शनिवार, 31 जनवरी 2026

सबके लिए है संघ की शाखा

संघ शताब्दी वर्ष : जिस स्थान पर शाखा लगती है उसे संघस्थान कहते हैं, खेल का मैदान नहीं


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक कहते हैं कि संघ को समझना है तो शाखा में आइए। प्रश्न है कि शाखा कहाँ लगती है और किस शाखा में जाना चाहिए? एक बात तो सभी जानते हैं कि सामान्यतौर पर संघ की शाखा खुले मैदान/स्थान पर लगती है। वरिष्ठ प्रचारक मधुभाई कुलकर्णी लिखते हैं- “जिस स्थान पर शाखा लगती है उसे हम संघस्थान कहते हैं, खेल का मैदान नहीं। संघस्थान तैयार करना पड़ता है। संघ में शाखा यानी भारत माता की आराधना ही है। वह स्थान, जहां भारत माता की प्रार्थना होती है तथा जहां अज्ञान का अंधकार दूर करने वाले भगवा ध्वज की स्थापना होती है, वह स्थान कैसा होना चाहिए? वह स्थान होना चाहिए मंदिर के समान स्वच्छ, पानी से धोकर साफ किया, रेखांकन (रंगोली) से सजा-धजा”।  ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो पार्क या मैदान किसी समय में ऊबड़-खाबड़ थे, संघ की शाखा शुरू होने के बाद स्वयंसेवकों के परिश्रम ने उन्हें व्यवस्थित कर दिया। एक विद्यालय के संचालक संघ शिक्षा वर्ग के लिए स्थान देने को तैयार नहीं थे लेकिन बाद में बहुत आग्रह के बाद उन्होंने स्थान दे दिया। सात दिन के प्राथमिक शिक्षा वर्ग के समापन कार्यक्रम में जब स्कूल संचालक आए और उन्होंने मैदान का कायाकल्प देखा तो हैरान रह गए। बहरहाल, शाखा को संघ की आत्मा कहा जाता है। संघ कार्य का आधार यही शाखाएं हैं, जो खुले मैदान में लगती हैं। यानी संघ का बुनियादी कार्यक्रम एकदम पारदर्शी है। 

अब प्रश्न आता है कि संघ की शाखा में कौन आ सकता है? संघ की शाखा में शामिल होने के लिए किसी भी प्रकार की विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है। किसी भी जाति, संप्रदाय और आयुवर्ग का व्यक्ति संघ की शाखा में आ सकता है। संघ की शाखा सबके लिए है। संघ में किसी प्रकार का पंजीयन नहीं किया जाता है और न ही किसी प्रकार की सदस्यता शुल्क लगती है। संघ का ‘घटक’ बनने के लिए शाखा ही एकमात्र स्थान है। निकटतम स्थान पर लगने वाली शाखा में आकर ही कोई व्यक्ति संघ का स्वयंसेवक बन सकता है। संघ से जुड़ने की प्रक्रिया इतनी ही सरल है। यदि आपको यह जानकारी नहीं है कि आपके आसपास संघ की शाखा कहाँ लगती है, तब आप आरएसएस की अधिकृत वेबसाइट ‘आरएसएस डॉट ओआरजी’ पर जाकर ‘ज्वाइन आरएसएस’ का ऑनलाइन फॉर्म भर सकते हैं। संघ के स्थानीय कार्यकर्ता आपसे संपर्क कर लेंगे। 

सबकी रुचि, प्रकृति और अवस्था को ध्यान में रखते हुए संघ में अलग-अलग प्रकार की शाखाएं लगती हैं। वैसे तो हम किसी भी शाखा में जा सकते हैं। लेकिन यदि हम उचित शाखा का चुनाव करेंगे, तो अधिक आनंद आएगा। ये शाखाएं सामान्यतौर पर आयुवर्ग के आधार पर हैं। इसी आधार पर उन शाखाओं का पाठ्यक्रम है। हमारी आयु अधिक है और हम बच्चों की शाखा में चले गए, तब थोड़ा सामंजस्य बैठाने में कठिनाई आएगी ही। हाँ, उसी शाखा में अधिक आयु के लोगों की संख्या 15-20 है और बच्चों की संख्या भी 15-20 है, तब दोनों आयुवर्ग के अलग-अलग गण बनाकर शाखा के कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। संघ ने शाखाओं को इस प्रकार वर्गीकृत किया है- 

विद्यार्थी संयुक्त : इस शाखा में विद्यालय-महाविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के साथ ही बाल स्वयंसेवक भी शामिल रहते हैं। इसलिए इसे विद्यार्थी संयुक्त शाखा कहा गया है।

विद्यार्थी तरुण : महाविद्यालयीन विद्यार्थियों की शाखा को विद्यार्थी तरुण शाखा कहा जाता है। 

व्यवसायी तरुण : विभिन्न व्यवसायों में सक्रिय एवं नौकरीपेशा युवा स्वयंसेवकों की शाखा का नामकरण व्यवसायी तरुण शाखा किया गया है।

व्यवसायी प्रौढ़ : अधिक आयु के व्यवसायी, नौकरीपेशा या सेवानिवृत्त स्वयंसेवक जिस शाखा में आते हैं, उसे व्यवसायी प्रौढ़ शाखा कहते हैं।

इससे पहले शाखाओं का वर्गीकरण प्रभात शाखा, सायं शाखा, रात्रि शाखा एवं बाल शाखा में किया गया था। प्रभात शाखा में व्यवसायी स्वयंसेवकों की संख्या अधिक रहती थी। सामान्यत: यह सुबह लगती थी। इसलिए इसका नामकरण प्रभात शाखा किया था। इसी प्रकार, विद्यार्थियों के लिए शाम में शाखा लगती थी, जिसे सायं शाखा कहा गया। जो स्वयंसेवक किन्हीं कारणों से सुबह और शाम को नहीं आ सकते, उनके लिए रात्रि में शाखा शुरू की गईं, जिनका नाम रात्रि शाखा पड़ गया था। छोटी उम्र के बच्चों के लिए अलग से शाखाएं चलती हैं, जिन्हें पहले बाल शाखा कहा जाता था। 

उपरोक्त चार प्रकार की शाखाओं के अतिरिक्ति साप्ताहिक एवं मासिक क्रम में भी स्वयंसेवकों के एकत्रीकरण की रचना बनी है। संघ प्रगतिशील संगठन है, वह देश-काल परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालकर कार्य करता है। चूँकि व्यवसाय एवं अन्य कारणों के समाज में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो प्रतिदिन की शाखा नहीं आ सकता। ऐसे लोगों के लिए संघ ने साप्ताहिक एवं मासिक एकत्र आने की रचना खड़ी की। सप्ताह में एक या दो बार लेकिन नियमित होने वाले एकत्रीकरण को मिलन कहा गया है। कुछ लोग सरलता से समझाने के लिए इसे साप्ताहिक शाखा भी कह देते हैं। क्योंकि ‘शाखा’ के साथ स्वयंसेवकों का अधिक आत्मीय संबंध है। अनेक स्थानों पर साप्ताहिक तौर पर समन्वय मिलन या समन्वय शाखा भी चलती हैं। संघ की प्रेरणा से संचालित विभिन्न राष्ट्रीय संगठनों के कार्यकर्ताओं का शाखा में आने का क्रम बना रहे और सबका आपस में मिलना होता रहे, इसके लिए समन्वय मिलन की संकल्पना संघ शाखा रचना में आई है। महानगरों में श्रेणी मिलन भी संचालित किए जा रहे हैं। ये मिलन व्यावसायिक श्रेणी के अनुसार आयोजित होते हैं, जैसे प्राध्यापक मिलन, अधिवक्ता मिलन, चिकित्सक मिलन, श्रमिक मिलन इत्यादि। इसी प्रकार, महीने या पाक्षिक क्रम पर निरंतर आयोजित होने एकत्रीकरण को ‘मंडली’ कहा गया है। मिलन एवं मंडली का स्वरूप नियमित चलने वाली शाखा से थोड़ा अलग होता है। शाखा के पाठ्यक्रम के अतिरिक्त मिलन और मंडली में प्रमुख मुद्दों एवं समसामयिक विषयों पर चर्चा एवं अन्य गतिविधियों का आयोजन भी होता है। इनका स्वरूप शारीरिक प्रधान न होकर बौद्धिक प्रधान होता है।

संघ की शाखा सृष्टि इस प्रकार की है कि उसमें सबकी कठिनाइयों एवं सुविधाओं को ध्यान रखा गया है। जैसी आपकी सुविधा हो, उसके अनुरूप आप संघ शाखा आ सकते हैं। नित्य आना चाहें तो नित्य की शाखा, अन्यथा सप्ताह में एक दिन तो संघ स्थान आ ही सकते हैं। शाखा में आए बिना संघ से परिचय अधूरा ही रहेगा, इसलिए शाखा अवश्य आएं।

यह भी पढ़ें : व्यक्ति निर्माण का केंद्र है संघ की शाखा

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 18 जनवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

पसंद करें, टिप्पणी करें और अपने मित्रों से साझा करें...
Plz Like, Comment and Share