मंगलवार, 27 जनवरी 2026

आरएसएस और संविधान : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए सर्वोच्च है संविधान का सम्मान

संघ शताब्दी वर्ष : ऐतिहासिक तथ्य और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बयान बताते हैं कि स्वयंसेवकों ने न केवल संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष किया है अपितु बलिदान भी दिया है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रारंभ से ही भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। संविधान भी ऐसा ही एक प्रतीक है, जिसका सम्मान एवं सुरक्षा संघ के लिए प्राथमिक है। हालांकि, आरएसएस और संविधान के रिश्तों को लेकर अकसर राजनीतिक विमर्श में कई तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं। यह सवाल ज्यादातर उनकी ओर से उठाया जाता है, जिन्हें संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ही संविधान विरोधी कहा था। संविधान सभा में अपने आखिरी भाषण में डॉ. अंबेडकर ने कम्युनिस्टों और समाजवादियों को संविधान की निंदा करने वाला बताया था। उन्होंने कहा था कि कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के अपने सिद्धांत पर आधारित संविधान चाहती है और वे संविधान की निंदा करते हैं क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संविधान के संबंध में ऐतिहासिक तथ्यों और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बयानों का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि संघ ने सदैव ही संविधान के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारत में आरएसएस ऐसा संगठन है, जिसने संविधान की सुरक्षा एवं सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष भी किया और बलिदान भी दिया है। 

महात्मा गांधी की हत्या के संदर्भ में झूठे आरोप लगाकर नेहरू सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगाया लेकिन जब एक भी आरोप प्रमाणित नहीं हो सका, तब सरकार को मजबूरन प्रतिबंध हटाना पड़ा। अपने घोर अलोकतांत्रिक निर्णय का बचाव करने के लिए सरकार की ओर से वर्ष 1949 में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की ओर से सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को भारत के राष्ट्रध्वज और संविधान के प्रति निष्ठावान रहने का सुझाव दिलवाया गया। इसी घटनाक्रम को आधार बनाकर आलोचकों की ओर से यह प्रोपेगेंडा खड़ा किया गया कि संघ की निष्ठा संविधान में नहीं है। जबकि ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि सरदार पटेल के सुझाव से बहुत पहले ही, 2 नवंबर 1948 को ही श्रीगुरुजी राष्ट्रध्वज, संविधान एवं अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति संघ की निष्ठा का लिखित और स्पष्ट प्रमाण दे चुके थे। श्रीगुरुजी ने कई बार दोहराया कि “भारत के प्रत्येक अन्य नागरिक के समान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक देश, उसके संविधान, स्वतंत्रता और गौरव के प्रत्येक प्रतीक के प्रति निष्ठावान है”।

वर्ष 1950 में जब हमने अपने संविधान को आत्मार्पित किया, तब श्रीगुरुजी ने देश को बधाई देते हुए कहा था कि आज ब्रिटिश ताज की जगह ‘अशोक चक्र’ ने ले ली है और हम अपनी इच्छानुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र हैं। श्रीगुरुजी ने इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को हर्ष और उत्सव का प्रसंग बताया था। उन्होंने कहा था कि आज का अवसर हार्दिक आनंद का अवसर है और हमें इस बात के लिए हर्ष होना चाहिए कि यह हमारा महान सौभाग्य है कि हम अपने देश के इतिहास की ऐसी शुभ घडी पर उपस्थित हैं। श्रीगुरुजी के ये विचार संविधान विरोधी व्यक्ति या संगठन प्रमुख के तो नहीं हो सकते। इन विचारों से तो स्पष्ट होता है कि संघ भारत के अपने संविधान के लागू होने के ऐतिहासिक अवसर का प्रसन्नता के साथ स्वागत कर रहा था। इस प्रसंग पर श्रीगुरुजी ने 26 जनवरी, 1930 के उस दिन को भी याद किया जब रावी के तट पर हमने पूर्ण स्वराज्य का संकल्प पारित किया। श्रीगुरुजी ने कहा- “रावी के तट पर 20 वर्ष पूर्व पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव हमारे आज के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा उपस्थित किया गया था और काग्रेस ने उसे स्वीकार किया था। उसके बाद प्रतिवर्ष 26 जनवरी को हम यह दिन ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाते रहे, किंतु हमारे चारों ओर विदेशी प्रभुत्व बना रहा”। ध्यान दें कि श्रीगुरुजी भारतीय संविधान के लागू होने को विदेशी प्रभुत्व से पूर्णत: मुक्ति के रूप में देख रहे थे। कुल मिलाकर कहना है कि संघ की ओर से 26 जनवरी 1950 को उसी प्रकार से आनंद व्यक्त किया गया, जिस प्रकार 26 जनवरी 1930 को ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाने का आदेश देते हुए संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने व्यक्त किया था। 

अकसर संघ पर आरोप लगाया जाता है कि वह संविधान को बदलना चाहता है। वास्तविकता यह है कि संघ ने संविधान में उन सब बदलावों का विरोध किया है, जो उसे कमजोर करने हैं। स्वतंत्र भारत की पहली सरकार ने संविधान लागू होने के कुछ समय बाद से ही संविधान में संशोधन प्रारंभ कर दिए। श्रीगुरुजी संविधान में बार-बार किए जा रहे संशोधनों को लेकर चिंतित थे। उनका मानना था कि संविधान देश को संगठित और शक्तिशाली बनाने का आधार है। उनका कहना था कि सरकार द्वारा बार-बार संशोधन करने से संविधान की प्रतिष्ठा कम होती है। उनकी पीड़ा यह थी कि संविधान के प्रति जो ‘पवित्रता का भाव’ होना चाहिए, उसका उल्लंघन किया जा रहा है और जनता को यह संदेश जा रहा है कि संविधान के साथ मनचाहा खिलवाड़ संभव है। श्रीगुरुजी चाहते थे कि शासक वर्ग संविधान का पर्याप्त आदर करे ताकि वह जनता के लिए सदैव पूजनीय बना रहे।

जब हमारी सरकार ने तुष्टीकरण की राजनीति के चलते जम्मू-कश्मीर में ‘दो निशान, दो विधान, दो प्रधान’ की व्यवस्था को स्वीकार करके भारत के राष्ट्रध्वज और संविधान के प्रतिष्ठा के साथ समझौता किया, तब आरएसएस ही था, जिसने संपूर्ण भारत के समान जम्मू-कश्मीर में भी ‘एक निशान, एक विधान, एक प्रधान’ का आंदोलन चलाया। संविधान की सर्वोच्चता स्थापित करने की सबसे पहली और बड़ी यह लड़ाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने ही लड़ी थी।  श्रीगुरूजी ने उस समय कड़े शब्दों में कहा था, “कश्मीर को सुरक्षित रखने का एकमात्र तरीका उसका भारतीय संघ में पूर्ण विलय है। अनुच्छेद-370 के साथ-साथ पृथक ध्वज एवं पृथक संविधान को समाप्त करना आवश्यक है”। भारत की एकता और संविधान की सार्वभौमिकता को पूरे देश में (कश्मीर सहित) लागू करवाने के इस अभियान में संघ के अनेक स्वयंसेवकों ने अपना बलिदान दिया और अंततः एक निर्णायक वैचारिक विजय प्राप्त की।

जब 1975 में देश को आपातकाल के गहन अंधकार में धकेला गया, तब लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन संघ के स्वयंसेवकों ने ही चलाया। आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल 1,30,000 सत्याग्रहियों में से 1,00,000 से अधिक स्वयंसेवक थे। मीसा के अधीन जो 30,000 लोग बंदी बनाए गए, उनमे से 25000 से अधिक संघ-संवर्ग के थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 कार्यकर्ता अधिकांशतः बंदीग्रहों और कुछ बाहर आपातकाल के दौरान बलिदान हो गए। इसी प्रकार, मार्च 1984 में, जब पंजाब में अलगाववाद चरम पर था और अकाली दल के कुछ तत्वों ने संविधान की प्रतियाँ जलाई थीं, तब संघ ने इसका कड़ा विरोध किया था। संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने प्रस्ताव पारित कर कहा था कि स्वर्ण मंदिर में खालिस्तानी झंडा फहराना और संविधान जलाना ‘निंदनीय और राष्ट्रद्रोही कार्य’ है, जिससे किसी भी देशभक्त का चिंतित होना स्वाभाविक है। संविधान के प्रति अप्रतिम निष्ठा रखनेवाले ही उसके सम्मान के लिए इस प्रकार मैदान में उतर सकते हैं। 

संविधान के प्रति संघ का यह दृष्टिकोण प्रारंभ से अब तक अक्षुण्ण है। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी संविधान के प्रति सम्मान को नागरिकों का प्रमुख कर्तव्य मानते हैं। उन्होंने अकसर अपने भाषणों में संविधान के प्रति संघ की भावना को स्पष्ट रूप से सबके सामने रखा है। पंच परिवर्तन में ‘नागरिक कर्तव्यों का पालन’ संविधान की भावना को जन-जन तक पहुँचा ही है।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 25 जनवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

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