रविवार, 4 जनवरी 2026

किसी की प्रतिक्रिया या विरोध में शुरू नहीं हुआ संघ

संघ शताब्दी वर्ष : संपूर्ण हिन्दू समाज को एकजुट कर, भारत को परमवैभव पर पहुँचाने के संकल्प से जन्मा है संघ 

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा का अवलोकन करने पर बहुत रोचक और आश्चर्यजनक बातें सामने आती हैं। संघ को लेकर जितने प्रकार के नैरेटिव समाज में चलते हैं, उनमें से ज्यादातर संघ विरोधियों ने फैलाए हैं। यानी जो संघ को जानते नहीं है, मानते नहीं हैं, उन्होंने समाज को बताने का प्रयास किया कि संघ क्या है और कैसा है। अनेक अवसरों पर संघ के हितैषी भी संघ की वास्तविक प्रतिमा समाज के सामने रखने में चूके हैं। शताब्दी वर्ष के प्रसंग को निमित्त मानकर संघ ने तय किया है कि समाज के सामने संघ को संघ के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाए। संघ के बारे में वास्तविक और अधिकृत जानकारी रखी जाए, ताकि समाज पर छाए भ्रम के बादल कुछ हद तक छंट जाएं। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक एवं सरकार्यवाह के प्रवास देशभर में हो रहे हैं। देश के चार प्रमुख केंद्रों- दिल्ली, बेंगलुरू, कोलकाता और मुम्बई में तो सरसंघचालक जी की विशेष व्याख्यानमालाएं हो रही हैं। इसके अलावा अन्य स्थानों पर भी समाज के विभिन्न वर्गों के साथ उनका संवाद हो रहा है। इसी क्रम में 2-3 जनवरी, 2026 को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का प्रवास हुआ। इस अवसर पर वे चार कार्यक्रमों- युवा संवाद, प्रमुख जन गोष्ठी, सामाजिक सद्भाव बैठक और शक्ति संवाद में सम्मिलित हुए। अपने इस प्रवास में उन्होंने महत्वपूर्ण तथ्य समाज के सामने रखे, जो निश्चित ही संघ के बारे में देखने का नया नजरिया देते हैं। 

संघ विरोधियों ने एक भ्रम पैदा किया कि संघ प्रतिक्रियावादी संगठन है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि संघ किसी की प्रतिक्रिया में शुरू हुआ संगठन नहीं है। संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा भी नहीं है। संघ का जन्म क्यों हुआ? उन्होंने बताया कि संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने देश-समाज के हित में चलने वाले सभी प्रकार के कार्यों में सहभागिता की। क्रांतिकारी संगठन में शामिल हुए। क्रांतिकारियों से जुड़ने के लिए डॉक्टर साहब योजनापूर्वक कोलकाता पढ़ने गए क्योंकि उस समय कोलकाता क्रांतिकारियों का गढ़ था। वहाँ से लौटकर उन्होंने राजनीतिक आंदोलनों का अनुभव भी लिया। स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाग लिया। यह सब काम करते हुए वे भारत की स्थितियों को लेकर चिंतन-मंथन करते थे। 

बालगंगाधर तिलक, वीर सावरकर, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय और डॉ. भीमराव अंबेडकर सहित उस समय के कई महापुरुषों के साथ देश की परिस्थितियों को लेकर उनकी चर्चा हुई है। उनको ध्यान आया कि बाहर से आने वाले मुट्ठीभर लोग, जो हमसे कमतर हैं, इसके बाद भी हमको, हमारे घर मे आकर ही पराजित कर देते हैं। हम स्वतंत्र होने ही वाले हैं लेकिन फिर से पराधीन नहीं होंगे, इसकी क्या गारंटी है। उन्होंने भारतीय समाज की नब्ज को पकड़ा। हजार वर्षों के संघर्ष के कारण भारतीय समाज मानसिक दासता का शिकार हो गया था। जब तक भारत के मूल समाज को आत्मदैन्य की स्थिति से बाहर निकालकर उसके मन में आत्मगौरव का भाव नहीं जगाएंगे, तब तक हम कमजोर ही रहेंगे। स्वाधीनता को सुनिश्चित और स्थायी करने के लिए समाज को ‘स्व’ का बोध कराना आवश्यक होगा। भारत के भाग्य को बदलना है तो इस समाज को ठीक करना होगा। यह सब विचार करके ही डॉ. हेडगेवार ने तय किया कि समाज में एकता और गुणवत्ता स्थापित करने के लिए संघ का कार्य प्रारंभ करना चाहिए। उन्होंने संघ की घोषणा करने के बाद कई प्रयोग किए। लगभग 14 वर्ष कार्य के बाद संघ की विशिष्ट कार्य पद्धति विकसित हुई। इस कार्यपद्धति में किसी का विरोध और किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं अपितु स्वाभाविक रूप से हिन्दू समाज के स्वाभिमान को जगाने का अभ्यास है। 

संघ के स्वयंसेवक जो प्रतिज्ञा करते हैं, उसमें किसी का विरोध नहीं अपितु सबके कल्याण की बात है। संघ भारत के उस विचार को जीता है, जो विश्व को परिवार मानकर सबके हित की चिंता करता है। संघ अपने जन्म से ही एक लक्ष्य लेकर चल रहा है कि संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन कर, अपने धर्म-संस्कृति का संरक्षण कर, अपने भारत को परम वैभव पर लेकर जाना है। संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक यह प्रतिज्ञा करता है।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 4 जनवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

संघ इसलिए भी प्रतिक्रियावादी संगठन नहीं हो सकता क्योंकि यह समाज में अपनी अलग पहचान नहीं देखता है। सरसंघचालक डॉ. भागवत जी ने इस संदर्भ में कहा कि संघ ने प्रारंभ से तय किया कि हमें समाज में ‘दबाव समूह’ के तौर पर संगठन खड़ा नहीं करना है। अपितु सम्पूर्ण हिन्दू समाज का ही संगठन करना है। कहने का अर्थ है कि संघ, समाज में अलग से संगठन के तौर पर अपनी पहचान नहीं चाहता है। याद रखें कि जो संस्थाएं या संगठन किसी प्रतिक्रिया में शुरू होते हैं, वे अपनी पहचान भी चाहते हैं और समाज में दबाव समूह के रूप में भी काम करते हैं। 

सरसंघचालक जी ने कितनी महत्वपूर्ण बात कही कि किसी देश के भाग्य का निर्धारण वहाँ के नेता, नीति, सरकार, अवतार तय नहीं कर सकते। देश को बड़ा बनाने का काम तो वहाँ का गुण सम्पन्न समाज ही करता है। नेता, नीति और सरकार तो इस कार्य में सहायक भर हो सकते हैं। यदि समाज योग्य नहीं है, तब वह अच्छे नेताओं का भी उपयोग नहीं कर सकता। इसलिए समाज को गुण सम्पन्न बनाना सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए। संघ, शाखा के माध्यम से ऐसे कार्यकर्ताओं का समूह खड़ा करने का काम कर रहा है, जो इस प्रकार का समाज बनाएंगे। संघ की 100 वर्षों की यात्रा को देखें तो यह व्यक्ति निर्माण से समाज और राष्ट्र निर्माण का स्वाभाविक आंदोलन है।

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