शनिवार, 3 जनवरी 2026

भावनाओं और संस्कृति की संवाहिका है हिन्दी

भावनाओं को बताने में हिन्दी के सामने कहाँ ठहर पाती है अंग्रेजी

हिन्दी विश्व की सबसे समृद्ध भाषाओं में से एक है। हिन्दी के पास अपना विशाल शब्दकोश है, जिसमें सभी भारतीय भाषाओं के अनूठे शब्द हैं। बोलियां भी हिन्दी के शब्दकोश और सौंदर्य में वृद्धि करती हैं। अपने सर्वसमावेशी स्वभाव के चलते हिन्दी ने बाहरी भाषाओं के शब्दों को भी अपने आँचल में स्थान दिया है, जिससे हिन्दी का शब्द भंडार और अधिक समृद्ध हुआ है। हिन्दी की एक और सबसे बड़ी विशेषता है कि इसके शब्दकोश में अलग-अलग भाव, स्थिति, संबंध को व्यक्त करने के लिए एक ही शब्द के पर्यायवाची शब्द भी हैं। यह विशेषता अन्य भारतीय भाषाओं में भी है। परंतु, जिस अंग्रेजी को वैश्विक भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसके पास यह सामर्थ्य नहीं है। इस मामले में अंग्रेजी हमारी हिन्दी के पासंग भी नहीं ठहरती है। 

एक सामान्य उदाहरण हम सब देते ही हैं कि हिन्दी में आत्मीय रिश्तों को अभिव्यक्त/संबोधित करने के लिए अनेक शब्द हैं, जो संबंधित व्यक्ति के साथ हमारे रिश्ते को स्पष्ट रूप से बताते हैं। जैसे:- चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मौसा-मौसी, मामा-मामी इत्यादि रिश्तों की अपनी विशिष्टता है, जो इन शब्दों से पता चलती है। अंग्रेजी में इन सबके लिए एक ही संबोधन है- अंकल और आंटी। अंग्रेजी में अंकल-आंटी कहने से पता नहीं चलता कि सामने वाले चाचा-चाची हैं या मामा-मामी। अंग्रेजी तो ढंग से गुरु और शिक्षक में भी अंतर नहीं कर सकती।

अन्य शब्दों के संदर्भ में भी हम हिन्दी-अंग्रेजी के इस अंतर को देख सकते हैं। हिन्दी में पानी के कई पर्यायवाची शब्द हैं- जल, नीर, तोय, अमृत, पय, सलिल आदि। जबकि अंग्रेजी में केवल 'वॉटर' शब्द ही प्रचलित है। अब यहां यह भी समझने की बात है कि पानी का प्रत्येक पर्यायवाची अगल भाव और स्थिति को बताता है। हम आम बोल-चाल में पानी शब्द का उपयोग करते हैं- एक गिलास पानी दीजिये, पौधों में पानी दे दो, नल में पानी आ गया इत्यादि। लेकिन जब हम धार्मिक अनुष्ठान में बैठे हैं और पूजन की दृष्टि से पानी की आवश्यकता है तब हम कभी नहीं कहते कि एक लौटा पानी दे दो। उस समय हमारे मुंह से यही निकलता है कि "एक लौटे या कलश में जल दे दीजिए"। भारत का पोषण करने वाली माँ गंगा में भी पानी नहीं, जल प्रवाहित होता है। वैज्ञानिक संदर्भ में जल का उपयोग किया जाता है। वहीं, नीर का प्रयोग शुद्ध, स्वच्छ और निर्मल पानी के लिए किया जाता है। तालाब और झील का पानी 'तोय' है। बहता हुआ पानी 'सलिल' है और वर्षा जल को कहते हैं 'वारि'।  

इसी प्रकार आग के स्वभाव और कार्य के आधार उसका नामकरण है। पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन, धार्मिक अनुष्ठान और साहित्यिक प्रयोग में यह अग्नि है। लेकिन जब यह भड़क उठती तो 'ज्वाला' बन जाती है। क्रोध को अभिव्यक्त करने के लिए भी 'ज्वाला' शब्द का प्रयोग होता है। जंगल की आग 'दावानल' और समुद्र के भीतर आग लगी हो तो 'बड़वानल' है। अनल शब्द का उपयोग उस आग को दर्शाने के लिए किया जाता है जो अपनी शक्ति और निरंतरता के लिए जानी जाती है, जिसका जलना कठिन होता है। यह शब्द आम बोलचाल के शब्द 'आग' की तुलना में अधिक साहित्यिक और काव्यमय माना जाता है। इसका प्रयोग अकसर कविताओं, गीतों और औपचारिक भाषा में किया जाता है। जरा आसमान की ओर देखिये, वहां चमक रहे सूर्य के लिए अंग्रेजी में केवल 'सन' है लेकिन हिन्दी में सूर्य, रवि, भानु, आदित्य और दिनकर भी है। चंद्रमा को तो हम आत्मीयता से मामा भी कह देते हैं। देवता के रूप में हम 'सोम' कहते हैं। पूर्णिमा की रात के ईश्वर के रूप यह 'राकेश' हो जाता है। जब कविता लिखनी हो तो मयंक, विधु, चांद और चंद्र का उपयोग अधिक करते हैं। खरगोश के आकार का धब्बा दिखने के कारण यह 'शशि' और 'शशांक' भी कहलाता है। ग्रहण के समय 'चंद्र' होगा। 

उपरोक्त उदाहरणों से ध्यान आता है कि अंग्रेज़ी में एक अर्थ के लिए सीमित शब्द होते हैं, लेकिन हिन्दी में शब्दों की बहुलता इसे अधिक लचीला और भावपूर्ण बनाती है। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य में कवि और लेखक अलग-अलग शब्दों का चयन करके अपने भावों की गहराई व्यक्त करते हैं। हम जानते हैं कि भाषा के विकास में संस्कृति का अत्यधिक महत्व रहता है। संस्कृति के खाद-पानी से ही भाषा पल्लवित-पुष्पित होती है। उसका सौंदर्य समृद्ध होता है। हिन्दी और अंग्रेजी की कुछ कहावतों में हम इस अंतर को देख सकते हैं। जहां हिन्दी की कहावतें रचनात्मक और सकारात्मक दृष्टिकोण देती हैं, वहीं उन्हीं संदर्भ में अंग्रेजी की कहावतों में नकारात्मक पुट है। जैसे- हम किसी के बारे में चर्चा कर रहे हैं और वह अचानक से हमारे सामने आ जाये तो हम कहते हैं कि "आपकी उम्र बहुत लंबी है। हम आपको ही याद कर रहे थे और आप आ गए"। वहीं, इसी परिस्थिति के लिए अंग्रेजी में कहावत है- "थिंक ऑफ डेविल, डेविल इज हियर" अर्थात शैतान का नाम लिया, शैतान हाजिर। मतलब हम अपने मित्र/परिचित को शैतान के रूप में देखते हैं क्या? जब हम एक साथ दो काम साधते हैं तो उसके लिए सुंदर कहावत है- 'एक पंथ-दो काज'। वहीं, अंग्रेजी में कहते हैं- 'टू किल टू बर्ड्स विथ वन स्टोन' और 'वन एरो, टू स्पैरो'। अंग्रेजी की कहावत में हिंसक दृष्टि है। हम ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखते हैं और उसकी भूमिका को सृजनात्मक रूप में देखते हैं। हिन्दी का कवि लिखता है- "होई सोई जो राम रची राखा"। वहीं, अंग्रेजी में कहा गया है- "मैन प्रोपोसेज़, गॉड डिस्पोसेज"। दोनों कहावतें जीवन में नियति और ईश्वर की इच्छा की भूमिका को दर्शाती हैं, लेकिन दोनों की सांस्कृतिक और भावार्थिक व्याख्या में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है। 

फ्रेंच की 'एलीट' पहचान को पीछे धकेलकर भले ही अंग्रेजी इंग्लैंड में महारानी बन गयी हो लेकिन भारत में वह हिन्दी की जगह नहीं ले सकती। शब्दकोश के मामले में अंग्रेजी की दरिद्रता भारत में साफ दिखाई देती है। भारत की बातों, परंपरा, व्यवहार और चीजों के लिए अंग्रेजी के पास उपयुक्त शब्द ही नहीं है। धर्म को अभिव्यक्त कर सके, ऐसा कोई शब्द अंग्रेजी के पास नहीं है। 'पाप' की कल्पना तो अंग्रेजी ने कर ली क्योंकि ईसाईयत का मत है कि मनुष्य की उत्पत्ति पाप से हुई है लेकिन अंग्रेजी के पास 'पुण्य' के लिए कोई उपयुक्त शब्द नहीं है। हम 'अमृतस्य पुत्र' हैं। मोक्ष की कल्पना भी अंग्रेजी में नहीं है। आत्मज्ञान, किंकर्तव्यविमूढ़, अंतर्ध्यान, नमस्कार और प्रणाम के आगे अंग्रेजी नतमस्तक है। उसके पास घी, रोटी, चटनी का विकल्प भी नहीं है। एक लंबी सूची है, जहां अंग्रेजी के कदम ठिठक जाते हैं। 

इस लेख में हमने अंग्रेजी को कमतर दिखाने का प्रयास नहीं किया है अपितु हिन्दी की शब्द संपदा की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है। चूंकि अंग्रेजी की भाव-भूमि अलग है और हिन्दी के उद्गम का स्रोत अलग, इसलिए भारत की बातों को हिन्दी ही सही अर्थों में अभिव्यक्त कर सकती है, अंग्रेजी नहीं। हम सदैव स्मरण रखें कि हिन्दी केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि भावनाओं, संस्कृति और ज्ञान की संवाहिका है। इसकी शब्द-संपदा हमें गर्व और समृद्धि का अनुभव कराती है। 

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