शनिवार, 17 जनवरी 2026

पत्रकारिता के खट्टे-मीठे अनुभवों की पोटली

देखें वीडियो : अब मैं बोलूंगी….


‘अब मैं बोलूंगी…’ यह पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार स्मृति आदित्य की यादों की पोटली है, जिसमें कुछ खट्टे तो कुछ मीठे संस्मरण शामिल हैं। 15 वर्षों से अधिक फीचर संपादक के रूप में और स्वतंत्र लेखन करते हुए, उन्हें जो अनुभव आए, उन सबको वे अपनी डायरी में दर्ज करती करती गईं। इनमें अखबार के दफ्तर की राजनीति के किस्से, साहित्य चोरी के प्रसंग और अपने मन की अनुभूतियों का ऐसा ब्यौरा दर्ज है, जो सबको सीख देता है। यह पुस्तक मुख्यत: स्मृति आदित्य के उस समय की मन:स्थिति को सामने लाती है, जब उनको पता चलता है कि 15 साल से अधिक की ऑनलाइन पत्रकारिता की उनकी नौकरी अब जा रही है। यह स्थिति किसी को भी विचलित कर सकती है कि जब आपको पता न हो कि आगे क्या करना है? लेकिन खुद पर विश्वास हो तब आप ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में भी स्वयं को संभाल लेते हो। जुलाई से दिसंबर तक लिखी डायरी में उन्होंने पत्रकारिता की अपनी शुरुआत, उससे जुड़े सपनों एवं वहाँ की कठिनाइयों को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि पढ़कर ऐसा लगता है- यह तो मेरी ही कहानी है। इस पुस्तक को ‘शिवना कृति सम्मान-2025’ भी प्राप्त हुआ है।

डायरी लिखना क्यों जरूरी है? इस प्रश्न के साथ ही पुस्तक के पहले अध्याय की शुरुआत होती है। इसका बढ़िया दार्शनिक उत्तर उन्होंने दिया है- “लिखना जरूरी है ताकि मन उड़ सके अपने मुताबिक”। दरअसल, लिख देने से मन खाली हो जाता है, अच्छे विचारों के लिए। और जब अच्छे प्रसंग लिख देते हैं, तो मन रचनात्मकता से भरकर प्रसन्न हो उठता है। इसलिए लिखना जरूरी है। प्रतिकूल परिस्थिति में जब हम अपने मन से बेकार की बातों को खाली करके, अपनी रुचि को जीने के लिए दो कदम बढ़ाते हैं, तो डिप्रेशन में जाने से भी बच जाते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार स्मृति आदित्य जोशी की पुस्तक 'अब मैं बोलूंगी...'

लेखिका ने उन कठिन अवसरों को भी याद किया है, जब हमारे काम पर कोई अपना नाम चिपका देता है। हम मेहनत से समाचारपत्र-पत्रिका के पृष्ठ तैयार करते हैं और अचानक से कोई विज्ञापन आ जाता है, तब मन को मारकर पठनीय सामग्री को विज्ञापन के साथ ‘एडजस्ट’ करना होता है। हालांकि, यह काम का हिस्सा है लेकिन कष्ट तो होता है। जैसे हम आँगन में रंगोली बनाएं और खुद ही किसी के दबाव में उसे बिगाड़ दें। एक-दो पृष्ठों पर उन्होंने समाचारपत्रों में आए ‘कॉरपोरेट कल्चर’ के गंभीर खतरों की ओर भी संकेत किया है। कैसे पत्रकारिता के आनंद को हमने काम के अत्यधिक दबाव में समाप्त कर दिया है। संपादकीय कक्ष में फिर से उस बौद्धिक वातावरण को अतीत से खींचकर लाने की जरूरत है, जो हमें मानसिक थकान नहीं देता था अपितु हमारी बौद्धिक चेतना को समृद्ध करता था। बहुत ही सुंदर ढंग से उन्होंने लिखा है- “दीमक लग रही है दिगामों में… एक जैसा वर्क कल्चर खा रहा है उन्हें… या तो समय पर बाहर ले जाकर धूप दिखायी जाए या धूप के टुकड़े भीतर लेकर आने का साहस किया जाए…”। 

अपने इन संस्मरणों में उन्होंने ‘साहित्य चोरी’ की मानसिकता को भी उजागर किया है। हमारे आसपास कई लोग हैं, जिनको लिखना तो नहीं आता लेकिन लेखक बनने की दिली इच्छा रहती है। ये लोग बड़ी बेशर्मी से दूसरों के लेख उठाकर अपने नाम से प्रकाशित करा लेते हैं। अकसर हम लोग ऐसे लोगों को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन स्मृति आदित्य ने तो ठान रखा था कि बहुत हुआ, ऐसे लोगों के विरुद्ध ‘अब मैं बोलूंगी…’। बहुत रोचक प्रसंग हैं, पढ़कर आपको आनंद आएगा और आश्चर्य भी होगा। ‘लाड़ली मीडिया अवार्ड’ पुरस्कृत अपनी फीचर स्टोरी को भी उन्होंने पुस्तक में शामिल किया है, जिनको अवश्य ही पढ़ा जाना चाहिए।

अपनी पुस्तक ‘अब मैं बोलूंगी…’ में लेखिका स्मृति आदित्य ने केवल स्याह पक्ष को ही नहीं दिखाया है अपितु पत्रकारिता के उजले पक्ष की बात भी की है। उनके कई प्रसंग पत्रकारिता एवं पत्रकारों के प्रति हमारे दृष्टिकोण को संवेदनशील बनाता है। डायरी को खत्म करते समय वे लिखती भी हैं कि “मुझे इस किताब के माध्यम से न तो किसी पर दोषारोपण करना है न ही किसी मालिक या संपादक के खिलाफ मोर्चा खोलना है… मैं हर हाल में खुश रहने वाली लड़की बस इतना चाहती हूँ कि इस पेशे की नैतिकता को यथासंभव बचाया जाए ताकि आने वाली पत्रकारीय नस्ल और फसल हरी रहे, लहलहाती रहे…”। यह पुस्तक पत्रकारिता में शीर्ष पदों पर बैठे महानुभावों के साथ इस पेशे से जुड़े सभी लोगों को पढ़नी चाहिए। 


पुस्तक : अब मैं बोलूँगी…

लेखक : स्मृति आदित्य

मूल्य : 150 रुपये (पेपरबैक)

पृष्ठ : 78

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, सीहोर, मध्यप्रदेश

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