शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

सरकारी दखल पर है सुप्रीम कोर्ट को आपत्ति, लेकिन 'अंकल जज' का क्या करें

 सु प्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक्ट (एनजेएसी) को असंवैधानिक बताकर खारिज कर दिया है। न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने के उद्देश्य से भाजपानीत एनडीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए अगस्त-2014 में इस आयोग का गठन किया था। इसके लिए संविधान में 99वां संशोधन भी किया गया था। केन्द्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आश्चर्य जताते हुए कहा है कि न्यायिक व्यवस्था में सुधार के लिए यह कानून जरूरी था। संसद के दोनों सदनों ने कानून को पारित किया था। उन्होंने अपने बयान में यह भी कहा है कि एनजेएसी को 20 राज्यों का समर्थन प्राप्त है। इस हिसाब से देखें तो भारत में न्यायिक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत केवल एनडीए सरकार ही नहीं बल्कि देश महसूस कर रहा है।
       वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में वरिष्ठ न्यायमूर्तियों की नियुक्ति 22 साल पुराने कॉलेजियम सिस्टम से होती है। इस सिस्टम में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति के अलावा चार वरिष्ठ न्यायमूर्तियों का पैनल सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण की सिफारिशें करता है। यहां सवाल हैं कि आखिर जजों को ही जज चुनने का अधिकार क्यों होना चाहिए? जजों के चुनाव के लिए अलग से न्यायिक आयोग की आवश्यकता क्यों नहीं होनी चाहिए? जैसे, लोक सेवकों के चयन के लिए लोकसेवा आयोग है। निष्पक्षता से जनप्रतिनिधियों का चुनाव हो सके, इसके लिए चुनाव आयोग है। किस व्यवस्था में समान पद पर नियुक्ति का अधिकार उसी पद पर बैठे लोगों को है? 
        न्यायपालिका पर लग रहे प्रश्न चिह्नों से निजात पाने के लिए जजों की नियुक्ति, पदोन्नति, स्थानांतरण से लेकर भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर कार्रवाई का फैसला लेने के लिए स्वंतत्र न्यायिक आयोग की आवश्यकता है। सरकार के आयोग का समर्थन कर रहे विद्वानों का मानना है कि कॉलेजियम सिस्टम में पक्षपात की आशंका रहती है। पैनल कई बार योग्यता की अनदेखी कर अपनी पसंद को तरजीह दे देता है। 
       सब जानते हैं कि 'अंकल जज' के आरोप लगते ही रहे हैं। वर्ष 2009 में देश की संवैधानिक संस्था लॉ कमीशन ने अपनी 230वीं रिपोर्ट में ये कहकर देश में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि अब तक जजों की नियुक्ति के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है उससे देश में 'अंकल जजेस' की संख्या बढ़ती जा रही है। इस बात के प्रमाण भी मौजूद हैं कि बड़ी संख्या में बड़े वकीलों और जजों के बेटे-बेटियां और रिश्तेदार सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जज हैं। कई की योग्यता पर प्रश्नचिह्न भी उठाए गए हैं। 
       संविधान के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जज बनने के लिए दस साल का अनुभव आवश्यक है। अब सवाल उठता है कि अनुभव किस तरह का? कितना गहरा? ये सवाल इसलिए है क्योंकि कई वकील दस साल के करियर में महज दो-चार केस का अनुभव हासिल करके ही जज बन गए। 
        यदि नया कानून लागू होता तो जजों के चयन में भाई-भतीजावाद की आशंका खत्म हो सकती थी। एनजेएसी में मुख्य न्यायमूर्ति, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायमूर्ति, केन्द्रीय कानून मंत्री के अलावा दो विद्वानों को शामिल करने का प्रस्ताव था। आयोग में विविध क्षेत्र के लोग शामिल होने से पक्षपात की आशंका स्वत: कम हो जाती है। नये कानून को खारिज करने वाली पांच जजों की बेंच ने आयोग में दो विद्वानों (जानकारों) को शामिल किए जाने के निर्णय पर ही प्रश्न खड़ा किया है। दरअसल, इन दो विद्वानों का चयन मुख्य न्यायमूर्ति, प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष (लोकसभा) की समिति को करना था। इस पर ही बेंच को सबसे अधिक एतराज था। 
        खैर, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम सिस्टम को ही जारी रखना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि नई व्यवस्था से जजों की नियुक्ति में राजनीति का हस्तक्षेप बढ़ जाता। बहरहाल, यह बात दीगर है कि राजनीति का हस्तक्षेप तो अब भी है। न्यायमूर्ति जेएस खेहड़, जे. चेलमश्वेर, एमबी लोकुर, कुरियन जोसेफ और एके गोयल की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि नया कानून असंवैधानिक है क्योंकि यह न्यायपालिका की आजादी में दखल देगा। भले ही आज सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को खारिज कर दिया हो लेकिन आज नहीं तो कल न्यायपालिका में पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए कुछ उपाय तो करने ही पड़ेंगे। क्योंकि, जनता न्यायपालिका से शुद्ध न्याय की अपेक्षा करती है।

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