संघ शताब्दी वर्ष : संघ का आग्रह, संघ को समझना चाहते हैं, तो शाखा आइए…
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सही अर्थों में समझना है और उसे नजदीक से देखना है, तब आपको संघ की शाखा में आना चाहिए। संघ का यह आग्रह उन सभी से रहता है, जो संघ को लेकर जिज्ञासु हैं। किसी प्रतिमा या दृश्य का कोई कितना ही अच्छा वर्णन करे लेकिन उसकी वास्तविक अनुभूति तो उसे समीप से देखकर ही होती है। सुनकर केवल कल्पनाओं के महल ही तैयार किए जा सकते हैं, जिन्हें कभी भी धराशाही किया जा सकता है। परंतु प्रत्यक्ष अनुभूति से बनी धारणा को किसी भी झूठ से खंडित नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि संघ की शाखा के संपर्क में आए महानुभाव समाज में चलने वाले किसी भी नैरेटिव से न तो संघ के बारे में धारणा बनाते और न ही बदलते हैं क्योंकि संघ क्या है, उन्होंने स्वयं शाखा में जाकर अनुभव किया है। हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संपूर्ण रचना को देखते हैं, तब इसके केन्द्र में हमें शाखा दिखाई देती है। भारत के उत्थान के लिए जिस प्रकार के संस्कारित मनुष्य छत्रपति शिवाजी महाराज से लेकर स्वामी विवेकानंद और उनके बाद के महापुरुष खोज रहे थे, वैसे मनुष्यों का निर्माण संघ की शाखा पर होता है। संघ कहता है कि उसकी शाखा खेल-कूद का उपक्रम मात्र नहीं है, अपितु यह तो व्यक्ति निर्माण का केंद्र है। अपने देश में सद्भावना लेकर काम करने वाले अनेक संगठन हैं। लेकिन उनके पास संघ जैसी कार्यपद्धति नहीं है, जिसके कारण संघ सौ वर्षों बाद भी यशस्वी है। संघ की शाखा ही है, जो उसे बाकी अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों से विशिष्ट बनाती है। अनेक प्रकार के झंझावात भी संघ और उसके स्वयंसेवकों को ध्येय से डिगा नहीं सके, तो उसका कारण शाखा रूपी अभिनव पद्धति है।
रोज शाखा आते हैं तो क्या होता है :
संघ शाखा, एक ऐसी कार्यपद्धति है, जिसमें स्वयंसेवक एक स्थान पर नित्य एकत्र होते हैं। जहाँ शाखा लगती है, उसे संघ स्थान कहते हैं। जब कोई एक स्थान पर नित्य आता है, तो उसका एक स्वभाव बनने लगता है। संत नामदेव जी ने कहा है कि यदि मन में भक्तिभाव नहीं है फिर भी कोई व्यक्ति भगवान का नाम बिना सूझबूझ से लेता रहा, तो भी उसका मन भगवान से जुड़ जाता है और उसका मानसिक उन्नयन हो जाता है। यही बात शाखा पर स्वयंसेवकों के नित्य एकत्र आने से सिद्ध होती देखी गई है। जब कोई व्यक्ति शाखा पर नियमित आता है, तब संघ का विचार एवं ध्येय उसके मन में गहराई तक स्वत: ही उतर जाता है। संघ के विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी पुस्तक ‘कार्यकर्ता’ में लिखते हैं- “शाखा में आने के बाद व्यक्ति में स्वयं खुद को पता न लगते हुए ही धीरे-धीरे परिवर्तन आता है। एक साथ कार्यक्रम करने से समूहभाव, सामाजिकता विकसित होती है। खेलकूद और अन्य शारीरिक कार्यक्रमों से स्वयंसेवकों की शारीरिक क्षमता बढ़ती है, जो आगे चलकर अपने कार्य के लिए कष्ट उठाने में सहायभूत होती है”।
समाप्त होता है अहंकार, बढ़ता है कर्तव्य भाव :
जब कोई व्यक्ति संघ की शाखा पर आता है और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खेलता है, मंडल में बैठकर चर्चा करता है, तब वह स्वत: ही भूल जाता है कि अन्य स्वयंसेवक बंधु किस पंथ और किस जाति के हैं। कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह भाव भी समाप्त हो जाता है। हमने यह भी देखा है कि शाखा का मुख्य शिक्षक एक छोटा बालक है, तब भी उसकी आज्ञा का पालन सरसंघचालक करते हैं। यानी शाखा पर पद और दायित्व का बड़प्पन भी नहीं दिखता। सामाजिक व्यवहार में जो बातें बाधक होती हैं, वे कब छूट जाती हैं, नित्य शाखा आनेवाले स्वयंसेवक को पता ही नहीं चलता है। यही है व्यक्ति निर्माण की अभिनव पद्धति, जिसमें व्यक्ति का अहंकार समाप्त होता है और कर्तव्य भाव बढ़ता है। समाज जीवन के लिए आवश्यक गुणों की जागृति संघ की शाखा पर होती है।
समर्थ रामदास के अखाड़े और संघ की शाखा :
नियमित मिलने-जुलने से अपनत्व का भाव आता है। अपने आप ही संगठन की भावना आती है। आत्मविश्वास बढ़ता है। हम सब एकसाथ हैं और समाज की किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं, यह विचार पक्का होता है। समर्थ रामदास जी महाराज ने देशभर में अखाड़ों की शुरुआत क्यों की? उन्होंने अखाड़ों को सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के केन्द्र के तौर पर देखा, जहाँ युवक एकसाथ आएंगे तो उनके मन में अपने राष्ट्र, समाज और धर्म की रक्षा का भाव जागृत होगा। अखाड़े केवल कुश्ती के अभ्यास और शारीरिक बल में वृद्धि के लिए नहीं थे। अपितु इनके माध्यम से समर्थ रामदास जी महाराज ने ‘लोकसंगठन’ (लोगों को एक मंच पर लाना) और ‘धर्मसंगठन’ (आध्यात्मिक चेतना जगाना) तैयार किया, जिसका सहयोग हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना में छत्रपति शिवाजी महाराज को मिला। आधुनिक समय में संघ की शाखा ने समर्थ गुरु रामदास महाराज के अखाड़े की संकल्पना को साकार किया है। संघ के विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी कहते थे कि “संघ की कार्यपद्धति में तथा कार्यक्रमों में कोई धार्मिक या आध्यात्मिक साधना का समावेश नहीं है। लेकिन अगर स्वयं के परे जाना, निजी अहंकार को समष्टि में मिलाना, वयंकार में परिवर्तित करना यही आध्यात्मिकता का बुनियादी आयाम है, तो शाखा व्यवहार से जो बंधुता का, सामूहिकता का, आत्मलोप का, संस्कार होता है वह आध्यात्मिक साधना ही है”।
सबके लिए खुली है संघ शाखा :
शाखा पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं है। शाखा में आने के लिए न आयु की मर्यादा का सवाल उठता है न किसी विशेष क्षमता का। कोई भी व्यक्ति शिशु अवस्था से लेकर वयोवृद्ध अवस्था तक शाखा आ सकता है। एक ही शाखा पर बच्चे और वयस्क, एकसाथ खेलते हुए हमें दिख जाएंगे। कोई भी व्यक्ति अपनी-अपनी प्रवृत्तियों, मानसिकता, कमजोरियों एवं विशेषताओं के साथ शाखा में शामिल हो सकता है। संघ स्थान सबके लिए खुला है। संघ को अपनी कार्य पद्धति पर पूर्ण विश्वास है कि शाखा आने वाला व्यक्ति समय के साथ स्वयं ही परिष्कृत हो जाएगा।
संघ केवल शाखा चलाता है :
संघ कार्य में शाखा का क्या महत्व है? इस संदर्भ में सरसंघचालकों के बौद्धिकों को पढ़ा जाना चाहिए। संघ की ओर से अकसर कहा जाता है कि संघ का कार्य केवल शाखा चलाना है। पांचजन्य और ऑर्गेनाइजर के विशेषांकों (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 वर्ष की यात्रा) के विमोचन प्रसंग पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भी कहा है कि “संघ केवल एक ही काम करता है, शाखा चलाना एवं मनुष्य निर्माण करना, लेकिन स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ता। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें स्वयंसेवक कार्य न कर रहा हो। संघ का कार्य एवं विचार सत्य पर आधारित है, किसी के प्रति विरोध या द्वेष पर नहीं”। अन्य अवसरों पर भी वे यह बात कह चुके हैं। इस कथन में संघ की शाखा की विशेषता एवं सामर्थ्य छिपा है। संघ की शाखा से निकले व्यक्तियों ने समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक से बढ़कर एक संगठन खड़े कर दिए हैं, जो राष्ट्रीय विचार के वाहक हैं। एक प्रसंग पर भगिनि निवेदिता ने भी मार्गदर्शन किया है- “सभी हिन्दू लोग अगर हररोज एक घंटे के लिए कोई विशेष निमित्त न रखते हुए भी इकठ्ठा हो जाएं तो भी कार्य के ऊँचे पहाड़ खड़े हो सकते हैं”। उनके इस विचार को संघ की शाखा ने सिद्ध करके दिखाया है। संघ की शाखा पर एकत्र आए हिन्दू समाज ने विभिन्न क्षेत्रों में अनूठे संगठनों की रचना करके अभूतपूर्व कार्य खड़े किए हैं।
एक घंटे की शाखा को समाज में 23 घंटे जीना :
कुछ लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि संघ की शाखा मतलब- किसी स्थान पर एकत्र होकर एक घंटे खेलना-कूदना। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने प्रारंभ से ही इस संबंध स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया है कि “स्वयंसेवक की यह सोच नहीं होनी चाहिए कि एक घंटा संघ के लिए, बाकी तेईस घंटे संघेतर व्यवहार के लिए”। संघ के प्रचारक रहे बाबासाहेब आप्टे भी कहते थे कि “हम एक घंटा संघस्थान पर आते हैं। बाकी तेईस घंटों में संघ का काम हमने कितना किया, उसका यह एक घंटा मापदण्ड है। हमारा संघ चिंतन चौबीस घंटों का होना चाहिए। अपनी नौकरी-व्यवसाय, अध्ययन-अध्यापन और अन्य प्रकार की सामाजिक सक्रियता के दौरान स्वयंसेवक को अपने आचरण से संघ को अभिव्यक्त करने के साथ ही योग्य लोगों का चयन करके संघ के राष्ट्रीय कार्य में सहभागी बनाना चाहिए। सबको साथ लेकर चलना संघ दृष्टि है”। कहने का अभिप्राय है कि संघ का स्वयंसेवक संघ स्थान पर जो संस्कार अर्जित करता है, उसे वह अपने साथ समाज में लेकर भी जाता है।
कुल मिलाकर संघ ने अपने ध्येय की पूर्ति के लिए साधन के रूप में जिस दैनंदिन शाखा पद्धति को विकसित किया है, वह अत्यंत सरल, सुलभ, स्वाभाविक और प्रभावी है।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 11 जनवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ |


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