शनिवार, 12 सितंबर 2015

'हिन्दी भाषा' पर मंथन

 द सवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में 'हिन्दी भाषा' पर मंथन शुरू हो गया है। देश-दुनिया से 'हिन्दी भाषा' के विद्वान और हिन्दी प्रेमी हिन्दी हृदयप्रदेश की राजधानी भोपाल में सिर जोड़कर बैठ चुके हैं। विमर्श के अनेक दौर चलेंगे। हिन्दी का विकास कैसे किया जाए? हिन्दी का विस्तार कैसे किया जाए? किन-किन क्षेत्रों में हिन्दी के विस्तार की संभावनाएं हैं? समृद्ध और ताकतवर भाषा होने के बाद भी हिन्दी कहाँ और क्यों पिछड़ गई? सब मुद्दों पर चर्चा होगी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का एजेंडा भी स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा है कि यह सम्मेलन हिन्दी भाषा की उन्नति पर केन्द्रित है, हिन्दी साहित्य पर नहीं। श्रीमती स्वराज ने यह भी कहा कि पिछले नौ सम्मेलनों में ही भाषा की उन्नति पर ध्यान दिया होता तो आज हमें हिन्दी के संवर्धन और संरक्षण की चिंता नहीं करनी पड़ती। यह अच्छी बात है कि विदेश मंत्री ने इसका अध्ययन किया है कि हिन्दी को आगे बढ़ाने में क्या चूक हो रहीं थी। लेकिन, यह भी सच है कि भले ही पिछले विश्व हिन्दी सम्मेलन साहित्य पर केन्द्रित रहे हों लेकिन उनके माध्यम से भी दुनिया में हिन्दी का झंडा बुलंद हुआ। कहीं न कहीं हिन्दी की गूंज दुनिया में पहुंची। हिन्दी के लिए नींव डाली। अब देखना होगा कि दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के जरिए उस नींव पर कैसे हिन्दी का विशाल और भव्य भवन तैयार किया जाएगा?
         बहरहाल, साहित्य से आगे जाकर हिन्दी के वास्तविक विकास के लिए 'भाषा' को विश्व हिन्दी सम्मेलन का केन्द्र बनाया गया है, इसके लिए विदेश मंत्री, उनका मंत्रालय और भारत सरकार बधाई के पात्र हैं। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन को लेकर सरकार का संकल्प नई आशाएं जगा रहा है। हिन्दी जगत के विस्तार की नई संभावनाएं दिख रही हैं। उद्घाटन के बाद विदेश मंत्री श्रीमती स्वराज ने हिन्दी प्रेमी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भरोसा दिलाया है कि अब तक के सम्मेलनों की अपेक्षा यह सम्मेलन अधिक परिणाममूलक होगा। सम्मेलन में विमर्शों से जो सुझाव निकलकर सामने आएंगे, उनके अमल के लिए ईमानदारी से प्रयास किए जाएंगे। 
       वास्तव में, हिन्दी को बचाना है, व्यवहार में लाना है और हिन्दी का विस्तार करना है तो 'ऊपर' से प्रयास की जरूरत है।सरकारी दफ्तरों में साहब ही अंग्रेजीदां होते हैं, सामान्य कर्मचारी तो हिन्दी ही सुगमता से समझते हैं। प्रशासन में बड़े-बड़े अफसर अंग्रेजी में नोटशीट लिखते हैं, अंग्रेजी में व्यवहार करते हैं, इस कारण बेचारे बाबुओं को मजबूरी में हिन्दी छोड़कर टूटी-फूटी अंग्रेजी सीखनी पड़ती है। साहबों को अंग्रेजी का मोह छोडऩा पड़ेगा। हमारे राजनेता मातृभाषा में वोट मांगकर संसद-विधानसभा में पहुंचते हैं लेकिन वहां पहुंचते ही अंग्रेजी बोलने लगते हैं। जनता की भाषा का साथ छोड़ देते हैं। उनके इस कृत्य से जनमानस में क्या संदेश जाता है? जरूरी अंग्रेजी श्रेष्ठ भाषा है। हिन्दी छोड़कर ही बड़ा नेता बना जा सकता है। संसद-विधानसभा में माननीय अपनी मातृभाषा में बात करें तो अधिक उचित होगा। आम आदमी, जो अंग्रेजी का ए-बी-सी-डी नहीं जानता, उसके मुकदमे का फैसला भी अंग्रेजी में होता है। वह अपनी मातृभाषा में अपना फैसला चाहता है। न्यायालय को अंग्रेजी का मोह छोड़कर हिन्दी या संबंधित राज्य की आधिकारिक भाषा में फैसले देने चाहिए। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा में भी हिन्दी को बढ़ावा दिया जाए, इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है? 
       संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी, पत्रकारिता, शिक्षण, विज्ञान, विधि एवं न्याय, शासन-प्रशासन और विदेश नीति में हिन्दी का विस्तार कैसे किया जा सकता है? तीन दिन के सम्मेलन में लगभग इन सभी बिन्दुओं पर गहन विमर्श होना है। जैसा कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संकल्प लिया है कि वे मंथन से निकले अमृत को यथार्थ में लाने का प्रयास करेंगी। अब देखना होगा कि दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में हो रहे मंथन से निकलने वाले अमृत से हिन्दी भाषा का कितना कल्याण होता है?

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