इतिहास के पृष्ठों पर कुछ ऐसे व्यक्तित्वों की अमर कहानियां दर्ज हैं, जिनका कद किसी पुरस्कार या सम्मान से कहीं अधिक बड़ा होता है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर ऐसा ही एक नाम है, जिन्होंने अपना सर्वस्व भारत माता की सेवा में समर्पित कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बीते दिन मुंबई में जो बात कही, वह न केवल वीर सावरकर के प्रति श्रद्धा रखनेवाले बंधुओं की भावनाओं का प्रतिबिंब है, बल्कि राष्ट्र के उस उत्तरदायित्व की ओर भी संकेत है जिसे पूरा किया जाना बाकी है। उनका यह कथन कि "वीर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है, तो यह सम्मान खुद इस पुरस्कार की गरिमा को बढ़ाएगा," भारत के नायकों के प्रति अपनी कृतज्ञता का स्मरण कराता है। वीर सावरकर का गौरवपूर्ण स्मरण करने में किंचित भी संकोच नहीं होना चाहिए। वीर सावरकर और उनके परिवार ने भारत की स्वतंत्रता और समाज सेवा के लिए जिस प्रकार का बलिदान दिया, उसकी किसी के साथ तुलना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि कुछ कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के दुष्प्रचार के बावजूद राष्ट्रभक्त नागरिकों के हृदय में वीर सावरकर के प्रति अथाह श्रद्धा है। इसलिए देश को बेसब्री से प्रतीक्षा है कि वीर सावरकर को यथाशीघ्र भारत रत्न से सम्मानित किया जाए। करोड़ों लोगों की इसी आकांक्षा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वर दिया है।
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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026
मंगलवार, 4 अगस्त 2015
बनाना होगा धरती को जीने लायक
ह म सबके हृदय द्रवित हैं। आँखें नम हैं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति, वैज्ञानिक और भारत रत्न डॉ. एपीजे कलाम चले गए। असल मायने में वे गए नहीं हैं बल्कि हमारे दिलों में और गहरे उतर गए हैं। यह मौका है, जब हमें कलाम साहब के सिद्धांतों को अपने व्यक्तित्व में उतार लेना होगा। वे चाहते थे कि उन्हें हमेशा शिक्षक के रूप में याद रखा जाए। संभवत: इसीलिए अपने पीछे एक अहम पाठ छोड़ गए हैं। एक बड़ा व्याख्यान, जो आईआईएम शिलांग में देना था- 'धरती को जीने लायक कैसे बनाया जाए।' उनके इस पाठ को हमें स्वयं भी बार-बार पढऩा है, जीवन में उतारना है और दूसरों को भी पढ़ाना है। उनके पाठ को आगे बढ़ाने के लिए प्रत्येक भारतीय को संकल्प लेना होगा।
शनिवार, 25 जुलाई 2015
भारत को नहीं दिखा अपना 'रत्न'
हॉ की के जादूगर के नाम से दुनिया में जिसने भारत का मान बढ़ाया, उसका सम्मान भारत नहीं कर सका। कैसी विचित्र स्थिति है, राष्ट्रीय खेल के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले मेजर ध्यानचंद को भारत सरकार सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित नहीं कर सकी है। लेकिन, दूसरा राष्ट्र (इग्लैण्ड) 25 जुलाई को उन्हें 'भारत गौरव' सम्मान से सम्मानित करने जा रहा है। इग्लैण्ड को तो भारत का गौरव दिख गया लेकिन भारत को अब तक अपना 'रत्न' क्यों नहीं दिख सका है? जबकि 'भारत रत्न अवॉर्ड' का जब भी जिक्र आता है, तब प्रत्येक भारतवासी बड़ी उम्मीद से सरकार की ओर देखता है कि अबकी बार तो 'हॉकी के जादूगर' को सर्वोच्च सम्मान मिल जाएगा। लेकिन, आखिर में पूरे देश को निराश ही होना पड़ता है।
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