रविवार, 20 सितंबर 2015

कम्युनिस्टों की सांप्रदायिक सियासत, महान संत श्रीनारायण गुरु का अपमान

 वा मपंथी दल धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढऩे का ढोंग करते हैं। उनकी धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है हिन्दू विरोध या फिर हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाना। वामपंथी संगठनों और राजनीतिक दलों का इतिहास रहा है कि उन्होंने सदैव भारतीय परंपराओं का निरादर ही किया है। केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने जन्माष्टमी के दिन ऐसी ही एक हरकत की है। सियासी फायदे के लिए माकपा ने जन्माष्टमी के आयोजन का ढोंग रचा। केरल के हिन्दू समाज को घोर आश्चर्य हुआ कि माकपा का रंग कैसे बदल रहा है? माकपा और जन्माष्टमी? योगेश्वर श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का आयोजन माकपा करेगी! हिन्दू समाज आशंकित था कि माकपा जरूर उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयत्न करेगी। माकपा ने किया भी वही। हिन्दू समाज का अपमान। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी समर्थित संगठन बालासंघम की ओर से शोभायात्रा का आयोजन किया गया। शोभायात्रा में भारत के महान संत एवं समाज सुधारक श्रीनारायण गुरु को कम्युनिस्टों ने सलीब पर टांग दिया। इतना ही नहीं, श्रीगुरु के संदेश 'मानव के लिए एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वर' को विकृत तरीके से पेश किया गया। उनके संदेश को इस तरह प्रदर्शित किया गया कि मानो श्रीनारायण गुरु कह रहे हों- 'दुनियावालों सब ईसाई हो जाओ।' 'ईसाई बाना' पहनाकर जिस तरह माकपा ने श्री नारायण गुरु को अपमानित किया है, ऐसे घोर निंदनीय कृत्य वह पहले भी कई बार कर चुकी है। नम्बूदिरीपाद और बाद में नयनार के मुख्यमंत्रित्व काल में कम्युनिस्टों ने राज्यभर में श्री नारायण गुरु की प्रतिमाओं को ध्वस्त किया था।
        केरल के हिन्दू समाज और संगठनों ने माकपा के इस कुकृत्य पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा है कि कम्युनिस्टों ने न केवल हिन्दू समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है बल्कि एक महान संत का भी अपमान किया है। यह क्षमा करने वाला अपराध नहीं है। हिन्दू समाज की ओर से कम्युनिस्टों से बड़ा सवाल है, आखिर क्यों उन्होंने महान संत का अनादर किया? हिन्दुओं के प्रति द्वेषपूर्ण व्यवहार से उन्हें क्या हासिल होता है? सांप्रदायिक होकर भी कम्युनिस्ट खुद को धर्म निरपेक्ष क्यों कहते हैं? इस्लाम और ईसाइयत से प्रेम लेकिन, हिन्दुत्व से चिढ़ क्यों? मुस्लिम और ईसाई वोट बैंक की राजनीति करने वाले कम्युनिस्ट दल अब इतनी ओछी हरकत पर उतर आए हैं कि धर्म से ऊपर, सबके लिए स्मरणीय और प्रेरणा के स्रोत संत श्रीनारायण गुरु का अपमान करेंगे? केरल का हिन्दू समाज ही नहीं बल्कि मुस्लिम और ईसाई समाज भी संभवत: इस तरह की राजनीति को धिक्कारेगा। माकपा के इस प्रकार के कृत्यों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। राज्य में बड़ी आबादी वाले एझवा समुदाय के प्रमुख सामाजिक संगठन श्रीनारायण धर्म परिपालना (एसएनडीपी) योगम् ने गुरु को इस तरह पेश करने पर माकपा की निंदा की है। योगम् महासचिव वेल्लापल्ली नटेसन ने कहा कि गुरु महान सामाजिक सुधारक थे। उन्होंने राज्य के पुनरुत्थान का मार्ग प्रशस्त किया। जो भी उन्हें खराब तरह से पेश करेगा, उसे नतीजे भुगतने होंगे। सैकड़ों एसएनडीपी कार्यकर्ताओं ने माकपा पर गुरु और उनकी विचारधारा का अपमान करने का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन भी किया है। विश्व हिंदू परिषद ने कहा कि गुरु का अपमान करने की माकपा की कोशिश हिंदू समुदाय के लिए एक चुनौती है। वहीं, एलुवा आधारित अद्वैत आश्रम के सचिव स्वामी शिवस्वरूपानंद ने भी श्रीगुरु के अपमान के लिए माकपा की ओछी राजनीति को जिम्मेदार ठहराया है। 
      लेकिन, माकपा अपनी गलती स्वीकार कर पूरे देश से माफ़ी मांगने की जगह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिन्दू संगठनों पर दोष डालने की निम्न कोटि की चालबाजी दिखा रही है। माकपा के राज्य सचिव के. बालासुंदरम मीडिया में आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि उनकी पार्टी ने नारायण गुरु का अपमान नहीं किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का दुष्प्रचार है कि माकपा ने गुरु का अपमान किया है। पार्टी ने गुरु की विचारधारा का बस सही रुख पेश करने की कोशिश की जिसे संघ ने विकृत कर दिया था। माकपा का 'सही रुख' क्या है, यह शोभायात्रा में सबने देखा था। सोशल मीडिया पर वायरल हुए शोभायात्रा के फोटो में भी माकपा का 'सही रुख' स्पष्ट दिख रहा है। माकपा का कृत्य सांप्रदायिक राजनीति की हद है। कम्युनिस्ट पार्टियों के चेहरे से धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील का मुखौटा नोंचकर फेंकने का वक़्त है। वरना, कल ये किसी और संत, समाज सुधारक और महापुरुष की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करेंगे। केरल सहित कुछ अन्य प्रान्तों की जनता को कम्युनिस्ट मोहजाल से बाहर निकलकर देखना होगा कि कम्युनिस्टों को सत्ता सौंपने के कारण न केवल उस प्रान्त को बल्कि समूचे भारत और भारतीय परम्पराओं को कितना नुक्सान पहुंचा है। दुनिया के तमाम देशों ने कम्युनिस्टों की संकीर्ण राजनीति को जड़ से उखाड़कर फेंक दिया है। अब समय आ गया है कि भारत में भी यहाँ-वहां खरपतवार की तरह उगी कम्युनिस्ट राजनीति की जड़ों में मट्ठा डाल दिया जाये। 
        श्रीनारायण गुरु का जन्म दक्षिण केरल के एक साधारण परिवार में वर्ष 1854 में हुआ था। बचपन से धार्मिक और सामाजिक रुझान वाले श्रीगुरुजी परम तत्व की खोज में अरुविप्पुरम आ गये थे। वहां घने जंगल में कुछ दिन एकांतवास में बिताए। उस वक्त मंदिरों में प्रवेश को लेकर अनेक प्रकार की वर्जनाएं लागू थीं। अकसर श्रीनारायण गुरु सोचा करते थे कि मंदिर ऐसा होना चाहिए, जिसमें किसी किस्म का कोई भेदभाव न हो। न धर्म का, न जाति का और न ही आदमी और औरत का। दक्षिण केरल में नैयर नदी के किनारे एक जगह है, अरुविप्पुरम। केरल का खास तीर्थ स्थल। श्रीनारायण गुरु ने यहां ऐसा ही एक मंदिर बनवाया, जिसके दरवाजे सबके लिए खोले गए। श्रीगुरु को समाज के सवर्ण वर्ग का कड़ा विरोध झेलना पड़ा। लेकिन, जातिबंधन तोडऩे, छुआछूत खत्म करने और ऊंच-नीच की खाई पाटने के लिए श्रीगुरु अपने पथ पर आगे बढ़ते गए। ऐसे महान संत का अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं है। माकपा हो या दूसरी पार्टियां, किसी को भी, किसी भी संत का, अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं हैं। 

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