- सुमंत विद्वांस
दिसंबर में जब मैं बालाघाट में था, तब भोपाल से मेरे मित्र लोकेन्द्र जी ने बहुत स्नेहपूर्वक अपनी तीन पुस्तकें मेरे लिए उपहार में भेजी थीं। साथ ही उन्होंने यह सुझाव भी भेजा कि इन तीनों में सबसे पहले ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’ को पढ़ूँ।
आज मैंने यह पुस्तक पढ़कर पूरी की।
इसे यात्रा वर्णन कहा गया है और यह बात बिल्कुल ठीक भी है। लेकिन यह पुस्तक किसी पर्यटक की डायरी नहीं है। यह इतिहास की याद दिलाने वाला दस्तावेज भी है और अपने नाम के अनुरूप ही छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य का ‘दर्शन’ करवाने वाली पुस्तक भी है।
शिवाजी महाराज के जीवन और कार्य के बारे में अनेक भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। उनमें से अनेक पुस्तकें बहुत शोधपूर्ण एवं गहन हैं। ऐसे में अगर आप सोचें कि इस पुस्तक को क्यों पढ़ा जाए, तो मैं कहूँगा कि यदि आपको सरल शब्दों में शिवाजी महाराज के कुछ महत्वपूर्ण किलों की प्राथमिक जानकारी पानी हो, तो यह पुस्तक आपके लिए बहुत काम की है। इसमें आपको सिंहगढ़ और रायगढ़ जैसे प्रसिद्ध किलों की जानकारी तो मिलेगी ही, पर साथ ही खान्देरी और कोलाबा जैसे जलदुर्गों व पुरंदर व मल्हारगढ़ जैसे किलों के बारे में भी पता चलेगा। इसके अलावा इसमें पुणे के शनिवारवाड़ा, लाल महल और पाचाड में जीजाबाई के समाधि-स्थल का भी परिचय मिल जाएगा।
मैं लगभग 15 वर्षों तक नासिक और पुणे में रहा हूँ, और उनमें से भी सात वर्ष पुणे शहर में ही रहा हूँ, इसलिए इनमें से कई स्थानों पर मैं जा चुका हूँ। इस पुस्तक को पढ़ते समय अनायास ही मेरी भी कई पुरानी यादें ताजा हो गईं और बहुत-सी नई जानकारी भी मिल गई।
लोकेन्द्र जी ने बिल्कुल ठीक लिखा है कि शिवाजी महाराज के किलों को देखे बिना उनके कार्य को ठीक से समझ पाना असंभव है। मुझे लगता है कि यह बात भारत के कई अन्य शासकों के सम्बन्ध में भी सही है। मैं छात्रों और युवाओं को विशेष रूप से सुझाव देना चाहता हूँ कि अपने जीवन में कम से कम 10 किलों को अवश्य देखें। मेरे जीवन का बहुत-सा हिस्सा ऐसे ही भ्रमण और यात्राओं में बीता है और मैं जीवन में जो कुछ भी हूँ, उसमें इन अनुभवों का बड़ा हाथ है। आज अपने फोन पर आप केवल दुनिया भर की ही नहीं, बल्कि दूसरे ग्रहों की और अंतरिक्ष व ब्रह्माण्ड की जानकारी भी देख सकते हैं। लेकिन जो ज्ञान, अनुभव और समझदारी आपको पर्यटन और ऐतिहासिक स्थलों पर जाने से मिलेगी, उसकी बराबरी किसी यूट्यूब वीडियो या इंटरनेट पर किसी वेबसाइट से नहीं हो सकती।
लेकिन एक और सुझाव मैं हर किसी के लिए देना चाहता हूँ कि अगर आप स्वयं ऐसे स्थलों पर जा नहीं सकते, तो भी हर हफ्ते यूट्यूब पर भारत के ऐसे किसी न किसी ऐतिहासिक किले, महल, मंदिर आदि के बारे में एकाध वीडियो जरूर देखें। ऐसे ऐतिहासिक स्थल केवल महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि पूरे भारत में फैले हुए हैं। उनके बारे में जानना और दूसरों को भी बताना एक बहुत अच्छा और महत्वपूर्ण काम है, जो आप घर बैठे कर सकते हैं। इससे अपने ही देश और इतिहास के बारे में आपकी जानकारी भी बढ़ेगी और आज की कुछ समस्याओं व परिस्थितियों की समझ भी बढ़ेगी।
लोकेन्द्र जी ने इन किलों की उपेक्षा और दुर्दशा के बारे में भी कुछ बात की है। मैं उनकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ। हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति करने वाले कई संगठन और पार्टियां हैं, पर अपनी धरोहरों को संभालने और संरक्षित रखने की चिंता किसी को नहीं है। महाराष्ट्र में तो कई राजनैतिक परिवार पीढ़ियों से केवल शिवाजी महाराज और मराठी के नाम पर लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर अपनी दुकानें चला रहे हैं, पर उन्हें भी इन ऐतिहासिक धरोहरों से कोई सरोकार नहीं है।
इन्हीं लोगों के बारे में मैं एक और बात जोड़ना चाहता हूँ।
खुद को शिवाजी महाराज का अनुयायी बताने वाले जो लोग महाराष्ट्र में हर चुनाव से पहले गुंडागर्दी और उप्र या तमिलनाडु वालों को भगाने की बात कहते रहते हैं, उन्हें एक बार शिवाजी महाराज की जीवनी ठीक से पढ़नी चाहिए।
तब उन्हें सबसे पहले यह बात समझ आएगी कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने साम्राज्य को मराठी साम्राज्य या मराठा साम्राज्य नहीं, बल्कि हिंदवी स्वराज्य क्यों कहा था। दूसरी बात उन्हें यह याद आएगी कि काशी के पंडित गागाभट्ट से लेकर कवि भूषण, परमानंद और कलश जैसे कवियों तक और महाराजा छत्रसाल से लेकर कुंवर रामसिंह तक उत्तरी भारत के कितने सारे लोगों का शिवाजी महाराज से निकट संपर्क या उनके कार्यों में सहयोग रहा। इसी तरह दक्षिणी भारत में कर्नाटक और तंजावूर तक भी उनके संपर्क थे। आपको वाकई शिवाजी महाराज की धरोहर पर दावा करना है, तो कम से कम उनके बारे में ठीक से जान लीजिए और उनके व्यवहार का आचरण करके दिखाइए।
मेरा ध्यान इस बात पर भी गया कि पुस्तक में लोकेन्द्र जी ने रोप-वे और ट्रॉफी जैसे आम अंग्रेजी शब्दों को लिखते समय रज्जू-मार्ग और वैजयंती जैसे हिन्दी अर्थ भी साथ ही दे दिए हैं। यह मुझे बड़ा अच्छा और रोचक भी लगा। कई अंग्रेजी और उर्दू शब्द हमारी आदत में इस प्रकार जुड़ चुके हैं कि अक्सर उनके मूल हिन्दी या संस्कृत शब्द हमें याद ही नहीं आते या फिर पता ही नहीं होते हैं। मैं स्वयं भी कई बार इस समस्या में उलझता हूँ। अपनी भाषा को बढ़ाने और बचाने के लिए अपने शब्दों का उपयोग सबसे सरल और प्रभावी उपाय है।
मैं कई भाषाएँ बोलता और समझता हूँ, इसलिए मैं इस बात का पूरा समर्थक हूँ कि आप अंग्रेजी भी सीखें और चाहें तो जर्मन, जापानी, चीनी या किसी दूसरे ग्रह की दो-चार भाषाएँ भी सीख लीजिए, पर यदि आप अपनी ही भाषा ठीक से नहीं जानते हैं तो कम से कम अपने इस अज्ञान को छिपाकर रखिए और अपनी भाषा सीख लीजिए।
भारत अकेला देश है, जहाँ लोग इस बात को उपलब्धि के रूप में गर्व से बताते हैं कि उन्हें या उनके बच्चों को तो अपनी भाषा आती ही नहीं, सिर्फ अंग्रेजी ही आती है। ऐसा बोलकर वे एक बार मेरी नजरों में शर्मिंदा होते हैं और फिर जब मैं धाराप्रवाह अंग्रेजी में बात करता हूँ और वे लड़खड़ा जाते हैं, तब वे मेरी नजरों में दोबारा भी शर्मिंदा हो जाते हैं। मेरा आपको सुझाव है कि आप पचासों भाषाएं सीख लीजिए पर अपने लोगों से अपनी भारतीय भाषाओं में बात कीजिए, चाहे टूटी फूटी ही सही।
लेकिन उसके लिए आपको अच्छी पुस्तकें पढ़नी पड़ेंगी और लोकेन्द्र जी की यह पुस्तक भी वैसी ही एक अच्छी पुस्तक है। सादर!

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