रविवार, 13 सितंबर 2026

हिन्दी समाचारपत्र में अंग्रेजी शब्दों पर ‘लाल गोले’ लगाकर संपादक के पास पहुँच गए थे सुदर्शन जी

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पाँचवें सरसंघचालक श्री कुप्प. सी. सुदर्शन स्वभाषा के प्रबल पक्षधर थे, हिन्दी में अंग्रेजी की मिलावट वे पसंद नहीं करते थे


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक केएस सुदर्शन भाषा की शुद्धता और व्याकरण को लेकर बेहद संवेदनशील थे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वर्तनी एवं व्याकरण की अशुद्धियों को वे कतई नजरअंदाज नहीं करते थे। भले ही उनकी अपनी मातृभाषा तमिल थी, लेकिन जन्मभूमि एवं कर्मभूमि हिन्दी भाषी क्षेत्र रहा। शायद इसलिए ही हिन्दी से उन्हें गहरा प्रेम था। हालांकि, सुदर्शनजी लगभग 12 भाषाओं पर अधिकार रखते थे। परिवार तमिल था लेकिन पूर्वज वर्षों पहले तमिलनाडु से स्थानांतरित होकर कर्नाटक में बस गए थे इसलिए कन्नड़ ही उनके परिवार की मुख्य भाषा बन गई थी। भाषा प्रेम को लेकर सुदर्शन जी के अनेक प्रेरक प्रसंग प्रचलित हैं। ऐसा ही एक किस्सा भोपाल का है, जब वे सरसंघचालक के दायित्व से मुक्त होकर ‘एक साधारण स्वयंसेवक’ की भाँति रह रहे थे। हिन्दी के हृदय प्रदेश, ‘मध्यप्रदेश’ से प्रकाशित हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र में जब उन्होंने अंग्रेजी के शब्दों की भरमार देखी, तो उन्हें क्षोभ हुआ। समाचारपत्र अपनी प्रतिष्ठा तो इस नाते करता है कि वह हिन्दी का सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रसारित समाचार पत्र है लेकिन हिन्दी भाषा के साथ न्याय नहीं करता है। उन्होंने लाल कलम से भाषा की त्रुटियों और अंग्रेजी के शब्दों पर गोले लगाए। उस रंगे-पुते समाचारपत्र को लेकर संपादक के कक्ष में भी पहुँच गए। सुदर्शनजी ने समाचारपत्र की वह प्रति संपादक की मेज पर रखकर उन्हें हिन्दी में अनावश्यक अंग्रेजी मिलावट के प्रति सचेत किया। यह बातचीत आक्रोश या अभिमान के साथ नहीं हो रही थी, बल्कि उसमें अपनत्व था। संपादक ने भी स्वीकार किया और विश्वास दिलाया कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों की मिलावट और वर्तनी की अशुद्धियों के प्रति सावधान रहेंगे। 

समाचारपत्र समाज को दिशा देने और भाषा का मानक तय करने का माध्यम होता है। यह प्रदेश उन किस्सों का भी साक्षी है, जब समाचारपत्र को पढ़कर लोग अपनी हिन्दी सुधारते और समृद्ध करते थे। इसलिए सुदर्शनजी की यह चिंता उचित ही थी कि यदि समाचारपत्र ही इस तरह की भाषाई और व्याकरण की गलतियाँ करेगा, तो नई पीढ़ी सही भाषा कैसे सीखेगी? एक बात यहाँ स्मरण रखें कि वे अंग्रेजी के विरोधी नहीं थे, केवल स्वदेशी, स्वभाषा और शुद्ध भाषा के आग्रही थे। सुदर्शनजी अंग्रेजी में भी धाराप्रवाह भाषण करते थे। लेकिन जब हिन्दी बोलते थे तब गलती से भी उनके बोलने में अंग्रेजी का शब्द नहीं आता था। मराठी, कन्नड़, तमिल, असमी, बंगाली, उड़िया भी वे धाराप्रवाह बोलते थे। नयी भाषा सीखने में उनका मुकाबला शायद ही कोई कर पाता। एक और बात याद रखें कि वे शुद्धता के आग्रही तो थे लेकिन कठिनता के आग्रही कतई नहीं थे। सुदर्शनजी क्लिष्ट या कठिन हिन्दी के बजाय ऐसी सहज और सरल हिन्दी के पक्षधर थे, जिसे देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग आसानी से समझ सकें। वे भाषा में शुद्धतावाद से ज्यादा उसकी पहुँच को महत्व देते थे।

आरएसएस के पांचवे सरसंघचालक केएस सुदर्शन जी

हम देख रहे हैं कि अंग्रेजी ने हमारी भाषाओं में किस प्रकार घुसपैठ कर ली है। कई बार तो प्रयासपूर्वक भी किसी अंग्रेजी शब्द का हिन्दी विकल्प दिखाई नहीं देता है। लेकिन, सुदर्शन जी ऐसी स्थिति में आखिरी क्षण तक प्रयास करते थे। संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रो. सदानंद सप्रे एक घटना को याद करते हैं, जो बताती है कि अंग्रेजी शब्द के सही विकल्प के लिए उनका प्रयास किस स्तर का रहता था। प्रो. सप्रे कहते हैं- “एक बार मैं एक अंग्रेजी शब्द का सही हिंदी अनुवाद खोज रहा था, परंतु वह नहीं मिल रहा था। इसलिए सुबह लगभग 11:00 बजे मैं सुदर्शन जी के पास गया और उनसे सहायता मांगी। उन्होंने कुछ शब्दकोशों में खोजा, परंतु उन्हें सही शब्द न मिला। चूँकि इसमें काफी समय लग रहा था, तो मैंने सुझाव दिया कि चलो, मैं एक शब्द का प्रयोग कर सकता हूँ, जो सही अनुवाद न भी हो, मगर लगभग उसके नजदीक होगा। चूँकि वे सही शब्द की तलाश में निमग्न थे इसलिए उन्होंने जोर दिया कि मुझे रुकना चाहिए। अब तक मैं परेशान होने लगा था, क्योंकि मुझे कहीं जाना था। मैंने उन्हें कहा कि मुझे कहीं बाहर जाना है। तब उन्होंने कहा कि आप चले जाओ और हम इसके बारे में बाद में कुछ-न-कुछ कर लेंगे। मैंने सोचा कि अब मामला समाप्त हो गया और मैं उसके बाद में भूल गया। उसी दिन दोपहर में लगभग 3:00 बजे मुझे एक फोन आया कि मैं उनसे जाकर मिलूँ। जब मैं वहाँ पहुँचा तो उन्होंने बड़े खुश होकर मुझे बताया कि मुझे सटीक हिन्दी शब्द मिल गया है, जिसकी आपको तलाश थी। तब उन्होंने एक नया शब्दकोश खोला और मुझे वह शब्द दिखाया। उनकी दिनचर्या के अनुसार दोपहर का यह समय उनके आराम के लिए नियत रहता था। मुझे बहुत दु:ख हुआ कि मेरे लिए शब्द ढूंढ़ने के चक्कर में आज वे आराम नहीं कर पाए थे। परंतु, उन्होंने सरलता से मुस्कुराते हुए मुझे कहा कि आप चिंता न करें, मुझे खुशी है कि कम से कम वह शब्द तो मिल गया, जिसकी आपको आवश्यकता थी”। 

हिन्दी के प्रति सुदर्शनजी के प्रेम की अनुभूति करने के लिए एक और प्रसंग से होकर गुजरना आनंददायक रहेगा। तिब्बत के विषय में सुदर्शनजी की गहरी रुचि थी। श्रीगुरुजी के जन्मशताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 2006 में उन्होंने तिब्बतियों के धार्मिक गुरु दलाई लामा से हिमाचल प्रदेश जाकर भेंट की। विजयादशमी के उत्सव में तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री को मुख्य अतिथि के रूप में नागपुर आमंत्रित किया। तिब्बत के समर्थकों के साथ उनका आत्मीय जुड़ाव था। एक बार भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार में तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री प्रो. सामधोंग रिनपोच मुख्य वक्ता के रूप में आए थे। सुदर्शनजी भी उनको सुनने पहुँचे थे। दोनों मित्र थे। इसलिए भाषण के पूर्व उन्होंने रिनपोच से पूछा कि आप अंग्रेजी में बोलेंगे या हिन्दी में? प्रधानमंत्री रिनपोच ने कहा कि वे सोच रहे हैं कि अंग्रेजी में बोलें। तब सुदर्शनजी ने कहा कि मुझे मालूम है कि आप अच्छी हिन्दी बोलते हैं। इसलिए मैं चाहूँगा कि आप अपना भाषण हिन्दी में दें। आप हिन्दी में बोलेंगे तो यहाँ सबको अच्छा लगेगा। प्रधानमंत्री रिनपोच ने सुदर्शनजी के आग्रह को स्वीकार किया और हिन्दी में बोलना शुरू किया, जिस पर श्रोताओं ने करतल ध्वनि से उनका हार्दिक स्वागत किया। 

सुदर्शनजी को जब भी अवसर मिलता वे हिन्दी के विस्तार के लिए प्रयास करते। हिन्दी को वे भारत की संपर्क भाषा के तौर पर देखते थे। इसलिए वे चाहते थे कि अंग्रेजी की बजाय हम हिन्दी को आगे बढ़ाएं। गैर-हिन्दी भाषी होकर भी उन्होंने हिन्दी के विस्तार में अपना योगदान दिया।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

पसंद करें, टिप्पणी करें और अपने मित्रों से साझा करें...
Plz Like, Comment and Share