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गुरुवार, 31 जुलाई 2025

डॉ. देवेन्द्र दीपक जी : जिन्होंने अपनी मेधा से राष्ट्रीयता के दीपक को प्रज्वलित रखा

श्री देवेन्द्र दीपक जी को प्रो. संजय द्विवेदी पर एकाग्र पुस्तक 'लोगों का काम है कहना' भेंट करते लोकेन्द्र सिंह

वरिष्ठ साहित्यकार श्रद्धेय देवेंद्र दीपक जी का सुखद सान्निध्य प्राप्त हुआ। निमित्त बने युवा पत्रकार आयुष पंडाग्रे। आयुष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गीतों की पुस्तक देवेंद्र दीपक जी को भेंट करने के लिए जाने वाले थे, तब मैंने उनसे कहा कि "साथ चलते हैं। मुझे भी जाना है।" लगभग डेढ़ घंटे हम श्रद्धेय दीपक जी के पास रहे। घड़ी की सुइयों पर कौन ध्यान देता, हम तो बस उनको सुनते जा रहे थे। बाहर सावन की रिमझिम थी और भीतर नेह की बारिश। हम एक विरले साहित्यकार की बौद्धिक यात्रा में गोते लगा रहे थे। राष्ट्रीय विचार की पगडंडी पर उनके जीवन में जो संघर्ष आए, उनके समाधान कैसे निकाले, वह सब हमारे सामने आ रहा था। डॉ. दीपक जी ने काव्य विधा में अद्भुत काम किया है। हमें आठ पंक्ति की कविता लिखने में जोर लगाना पड़ना है, आपने कई काव्य नाटक लिखे हैं। नि:संदेह आप पर माँ सरस्वती की विशेष कृपा है। आपने अपनी मेधा राष्ट्रीय चेतना के जागरण में समर्पित की है। आप राष्ट्रीय धारा के यशस्वी साहित्यकारों की माला के चमकते मोती हैं।

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

मित्रता की सुगंध

पिछले दिनों भोपाल में मित्र गोपाल जी से लगभग 20 वर्ष बाद भेंट हुई है। भेल के अतिथि गृह की कैंटीन में इस दिन चाय का स्वाद कुछ अलग ही था। संभवतः पुराने दोस्तों की उपस्थिति से चाय भी प्रसन्न थी। गोपाल जी, शासकीय कार्य से आधिकारिक यात्रा पर भोपाल आए थे।

गोपाल मूलतः चंद्रपुर, महाराष्ट्र से हैं। हम 2000–01 में सूर्या फाउंडेशन के व्यक्तित्व विकास शिविर में मिले थे। इन शिविरों में व्यक्तित्व विकास कितना हुआ, इसकी अनुभूति तो समाज के बंधु करते ही होंगे किन्तु अपने लिए सबसे आनंद की बात यह है कि यहाँ से बहुत सारे अनमोल दोस्त मिले थे। देश के लगभग हर प्रांत में कोई न कोई अपना बन गया। 

जब हमारी दोस्ती हुई थी तब मोबाइल फोन नहीं थे और न ही फेसबुक जैसे सोशल मीडिया मंच। इसलिए आजकल की तरह दोस्तों की रोजाना की खबर नहीं रहती थी। देशभर में फैले हम सब दोस्त आपस में संवाद करने के लिए खूब चिट्ठियां लिखा करते थे।

गुरुवार, 6 जून 2019

समाजवादी चिन्तक श्री रघु ठाकुर से भेंट


डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों को अपने जीवन में आत्मसात किए हुए प्रख्यात गांधीवादी एवं समाजवादी चिंतक श्री रघु ठाकुर जी का सान्निध्य (संत संगति) लंबे अरसे बाद प्राप्त हुआ। इस अवसर पर उनसे "समाजवाद और डॉ. लोहिया के विचारों" पर महत्वपूर्ण साहित्य प्राप्त किया। अपनी पुस्तक 'हम असहिष्णु लोग भी उन्हें भेंट दी। मेरी एक पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' का विमोचन आप ही के हाथों हुआ था।
            श्री रघु ठाकुर देश में समतामूलक समाज की संरचना हेतु समर्पित हैं। उनको मैं राजनीति का संत मानता हूं। अपने लक्ष्य के लिए वे लगातार प्रवास करते रहते हैं। समाज से सतत संवाद।जीवन एकदम सरल सादगी से भरपूर और प्रेरक है। उनके साथ बैठ जाओ तो समय का पता ही नहीं चलता। उनसे ढेर सारी बातें करना यानी खुद को अपडेट करना, जैसे किसी महत्वपूर्ण पुस्तक का अध्ययन करना। इस मुलाकात में उनसे वर्तमान राजनीतिक प्रसंग, सन्दर्भ और परिदृश्य पर चर्चा हुई। समाज में समानता का भाव और आत्मीय भाव कैसे लाया जा सकते हैं, इस बारे में भी विमर्श हुआ। 
            वे सदैव लिखते-पढ़ते रहते हैं। राष्ट्रीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं में विचारोत्तेजक लेखों के रूप में उनकी सक्रिय उपस्थिति रहती है। श्री ठाकुर "दुखियावाणी" मासिक पत्र का संपादन कर रहे हैं। वे डॉ. लोहिया द्वारा प्रकाशित 'जन' एवं 'मैन काइंड' में लेखन कार्य तथा श्री जार्ज फर्नाडिज के द्वारा प्रकाशित 'प्रतिपक्ष' एवं 'द अदर साइड' के संपादन से भी जुड़े रहे हैं। आप दक्षेस महासंघ के अध्यक्ष तथा लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय संरक्षक हैं।

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

कम्युनिज्म से अध्यात्म की यात्रा-1

मार्क्स और लेनिन को पढ़ने वाला, 
लिख-गा रहा है नर्मदा के गीत

धूनी-पानी में उदासीन संत रामदास जी महाराज के साथ लोकेन्द्र सिंह
  ऐसा  कहा जाता है- 'जो जवानी में कम्युनिस्ट न हो, समझो उसके पास दिल नहीं और जो बुढ़ापे तक कम्युनिस्ट रह जाए, समझो उसके पास दिमाग नहीं।' यह कहना कितना उचित है और कितना नहीं, यह विमर्श का अलग विषय है। हालाँकि मैं यह नहीं मानता, क्योंकि मुझे तो जवानी में भी कम्युनिज्म आकर्षित नहीं कर सका। उसका कारण है कि संसार की बेहतरी के लिए कम्युनिज्म से ज्यादा बेहतर मार्ग हमारी भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा में दिखाया गया है। कोई व्यक्ति जवानी में कम्युनिस्ट क्यों होता और बाद में उससे विमुख क्यों हो जाता है? इसके पीछे का कारण बड़ा स्पष्ट है। एक समय में देश के लगभग सभी शिक्षा संस्थानों में कम्युनिस्टों की घुसपैठ थी, उनका वर्चस्व था। यह स्थिति अब भी ज्यादा नहीं बदली है। जब कोई युवा उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालयों में आता है, तब वहाँ कम्युनिस्ट शिक्षक उसके निर्मल मन-मस्तिष्क में कम्युनिज्म का बीज रोपकर रोज उसको सींचते हैं। बचपन से वह जिन सामाजिक मूल्यों के साथ बड़ा हुआ, जिन परंपराओं का पालन करने में उसे आनंद आया, माँ के साथ मंदिर में आने-जाने से भगवान के जिन भजनों में उसका मन रमता था, लेकिन जब उसके दिमाग में कम्युनिज्म विचारधारा का बीज अंकुरित होकर आकार लेने लगता है, तब वह इन्हीं सबसे घृणा की हद तक नफरत करने लगता है। इस हकीकत को समझने के लिए फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' को देखा जा सकता है। बहरहाल, जब वह नौजवान महाविद्यालय से निकलकर असल जिंदगी में आता है, तब उसे कम्युनिज्म की सब अवधारणाएं खोखलीं और अव्यवहारिक लगने लगती हैं। कॉलेज में दिए जा रहे कम्युनिज्म के 'डोज' की जकडऩ से यहाँ उसके विवेक को आजादी मिलती है। उसका विवेक जागृत होता है, वह स्वतंत्रता के साथ विचार करता है। परिणाम यह होता है कि कुछ समय पहले जो विचार क्रांति के लिए उसकी रगों में उबाल ला रहा था, अब उस विचार से उसे बेरुखी हो जाती है। वह विचारधारा उसे मृत प्रतीत होती है। यानी विवेक जागृत होने पर कम्युनिज्म का भूत उतर जाता है। 

रविवार, 14 अगस्त 2016

लोकेन्द्र पाराशर के कंधों पर भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी : उनका संक्षिप्त परिचय

 सहजता,  सरलता, सादगी और बेबाकी इन सबको मिला दिया जाए तो एक बेहद उम्दा इंसान आपके सामने होगा। लोकेन्द्र पाराशर। जो उनके भीतर है, वह ही बाहर भी। कथनी-करनी में किंचित भी अंतर नहीं। खरा-खरा कहना, चाहे किसी को बुरा लगे या भला। आपसे मित्रवत मिलेंगे और हर संभव आपकी मदद करने को हर पल तैयार। समाजकंटकों के लिए अपनी लेखनी की आग और समाजचिंतकों के लिए अपनी आंखों के पानी के लिए वे देशभर में ख्यात हैं। वे लम्बे समय तक पत्रकारिता की पाठशाला कहे जाने वाले दैनिक स्वदेश (ग्वालियर) के संपादक रहे हैं। उनका चिंतन राष्ट्रवादी है। वे समाज और देशहित से जुड़े मुद्दों पर गहरी पकड़ रखते हैं। ग्रामवासी होने के कारण भारत को औरों की अपेक्षा कहीं अधिक नजदीक से देखते और समझते हैं। उनका चिंतन, उनकी सोच और उनके विचार उनके लेखन में झलकता है।

मंगलवार, 10 मार्च 2015

गुजराती पत्रकारिता में है 'खुशबू गुजरात' की

 गु जराती पत्रकारिता की विशेषता है कि वे अपने अतीत को बहुत उज्ज्वल बताते हैं। उसे अपने अतीत पर गौरव है। यही कारण है कि गुजराती पत्रकारिता लम्बे समय तक परम्परागत पत्रकारिता की लकीर पर ही चलती रही है। नई सोच के कुछ अखबारों ने जब गुजरात की धरती पर कदम रखा तो परम्परावादी समाचार-पत्र और पत्रिकाओं ने भी अंगड़ाई ली है। बहरहाल, समय के साथ आ रहे बदलावों के बीच गुजराती पत्रकारिता में आज भी सौंधी 'खुशबू गुजरात' की ही है।

बुधवार, 17 सितंबर 2014

वेब मीडिया का नया आयाम मोबाइल एप

कमोडिटीज कंट्रोल डॉट कॉम के सम्पादक कमल शर्मा से बातचीत

 'स मय परिवर्तनशील है। जब आप समय के साथ जुड़ते हैं तो आपका विकास निश्चित है। बदलाव को समझिए और उसके साथ हो लीजिए, यह ही जीवन है। समूची पत्रकारिता में आ रहे बदलाव को हम सब महसूस कर रहे हैं। वेब मीडिया एक क्रांतिकारी परिवर्तन है। स्थिति यह है कि अगले दो साल यानी 2016 में वेब मीडिया में भी परिवर्तन आना है। हम मीडिया को मुट्ठी में बंद कर घूमेंगे। अपनी खबरें, अपने हिसाब से, जी चाहेगा तब देख-पढ़ सकेंगे। यह होगा। अपना वजूद बचाए रखने के लिए देश के बड़े मीडिया संस्थानों को यह करना ही पड़ेगा।' अपने 30 साल के पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर कमोडिटीज कंट्रोल डॉट कॉम के सम्पादक कमल शर्मा ने गहरे आत्मविश्वास के साथ ये विचार साझा किए। उन्होंने वेब मीडिया को समय की जरूरत बताया। उनके साथ हुई बातचीत को बताने से पहले बेहद सहज, सरल और बेबाक कमल शर्मा का जिक्र करना चाहूंगा। 31 अगस्त, 1963 को राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर में जन्मे कमल शर्मा हिन्दी के शीर्ष के उन पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने आगे बढ़कर चुनौतियों को स्वीकार किया। वे भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली के पत्रकारिता पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स के पहले बैच के छात्र हैं। बाद में उन्होंने सौराष्ट्र यूनिवर्सिटी, राजकोट से पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। नवभारत टाइम्स, नईदिल्ली से शुरू हुआ पत्रकारिता का सफर बड़े शान से राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला कारोबार, व्यापार, लोकमत समाचार, देवगिरी समाचार और दैनिक भास्कर मुम्बई ब्यूरो प्रमुख होते हुए करीब दस साल पहले कमोडिटीज कंट्रोल डॉट कॉम तक पहुंचा है। इस बीच वे कभी न थके, न रुके और न ही अपने पथ से डिगे। निरंतर चलते जाना ही उनका मूलमंत्र रहा। आज भी देशभर में घूम-घूमकर आर्थिक पत्रकारिता को बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं। ईटीवी ग्रुप में बतौर बिजनेस एडिटर और सीएनवीसी आवाज में बतौर प्रोड्यूसर भी श्री शर्मा काम कर चुके हैं। 
          जब भारत में वेब पत्रकारिता ने कदम रखे तब खालिस पत्रकार इस विद्या में जाने का जोखिम लेने से बच रहे थे, तब पहले पहल वेब पत्रकारिता को चुनौती की तरह कमल शर्मा ने स्वीकार किया। इंडिया इंफो डॉट कॉम के बुलावे पर वहां कंटेंट मैनेजर (सम्पादक) के रूप में सार्थक समय बिताया। मैंने उनसे सवाल किया कि जब आपके साथी टीवी पत्रकारिता की ओर रुख कर रहे थे तब आपने नए माध्यम में जाने की क्यों सोची? भारत जैसे देश में वेब मीडिया के सफल होने पर सब शंका कर रहे थे, तब आपने वेब पत्रकारिता से जुडऩे का साहस कहां से जुटाया? श्री कमल शर्मा ने हंसते हुए कहा - 'सही मायने में जोखिम और चुनौतियों का ही तो दूसरा नाम पत्रकारिता है। फिर, वेब पत्रकारिता में जाने के लिए अलग से साहस की जरूरत कहां।' उन्होंने कहा कि बदलाव समय की अनिवार्य शर्त है। बदलाव को पढऩा आपको आना चाहिए। समय के साथ हो रहे अच्छे बदलाव के साथ आप जुड़ जाते हैं तो आप निश्चित ही ग्रोथ करेंगे। यह सच है, जब वेब मीडिया ने भारत में आमद दर्ज कराई तब उन्हें अच्छे पत्रकारों की जरूरत थी। लेकिन, हर कोई वहां जाने को तैयार नहीं था। जब मैंने वेब पत्रकारिता में जाने का फैसला किया तो दोस्तों ने खूब रोका -'मत जाओ, देश में कम्प्यूटर साक्षर लोग ही बहुत नहीं है तो फिर इंटरनेट पर तुम्हारी खबरों को देखेगा-पड़ेगा कौन? करियर चौपट हो जाएगा, अच्छा-खासा मुकाम तुमने प्रिंट पत्रकारिता में हासिल कर लिया है तो फिर क्यों ऐसा जोखिमभरा फैसला ले रहे हो?' बड़ा अच्छा लगता है कि आज उन सब दोस्तों के अखबार-न्यूज चैनल्स इंटरनेट पर भी हैं। उन्हें भी अपनी-अपनी वेबसाइट बनाने को मजबूर होना पड़ा है। यह ही है वेब मीडिया की ताकत। शुरुआती दौर में इंडिया इंफो डॉट कॉम और रेडिफ डॉट कॉम ही ऐसी वेबसाइट थीं, जिन्होंने कंटेन्ट (समाचार, मनोरंजन और विविध सामग्री) इंटरनेट के माध्यम से परोसने का साहस किया। आज तो ढेरों वेबसाइट हैं। 
        'वेब मीडिया की ताकत से एक सवाल उपजता है, जो आजकल गाहे-बगाहे चर्चा में भी रहता है। आपको क्या लगता है कि वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया को खा जाएगा? खत्म कर देगा? दुनिया में जिस तरह बड़े-बड़े अखबारों के शटर गिर रहे हैं, क्या वैसी स्थिति वेब मीडिया भारत में बना सकेगा? हालांकि यही हौव्वा टीवी पत्रकारिता की शुरुआत में उठाया गया था लेकिन हुआ विपरीत, अखबारों के कई एडिशन शुरू हो गए और प्रसार संख्या की तेजी से बड़ी है।' मेरे इस सवाल का श्री शर्मा ने बड़ी सहजता से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि अखबार खत्म हो जाएंगे और टीवी चैनल्स बंद हो जाएंगे। लेकिन, आप देखिए कि किस तरह वेब मीडिया ने परम्परागत मीडिया को चुनौती दी है। छोटे-बड़े अखबारों के सामने यह स्थिति खड़ी कर दी है कि उन्हें अपने वेब पोर्टल्स शुरू करने पड़े हैं। अब कोई भी नया अखबार-चैनल अपने वेब पोर्टल के साथ ही लोगों के बीच आता है। यह बड़ा बदलाव है और परम्परागत मीडिया को बड़ी चुनौती है। अखबारों ने आज जो उपलब्धि हासिल की है, उसे पाने में उन्हें 150 से 200 साल लग गए। इलेक्ट्रोनिक मीडिया को भी लम्बा वक्त बीत गया है। लेकिन, वेब मीडिया ने कम समय में अपनी सशक्त भूमिका का प्रदर्शन किया है। वेब मीडिया ने डॉट कॉम बबलबस्ट के बाद जो धमाकेदार वापसी की है, उसमें सब शंकाओं का समाधान है। दरअसल, वेब मीडिया नए भारत का मीडिया है। आज का युवा बहुत ही सेलेक्टिव हो गया है। चैनल्स पर जरूरी नहीं कि आप जब फुर्सत हो तब आपकी रुचि की खबरें आ रही हों। अखबार में भी आपको पन्ने पलटने पड़ते हैं। लेकिन, वेब मीडिया ने तो क्रांति कर दी है। आप जब चाहें, जहां चाहें, अपने अनुसार खबरें पढ़ सकते हैं। 
      श्री शर्मा ने बताया कि वेब पत्रकारिता का अगला चरण मोबाइल है। अब हर हाथ में स्मार्टफोन है और युवाओं की बड़ी आबादी टेक्नोक्रेट। इसलिए मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए कंटेन्ट उपलब्ध कराने के प्रयास तेज हो रहे हैं। आप देखिएगा, 2016 में भारतीय पत्रकारिता का नया चेहरा मोबाइल होगा। देश के कुछ बड़े मीडिया समूहों ने इस दिशा में चिंतन और काम शुरू भी कर दिया है। जो मीडिया हाउस बदलाव के हिसाब से अपने को तैयार नहीं कर रहे, उनके अस्तित्व पर भी संकट आ सकता है। प्रिंट, टीवी और वेब तीनों ही माध्यम यदि मोबाइल एप्लीकेशन के बढ़ते जाल से जुडऩे का प्रयास नहीं करेंगे तो वे काफी पीछे छूट जाएंगे। 
        करियर की संभावनाओं के हिसाब से भी वेब पत्रकारिता को उन्होंने बेहतर क्षेत्र बताया। इस क्षेत्र में कितनी संभावनाएं हैं उसे कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि यदि एक दिन के लिए भी गूगल को बंद कर दिया जाए तो क्या स्थिति हो जाएगी, आपको अंदाजा है। श्री शर्मा ने कहा कि वर्तमान में बड़े से बड़े मीडिया हाउस भी अपनी वेबसाइट के लिए अभी अलग से रिपोर्टर नहीं रखते हैं। लेकिन, निकट भविष्य में यह करना पड़ेगा। आज भी कई वेबसाइट हैं जो व्यावसायिक तरीके से संचालित की जा रही हैं, वहां डेस्क के साथ ही फील्ड में काम करने वाले लोगों की जरूरत है। वेब मीडिया हमें उद्यमी बनने का भी मौका दे रहा है। दो-तीन साथी मिलकर बेहद कम लागत में, महज दो-तीन लैपटॉप, इंटरनेट कनेक्शन और पोर्टल के नाम रजिस्टेशन के साथ ही कुछ रुपयों में अपनी वेबसाइट संचालित कर सकते हैं। गूगल सहित कई उदाहरण हैं, जिनकी शुरुआत बेहद छोटे प्रयास ही हुई लेकिन वे आज क्या हैं, हम सब जानते हैं।
        वेब मीडिया का जिक्र जैसे ही आता है तो उसमें फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग सहित दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट को भी शामिल कर लिया जाता है। यह कहां तक सही है? क्या इन्हें भी वेब मीडिया मानेंगे? चाय का एक सिप लेते हुए कमल शर्मा ने जवाब दिया- 'आपकी चिंता सही है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर प्रसारित हो रही भ्रामक खबरों के कारण अब इसे मीडिया कहना थोड़ा जल्दबाजी होगा। पत्रकारिता की पहली शर्त होती है कि कुछ भी अपुष्ट, अस्पष्ट और सामाजिक सौहार्द बिगाडऩे वाले समाचार प्रसारित न हों लेकिन सोशल साइट्स पर इन सिद्धांतों का पालन नहीं किया जा रहा है। हालांकि यह भी सच है कि भले ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स को वेब मीडिया अभी न कहा जाए लेकिन ये वेब मीडिया के सहायक टूल्स तो है हीं।' उन्होंने बताया कि इंटरनेट ने आज हर आदमी को पत्रकार बना दिया है। हर आदमी की हद और हाथ में अपनी बात दुनिया के सामने पहुंचाने की ताकत आ गई है। मर्यादा का पालन करना हमारे हाथ में है। 
(मीडिया विमर्श में प्रकाशित साक्षात्कार)

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

ऊंचे शिखरों पर रोमांच का सफर


 क ठिनाइयां आपको अंदर से मजबूत करती हैं। अचानक से आईं मुसीबतें आपको फटाफट निर्णय लेने का अनुभव देती हैं। अनजाने रास्ते और लंबे सफर आपके लिए नई राहें खोलते हैं। यह सब करने के लिए बस थोड़े-से साहस की जरूरत होती है।  उठाइए साइकिल और निकल जाइए, ऐसे रास्तों पर जहां जाने के लिए आपका जी मचल रहा हो। जिंदगी को ठाट से जीने के लिए साइकिलिंग से अच्छा विकल्प नहीं है। यह कहना है रोमांच के साथी युवा देवेन्द्र तिवारी का। मध्यप्रदेश के जिले ग्वालियर में कृषक परिवार में जन्मे देवेन्द्र तिवारी देश के कई दुर्गम क्षेत्रों को साइकिलिंग से जीत चुके हैं।

मंगलवार, 8 मार्च 2011

नरसिंहगढ़ का फुन्सुक वांगडू 'हर्ष गुप्ता'

हर्ष गुप्ता
 खू बसूरत और व्यवस्थित खेती का उदाहरण है नरसिंहगढ़ के हर्ष गुप्ता का फार्म। वह खेती के लिए अत्याधुनिक, लेकिन कम लागत की तकनीक का उपयोग करता है। जैविक खाद इस्तेमाल करता है। इसे तैयार करने की व्यवस्था उसने अपने फार्म पर ही कर रखी है। किस पौधे को किस मौसम में लगाना है। पौधों के बीच कितना अंतर होना चाहिए। किस पेड़ से कम समय में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। किस पौधे को कितना और किस पद्धति से पानी देना है। इस तरह की हर छोटी-बड़ी, लेकिन महत्वपूर्ण जानकारी उसके दिमाग में है। जब वह पौधों के पास खड़ा होकर सारी जानकारी देता है तो लगता है कि उसने जरूर एग्रीकल्चर में पढ़ाई की होगी, लेकिन नहीं। हर्ष गुप्ता इंदौर के एक प्राइवेट कॉलेज से फस्र्ट क्लास टैक्सटाइल इंजीनियर है। उसने इंजीनियरिंग जरूर की थी, लेकिन रुझान बिल्कुल भी न था।
        सन् २००४ में वह पढ़ाई खत्म करके घर वापस आया। उसने फावड़ा-तसल्ल उठाए और पहुंच गया अपने खेतों पर। यह देख स्थानीय लोग उसका उपहास उड़ाने लगे। लो भैया अब इंजीनियर भी खेती करेंगे। नौकरी नहीं मिल रही इसलिए बैल हाकेंगे। वहीं इससे बेफिक्र हर्ष ने अपने खेतों को व्यवस्थित करना शुरू कर दिया। इसमें उसके पिता का भरपूर सहयोग मिला। पिता के सहयोग ने हर्ष के उत्साह को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। बेटे की लगन देख पिता का जोश भी जागा। खेतीबाड़ी से संबंधित जरूरी ज्ञान इंटरनेट, पुराने किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से जुटाया। नतीजा थोड़ी-बहुत मुश्किलों के बाद सफलता के रूप में सामने आया। उसके फार्म पर आंवला, आम, करौंदा, शहतूत, गुलाब सहित शीशम, सागौन, बांस और भी विभिन्न किस्म के पेड़-पौधे २१ बीघा जमीन पर लगे हैं। हर्ष की कड़ी मेहनत ने उन सबके सुर बदल दिए जो कभी उसका उपहास उड़ाते थे। उसके फार्म को जिले में जैव विविधता संवर्धन के लिए पुरस्कार भी मिल चुका है। इतना ही नहीं कृषि पर शोध और अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों को फार्म से सीखने के लिए संबंधित संस्थान भेजते हैं।
        हर्ष का कहना है कि मेहनत तो सभी किसान करते हैं, लेकिन कई छोटी-छोटी बातों का ध्यान न रखने से उनकी मेहनत बेकार चली जाती है। मेहनत व्यवस्थित और सही दिशा में हो तो सफलता सौ फीसदी तय है। मैं इंजीनियर की अपेक्षा किसान कहलाने में अधिक गर्व महसूस करता हूं। हर्ष कहते हैं कि खेती के जिस मॉडल को मैं समाज के सामने रखना चाहता हूं उस तक पहुंचने में कुछ वक्त लगेगा.......
    हर्ष गुप्ता और उसके फार्म के बारे में बात करने का मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना सा ही है कि कामयाबी के लिए जरूरी नहीं कि अच्छी पढ़ाई कर बड़ी कंपनी में मोटी तनख्वा पर काम करना है। लगन हो तो कामयाबी तो साला झक मारके आपके पीछे आएगी। यह कर दिखाया छोटे-से कस्बे नरसिंहगढ़ के फुन्सुक वांगडू 'हर्ष गुप्ता' ने।

रविवार, 9 मई 2010

क्या इतना सहज होता है सांसद व वरिष्ठ पत्रकार

प्रभात झा बने मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष
राज्यसभा सांसद प्रभात झा को मप्र में भारतीय जनता पार्टी का निर्विरोध प्रदेश अध्यक्ष चुन लिया गया है। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं मप्र भाजपा चुनाव पर्यवेक्षक कलराज मिश्र भोपाल में इसकी घोषणा की।
प्रभात का प्रदेश अध्यक्ष बनना

माना जा रहा है कि पत्रकार से सांसद बने प्रभात झा के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने से पार्टी कार्यकताओं में नया जोश व ऊर्जा का संचार होगा। प्रभात को संगठन और जमीनी स्तर के कार्यकर्ता पसंद करते हैं इसी का परिणाम है कि उनके अध्यक्ष बनने पर किसी ने उंगली नहीं उठाई सिवाय ताई (इंदौर से भाजपा की सांसद सुमित्रा महाजन)। चूंकि वे भी प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए लालायतित थीं। लेकिन, पार्टी संगठन की डोर में बंधे होने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। वहीं फग्गन सिंह कुलस्ते का भी मन प्रदेश अध्यक्ष बनने का था लेकिन वे संगठन के मनाने पर मन गए। खैर ये राजनीति की बाते हैं अपुन को ज्यादा तो समझ आती नहीं.......
प्रभात जी से मेरा प्रत्यक्ष का संपर्क है सो मैं लिख रहा हूं उनसे हुईं मुलाकात का जिक्र.....
कैंटीन में सीखी उनसे पत्रकारिता
बात उन दिनों की है जब मैं अपने साथियों के साथ जीवाजी यूनिवर्सिटी में थे और हम किताबों में पत्रकारिता पढ़ा करते थे। किसी पत्रकार या बड़े आदमी से हम कुछ सीखने की ललक से मिला करते थे। जब भी कोई बड़ा आदमी और नामचीन पत्रकार आता तो बड़ा सम्भलकर बात करना पड़ती थी। साथ में उनके सम्मान का भी पूरा ख्याल रखना पड़ता था। 
....... भले ही प्रभात जी पत्रकार से राज्यसभा सांसद हो गए हों लेकिन, पत्रकारिता आज भी उनके लिए सर्वोपरि है। गर्मियों के दिन थे शायद मई-जून होगी। प्रभात जी ग्वालियर प्रवास पर आए हुए थे। हमने और हमारे शिक्षक ने सोचा क्यों न प्रभात जी को विश्वविद्यालय आमंत्रित किया जाए और कुछ मार्गदर्शन लिया जाए। हमने उन्हें फोन किया और उनसे आग्रह किया,  वे मान गए और दोपहर का दो बजे का समय दिया। हम हमेशा की तरह अपने मेहमान के स्वागत की जुगत भिड़ाने लगे। तब हमें ख्याल आया अरे यार आज तो संडे है। राजनीति विभाग के एचओडी से कॉनफ्रेंस हॉल की अनुमति के लिए गए। चूंकि वे मन से कांग्रेसी ठहरे सो उन्होंने संडे का बहाना लेते हुए मना कर दिया। हांलाकि इससे पूर्व हम वहां संडे के दिन ही एक आयोजन कर चुके थे। खैर अब हमारा दिमाग खराब हो रहा था। दोपहर के दो बज गए श्री प्रभात जी विश्वविद्यालय परिसर में आए तो हमने उन्हें अपनी परेशानी से अवगत कराया। उन्होंने सहज लेते हुए कहा-बात करने के लिए किसी खास जगह की क्या जरूरत है कहीं भी बैठ लेते हैं। भगवान का शुक्र था कि कैंटीन खुली थी। उन्होंने कैंटीन खुली देख कर कहा चलो कैंटीन की टीनशेड में ही बैठ लेते हैं। हम सभी असहज थे लेकिन वो बिल्कुल सहज दिख रहे थे। करीब उन्होंने एक घंटे का समय बिताया और अपने अनुभव बांटे साथ ही पत्रकारिता करियर के लिए कुछ टिप्स भी दिए। एक राज्यसभा सांसद और एक वरिष्ठ पत्रकार को इतना सहज कभी नहीं देखा।
कर्मयोगी
सहज उपलब्ध 
पत्रकारिता जीवन की शुरुआत होने के बाद की मुलाकात भी जेहन में है। प्रभात जी ने ग्वालियर की तमाम छोटी-मोटी गलियां और हर ओर जाने वाली सड़कें अपने कदमों से नापी हैं अपने पत्रकारिता जीवन में। मेरे मामाजी (नरोत्तम यादव)  उनके अच्छे मित्र थे। एक दफा मैंने बातों बातों में मामा जी से कहा-मैं पत्रकार बनना चाहता हूं। तब उन्होंने प्रभात जी के बारे में मुझे बताया कि पत्रकारिता आसान नहीं, प्रभात जी कांधे एक थैला टांगे सुबह  घर से निकलते हैं और पैदल-पैदल सब दूर हो आते हैं। (तब मैं प्रभात जी को न जानता था).... उनकी बातों से मुझे जान पड़ा पत्रकारिता तो अपने बस की नहीं। लेकिन किस्मत को तो इसी झमेले में फंसाना था, फंसा ही लिया। हां तो बात कर रहा था..... मैं जबलपुर नईदुनिया से इंटर्नशिप करके शहर लौटा था। एक भाईसाहब शाम को मुझसे मिलने आए। अचानक से उन्होंने कहा चलो प्रभात जी से मिल आएं। मैं फुरसत में था और मेरा उनसे मिलने का मन भी रहता है तो तुरंत चल दिया। पडाव स्थित उनके कार्यालय पहुंचे। काफी लोग उनसे मिलने के लिए बैठे थे। वे सो रहे थे। उठने पर जैसे ही उन्हें भाई साहब (राजेश पुरोहित) और मेरे आने के बारे में पता चला उन्होंने अंदर ही हमें बुला लिया। काफी देर तक बात होती रही। मेरे पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की बधाई देते हुए  कार्यकर्ता द्वारा लाई गई मिठाई से मेरा मुंह मीठा कराया। वे पैरों में दवा लगा रहे थे तब मैंने उनके पैरों की ओर  देखा।  तो उनकी तपस्या साफ-साफ दिखी। उन्होंने जो शिद्दत से पत्रकारिता की थी उसके निशा आज भी उनके पैरों में थे। ........... कोई अपने काम के प्रति कितना समर्पित होता है उनको देखकर पता चला।