दे शद्रोह के आरोपी और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को छह माह की अंतरिम जमानत मिलने पर वामपंथी विचारधारा के अनुयायियों में काफी उत्साह है। कन्हैया के जेल से बाहर आने पर वामपंथियों और उसके समर्थकों ने 'होली-दीवाली' सब एकसाथ मना ली। गुरुवार रात को जेएनयू परिसर में कन्हैया कुमार के भाषण के बाद उसके समर्थक गुब्बारे हो गए हैं। सब यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कन्हैया को देश से नहीं बल्कि देश में आजादी चाहिए। वह तो भुखमरी, गरीबी, अव्यवस्था से आजादी मांग रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी चाहिए। खुद को वैज्ञानिक सोच का बताने वाले तथाकथित प्रगतिशील इस तरह की अतार्किक बहस भी शुरू कर सकते हैं, यह गजब की बात है। यदि अभिव्यक्ति की आजादी नहीं होती तब क्या कन्हैया कुमार जेल से छूटकर जेएनयू में मजमा जुटाकर प्रधानमंत्री को कोस सकते थे? या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्हें वही 'देशविरोधी नारे' लगाने की आजादी चाहिए। भुखमरी, गरीबी और अव्यवस्था से तो सबको आजादी चाहिए। यह सवाल दो साल पहले सत्ता में आई एनडीए सरकार की अपेक्षा करीब 60 साल शासन में रही कांग्रेस से पूछा जाना अधिक व्यवहारिक होता।
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शनिवार, 5 मार्च 2016
बुधवार, 20 जनवरी 2016
आत्महत्या पर राजनीति से बाज आएं
के न्द्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद के शोधार्थी छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या अफसोसजनक है। किसी युवा का इस तरह जाना स्वस्थ समाज के लिए ठीक नहीं है। लेकिन, इससे भी अधिक अफसोसजनक और शर्मनाक रोहित की आत्महत्या पर हो रही राजनीति है। हमारे राजनेताओं ने जातिभेद को खत्म करने के लिए भले कभी कोई प्रयास नहीं किया होगा, लेकिन इस मामले को जातिवाद का रंग देकर जातिभेद को गहरा करने का काम जरूर कर रहे हैं। रोहित वेमुला की आत्महत्या को जातिवाद से जोडऩा किसी भी नजरिए से ठीक नहीं है। लेकिन, अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए हम यह पाप भी कर रहे हैं। जातिवाद की इस घृणित राजनीति के जरिए हम दलित और सवर्ण को एक-दूसरे के सामने दुश्मन की तरह खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। हम सामाजिक समरसता को बिगाडऩे के लिए इतने उतावले क्यों बैठे हैं? जबकि इतना सच तो सबको पता है कि रोहित वेमुला के छात्रावास से निष्कासन में कहीं भी जाति कारण नहीं थी। इसके बाद भी हमारे राजनेता और बुद्धिवादी झूठ बोलने का साहस कहाँ से बटोरकर लाते हैं?
गुरुवार, 3 सितंबर 2015
उपराष्ट्रपति बताएं, कौन-सा भेदभाव दूर करना होगा?
उ पराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-मुशावरत के स्वर्ण जयंती समारोह से मुसलमानों को लेकर केन्द्र सरकार को नसीहत दी है। उन्होंने कहा है कि सबका साथ-सबका विकास अच्छा, लेकिन सरकार को मुसलमानों के साथ हो रहे भेदभाव को दूर करना चाहिए। मुसलमानों का भरोसा जीतने के लिए सरकार उन गलतियों को जल्द सुधारे, जो सरकार या उसके एजेंटों ने की हैं। किसी सांप्रदायिक राजनेता की तरह उप राष्ट्रपति ने सरकार को मुस्लिम आबादी की भी धौंस देने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि देश की आबादी में 14 फीसदी से अधिक मुसलमान हैं, सरकार उनकी अनदेखी न करे। भारत के उप राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर बैठे हामिद अंसारी के बयान को लेकर सियासी और सामाजिक विरोध शुरू हो गया है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रवादी सामाजिक संगठन उप राष्ट्रपति के बयान को असंवैधानिक तथा सांप्रदायिक बताया है। मुस्लिम राजनीति करने वाले दल, कांग्रेस और वामपंथी सहित अन्य पार्टियां उनका समर्थन भी कर रही हैं।
मंगलवार, 4 अगस्त 2015
नेता समझें, ये सियासत नहीं है
भा रतीय नेता और राजनीति वोट बैंक की तलाश में अंधे गलियारों में भटक रहे हैं। आतंकवाद के नाम पर दोहरा रवैया अपनाने वाली कुछ चिह्नित पार्टियां और नेता पहले मुम्बई शृंखलाबद्ध धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फाँसी की सजा को माफ कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे थे। हद तो तब हो गई जब आतंकवाद को धर्म से न जोडऩे की दुहाई देने वाले ही एक आतंकवादी को धर्म विशेष से जोडऩे लगे। उसके बचाव में कुतर्कों पर भी उतर आए। न राष्ट्र के स्वाभिमान का ख्याल उन्होंने किया और न ही न्यायपालिका के प्रति सम्मान व्यक्त किया। नेताओं के बयानों को पढ़-सुन-देखकर आतंकवादी हमलों में अपने परिजनों को खोने वाले परिवार क्या सोच रहे होंगे? शहीद जवान आसमान से देख रहे होंगे तो खून के आँसू रो पड़ेंगे। लेकिन, नेताओं को शर्म नहीं, आतंकियों की पैरवी करने में, उन्हें 'जी' और 'साहब' कहने में भी। आतंकवादी की फाँसी पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश की गई। अपराधी को धर्म से जोड़ दिया।
अब तो इस रोग से मुक्ति चाहिए
आ खिर आतंकवाद के दंश से कब मुक्ति मिलेगी? यह सवाल प्रत्येक भारतवासी के दिल और जुबान पर है। आतंकवाद ने भारत के कोने-कोने को लहूलुहान कर दिया है। आतंकवादी हमलों में कभी आम आदमी मरते हैं, कभी सिपाही की जान जाती है तो कभी सैनिक शहीद होते हैं। तंग आ गए हैं, कायरों की हरकतों से। बहुत हुआ, अब इस नासूर का इलाज चाहिए। हमेशा-हमेशा के लिए। आतंकवाद को जड़ से खत्म करना कोई असम्भव कार्य नहीं है। यह संभव है। अमरीका और ब्रिटेन सहित अन्य देशों ने अपनी भूमि से आतंकवाद को उखाड़ फेंका है। फिर हम क्यों नहीं कर सकते? कर सकते हैं। आतंकवाद को रोकने के लिए फिर से एक कड़े कानून की जरूरत है। दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है। आतंकवाद को खत्म करने के लिए वर्तमान सरकार से तो और अधिक उम्मीद हैं। राष्ट्रवादी सरकार है। प्रधानमंत्री का सीना भी 56 इंच का है। सुरक्षा बलों को पिछली सरकार के मुकाबले अधिक समर्थन है। अभी हाल ही में म्यांमार की सीमा में घुसकर भारतीय सैनिकों ने आतंकवादियों को मार गिराया था।
मंगलवार, 28 जुलाई 2015
कौन हैं आतंकवादी के साथ खड़े लोग?
व र्ष 1993 के मुम्बई सीरियल धमाकों में 257 निर्दोष लोगों की जान लेने वाले आतंकवादी याकूब मेमन के समर्थन में खड़े लोग कौन हैं? बन्दूक-बम से लोगों का खून बहाने वाले आतंकवादी, नक्सलवादी या फिर उग्रवादी? अंडरवर्ल्ड के लोग? चोर-गुण्डें? अपराधी? नहीं, इनमें से कोई नहीं है। उनके काम-धंधे और पोशाक तो इनसे बिल्कुल नहीं मिलती-जुलती। सोच मिलती है या नहीं, इस बारे में जरूर विचार किया जा सकता है। न्यायालय में दोषी साबित हुए याकूब मेमन के समर्थन में खड़े लोग सफेदपोश हैं। फिल्म, राजनीति और सामाजिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोग। आतंकवादी के समर्थन में आने से इनकी प्रतिष्ठिता पर भी सवाल खड़े होते हैं। 257 जिन्दगियों और उनसे जुड़े परिवारों की चिंता न करके कैसे एक अपराधी का समर्थन ये लोग कर पा रहे हैं? याकूब मेमन की फांसी की सजा पर रोक लगाने के लिए एक याचिका राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के पास भेजी गई है। मेमन की फांसी को रोकने के लिए सिफारिश करने वालों में फिल्म निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट, आनंद पटवर्धन, अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, शाहरुख खान, सलमान खान, सांसद और वकील राम जेठमलानी, कम्युनिस्ट नेता वृंदा करात, प्रकाश करात, सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी, कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, प्रशांत भूषण और वरिष्ठ पत्रकार एवं समाचार पत्र हिन्दू के सम्पादक एन. राम सहित करीब 200 लोग शामिल हैं।
सोमवार, 27 जुलाई 2015
आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता?
मु म्बई सीरियल धमाकों में सैकड़ों लोगों की जान लेने वाले आतंकवादी याकूब मेमन की फांसी पर जबरन का विवाद खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। एआईएमआईएम के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असुद्दीन ओवैसी ने अल्पसंख्यकों को आकर्षित करने के लिए मेमन की फांसी पर मजहबी पत्ता खेला है। उसने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश की है। साम्प्रदायिकता का जहर घोलने और भड़काऊ बयान देने के लिए ओवैसी पहले से ही कुख्यात है। मेमन की फांसी की सजा पर ओवैसी ने कहा है कि याकूब मेमन मुसलमान है इसलिए उसे फांसी दी जा रही है। उसके इस बयान से राजनीतिक गलियारे में सियासी हलचल तेज हो गई है। बयान के विरोध और पक्ष में आवाजें आने लगी हैं। एक आतंकवादी के पक्ष में जनप्रतिनिधि का इस तरह बयान देना कितना सही है? यह तो सभी जानते हैं कि ओवैसी मुस्लिम राजनीति करते हैं। लेकिन, वोटबैंक को साधने और मजबूत करने के लिए एक हत्यारे के पक्ष में उतर आना कहां जायज है?
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