सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

मातृभाषाओं के संरक्षण का पक्षधर है संघ

संघ शताब्दी वर्ष : सभी भारतीय भाषाएं, राष्ट्रीय भाषाएं हैं। किसी की अनदेखी न हो, सबको समान स्तर प्राप्त हो


वैश्विक मानचित्र पर भाषाई दृष्टि से भारत की स्थिति विशिष्ट है। हमारे यहाँ उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक भाषाओं के विविध रंग फैले हुए दिखायी देते हैं। भारत की ये भाषाएं क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएं नहीं है, अपितु सभी भाषाएं राष्ट्रीय हैं। उनका एकसमान महत्व है। राजनीतिक स्वार्थ हावी होने से पहले भारत में कभी भाषाई विभाजन दिखायी नहीं दिया। दरअसल, जिस प्रकार भारत की संस्कृति के विविध पक्ष एक–दूसरे के साथ एकात्म हैं, उसी भाँति हमारी भाषाओं में भी आपस में गहरा नाता है। विविधता में एकात्मता का उत्सव मनाने वाले देश भारत में भाषाओं का सुंदर पुष्पगुच्छ है, जिसकी सुगंध से भारत की संस्कृति महकती रही है। भारत को कमजोर करने वाली ताकतें अकसर हमारी भाषाओं को एक–दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास करती हैं। वहीं, भारत के प्रति श्रद्धा रखने वाले संगठन भारत की सभी मातृभाषाओं के बीच स्वाभाविक एकात्म को गहरा करने में विश्वास रखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा ही संगठन है, जिसने सदैव भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनके एकात्म पर जोर दिया है। संघ ने सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा माना है, जो भारत की समृद्ध संस्कृति की संवाहिकाएं हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर देश की सभी भाषाओं को चिरजीवी मानते थे। आम समाज से लेकर राजकाज के व्यवहार में मातृभाषा का उपयोग होना चाहिए, इसके वे प्रबल पक्षधर थे। इस संदर्भ में वे छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण देते थे। विशेषरूप से छत्रपति शिवाजी महाराज के उदाहरण से उन लोगों को सीखना चाहिए जो आज कहते हैं कि हमारे दैनिक व्यवहार में अंग्रेजी और अन्य बाह्य भाषाओं का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है कि अब उन्हें हटाना संभव नहीं है। श्रीगुरुजी कहते थे– “राज्य स्थापना के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने सामान्य व्यवहार में घुसे फारसी, अरबी शब्दों को निकालने का काम किया। उस समय की स्थिति का विचार करने पर दिखाई देगा कि फारसी, अरबी के बिना काम ही नहीं चलता था। छत्रपति छत्रपति शिवाजी महाराज ने मिलावट की प्रवृत्ति को दूर करने और अपनी भाषा को शुद्ध रूप में लाने का प्रयत्न किया। उनके काल का ‘राज्य व्यवहार-कोश’ प्रसिद्ध है”। हमारे सामने छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण था लेकिन इसके बाद भी स्वाधीनता के बाद हमारे सत्ताधीशों ने अंग्रेजी के सामने घुटने टेक दिए। दुनिया में कई देशों के उदाहरण हैं, जिन्होंने सत्ता के सूत्र संभालते ही अपनी भाषा में राजकाज किया। मातृभाषा के प्रति गौरव का भाव जगाते समय श्रीगुरुजी भी ऐसे देशों का उदाहरण देते थे। उनका स्पष्ट मत था कि जो देश अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए, उन सभी देशों ने अपने देश की भाषाओँ को ग्रहण किया। ब्रह्मदेश ने ब्रह्मी और श्रीलंका ने सिंहली को स्वीकार किया। सत्ता हाथों में आते ही उन्होंने भाषा बदल दी। दक्षिण अफ्रीका में विभिन्न 14-16 भाषाएँ हैं तथा प्रत्येक समुदाय को अपनी भाषा पर गर्व है। फिर भी सर्वसम्मति से उन्होंने ‘स्वाहिली’ भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में ग्रहण किया। उनका सब-कुछ ठीक चल रहा है। इस संबंध में इजराइल और तुर्की के उदाहरण भी प्रेरक हैं।

भारतीय भाषाओं के लेकर संघ का दृष्टिकोण बहुत व्यापक है। यही कारण है कि संघ ने समय–समय पर अपनी भाषाओं के संदर्भ में समाज और सरकार का प्रबोधन किया है। जब राजनीति स्वार्थों के चलते देश में भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाने–भिड़ाने का अपराध किया जा रहा था, तब संघ ने भाषाई समन्वय का आग्रह किया। संघ की सर्वोच्च ईकाइ ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ ने 1958 में ‘राष्ट्रीय भाषा–नीति’ प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया है– “यह अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है की राजभाषा के विवाद में पड़े कुछ लोग हटवादिता से अपना संतुलन खो बैठे हैं और राष्ट्रजीवन में विषाक्त वातावरण उत्पन्न कर रहे हैं। आज की यह स्थिति सरकार द्वारा संविधान में निर्देशित तत्वों का पालन न किए जाने से ही उत्पन्न हुई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्पष्ट मत है कि किसी भी स्वतंत्र देश का कामकाज किसी भी विदेशी भाषा में नहीं चलाया जा सकता। जब तक भारत अपने सामान्य एवं राज्य व्यवहार के लिए अंग्रेजी का उपयोग करता रहेगा वह मानसिक दासता से मुक्त नहीं हो सकता। उसके कारण शासन और जनता के बीच खाई बनी रहेगी। राष्ट्रीय जीवन का विकास भी नहीं होगा और अपनी वैशिष्ट्यपूर्ण देन को भी वह संसार को देने में असमर्थ रहेगी”। उल्लेखनीय है कि जब अन्य देश स्वतंत्रता के बाद अपनी भाषा में राजकाज चला सकते हैं, तब हमारे सामने क्या संकोच था? यदि कोई यह तर्क देता है कि भारत में अनेक भाषाएं हैं, इसके कारण यह संभव नहीं है। यदि ऐसा है तब अंग्रेजी में राजकाज कैसे चल सकता है? अंग्रेजी का विरोध क्यों नहीं? यही औपनिवेशिक मानसिक दासता की निशानी है। इससे मुक्त हुए बिना हमारा कल्याण नहीं हो सकता। बहरहाल, संघ किसी एक भाषा का पक्षधर नहीं है अपितु वह तो सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की बात करता है। संघ सदैव से ही भारत की सभी भाषाओं को राष्ट्रीय मानता आया है और उसका विश्वास है कि भले ही ऊपर से कुछ भिन्नता दिखती है पर उनमें आत्म एक है और एक ही भारतीय संस्कृति के मूल्यों की प्रतिष्ठापना उनके साहित्य द्वारा हुई है। उनका प्रभाव अपने प्रदेशों से बाहर संपूर्ण भारत व्यापी रहा है। इन सभी को समान रूप से सब की जननी राष्ट्रभारती संस्कृति से पोषण मिलता रहा है। 

शासन की भाषा–नीति क्या होनी चाहिए? इस संदर्भ में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने 1963 में एक बार फिर प्रस्ताव पारित किया। संघ ने चिंता व्यक्त की– “यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारी स्वतंत्रता के 16 वर्ष पश्चात भी देश के प्रशासन में अंग्रेजी प्रभुत्व के स्थान पर बैठी हुई है। हमारे पास कई राष्ट्रीय भाषाएं होने के बाद भी हमारे शासन की कोई भाषा–नीति नहीं है”। वर्ष 1965 में संघ की प्रतिनिधि सभा ने ‘भाषा–नीति’ के शीर्षक से देश के समक्ष प्रस्ताव रखा कि स्वतंत्रता की यह मांग है कि “देश का प्रशासन हमारी अपनी भाषा में चलाया जाए। विदेशी भाषा राष्ट्र की प्रतिभा को अभिव्यक्त नहीं कर सकती, न ही उसके विकास में सहायक हो सकती है”। इस प्रस्ताव में संघ ने स्पष्टतौर पर दोहराया है कि भारत की सभी मातृभाषाएं राष्ट्रीय हैं, सभी को समान स्तर मिले, किसी के साथ अन्याय न हो। हिन्दी केन्द्र में और क्षेत्रीय भाषाएँ अपने-अपने प्रान्त में प्रशासनिक भाषा के रूप में प्रयुक्त हों। उनका प्रयोग तुरन्त प्रारम्भ हो। अंग्रेजी के प्रभुत्व के कारण हमारी भाषाओं के सामने कितने प्रकार के संकट खड़े हो गए हैं, इससे हम सब अवगत हैं। संघ ने कभी भी इस चिंता से मुंह नहीं मोड़ा। वर्ष 2015 एवं 2018 में भी प्रतिनिधि सभा ने ‘भारतीय भाषाओं के संरक्षण’ पर आवश्यक प्रस्ताव पारित किए। मातृभाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रभावी उपाय इन प्रस्तावों में संघ ने समाज और सरकार के सामने विचारार्थ रखे हैं। यह सुखद है कि संघ के निरंतर प्रयासों का परिणाम सबदूर दिखाई देने लगे हैं। नागरिक भी अपनी भाषाओं को लेकर सजग हुए हैं और सरकार ने भी इस दिशा में सराहनीय प्रयास किए हैं।

देश में भाषा की उलझनों पर विचार करते हुए श्री गुरूजी कहते हैं कि “मेरे विचार में आज जो उलझन निर्माण की गई है, वह केवल देश की अन्यान्य सभी भाषाओं को समान रूप से राष्ट्रीय न मानने के कारण ही है। चाहे वह तमिल हो अथवा बंगला, मराठी हो या पंजाबी सभी हमारी समान श्रद्धा की पात्र हैं। मैं तो यही चाहूँगा कि हममें से प्रत्येक को अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त देश की अन्यान्य भाषाओं में से कम से कम एक और भाषा का अध्ययन अवश्यमेव करना चाहिए”। यह अनुकरणीय विचार है। अकसर विवाद तभी होता है जब हम अपनी भाषा के सामने दूसरी भाषाओं को कमतर मानने लगते हैं। हमारे मन में यह बात एकदम स्पष्ट रहनी चाहिए कि भारत की सभी भाषाएं समान महत्व की हैं और सभी भाषाएं राष्ट्रीय स्तर की हैं। श्रीगुरुजी का मानना था कि हमारी सभी भाषाएं, चाहे वह तमिल हो या बांग्ला, मराठी हो या पंजाबी, हमारी राष्ट्रभाषाएं हैं। सभी भाषाएं और उपभाषाएं खिले हुए पुष्पों के समान हैं, जिनसे हमारी राष्ट्रीय संस्कृति की सुरभि प्रसारित होती है। इन सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत भाषाओं की रानी देववाणी संस्कृत रही है।  

वर्ष 1962 में तमिल संस्कृति के महान समर्थक तथा मदुरै से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार-पत्र के संपादक कारिमुत्तु त्यागराज चेटियर ने श्रीगुरुजी को चाय के लिए आमंत्रित किया था। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रश्न को लेकर उन दिनों (सन्‌ 1962) दक्षिण भारत में बडा विवाद उठ खडा हुआ था। उन्होंने बडे साहस के साथ श्रीगुरुजी से पूछा- “हमारे देश के लिए हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा बनाने की क्या आवश्यकता है?” इस पर श्रीगुरुजी ने कहा- “क्यों? मेरे विचार से देश की सभी भाषाएं, जिन्होंने हमारी संस्कृति के महान विचारों को प्रस्तुत किया है, शत-प्रतिशत राष्ट्रीय हैं। हमारे देश की राष्ट्रभाषा केवल हिन्दी ही नहीं है। अतः तमिल भी राष्ट्रभाषाओं में से एक है। लेकिन मुख्य बात यह है कि इतने बडे देश के लिए एक सामान्य व्यवहार की भाषा की आवश्यकता है, जो आजकल विदेशी भाषा (अंग्रेजी) का स्थान ले सके। क्या आप इस आवश्यकता का अनुभव नहीं करते?” श्रीगुरुजी के उत्तर से पूर्णतया समाधान पाकर श्री चेटियर ने साधुवाद द्वारा मुक्तकंठ से उसकी यथार्थता स्वीकार की। यदि हम आज भी इस दृष्टिकोण से विचार करें, तो भाषा का विवाद उत्पन्न नहीं होगा। यह विचार सभी भाषाई समाज के बीच जाना चाहिए। आखिर हम आपस में संवाद के लिए विदेशी भाषा पर आश्रित क्यों रहें? क्या हम अपनी ही एक भाषा को अंग्रेजी के स्थान पर संपर्क की भाषा नहीं बना सकते? 

वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत भी अकसर भारतीय भाषाओं पर संघ के दृष्टिकोण को समाज के सम्मुख रखते हुए कहते हैं– “सभी भारतीय भाषाएं हमारी भाषाएं हैं। क्षेत्रीय मुद्दों को राजनेता केवल अपना वोट-बैंक बढ़ाने के लिए भड़काते हैं”। श्रीगुरुजी की भाँति वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत भी आग्रह करते हैं कि हमें अपनी मातृभाषा के साथ–साथ भारत की कोई अन्य भाषा भी सीखनी चाहिए। कामकाज की दृष्टि से हम सब संपूर्ण भारत में प्रवास करते हैं। नौकरी के लिए अलग–अलग स्थानों पर जाकर लंबे समय तक रहते भी हैं। ऐसे में होना यह चाहिए कि हम अपनी मातृभाषा के संरक्षण के साथ–साथ अपनी वहाँ की भाषा को सीखें और बोलें। सरसंघचालक डॉ. भागवत कहते हैं– “अपनी मातृभाषा पूरी आनी चाहिए। जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ की भाषा आत्मसात करनी चाहिए और पूरे भारत की एक भाषा जो हम बनाएंगे। वह श्रेष्ठ है इसलिए नहीं, आज के समय में वह सर्वाधिक उपयुक्त है, इसलिए बनाएंगे। उसको भी सीखना चाहिए और फिर आपकी रुचि है और आवश्यकता है तो कोई भी विदेश की भाषा सीखिए। उसमें विदेशी लोगों से ज्यादा प्रवीण बनिए। उसमें भारत का गौरव है”।

कुल मिलाकर निष्कर्ष निकलता है कि संघ भारतीय भाषाओं के संरक्षण का पक्षधर है। वह सभी भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा मानता है। सभी भाषाओं के बीच समन्वय का आग्रह करता है। संघ का स्पष्ट मानना है कि भारत को भारत बनाने के लिए प्रशासन से लेकर आम जीवन में मातृभाषा में व्यवहार होना चाहिए। विदेशी भाषा पर आश्रित होकर हम सर्वांगीण उन्नति नहीं कर सकते। संघ का यह भी आग्रह है कि प्रत्येक भारतीय अपनी मातृभाषा में पारंगत हो, अपने निवास स्थान की प्रादेशिक भाषा को आत्मसात करे और पूरे देश को जोड़ने वाली एक संपर्क भाषा सीखे।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 22 फरवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ


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