सोमवार, 22 दिसंबर 2014

हिन्दुत्व का सिपाही

 दु नियाभर का काम, सांसद होने से बाय प्रोडक्ट मिली तमाम व्यस्तताएं और सामाजिक गतिविधियों में सक्रियता के बाद भी आप उन्हें नियमित पढ़ पाते हैं, राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का मजबूती से पक्ष रखने के लिए कटिबद्ध तरुण विजय ही यह कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साप्ताहिक समाचार-पत्र पाञ्चजन्य के पूर्व संपादक के नाते भी हम सब उन्हें जानते हैं। वर्ष 1961 में जन्मे तरुण विजय महज 25 वर्ष की आयु में दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन आरएसएस के मुखपत्र 'पाञ्चजन्य' के संपादक हो गए और लगातार 22 साल तक यहां रहे।
      तरुण विजय के तर्क, विमर्श क्षमता, स्वाध्याय और लेखनी की ताकत है कि वामपंथी विचारधार की ओर झुके समाचार-पत्र जनसत्ता में उनका कॉलम 'दक्षिणावर्त' सर्वाधिक लोकप्रिय है। वे अपने विरोधियों को तर्कों से चित करते हैं। वे खुलेमन के हैं, विरोधियों का स्वागत करते हैं, उनसे सार्थक संवाद की परम्परा बनाने की कोशिश करते हैं। तरुण विजय और पाञ्चजन्य तब बहुत चर्चा में आए जब उन्होंने कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का साक्षात्कार पाञ्चजन्य में छाप दिया। मीडिया, कांग्रेस, भाजपा और आरएसएस में हंगामा खड़ा हो गया। लेकिन, यही तो सच्चा लोकतंत्र है, जहां विरोधी की बात भी सुनी जाती है और उसे समझने का प्रयास भी किया जाता है। 
      संवेदनशील पत्रकार एवं लेखक तरुण विजय पाञ्चजन्य से अलग होने के बाद संघ के प्रचारक होकर वनवासियों के बीच काम करने के लिए दादरा और नगर हवेली चले गए। वंचित और मुख्यधारा से पिछड़े समाज के लिए बेहतर करने की उनकी हमेशा से कोशिश रही है। दलित और जनजातीय समुदाय के लोगों को सम्मान दिलाने के लिए उन्होंने प्रशिक्षित और योग्यता प्राप्त दलित एवं जनजातीय पुजारियों को हिन्दू मंदिरों के गर्भगृह में देवपूजन तथा कर्मकाण्ड का अधिकार प्रदान करने के लिए राज्यसभा में अधिनियम पेश किया।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे तरुण विजय ने अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत प्रतिष्ठित अखबार ब्लिट्ज से की थी। बाद में, खुद को स्वतंत्र पत्रकार के रूप में स्थापित किया। वे टाइम्स ऑफ इंडिया, पायोनियर और जनसत्ता सहित देशभर के तमाम अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लिखते रहे हैं। उन्होंने वामपंथी कलुषगाथा, समरसता के सूत्र, मानसरोवर यात्रा सहित कई किताबों का संपादन और लेखन भी किया है। श्री विजय जितने बड़े पत्रकार, विचारक और लेखक हैं, उतने ही उम्दा फोटोग्राफर भी हैं। सिंध नदी और हिमालय की धवल चोटियां उन्हें फोटोग्राफी के लिए बुलाती हैं। उनके मुताबिक सिंधु नदी की शीतल बयार, कैलास पर शिवमंत्रोच्चार, चुशूल की चढ़ाई या बर्फ से जमे झंस्कार पर चहलकदमी - इन सबको मिला दें तो कुछ-कुछ तरुण विजय नजऱ आएंगे।
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"तरुण जी की पत्रकारिता इस मायने में प्रशंसनीय है कि यहाँ राजनीति का 'र' राष्ट्र के 'र' पर हावी नहीं होता। नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए अनुकरणीय यह वह लीक है जहाँ कलम स्वार्थ के लिए नहीं स्वदेश के लिए उठी है।"
- हितेश शंकर, संपादक, पाञ्चजन्य

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