनाया जाता? सेक्युलरिज्म के नाम पर यह दोगलापन पहली बार उजागर नहीं हुआ है। यह विडम्बना है कि वर्षों से इस देश में वोटबैंक की राजनीति के कारण समाज को बाँटने का काम कांग्रेस और उसके प्रगतिशील साथियों ने किया है, लेकिन सांप्रदायिक दल होने की बदनामी समान नागरिक संहिता की माँग करने वाली भारतीय जनता पार्टी के खाते में जबरन डाल दी गई है।

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

इस्लामिक कानूनों की माँग का औचित्य


भारत जैसे देश में इस्लामिक संगठन यदि ‘ईशनिंदा’ जैसे विवादित कानून की माँग कर रहे हैं, तब इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। जरा यह भी देखने की आवश्यकता है कि सेकुलर बुद्धिजीवी इस तरह के कानूनों की माँग का विरोध करने की जगह किस कोने में दुबक गए हैं? जब भी देश में समान नागरिक संहिता जैसे सेकुलर कानून की माँग उठती है तब यही बुद्धिजीवी उछल-उछलकर विरोध करते हैं। स्पष्ट है कि वे कहने के लिए सेकुलर हैं, लेकिन उनका आचरण घोर सांप्रदायिक है। उनके व्यवहार में हिन्दू विरोध और इस्लामिक तुष्टीकरण की झलक दिखाई देती है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हाल ही में सम्पन्न हुई अपनी एक बैठक में भारत में पाकिस्तान के उस कानून को लागू करने का प्रस्ताव पारित किया है, जिसके तहत मोहम्मद पैगंबर साहब या कुरान के संबंध में अपमानजनक, आपत्तिजनक या आलोचनात्मक बात कहने पर मृत्युदंड का प्रावधान है। पाकिस्तान में इस कानून का दुरुपयोग सुधारवादी मुस्लिमों के विरुद्ध ही नहीं अपितु गैर-मुस्लिमों को भयाक्रांत करने और उन्हें दबाने के लिए किया जाता है। यह भी देखने में आया है कि सामान्य बात को भी ‘ईशनिंदा’ बताकर अनेक गैर-मुस्लिमों को प्रताडि़त और दंडित किया गया है। क्या भारत जैसे देश में इस प्रकार के सांप्रदायिक कानून की वकालत होनी चाहिए?

गुरुवार, 26 जनवरी 2023

कर्तव्य पथ पर ‘गणतंत्र’

हम भारत के लोग अपना 74वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। हमारा गणतंत्र बीते 73 वर्षों में किस ओर बढ़ा है, विद्वान लोग अकसर इसकी समीक्षा/चर्चा करते रहते हैं। वैसे तो भारत के लिए गणतंत्र कोई आधुनिक व्यवस्था नहीं है। जब हम अपने इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ पलटकर देखते हैं, तो हमें भारत में गणतंत्र की समृद्ध परंपरा दिखाई देती है। फिलहाल हम अपने वर्तमान गणतंत्र की बात करें तो ध्यान आता है कि अपनी चर्चाओं में अकसर विद्वान कहते हैं कि भारत का ‘तंत्र’ अभी पूरी तरह से ‘गण’ केंद्रित नहीं हुआ है। कहीं न कहीं औपनिवेशिक मानसिकता ही हमारे तंत्र पर हावी है। परंतु पिछले दस वर्षों में जिस तरह से भारत के गणतंत्र ने करवट बदली है, उससे स्पष्टतौर पर परिलक्षित हो रहा है कि हमारा तंत्र अब गण की ओर सम्मुख हुआ है। इसलिए पिछले कुछ वर्षों में शासन स्तर पर हुए निर्णय, नीतिगत बदलाव एवं सांकेतिक व्यवस्थाएं गण की मंशा के अनुरूप दिखाई देती हैं। अब अंतरराष्ट्रीय ताकतों के दबाव में नहीं अपितु जनता के हित में नीतियां बनती हैं। हमारा शासन किसी का पिछलग्गू नहीं है, वह भारतीय दृष्टिकोण से नीतियां बना रहा है। भारत अब बैशाखियां छोड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ चला है।

शनिवार, 22 सितंबर 2018

समाधानमूलक प्रश्नोत्तरी

भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण
- लोकेन्द्र सिंह
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' व्याख्यान माला में अंतिम दिन अभ्यागतों के प्रश्नों के उत्तर दिए। प्रश्न वही थे, जो हमेशा संघ से पूछे जाते हैं किंतु इस बार यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण थे क्योंकि उनको समाधानमूलक उत्तरों ने पूर्ण कर दिया। संघ ने 'सनातन प्रश्नों' के उत्तर अधिकृत एवं सर्वोच्च पदाधिकारी के माध्यम से संपूर्ण समाज के सम्मुख रख दिए हैं। भले ही कोई उनसे सहमत हो या असहमत, किंतु अब कम से कम अनेक प्रश्नों पर संघ का अधिकृत पक्ष तो सार्वजनिक हो गया है। हालाँकि अनेक प्रश्नों के उत्तर संघ पूर्व में भी अपने कार्य-व्यवहार, अधिकृत वक्तव्यों एवं प्रस्तावों के माध्यम से समाज के सामने रख चुका है। कुल मिलाकर इस बौद्धिक यज्ञ की पूर्णाहुति लोक-विमर्श और लोक-व्यवहार को दिशा देने वाली रही। व्याख्यानमाला में शामिल अभ्यागतों के 215 प्रश्नों के उत्तर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दिए। तीसरे दिन के आयोजन को कुछ नाम देना हो तो 'समाधानमूलक प्रश्नोत्तरी' दिया जा सकता है।

रविवार, 1 नवंबर 2015

संघ और राजनीति

 रा ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस दशहरे (22 अक्टूबर, 2015) पर अपने नब्बे वर्ष पूरे कर रहा है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने वर्ष 1925 में जो बीज बोया था, आज वह वटवृक्ष बन गया है। उसकी अनेक शाखाएं समाज में सब दूर फैली हुई हैं। संघ लगातार दसों दिशाओं में बढ़ रहा है। नब्बे वर्ष के अपने जीवन काल में संघ ने भारतीय राजनीति को दिशा देने का काम भी किया है। आरएसएस विशुद्ध सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता है, फिर क्यों और कैसे वह राजनीति को प्रभावित करता है? यह प्रश्न अनेक लोग बार-बार उठाते हैं। जब 'संघ और राजनीति' की बात निकलती है तो बहुत दूर तक नहीं जाती। दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निकटता से नहीं जानने वाले लोग इस विषय पर भ्रम फैलाने का काम करते हैं। राजनीति का जिक्र होने पर संघ के साथ भारतीय जनता पार्टी को नत्थी कर दिया जाता है। भाजपा संघ परिवार का हिस्सा है, इस बात से किसी को इनकार नहीं है। लेकिन, भाजपा के कंधे पर सवार होकर संघ राजनीति करता है, यह धारणा बिलकुल गलत है। देश के उत्थान के लिए संघ का अपना एजेंडा है, सिद्धांत हैं, जब राजनीति उससे भटकती है तब संघ समाज से प्राप्त अपने प्रभाव का उपयोग करता है। सरकार चाहे किसी की भी हो। यानी संघ समाज शक्ति के आधार पर राजसत्ता को संयमित करने का प्रयास करता है। अचम्भित करने वाली बात यह है कि कई विद्वान संघ के विराट स्वरूप की अनदेखी करते हुए मात्र यह साबित करने का प्रयास करते हैं कि भाजपा ही संघ है और संघ ही भाजपा है।