बुधवार, 1 अप्रैल 2026

संघ की वैचारिक यात्रा का ऐतिहासिक दस्तावेज ‘आरएसएस @100’

जनसंचार के सरोकारों को समर्पित पत्रिका 'मीडिया विमर्श' का संघ शताब्दी वर्ष विशेषांक 

- पुरु शर्मा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की यात्रा पूरी होने पर देशभर में संघ की विचारधारा, उसकी उपलब्धियों एवं योगदान को लेकर चर्चा है। ऐसे में ‘मीडिया विमर्श’ का विशेषांक ‘आरएसएस@100’ का आना महत्वपूर्ण है। मीडिया विमर्श का यह विशेषांक संघ से संबंधित सामयिक एवं चर्चित विषयों पर प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक एवं लेखक डॉ. लोकेन्द्र सिंह इसके अतिथि संपादक हैं। संघ विषयों पर वे निरंतर लिखते हैं। संघ पर केंद्रित उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें- संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति और राष्ट्रध्वज एवं आरएसएस भी उल्लेखनीय हैं। डॉ. सिंह के कुशल संपादन में तैयार मीडिया विमर्श का विशेषांक संघ की एक सदी की यात्रा को केवल एक संगठन के इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण की गाथा के रूप में प्रस्तुत करता है। यह विशेषांक उन सबके लिए उपयोगी है, जो संघ को जानना-समझना चाहते हैं। कहना होगा कि यह एक संदर्भ ग्रंथ की भाँति है। 

‘मीडिया विमर्श’ के सलाहकार संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने संपादकीय लेख ‘दिल से समझिए आरएसएस को’ में बहुत ही स्पष्टता के साथ उन भ्रांतियों पर प्रहार किया है जो अक्सर बौद्धिक जगत में संघ के विरुद्ध प्रचारित की जाती हैं। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया है कि संघ अपनी कार्यपद्धति के कारण प्रचार से दूर रहता है, जिसके कारण उसकी वास्तविक छवि और सेवा कार्यों का पूरा सच अक्सर सामने नहीं आ पाता। इस विशेषांक की सबसे बड़ी विशेषता इसका व्यापक फलक है, जिसमें देश के शीर्ष नेतृत्व से लेकर संघ के वरिष्ठ प्रचारकों के विचारों को सम्मिलित किया गया है। डॉ. लोकेन्द्र सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से लेकर संघ के वरिष्ठ प्रचारकों श्रीधर पराड़कर, निखिलेश माहेश्वरी, कैलाश चंद्र, सदानंद सप्रे और हितानंद शर्मा के विचारों को शामिल करके संघ के दृष्टिकोण को यथार्थ रूप में पाठकों के सामने लाने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा संघ को नजदीक से देखने और उससे जुड़े अन्य लेखकों के आलेख भी विशेषांक में हैं। संघ के वर्तमान सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों के वक्तव्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि संघ का उद्देश्य समाज में कोई अलग गुट बनाना नहीं, बल्कि पूरे समाज को ही संगठित और सामर्थ्यवान बनाना है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने आलेख में संघ को ‘अनादि राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार’ बताते हुए व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की इसकी अनूठी कार्यपद्धति की सराहना की है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने डॉ. हेडगेवार और बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों में निहित समानता को उजागर करते हुए संघ की सर्व-समावेशी समाज-दृष्टि का प्रमाण प्रस्तुत किया है। संपादक डॉ. लोकेन्द्र सिंह ने अपने लेख में संघ के सौ वर्षों को पांच चरणों में विभाजित कर यह समझाया गया है कि कैसे यह संगठन उपहास, उपेक्षा और विरोध के कठिन अवरोधों को पार करते हुए आज समाज की सज्जनशक्ति के साथ ‘एकरस’ होने की स्थिति में पहुँचा है। 

विशेषांक के विभिन्न लेखों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि संघ के लिए ‘हिन्दू’ शब्द कोई उपासना पद्धति नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान है जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के मर्म को आत्मसात करती है। शिक्षा, सेवा और समाज सुधार के क्षेत्र में संघ के योगदान पर भी इस अंक में विस्तार से चर्चा की गई है। डॉ. सदानन्द दामोदर सप्रे ने अपने लेख में बहुत ही तार्किक ढंग से उन भ्रांतियों का निवारण किया है जिनमें संघ को किसी विशेष जाति या वर्ग का संगठन माना जाता है। निखिलेश माहेश्वरी के लेख में विद्या भारती के माध्यम से मैकाले की शिक्षा पद्धति के विकल्प के रूप में भारतीय मूल्य-आधारित शिक्षा के सफल प्रयोग को दर्शाया गया है। ‘पंच परिवर्तन’ की संघ की संकल्पना के एक-एक संकल्प पर विस्तार से चर्चा यह विशेषांक करता है। विशेषांक के आखिर में ‘अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों’ को शामिल किया गया है, जो संघ को लेकर एक स्पष्ट सोच बनाते हैं। इसके साथ अन्य पठनीय पुस्तकों की सूची देकर उन पाठकों की सहायता की है, जो संघ के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं। कुल मिलाकर कहना होगा कि डॉ. लोकेन्द्र सिंह जैसे विद्वानों ने संघ, सत्ता और समाज के अंतर्संबंधों तथा शताब्दी वर्ष की चुनौतियों का सारगर्भित विश्लेषण प्रस्तुत कर इस अंक को एक पूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज बना दिया है। 

(समीक्षक युवा साहित्यकार हैं।)

विशेषांक : आरएसएस@100

संपादक : डॉ. लोकेन्द्र सिंह

पृष्ठ : 264

प्रकाशक : मीडिया विमर्श

रविवार, 29 मार्च 2026

“मेरा यह जीवन देश सेवा के लिए समर्पित”

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार अनुशीलन समिति के प्रमुख क्रांतिकारी थे, उन्होंने आजन्म भारतमाता की सेवा करने की प्रतिज्ञा की

यह चित्र Google Gemini AI से निर्मित है।

ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए कोलकाता से बड़े पैमाने पर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन हो रहा था। एक प्रकार से कोलकाता क्रांतिकारियों के लिए ‘काशी’ बन गया था। केशव बलिराम हेडगेवार के मन में भी एक ज्वार था- क्रांतिकारी बनकर भारत माता को ब्रितानी हुकूमत की बेढ़ियों से स्वतंत्र करना है। डॉक्टर साहब की जीवनी लिखने वाले सीपी भिशिकर लिखते हैं कि वंदेमातरम आंदोलन के समय से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में उनका मन रमने लगा था। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने ठान लिया था कि कोलकाता जाकर मेडिकल की पढ़ाई करेंगे और वहीं क्रांतिकारी गतिविधियों में जुड़ जाएंगे। नागपुर के राष्ट्रभक्त महापुरुष भी यही चाहते थे कि केशव कोलकाता जाएं, क्रांतिकारियों से संपर्क जोड़ें और लौटकर पश्चिम भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित करें। क्रांतिकारी रामलाल वाजपेयी ने भी अपने जीवन चरित्र में इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “उनको कलकत्ता भेजने का असली मकसद क्रांतिकारी संगठन संबंधी जानकारी प्राप्त करना एवं मध्यप्रांत और बंगाल के बीच सेतु का काम करना था”। केशव हेडगेवार जब कलकत्ता पहुँचे तब क्रांतिकारियों पर अंग्रेजी दमन का दौर चल रहा था। सरकार राष्ट्रद्रोही सभा अधिनियम-1907, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम-1908 और इंडियन प्रेस एक्ट-1910 के द्वारा क्रांतिकारी पत्रों, संगठनों एवं व्यक्तियों को दंडित करने, प्रतिबंधित करने एवं उन पर मुकदमा चलाने का कार्य कर रही थी। परंतु, यह दमनचक्र प्रखर क्रांतिकारी केशव बलिराम हेडगेवार के इरादों को कहाँ डिगा सकता था।

रविवार, 22 मार्च 2026

यूनियन जैक को उखाड़ फेंकने के लिए खोद दी सुरंग

संघ शताब्दी वर्ष : जन्मजात देशभक्त थे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

यह चित्र AI प्लेटफॉर्म Google Gemini से निर्मित है।

कहते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले महापुरुष डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का बचपन भी कुछ ऐसा ही था, जो स्पष्ट संकेत देता था कि यह बालक बड़ा होकर भारत के नवनिर्माण की नींव रखेगा। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को ‘जन्मजात देशभक्त’ ऐसे ही नहीं कहा जाता है। उनके बचपन के अनेक प्रसंग मिलते हैं, जो उनकी देशभक्ति की केसरिया छाप को दर्शाते हैं। 13 वर्ष की उम्र में केशव ने प्लेग की महामारी में अपने माता-पिता को खो दिया। इस प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी केशव ने स्वयं को संभाले रखा। उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और क्रांति के मार्ग पर कदम बढ़ाते गए। स्कूल के दिनों में ही उनकी प्रखर देशभक्ति की मुखर अभिव्यक्ति होने लग गई थी। जीवन के संघर्ष में तपकर निखरे केशव बचपन में ही बड़ों की भाँति परिपक्व हो गए थे। 1901 में जब किंग एडवर्ड-सप्तम इंग्लैंड की राजगद्दी पर बैठे, तब नागपुर में एम्प्रेस मिल के मालिकों ने खुशी में आतिशबाजी का कार्यक्रम रखा। लगभग पूरा शहर इस आतिशबाजी को देखने के लिए एकत्रित हुआ। बच्चों को तो आतिशबाजी वैसे ही बहुत आकर्षित करती है। बड़ी संख्या में बच्चे भी आतिशबाजी का लुत्फ उठाने के लिए आए थे। लेकिन, जब केशव से आतिशबाजी देखने चलने का आग्रह किया गया तो उन्होंने अपने मित्रों से कहा- “यह शर्म की बात है कि हम एक विदेशी शासक की ताजपोशी पर जश्न मनाएं; मैं यह आतिशबाजी देखने नहीं जाऊंगा”।

बुधवार, 18 मार्च 2026

आरएसएस के साथ आई समाज की सज्जनशक्ति

सर्वव्यापी-सर्वस्पर्शी कार्य : संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों में समाज का सहयोग और सहभागिता ने स्वयंसेवकों का बढ़ाया उत्साह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष पर कोई बड़ा उत्सव आयोजित न करके छोटे-छोटे स्थानों (मंडल/बस्ती) पर कार्यक्रमों का आयोजन किया, ताकि संघ कार्य का व्याप बढ़े। शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने मुख्य रूप से दो प्रकार के कार्यक्रमों की व्यापक योजना बनाई है। इनमें पहला उद्देश्य संगठन का विस्तार करना है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज की सज्जन शक्ति को सद्भाव और समरसता के सूत्र में पिरोकर राष्ट्र निर्माण के लिए संगठित करना है। इस ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित संघ के कार्यक्रमों में समाज का जो अभूतपूर्व और भरपूर साथ मिल रहा है, वह संगठन की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता का प्रमाण है। कहना होगा कि कई कार्यक्रमों का नेतृत्व तो समाज ने ही किया, संघ की शक्ति तो उनकी सहयोगी बनी। विशेष रूप से हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन समाज की सज्जनशक्ति ने आगे रहकर किया।

सोमवार, 16 मार्च 2026

अनूठा जन्मदिन : पुस्तकों से तौले गए 8 वर्षीय मारुति

भोपाल में 8 वर्षीय बालक मारुति का जन्मदिन अनूठे ढंग से मनाया गया। पूरे उत्सव में भारतीय संस्कृति की गहरी झलक दिखाई दी। मारुति के माता-पिता और दादा-दादी ने भारतीय पद्धति के अनुसार जन्मदिन की योजना बनाई। इस उत्सव को सार्थक स्वरूप देते हुए 'पुस्तक-तुला' का आयोजन किया गया, जिसमें मारुति को पुस्तकों से तौला गया। ​तराजू के एक पलड़े में मारुति को बैठाया गया और दूसरे पलड़े में पुस्तकें रखी गईं। जो भी अतिथि आए थे, वे अपने साथ लाई गई पुस्तकें या वहां उपलब्ध पुस्तकों को दूसरे पलड़े में तब तक रखते गए, जब तक मारुति का पलड़ा ऊपर नहीं उठ गया। इस अवसर पर कई सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। परिवार 'पुनरुत्थान विद्यापीठ' से जुड़ा हुआ है और इस प्रकार जन्मदिन मनाने की प्रेरणा उन्हें वहीं से प्राप्त हुई। मारुति की शिक्षा भी पुनरुत्थान विद्यापीठ के गुरुकुल में चल रही है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

'जादूगरनी' - जीवन, प्रेम और रिश्तों की खूबसूरत अभिव्यक्ति

वीडियो देखें : क्या एक कविता जीवन बदल सकती है?


“जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीन का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”। युवा कवि सुदर्शन व्यास ने अपने नये काव्य संग्रह का नामकरण इसी भाव के साथ किया है- जादूगरनी। सच है, कविताओं में वह जादू होता है कि वे बड़े परिवर्तन की संवाहक बनती हैं। दुनिया के कितने ही बड़े आंदोलनों का आधार कविता ही बनी है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों और स्वतंत्रतता सेनानियों का बीज मंत्र ‘वंदेमातरम’ भी काव्य है। ऐसा काव्य जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में नये सिरे से प्राण फूंक दिए। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन काव्य के रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहता आया है। कविता के महत्व एवं हमारे जीवन में उसकी उपस्थिति पर कवि ने उचित ही लिखा है कि “मनुष्यता के सबसे बड़े शोक में भी कविता गायी जाती है और सबसे बड़ी खुशी में भी कविता होती है। कविता हमारे जीवन का आधार है और जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीने का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”।

रविवार, 8 मार्च 2026

स्वदेशी का आग्रही है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

संघ शताब्दी वर्षआरएसएस ने धरातल पर उतारकर दिखाया स्वदेशी विचार


भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता एवं विकास का सपना देखने वाले महापुरुषों ने ‘स्वदेशी’ का महत्व समझा और भारत को आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाने के लिए समाज से स्वदेशी आचरण का आग्रह किया। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की शिक्षा देनी होगी। स्वातंत्र्यवीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तक, सभी ने स्वदेशी को अपनाने का आग्रह किया। भारत के निर्माण का सपना देखने वाले विचारक यह भली-भांति जानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति के मूल में स्वदेशी का आचरण ही है।

भारत को परमवैभव पर ले जाने की महान आकांक्षा के साथ 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, तब से ही संघ ने स्वदेशी को लेकर समाज का प्रबोधन प्रारंभ कर दिया था। संघ के लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मूल मंत्र है। संघ ने अपनी स्थापना के साथ ही भारत की आत्मनिर्भरता और भारतीय मूल्यों पर आधारित अर्थतंत्र की वकालत की है।

मंगलवार, 3 मार्च 2026

कहाँ है आपकी निष्ठा

खामेनेई की मौत : प्रदर्शन करनेवाले मुसलमानों की निष्ठा कहाँ है?


अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य पूर्व में जो भू-राजनीतिक भूचाल आया है, उसकी अनुगूंज भारत के कई हिस्सों में सुनाई दे रही है। लखनऊ से लेकर श्रीनगर तक कई क्षेत्रों में हजारों मुस्लिम प्रदर्शनकारियों का सड़कों पर उतरना, अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारेबाजी करना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह प्रदर्शन सवाल उठाता है कि भारत के मुसलमानों की निष्ठा आखिर कहाँ है? ईरान के सुप्रीम खामनेई की मौत के बाद भारत में प्रदर्शनों का क्या औचित्य है? अपने आप को इस्लामिक सत्ता/व्यवस्था से जोड़ने की यह बीमारी आज की नहीं है। खिलाफत आंदोलन को याद कीजिए और उसके उद्देश्य का विश्लेषण कीजिए। आखिर क्यों भारत के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन चलाया था? क्या उसका कोई संबंध भारत की स्वतंत्रता से था? 

आज से आठ दशक पूर्व संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस कड़वे सच की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया था, वह आज पूरी तरह प्रासंगिक नजर आता है। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि मुसलमानों की निष्ठा उस देश के प्रति नहीं होती जहाँ वे रहते हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक विश्वास पर निर्भर करती है जिसका वे हिस्सा हैं। लखनऊ से लेकर जम्मू-कश्मीर की सड़कों पर उतरकर मातम मनाने वाली भीड़ और खामेनेई को शहीद का दर्जा देने की कवायद, इसी मानसिकता का साक्षात प्रमाण है।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

छत्रपति शिवाजी महाराज से सीखें जल प्रबंधन

सह्याद्रि के उत्तुंग शिखरों पर आसमान से बातें करनेवाले गिरिदुर्ग हों या फिर समुद्री लहरों के बीच मुस्कुराते जलदुर्ग, उनकी व्यवस्थाएं देखकर ध्यान आता है कि हिन्दवी स्वराज्य के योजनाकार, वास्तुकार, अभियंता और निर्माण में योगदान करनेवाले सभी शिल्पकार एवं श्रमिक अपने कार्य-कौशल में सिद्धस्थ थे। सुरक्षा पक्ष हो या फिर कला पक्ष, सबका बारीकी से विचार किया गया। इसके साथ ही बुनियादी आवश्यकताओं की चिंता भी की गई। भारत में जहाँ भी आपने दुर्ग देखे होंगे, उनमें जलस्रोत की व्यवस्था देखी ही होगी। परंतु हिन्दवी स्वराज्य के किलों में जलस्रोतों का प्रबंधन रचनात्मक ढंग से किया गया है। हजारों फीट की ऊंचाई पर बारह महीने पानी की व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण था। कुशल योजनाकारों ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से दुर्गों पर जलाशयों का निर्माण किया है। किसी भी दुर्ग पर एक-दो नहीं अपितु अलग-अलग हिस्सों में कई जलाशयों का निर्माण किया जाता था। हम हिन्दवी स्वराज्य की राजधानी दुर्गदुर्गेश्वर श्रीरायगढ़ की ही बात करें, तो वहाँ छोटे-बड़े 84 जलाशयों का निर्माण किया गया है। चूँकि रायगढ़ पर अधिक संख्या में लोग रहते थे इसलिए यहाँ बड़ी संख्या में जल निकायों का निर्माण किया गया। श्रीरायगढ़ के प्रसिद्ध जल निकाय हैं- गंगा सागर तालाब, हत्ती तालाब, कुशावर्त तालाब, हनुमान टांकी, बारह टांकी इत्यादि।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

मातृभाषाओं के संरक्षण का पक्षधर है संघ

संघ शताब्दी वर्ष : सभी भारतीय भाषाएं, राष्ट्रीय भाषाएं हैं। किसी की अनदेखी न हो, सबको समान स्तर प्राप्त हो


वैश्विक मानचित्र पर भाषाई दृष्टि से भारत की स्थिति विशिष्ट है। हमारे यहाँ उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक भाषाओं के विविध रंग फैले हुए दिखायी देते हैं। भारत की ये भाषाएं क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएं नहीं है, अपितु सभी भाषाएं राष्ट्रीय हैं। उनका एकसमान महत्व है। राजनीतिक स्वार्थ हावी होने से पहले भारत में कभी भाषाई विभाजन दिखायी नहीं दिया। दरअसल, जिस प्रकार भारत की संस्कृति के विविध पक्ष एक–दूसरे के साथ एकात्म हैं, उसी भाँति हमारी भाषाओं में भी आपस में गहरा नाता है। विविधता में एकात्मता का उत्सव मनाने वाले देश भारत में भाषाओं का सुंदर पुष्पगुच्छ है, जिसकी सुगंध से भारत की संस्कृति महकती रही है। भारत को कमजोर करने वाली ताकतें अकसर हमारी भाषाओं को एक–दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास करती हैं। वहीं, भारत के प्रति श्रद्धा रखने वाले संगठन भारत की सभी मातृभाषाओं के बीच स्वाभाविक एकात्म को गहरा करने में विश्वास रखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा ही संगठन है, जिसने सदैव भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनके एकात्म पर जोर दिया है। संघ ने सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा माना है, जो भारत की समृद्ध संस्कृति की संवाहिकाएं हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर देश की सभी भाषाओं को चिरजीवी मानते थे। आम समाज से लेकर राजकाज के व्यवहार में मातृभाषा का उपयोग होना चाहिए, इसके वे प्रबल पक्षधर थे। इस संदर्भ में वे छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण देते थे। विशेषरूप से छत्रपति शिवाजी महाराज के उदाहरण से उन लोगों को सीखना चाहिए जो आज कहते हैं कि हमारे दैनिक व्यवहार में अंग्रेजी और अन्य बाह्य भाषाओं का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है कि अब उन्हें हटाना संभव नहीं है। श्रीगुरुजी कहते थे– “राज्य स्थापना के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने सामान्य व्यवहार में घुसे फारसी, अरबी शब्दों को निकालने का काम किया। उस समय की स्थिति का विचार करने पर दिखाई देगा कि फारसी, अरबी के बिना काम ही नहीं चलता था। छत्रपति छत्रपति शिवाजी महाराज ने मिलावट की प्रवृत्ति को दूर करने और अपनी भाषा को शुद्ध रूप में लाने का प्रयत्न किया। उनके काल का ‘राज्य व्यवहार-कोश’ प्रसिद्ध है”। हमारे सामने छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण था लेकिन इसके बाद भी स्वाधीनता के बाद हमारे सत्ताधीशों ने अंग्रेजी के सामने घुटने टेक दिए। दुनिया में कई देशों के उदाहरण हैं, जिन्होंने सत्ता के सूत्र संभालते ही अपनी भाषा में राजकाज किया। मातृभाषा के प्रति गौरव का भाव जगाते समय श्रीगुरुजी भी ऐसे देशों का उदाहरण देते थे। उनका स्पष्ट मत था कि जो देश अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए, उन सभी देशों ने अपने देश की भाषाओँ को ग्रहण किया। ब्रह्मदेश ने ब्रह्मी और श्रीलंका ने सिंहली को स्वीकार किया। सत्ता हाथों में आते ही उन्होंने भाषा बदल दी। दक्षिण अफ्रीका में विभिन्न 14-16 भाषाएँ हैं तथा प्रत्येक समुदाय को अपनी भाषा पर गर्व है। फिर भी सर्वसम्मति से उन्होंने ‘स्वाहिली’ भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में ग्रहण किया। उनका सब-कुछ ठीक चल रहा है। इस संबंध में इजराइल और तुर्की के उदाहरण भी प्रेरक हैं।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

भारत के हो, तो गाओ गर्व से ‘वंदेमातरम्’

राष्ट्रगीत को मिला उसका सम्मान, गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम्’ के सम्मान के संबंध में जारी किए दिशा-निर्देश


मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते कभी कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन के मंत्र और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम’ के सम्मान के साथ समझौता कर लिया था। राष्ट्रगान को जो सम्मान दिया गया, राष्ट्रगीत को उससे वंचित कर दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 51ए में राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करने को मौलिक कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया है लेकिन इसमें राष्ट्रगीत के संबंध में कोई निर्देश नहीं मिलता है। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान के गायन को रोकता है या गा रहे लोगों के बीच अशांति पैदा करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इस अधिनियम में भी राष्ट्रगीत का अपमान करने पर सजा का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। राष्ट्रगीत के सम्मान के प्रति यह उदासीनता क्यों रखी गई? इसका उत्तर सब जानते हैं। इसलिए सभी राष्ट्रभक्त देशवासियों के मन में कसक थी कि आखिर वह दिन कब आएगा जब हम अपने राष्ट्रगीत को वह सम्मान देंगे, जिसका वह प्रारंभ से अधिकारी है। याद रखें कि जिनके मन में भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान नहीं था, वे लोग तो पाकिस्तान चले गए थे। आज जिन्हें भारत में रहकर वंदेमातरम गाने और उसके सम्मान में खड़े होने में दिक्कत है, उन्हें अपने बारे में विचार करना चाहिए। भारत में रहना है तो फिर वंदेमातरम तो गाना पड़ेगा। मोदी सरकार को साधुवाद कि उसने राष्ट्रीय गीत को उसका खोया हुआ स्वाभिमान एवं प्रतिष्ठा लौटाई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम’ के गायन को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करके अच्छा कदम उठाया है। इस आदेश के तहत अब जब भी राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान, दोनों एक साथ बजाए जाएंगे, तो पहले ‘वंदे मातरम्’ (राष्ट्रगीत) के सभी छह छंद गाए जाएंगे और उसके बाद ‘जन-गण-मन’ (राष्ट्रगान) होगा। यह बदलाव केवल प्रक्रियात्मक नहीं है, बल्कि इसके ऐतिहासिक और संवैधानिक निहितार्थ भी हैं। हमें सदैव याद रखना चाहिए कि वंदेमातरम का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय स्थान रहा है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित इस गीत ने क्रांतिकारियों में जो ऊर्जा भरी, वह इतिहास में दर्ज है।

देखें : आरएसएस के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव हेडगेवार ने चलाया वंदेमातरम आंदोलन

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

पर्यटक की डायरी से अधिक इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज है 'हिन्दवी स्वराज्य दर्शन'

- सुमंत विद्वांस

दिसंबर में जब मैं बालाघाट में था, तब भोपाल से मेरे मित्र लोकेन्द्र जी ने बहुत स्नेहपूर्वक अपनी तीन पुस्तकें मेरे लिए उपहार में भेजी थीं। साथ ही उन्होंने यह सुझाव भी भेजा कि इन तीनों में सबसे पहले ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’ को पढ़ूँ।

आज मैंने यह पुस्तक पढ़कर पूरी की।

इसे यात्रा वर्णन कहा गया है और यह बात बिल्कुल ठीक भी है। लेकिन यह पुस्तक किसी पर्यटक की डायरी नहीं है। यह इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज भी है और अपने नाम के अनुरूप ही छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य का ‘दर्शन’ करवाने वाली पुस्तक भी है। 

शिवाजी महाराज के जीवन और कार्य के बारे में अनेक भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। उनमें से अनेक पुस्तकें बहुत शोधपूर्ण एवं गहन हैं। ऐसे में अगर आप सोचें कि इस पुस्तक को क्यों पढ़ा जाए, तो मैं कहूँगा कि यदि आपको सरल शब्दों में शिवाजी महाराज के कुछ महत्वपूर्ण किलों की प्राथमिक जानकारी पानी हो, तो यह पुस्तक आपके लिए बहुत काम की है। इसमें आपको सिंहगढ़ और रायगढ़ जैसे प्रसिद्ध किलों की जानकारी तो मिलेगी ही, पर साथ ही खान्देरी और कोलाबा जैसे जलदुर्गों व पुरंदर व मल्हारगढ़ जैसे किलों के बारे में भी पता चलेगा। इसके अलावा इसमें पुणे के शनिवारवाड़ा, लाल महल और पाचाड में जीजाबाई के समाधि-स्थल का भी परिचय मिल जाएगा।

मैं लगभग 15 वर्षों तक नासिक और पुणे में रहा हूँ, और उनमें से भी सात वर्ष पुणे शहर में ही रहा हूँ, इसलिए इनमें से कई स्थानों पर मैं जा चुका हूँ। इस पुस्तक को पढ़ते समय अनायास ही मेरी भी कई पुरानी यादें ताजा हो गईं और बहुत-सी नई जानकारी भी मिल गई।

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

समाज परिवर्तन का केंद्र बनी शाखाएं

संघ शताब्दी वर्ष : जहाँ संघ की शाखा लगती है, वहाँ समाज में सकारात्मक परिवर्तन दिखायी देते हैं


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा केवल खेलने-कूदने और योगाभ्यास का स्थान नहीं है। किसी शाखा में भले ही 100 स्वयंसेवक नित्य आते होंगे, लेकिन अच्छी शाखा उसे ही माना जाता है, जिसके कारण से शाखा क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव आए हों। हिन्दू समाज में जागृति आई हो। समाज अपनी चुनौतियों का समाधान करने में स्वयं सक्षम हो गया हो। शाखा की सफलता इसी में है कि वह समाज परिवर्तन का केंद्र बने। इसलिए संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं कि जिन क्षेत्रों में संघ की अच्छी शाखा चलती है, वहाँ की अनेक समस्याओं का समाधान स्वयं ही हो जाता है। शाखा आने वाले स्वयंसेवक अपने क्षेत्र की समस्याओं को चिह्नित करते हैं और समाज की सज्जनशक्ति को साथ लेकर उसका समाधान निकालने का प्रयास करते हैं। संघ शाखा की सफलता की अनेक कहानियां हैं। यहाँ हम मध्यभारत की कुछ शाखाओं का उल्लेख कर रहे हैं, जिन्होंने समाज परिवर्तन के अनुकरणीय उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत किए हैं।

भोपाल में शाखाओं के माध्यम से पर्यावरण, शिक्षा एवं सेवा के कई प्रकल्प चलाए जाते हैं। ऐसा ही एक प्रकल्प है- एम्स में संचालित ‘सार्थक सेवा केंद्र’। विद्युत भाग की ‘वीर मंगल पांडेय शाखा’ के स्वयंसेवकों ने अनुभव किया कि एम्स में दूर-दूर से मरीजों का आना होता है लेकिन यहाँ परिजनों के लिए रात्रि विश्राम की व्यवस्था नहीं है। इस कारण मरीजों के साथ उनके परिजनों को भी असुविधा होती थी। उन्हें मजबूरी में पार्क के किनारे बैठकर रात गुजारनी पड़ती थी। यह सब देखकर शाखा टोली की बैठक में निर्णय लिया गया कि एम्स में एक सहायता केंद्र प्रारंभ किया जाए। कुछ स्वयंसेवक चिन्हित किए गए और 13 मई 2022 से यहाँ ‘सार्थक सेवा केंद्र’ शुरू कर दिया गया। 10 से 12 स्वयंसेवकों ने दो पालियों में यानी सुबह 8 बजे से 11 बजे तक और उसके बाद 11 से 2 बजे तक समय देने कि योजना बनाई। आज यह प्रकल्प रैन बसेरा, व्हीलचेयर एवं स्ट्रेचर, रक्तदान और एम्बुलेंस की सुविधाएं उपलब्ध कराता है। वहीं, बुधनी के सिविल अस्पताल में भेरुंदा नगर की ‘बजरंग शाखा’ गरम पानी एवं रोगी सहायता केंद्र का संचालन करती है। अस्पताल में आए दिन मरीजों को गर्म पानी, दूध एवं अन्य चीजों के लिए परेशान होना पड़ता था। इसी प्रकार का प्रकल्प ग्वालियर के कमलाराजा अस्पताल में भी चलाया जाता है। यहीं, जयारोग्य चिकित्सालय में सर्दी के समय मरीज के परिजनों को ठंड से बचाने के लिए ‘कंबल केंद्र’ का संचालन किया जाता है।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

स्वातंत्र्यवीर सावरकर हैं 'भारत रत्न'

इतिहास के पृष्ठों पर कुछ ऐसे व्यक्तित्वों की अमर कहानियां दर्ज हैं, जिनका कद किसी पुरस्कार या सम्मान से कहीं अधिक बड़ा होता है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर ऐसा ही एक नाम है, जिन्होंने अपना सर्वस्व भारत माता की सेवा में समर्पित कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बीते दिन मुंबई में जो बात कही, वह न केवल वीर सावरकर के प्रति श्रद्धा रखनेवाले बंधुओं की भावनाओं का प्रतिबिंब है, बल्कि राष्ट्र के उस उत्तरदायित्व की ओर भी संकेत है जिसे पूरा किया जाना बाकी है। उनका यह कथन कि "वीर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है, तो यह सम्मान खुद इस पुरस्कार की गरिमा को बढ़ाएगा," भारत के नायकों के प्रति अपनी कृतज्ञता का स्मरण कराता है। वीर सावरकर का गौरवपूर्ण स्मरण करने में किंचित भी संकोच नहीं होना चाहिए। वीर सावरकर और उनके परिवार ने भारत की स्वतंत्रता और समाज सेवा के लिए जिस प्रकार का बलिदान दिया, उसकी किसी के साथ तुलना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि कुछ कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के दुष्प्रचार के बावजूद राष्ट्रभक्त नागरिकों के हृदय में वीर सावरकर के प्रति अथाह श्रद्धा है। इसलिए देश को बेसब्री से प्रतीक्षा है कि वीर सावरकर को यथाशीघ्र भारत रत्न से सम्मानित किया जाए। करोड़ों लोगों की इसी आकांक्षा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वर दिया है।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

‘जलकुंभी से भरी नदी में’ संवेदनाओं और सरोकारों का बोध

देखें वीडियो ब्लॉग : युवा कवि पुरु शर्मा के काव्य संग्रह की चर्चा

हिन्दी साहित्य के विस्तृत आकाश में जब कोई युवा हस्ताक्षर अपनी पहली कृति के साथ उपस्थित होता है, तो उससे कई उम्मीदें जुड़ जाती हैं। अशोकनगर, मध्यप्रदेश के युवा कवि पुरु शर्मा का पहला काव्य संग्रह ‘जलकुंभी से भरी नदी में’ उन उम्मीदों पर न केवल खरा उतरता है, बल्कि भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करता है। यह संग्रह एक ऐसे युवा मन का दर्पण है जो अपने अध्ययन और समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता के धागों से बुना गया है। पुरु की कविताओं में कोमलता का अहसास है। अपने समय की पीढ़ी से जनसरोकारों पर सीधा संवाद है। पर्यावरण संरक्षण की चिंता उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। अपनी विरासत को लेकर गौरव की अनुभूति है। अपनी कविता के माध्यम से पुरु साहित्य के धुंरधरों से साहित्य के धर्म की बात करते हैं। कहना होगा कि पुरु शर्मा की कविताएँ केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों का बयान नहीं हैं, बल्कि वे अपने समय, समाज, संस्कृति और पर्यावरण के प्रति एक सजग नागरिक की चिंताएँ हैं। संग्रह के शीर्षक से ही पर्यावरण के प्रति कवि का गहरा सरोकार स्पष्ट होता है। एक युवा कवि का अपने देश और संस्कृति के प्रति ऐसा अनुराग देखकर सुखद आश्चर्य होता है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

शाखा में नित्य आने से होता है समग्र व्यक्तित्व विकास

संस्कार केंद्र है संघ शाखा : खेल-खेल में स्वयंसेवक सीख जाते हैं प्रबंधन के सूत्र, संगठन शास्त्र, परोपकार, सेवाभाव, पारिवारिक आत्मीयता, सामुहिकता और समन्वय जैसे गुण


संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने व्यक्ति निर्माण के लिए शाखा के रूप में अनूठी कार्यपद्धति दी है। शाखा की सामान्य-सी दिखनेवाली गतिविधियों में वह जादू है कि नित्य शाखा आने वाले स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व में व्यापक परिवर्तन आता है। स्वयंसेवक का समग्र व्यक्तित्व विकास होता है। शाखा के संस्कार से स्वयंसेवकों के मन में पारिवारिक आत्मीयता, सामाजिक उत्तरदायित्व, परोपकार, देशभक्ति, संवेदनशीलता, साहस, सेवा और प्रबंधन जैसे अनेक गुण विकसित होते हैं। संघ विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी पुस्तक ‘कार्यकर्ता’ में लिखते हैं- “संघशाखा पर प्रतिदिन एकत्रीकरण, यह अपनी कार्यपद्धति के संगठनसूत्र का बुनियादी पहलू है। उसमें से ही, आनेवाले स्वयंसेवकों के मन में एक पारिवारिक आत्मीयता का भाव विकसित होता है। इस पारिवारिकता के कारण ही एकसाथ काम करने की उमंग मन में पैदा होती है। सामूहिक कार्यक्रमों के माध्यम से ही सामूहिक मानसिकता का निर्माण होता है, इस मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त के प्रकाश में सामूहिक कार्यक्रम हम करते हैं। संघशाखा यह एक संस्कार केंद्र है”। 

सामान्यतौर पर संघ की शाखा 60 मिनट की रहती है। यह 60 मिनट स्वयंसेवक एक अनुशासित व्यवस्था में व्यतीत करते हैं। शाखा पर होने वाले सभी शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यक्रमों का पूर्व नियोजन होता है। प्रत्येक कार्यक्रम के लिए कालखंड विभाजित हैं। ऐसा नहीं होता कि स्वयंसेवकों को खेलने में आनंद आ रहा है, तो उस दिन शाखा पर केवल खेल ही होंगे। सामान्यतौर पर 40 मिनट शारीरिक, 10 मिनट बौद्धिक और शेष 10 मिनट शाखा लगाने एवं विकिर (शाखा छोड़ने) के लिए तय रहते हैं। सबसे पहले स्वयंसेवक संघस्थान पर एकत्र होते हैं। उसके पश्चात आचार पद्धति से शाखा लगाने का कार्य मुख्य शिक्षक सम्पन्न करता है। पहले स्वयंसेवक गुरु ‘भगवा ध्वज’ को प्रणाम करते हैं, उसके बाद ही शाखा में शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रमों की रचना होती है। प्रारंभ में शाखा पर उपस्थित स्वयंसेवकों की उम्र को ध्यान में रखकर व्यायाम, सूर्यनमस्कार, योग एवं आसान कराए जाते हैं। उसके बाद, लगभग 15 मिनट विभिन्न प्रकार के खेल खिलाए जाते हैं। शारीरिक कार्यक्रमों में समता, दंड संचालन, नियुद्ध इत्यादि भी शामिल रहते हैं। उसके बाद 10 मिनट बौद्धिक कार्यक्रम (गीत, सुभाषित, अमृतवचन, समाचार समीक्षा इत्यादि) सम्पन्न कराए जाते हैं। सबसे अंत में, सभी स्वयंसेवक प्रार्थना करते हैं और ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए अप्रत्यक्ष रूप से बहुत सारे गुणों को अपने साथ लेकर समाज में जाते हैं।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

भावाक्षर : संवेदनाओं और जीवन के यथार्थ की काव्यात्मक अभिव्यक्ति

यह वीडियो ब्लॉग भी देखें : युवा कवि डॉ. कपिल भार्गव के काव्य संग्रह 'भावाक्षर' की समीक्षा


साहित्य का मूल उद्देश्य मनुष्य की संवेदनाओं को शब्द देना है। जब एक संवेदनशील मन अपने परिवेश, राष्ट्र, समाज और निजी अनुभूतियों को शब्दों के धागे में पिरोता है, तो ‘भावाक्षर’ जैसा संग्रह जन्म लेता है। युवा कवि और संस्कृत के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. कपिल भार्गव का काव्य संग्रह ‘भावाक्षर’ महज कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि जीवन के विविध रंगों का एक कोलाज है। जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपने भावों को काव्य के रूप में प्रस्तुत करने का कौशल इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। कुल 77 कविताओं के इस गुलदस्ते में कवि ने सामाजिक सरोकारों से लेकर मानवीय पहलुओं, और राष्ट्रभक्ति से लेकर पर्यटन तक के विषयों को स्पर्श किया है। संस्कृत के विद्वान होने के नाते डॉ. कपिल की भाषा में सहज संयम और संस्कार दिखाई देता है। उन्होंने समाचारपत्र में प्रकाशित बुजुर्ग की तस्वीर पर कविता लिखी है तो प्रकृति पर हो रहे आघात पर अपनी पीड़ा को शब्द दिए हैं, यह उनके संवेदनशील कवि होने का प्रमाण है। ‘महानायक चार्ली चैपलिन’ और ‘विवाह की तृतीय वर्षगाँठ’ जैसी कविताएं बताती हैं कि कवि का मन छोटी-बड़ी हर घटना से प्रभावित होता है।

शनिवार, 31 जनवरी 2026

सबके लिए है संघ की शाखा

संघ शताब्दी वर्ष : जिस स्थान पर शाखा लगती है उसे संघस्थान कहते हैं, खेल का मैदान नहीं


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक कहते हैं कि संघ को समझना है तो शाखा में आइए। प्रश्न है कि शाखा कहाँ लगती है और किस शाखा में जाना चाहिए? एक बात तो सभी जानते हैं कि सामान्यतौर पर संघ की शाखा खुले मैदान/स्थान पर लगती है। वरिष्ठ प्रचारक मधुभाई कुलकर्णी लिखते हैं- “जिस स्थान पर शाखा लगती है उसे हम संघस्थान कहते हैं, खेल का मैदान नहीं। संघस्थान तैयार करना पड़ता है। संघ में शाखा यानी भारत माता की आराधना ही है। वह स्थान, जहां भारत माता की प्रार्थना होती है तथा जहां अज्ञान का अंधकार दूर करने वाले भगवा ध्वज की स्थापना होती है, वह स्थान कैसा होना चाहिए? वह स्थान होना चाहिए मंदिर के समान स्वच्छ, पानी से धोकर साफ किया, रेखांकन (रंगोली) से सजा-धजा”।  ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो पार्क या मैदान किसी समय में ऊबड़-खाबड़ थे, संघ की शाखा शुरू होने के बाद स्वयंसेवकों के परिश्रम ने उन्हें व्यवस्थित कर दिया। एक विद्यालय के संचालक संघ शिक्षा वर्ग के लिए स्थान देने को तैयार नहीं थे लेकिन बाद में बहुत आग्रह के बाद उन्होंने स्थान दे दिया। सात दिन के प्राथमिक शिक्षा वर्ग के समापन कार्यक्रम में जब स्कूल संचालक आए और उन्होंने मैदान का कायाकल्प देखा तो हैरान रह गए। बहरहाल, शाखा को संघ की आत्मा कहा जाता है। संघ कार्य का आधार यही शाखाएं हैं, जो खुले मैदान में लगती हैं। यानी संघ का बुनियादी कार्यक्रम एकदम पारदर्शी है। 

अब प्रश्न आता है कि संघ की शाखा में कौन आ सकता है? संघ की शाखा में शामिल होने के लिए किसी भी प्रकार की विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है। किसी भी जाति, संप्रदाय और आयुवर्ग का व्यक्ति संघ की शाखा में आ सकता है। संघ की शाखा सबके लिए है। संघ में किसी प्रकार का पंजीयन नहीं किया जाता है और न ही किसी प्रकार की सदस्यता शुल्क लगती है। संघ का ‘घटक’ बनने के लिए शाखा ही एकमात्र स्थान है। निकटतम स्थान पर लगने वाली शाखा में आकर ही कोई व्यक्ति संघ का स्वयंसेवक बन सकता है। संघ से जुड़ने की प्रक्रिया इतनी ही सरल है। यदि आपको यह जानकारी नहीं है कि आपके आसपास संघ की शाखा कहाँ लगती है, तब आप आरएसएस की अधिकृत वेबसाइट ‘आरएसएस डॉट ओआरजी’ पर जाकर ‘ज्वाइन आरएसएस’ का ऑनलाइन फॉर्म भर सकते हैं। संघ के स्थानीय कार्यकर्ता आपसे संपर्क कर लेंगे। 

सबकी रुचि, प्रकृति और अवस्था को ध्यान में रखते हुए संघ में अलग-अलग प्रकार की शाखाएं लगती हैं। वैसे तो हम किसी भी शाखा में जा सकते हैं। लेकिन यदि हम उचित शाखा का चुनाव करेंगे, तो अधिक आनंद आएगा। ये शाखाएं सामान्यतौर पर आयुवर्ग के आधार पर हैं। इसी आधार पर उन शाखाओं का पाठ्यक्रम है। हमारी आयु अधिक है और हम बच्चों की शाखा में चले गए, तब थोड़ा सामंजस्य बैठाने में कठिनाई आएगी ही। हाँ, उसी शाखा में अधिक आयु के लोगों की संख्या 15-20 है और बच्चों की संख्या भी 15-20 है, तब दोनों आयुवर्ग के अलग-अलग गण बनाकर शाखा के कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। संघ ने शाखाओं को इस प्रकार वर्गीकृत किया है-

बुधवार, 28 जनवरी 2026

1963 गणतंत्र दिवस परेड की अनसुनी कहानी, जब राजपथ पर गूंजे संघ के कदम

गणतंत्र दिवस की परेड और आरएसएस : 26 जनवरी, 1963 को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का प्रदर्शन किया 


आज भी हम 1962 के भारत-चीन युद्ध को भूल नहीं पाते हैं। चीन ने भारत के विश्वास का कत्ल किया था। ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के हमारे नारे को धुंए में उड़ाकर चीन की कम्युनिस्ट सत्ता ने भारत पर अप्रत्याशित युद्ध थोप दिया था। हमारी सेना ने यथासंभव प्रतिकार किया। चीन को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया। भारतीय सेना के शौर्य को देखकर चीन को अपने कदम रोकने पड़े। हालांकि, इस युद्ध में हमने बहुत कुछ खो दिया था। राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी चीन के साथ खड़ी थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण संदेश दिया। संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिक अनुशासन, प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सहयोग, घायल जवानों के प्राणों की रक्षा के लिए रक्त की आपूर्ति, युद्ध क्षेत्र में सैन्य रसद पहुँचाने में सहयोग एवं हवाई पट्टियों की सुरक्षा सहित कई महत्वपूर्ण कार्यों में आगे बढ़कर सहयोग किया। संकट के समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति को देखकर संघ के विरोधी रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का हृदय भी परिवर्तित हो गया। यही कारण रहा कि सरकार ने 26 जनवरी, 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए अन्य नागरिक संगठनों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समविचारी संगठन भारतीय मजदूर संघ को राजपथ पर आमंत्रित किया। संघ के स्वयंसेवकों ने गणवेश पहनकर जब राजपथ पर राष्ट्रीय परेड में हिस्सा लिया, तब स्वयंसेवक न केवल सबके बीच आकर्षण का केंद्र बने अपितु उन्होंने राष्ट्रीय एकजुटता के लिए अपने कर्तव्यों के निर्वहन का संदेश भी दिया।

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

आरएसएस और संविधान : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए सर्वोच्च है संविधान का सम्मान

संघ शताब्दी वर्ष : ऐतिहासिक तथ्य और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बयान बताते हैं कि स्वयंसेवकों ने न केवल संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष किया है अपितु बलिदान भी दिया है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रारंभ से ही भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। संविधान भी ऐसा ही एक प्रतीक है, जिसका सम्मान एवं सुरक्षा संघ के लिए प्राथमिक है। हालांकि, आरएसएस और संविधान के रिश्तों को लेकर अकसर राजनीतिक विमर्श में कई तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं। यह सवाल ज्यादातर उनकी ओर से उठाया जाता है, जिन्हें संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ही संविधान विरोधी कहा था। संविधान सभा में अपने आखिरी भाषण में डॉ. अंबेडकर ने कम्युनिस्टों और समाजवादियों को संविधान की निंदा करने वाला बताया था। उन्होंने कहा था कि कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के अपने सिद्धांत पर आधारित संविधान चाहती है और वे संविधान की निंदा करते हैं क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संविधान के संबंध में ऐतिहासिक तथ्यों और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बयानों का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि संघ ने सदैव ही संविधान के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारत में आरएसएस ऐसा संगठन है, जिसने संविधान की सुरक्षा एवं सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष भी किया और बलिदान भी दिया है।

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

रहमान का ‘सांप्रदायिक सुर’

भारत के लोगों ने संगीतकार एआर रहमान को वर्षों बिना किसी भेदभाव के अथाह प्रेम दिया है, जबकि सबको पता है कि रहमान कन्वर्टेड मुसलमान हैं। आज तक किसी ने भी रहमान को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है। परंतु, रहमान ने खुद ही स्वयं को लेकर विवाद खड़ा कर लिया है। एक विदेशी मीडिया संस्थान को दिए गए साक्षात्कार में उनका यह कहना कि बॉलीवुड में उन्हें काम न मिलने की वजह ‘सांप्रदायिक’ हो सकती है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। जिस कलाकार को पूरे देश ने बिना किसी धर्म या जाति के भेदभाव के, आंखों पर बिठाया हो, ऐसी विक्टिम हुड (पीड़ित भाव) की बातें करना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। एक प्रकार से कहना होगा कि रहमान के मन में ही कहीं सांप्रदायिक सोच बैठी हुई थी, जो अब जाकर सामने आई है। रहमान जैसे लोगों को इसका जवाब भी देना चाहिए कि अनेक हिन्दू संगीतकार भी बॉलीवुड से बाहर हो चुके हैं, उसका कारण क्या है? क्या उन्हें भी मुस्लिम गिरोहबंदी के कारण काम मिलना बंद हुआ है? भारतीय सिनेमा में मुस्लिम कलाकारों का जिस प्रकार का वर्चस्व है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद भी रहमान हिन्दुओं के माथे पर सांप्रदायिका का लेबल चस्पा करने की कोशिश करे रहे हैं, तो इसे एक प्रकार से बेईमानी ही कहना चाहिए।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

सनातन की ओर लौटती तरुणाई

श्रीराम मंदिर: भारतीय युवाओं की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय


भारत के युवाओं को लेकर देश में अलग-अलग ढंग से विमर्श चल रहे हैं। कुछ ताकतें चाहती हैं कि भारत का युवा अपनी ही संस्कृति एवं जीवन मूल्यों के विरुद्ध खड़ा हो जाए। धर्म-संस्कृति क्रियाकलापों से युवाओं को दूर करने के लिए यहाँ तक कहा गया कि “जो लोग मंदिर जाते हैं, वही लोग महिलाओं को छेड़ते हैं”। यह भी कि “सरस्वती की पूजा करने से कोई आईएएस नहीं बनता”। योलो और वोकिज्म की रंगीन अवधारणाएं भारत की जेन-जी के दिमाग में उतारने के प्रपंच रचे ही जा रहे हैं। परंतु, भारत विरोधी ताकतों को यह स्मरण नहीं रहता कि भारत की संस्कृति के पोषण में वह ताकत है कि उसकी संतति अधिक समय तक उससे दूर नहीं रह सकती। सब प्रकार के प्रपंचों से थक-हारकर, आत्मा के वास्तविक सुख की प्राप्ति के लिए वह अपनी संस्कृति की गोद में ही लौटता है। आज सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों में युवाओं की जिस प्रकार की सक्रिय उपस्थिति दिखायी दे रही है, उसके गहरे निहितार्थ हैं। पिछले कुछ वर्षों में धर्म के प्रति युवाओं में गहरी रुचि पैदा हुई है। उनकी आध्यात्मिक चेतना को मंदिर में उमड़ रही युवाओं की भीड़ में अनुभव किया जा सकता है। ज्ञान की खोज में आश्रमों एवं गुरुकुलों में पहुँच रहे युवाओं के माथे पर उनकी जिज्ञासाओं को पढ़ा जा सकता है। युवाओं में परिवर्तन की इस लहर का प्रमुख केंद्र श्री अयोध्या धाम में, अपने भव्य मंदिर में विराजे रामलला हैं। भारत की सांस्कृतिक राजधानी श्रीअयोध्या में प्रभु श्रीराम के दिव्य मंदिर के निर्माण, रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा, शिखर पर धर्म ध्वजा की स्थापना, ये सब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, अपितु भारतीय जनमानस की चेतना में युगांतरकारी घटनाएं हैं। कहना होगा कि 22 जनवरी, 2024 के बाद भारत के युवा मन में जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह अभूतपूर्व है। यह घटना सदियों के संघर्ष के विराम के साथ-साथ एक नये और आत्मविश्वास से भरे भारत के उदय का प्रतीक बन गई है। आज श्रीराम मंदिर केवल ईंट-पत्थरों से बना देवालय नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का केंद्र बन गया है।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

पत्रकारिता के खट्टे-मीठे अनुभवों की पोटली

देखें वीडियो : अब मैं बोलूंगी….


‘अब मैं बोलूंगी…’ यह पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार स्मृति आदित्य की यादों की पोटली है, जिसमें कुछ खट्टे तो कुछ मीठे संस्मरण शामिल हैं। 15 वर्षों से अधिक फीचर संपादक के रूप में और स्वतंत्र लेखन करते हुए, उन्हें जो अनुभव आए, उन सबको वे अपनी डायरी में दर्ज करती करती गईं। इनमें अखबार के दफ्तर की राजनीति के किस्से, साहित्य चोरी के प्रसंग और अपने मन की अनुभूतियों का ऐसा ब्यौरा दर्ज है, जो सबको सीख देता है। यह पुस्तक मुख्यत: स्मृति आदित्य के उस समय की मन:स्थिति को सामने लाती है, जब उनको पता चलता है कि 15 साल से अधिक की ऑनलाइन पत्रकारिता की उनकी नौकरी अब जा रही है। यह स्थिति किसी को भी विचलित कर सकती है कि जब आपको पता न हो कि आगे क्या करना है? लेकिन खुद पर विश्वास हो तब आप ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में भी स्वयं को संभाल लेते हो। जुलाई से दिसंबर तक लिखी डायरी में उन्होंने पत्रकारिता की अपनी शुरुआत, उससे जुड़े सपनों एवं वहाँ की कठिनाइयों को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि पढ़कर ऐसा लगता है- यह तो मेरी ही कहानी है। इस पुस्तक को ‘शिवना कृति सम्मान-2025’ भी प्राप्त हुआ है।

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

व्यक्ति निर्माण का केंद्र है संघ की शाखा

संघ शताब्दी वर्ष : संघ का आग्रह, संघ को समझना चाहते हैं, तो शाखा आइए… 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सही अर्थों में समझना है और उसे नजदीक से देखना है, तब आपको संघ की शाखा में आना चाहिए। संघ का यह आग्रह उन सभी से रहता है, जो संघ को लेकर जिज्ञासु हैं। किसी प्रतिमा या दृश्य का कोई कितना ही अच्छा वर्णन करे लेकिन उसकी वास्तविक अनुभूति तो उसे समीप से देखकर ही होती है। सुनकर केवल कल्पनाओं के महल ही तैयार किए जा सकते हैं, जिन्हें कभी भी धराशाही किया जा सकता है। परंतु प्रत्यक्ष अनुभूति से बनी धारणा को किसी भी झूठ से खंडित नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि संघ की शाखा के संपर्क में आए महानुभाव समाज में चलने वाले किसी भी नैरेटिव से न तो संघ के बारे में धारणा बनाते और न ही बदलते हैं क्योंकि संघ क्या है, उन्होंने स्वयं शाखा में जाकर अनुभव किया है। हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संपूर्ण रचना को देखते हैं, तब इसके केन्द्र में हमें शाखा दिखाई देती है। भारत के उत्थान के लिए जिस प्रकार के संस्कारित मनुष्य छत्रपति शिवाजी महाराज से लेकर स्वामी विवेकानंद और उनके बाद के महापुरुष खोज रहे थे, वैसे मनुष्यों का निर्माण संघ की शाखा पर होता है। संघ कहता है कि उसकी शाखा खेल-कूद का उपक्रम मात्र नहीं है, अपितु यह तो व्यक्ति निर्माण का केंद्र है। अपने देश में सद्भावना लेकर काम करने वाले अनेक संगठन हैं। लेकिन उनके पास संघ जैसी कार्यपद्धति नहीं है, जिसके कारण संघ सौ वर्षों बाद भी यशस्वी है। संघ की शाखा ही है, जो उसे बाकी अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों से विशिष्ट बनाती है। अनेक प्रकार के झंझावात भी संघ और उसके स्वयंसेवकों को ध्येय से डिगा नहीं सके, तो उसका कारण शाखा रूपी अभिनव पद्धति है।

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

हिन्दुओं के मानवाधिकारों पर वैश्विक चुप्पी

गरिमामयी जीवन जीने के लिए मनुष्य होने के नाते हमारे कुछ अधिकार हैं। वैश्विक स्तर पर मनुष्यों के अधिकारों की रक्षा हो सके, इस उद्देश्य के साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर, 1948 को ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ की। यह दस्तावेज मानव जीवन, स्वतंत्रता, विचार की अभिव्यक्ति, धर्म, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को परिभाषित करता है। भारत के संविधान में भी कई अनुच्छेद मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। मानवाधिकारों का हनन रोकने, उनकी निगरानी करने एवं इससे जुड़े अन्य मामलों पर हस्तक्षेप करने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएँ भी गठित की गई हैं। परंतु, विडंबना यह है कि इन संस्थाओं को अन्य समुदायों के मानवाधिकारों की चिंता तो होती है, लेकिन हिंदुओं के मानवाधिकार इन्हें संभवतः दिखाई ही नहीं देते। विश्व के विभिन्न देशों में हिंदुओं के मानवाधिकारों का खुलेआम हनन हो रहा है, लेकिन कहीं कोई घोर आपत्ति सुनाई नहीं देती। एक प्रकार से वैश्विक चुप्पी छाई हुई है। यह स्थिति चिंताजनक है। यह चुप्पी हिंदू समाज के मन में आक्रोश पैदा करती है और सांप्रदायिक भेद भी बढ़ाती है।

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बांग्लादेश में निशाने पर हिन्दू

बांग्लादेश से आ रहे समाचार न केवल विचलित करने वाले हैं, बल्कि पड़ोसी देश में कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और विशेष रूप से हिन्दू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। बांग्लादेश के जेस्सोर जिले में पत्रकार राणा प्रताप बैरागी की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या और अगले ही दिन एक हिन्दू दुकानदार शरत चक्रवर्ती मणि की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई। 18 दिन में 6 हिन्दुओं की हत्याओं की घटनाएं सामने आई हैं। मारपीट और शोषण के मामले भी सामने आ रहे हैं। ये घटनाएं महज आंकडे नहीं हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक सोच के गवाह हैं, जिसने पिछले कुछ हफ्तों में वहां के हिन्दू समुदाय को दहशत के साये में जीने को मजबूर कर दिया है। घटनाओं की प्रकृति और उनमें अपनाए गए तरीके अत्यंत बर्बर और अमानवीय हैं। एक तरफ जहां राणा प्रताप को सरेआम गोली मारी गई, वहीं शरीयतपुर में व्यापारी खोकन चंद्र दास के साथ जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला है। धारदार हथियारों से हमला करना और फिर पेट्रोल डालकर जिंदा जला देना, अपराधियों के मन में बैठे गहरे सांप्रदायिक जहर को दर्शाता है।

रविवार, 4 जनवरी 2026

किसी की प्रतिक्रिया या विरोध में शुरू नहीं हुआ संघ

संघ शताब्दी वर्ष : संपूर्ण हिन्दू समाज को एकजुट कर, भारत को परमवैभव पर पहुँचाने के संकल्प से जन्मा है संघ 

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा का अवलोकन करने पर बहुत रोचक और आश्चर्यजनक बातें सामने आती हैं। संघ को लेकर जितने प्रकार के नैरेटिव समाज में चलते हैं, उनमें से ज्यादातर संघ विरोधियों ने फैलाए हैं। यानी जो संघ को जानते नहीं है, मानते नहीं हैं, उन्होंने समाज को बताने का प्रयास किया कि संघ क्या है और कैसा है। अनेक अवसरों पर संघ के हितैषी भी संघ की वास्तविक प्रतिमा समाज के सामने रखने में चूके हैं। शताब्दी वर्ष के प्रसंग को निमित्त मानकर संघ ने तय किया है कि समाज के सामने संघ को संघ के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाए। संघ के बारे में वास्तविक और अधिकृत जानकारी रखी जाए, ताकि समाज पर छाए भ्रम के बादल कुछ हद तक छंट जाएं। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक एवं सरकार्यवाह के प्रवास देशभर में हो रहे हैं। देश के चार प्रमुख केंद्रों- दिल्ली, बेंगलुरू, कोलकाता और मुम्बई में तो सरसंघचालक जी की विशेष व्याख्यानमालाएं हो रही हैं। इसके अलावा अन्य स्थानों पर भी समाज के विभिन्न वर्गों के साथ उनका संवाद हो रहा है। इसी क्रम में 2-3 जनवरी, 2026 को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का प्रवास हुआ। इस अवसर पर वे चार कार्यक्रमों- युवा संवाद, प्रमुख जन गोष्ठी, सामाजिक सद्भाव बैठक और शक्ति संवाद में सम्मिलित हुए। अपने इस प्रवास में उन्होंने महत्वपूर्ण तथ्य समाज के सामने रखे, जो निश्चित ही संघ के बारे में देखने का नया नजरिया देते हैं।

शनिवार, 3 जनवरी 2026

भावनाओं और संस्कृति की संवाहिका है हिन्दी

भावनाओं को बताने में हिन्दी के सामने कहाँ ठहर पाती है अंग्रेजी

हिन्दी विश्व की सबसे समृद्ध भाषाओं में से एक है। हिन्दी के पास अपना विशाल शब्दकोश है, जिसमें सभी भारतीय भाषाओं के अनूठे शब्द हैं। बोलियां भी हिन्दी के शब्दकोश और सौंदर्य में वृद्धि करती हैं। अपने सर्वसमावेशी स्वभाव के चलते हिन्दी ने बाहरी भाषाओं के शब्दों को भी अपने आँचल में स्थान दिया है, जिससे हिन्दी का शब्द भंडार और अधिक समृद्ध हुआ है। हिन्दी की एक और सबसे बड़ी विशेषता है कि इसके शब्दकोश में अलग-अलग भाव, स्थिति, संबंध को व्यक्त करने के लिए एक ही शब्द के पर्यायवाची शब्द भी हैं। यह विशेषता अन्य भारतीय भाषाओं में भी है। परंतु, जिस अंग्रेजी को वैश्विक भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसके पास यह सामर्थ्य नहीं है। इस मामले में अंग्रेजी हमारी हिन्दी के पासंग भी नहीं ठहरती है। 

एक सामान्य उदाहरण हम सब देते ही हैं कि हिन्दी में आत्मीय रिश्तों को अभिव्यक्त/संबोधित करने के लिए अनेक शब्द हैं, जो संबंधित व्यक्ति के साथ हमारे रिश्ते को स्पष्ट रूप से बताते हैं। जैसे:- चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मौसा-मौसी, मामा-मामी इत्यादि रिश्तों की अपनी विशिष्टता है, जो इन शब्दों से पता चलती है। अंग्रेजी में इन सबके लिए एक ही संबोधन है- अंकल और आंटी। अंग्रेजी में अंकल-आंटी कहने से पता नहीं चलता कि सामने वाले चाचा-चाची हैं या मामा-मामी। अंग्रेजी तो ढंग से गुरु और शिक्षक में भी अंतर नहीं कर सकती।