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रविवार, 11 मई 2014

मेरा आसमान

 पि ताजी बेहद सख्त हैं। नारियल की तरह कठोर। अंतर्मन से नरम हैं या नहीं, कह नहीं सकता, क्योंकि कभी पिताजी के भीतर झांककर नहीं देखा। लेकिन, मां का व्यवहार बेहद मुलायमियत भरा है। उसकी तुलना नहीं की जा सकती। मां सृष्टि का केन्द्र है। खुदा है। भगवान है। जब भी ऐसा लगता था कि अपने से कुछ गड़बड़ हो गई है और पिताजी की डांट पडऩा तय है। तब पिताजी के शब्द-बमों से बचने का एक ही सुरक्षित बंकर नजर आता था, मां का आंचल। असल में मां का आंचल मेरे हिस्से का सबसे सुंदर आसमान भी था। उसकी साड़ी में जड़े मोती और सितारे, मेरे अपने चंदा मामा और तारे हुआ करते थे। पिताजी की नजरों से बचना होता था तो इसी आसमान को ओढ़ लिया करता था। मां ने बहुत पोथी तो नहीं पढ़ीं, लेकिन वह मेरी आंखें अच्छे से पढ़ लिया करती है, तब भी और आज भी। मां दुनिया को अच्छे से समझती है। जब वह इस दुनिया में मुझे लेकर आई तो उसे हमेशा मेरी सुरक्षा की फिक्र रहने लगी थी। कहीं किसी की नजर न लग जाए। तब कुछ लोगों की काली नजर से बचाने के लिए मां अपने आंचल में मुझे छिपा लिया करती थी। फिर जब बड़ा हुआ तो तेज धूप, लपट, धूल-धक्कड़ से बचाने के लिए भी वह इसी आसमान को मेरे सिर पर रख दिया करती थी और मैं दुनियावी झंझटों से बेफिक्र अपने चांद-तारों में खो जाया करता था। 
         एक दिन का वाकया अच्छे से याद है मुझे। तब मैं करीब दस बरस का था। शाम को दोस्तों के साथ खेलने पुलिस ग्राउंड गया था। वहां लाल रंग से पुते लगभग गोल और चिकने कंकर सड़क के दोनों ओर डाले गए थे। मैं रोज एक गिलास दूध पीता था और मेरा दोस्त गिलास भरकर चाय। मां की धारणा है कि दूध पीने वाला बच्चा अंदर से ताकतवर और फुर्तीला होता है जबकि ज्यादा चाय पीने वाला अंदर से फुंका हुआ रहता है। मां के इसी दर्शन पर दोस्त से बहस हो गई। मां सही कहती है या गलत इसको साबित करने के लिए शर्त रखी गई कि मैं दौड़कर उसकी साइकिल से आगे निकलकर दिखाऊं। दौड़ शुरू हुई। मां को सच साबित करने के लिए पूरी जान लगाकर दौड़ा। लक्ष्य तक पहुंचने के चंद कदम पहले ही मेरा पैर उन गोल और चिकने कंकरों पर पड़ गया। मैं फिसलता हुआ तय स्थान तक पहुंच गया। कौन हारा-जीता, नहीं देख सका। मेरी कनपटी बुरी तरह छिल गई थी। अरबी की सब्जी बनाने से पहले जैसे मां उसे टाट पर छीला करती है, ठीक वैसे ही मेरे गाल की खाल निकल आई थी। इसी गाल पर तो मां स्कूल जाने से पहले मुझे प्यार किया करती थी। 
          मैं दर्द से तड़प रहा था। दोस्त ने किसी तरह मुझे घर पहुंचाया। मुझे डर था कि पिताजी आज सिर्फ डांटेंगे ही नहीं बल्कि पीट भी सकते हैं। डर के मारे मैं चादर ओढ़कर सो गया। बिना खाना खाए जल्दी सोने पर मां को शक हुआ। उसने चादर उठाकर देखा, मैं जख्मी कनपटी को छिपाकर सो रहा था। लेकिन, चेहरे पर दर्द के भाव को उसने पढ़ लिया। मां ने हाथ पकड़ा। मैं बुखार में तप रहा था। मेरी हालत देखकर उसकी आंखों से आंसू छलक आए। 
           उसने गुस्से से कहा- 'तूने बताया क्यों नहीं।' 
         मैंने रोते हुए कहा- 'पिताजी का डर था। वो मारते मुझे।' 
मैं कुछ और बता पता, तब तक पिताजी आ गए। मां ने हमेशा की तरह आज फिर मेरे चेहरे पर अपना आंचल डाल दिया। मेरे सारे दर्द और डर जाते रहे। मां ने पिताजी को मेरी चोट के बारे में बताया। पिताजी ने कुछ नहीं कहा। जल्दी से ऑटो बुलाई और दोनों मुझे डॉक्टर के पास ले गए। रास्ते भर मैं मेरे हिस्से के आसमान में खोया रहा। ऐसे कई वाकये हैं जब सारे दर्द, व्यथाएं और चिंताएं मां के आंचल में कहीं खो जाती थीं। अब जब बड़ा हो गया तो लगता है कि मेरे हिस्से का वह आसमान कहीं खो गया है। मां है, उसका आंचल भी है लेकिन मैं ही अब पहले जैसा नहीं रहा हूं।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

मेरे मणिक मुल्ला 'दाऊ बाबा'

 सू रज का सातवां घोड़ा अर्थात् वह जो सपने भेजता है। धर्मवीर भारती का बहुचर्चित और अनूठे तरीके से लिखा गया उपन्यास है सूरज का सातवां घोड़ा। यह भी कह सकते हैं कि यह उपन्यास नहीं वरन् कहानियों का गुच्छ है। इस उपन्यास का सूत्रधार है मणिक मुल्ला। मणिक मुल्ला जिस मोहल्ले में रहता था उसी मोहल्ले और आसपास के कुछ युवा गर्मी की दोपहर में उसके पास समय काटने के लिए आ जाते थे। मणिक मुल्ला उनको कहानियां सुनाया करता था। मणिक की कहानियां निष्कर्षवादी हैं। सूरज का सातवां घोड़ा में मणिक मुल्ला लेखक और उसके मित्रों को लगातार सात दोपहर में सात कहानियां सुनता है। दोपहर होते ही लेखक और उसके मित्र मणिक के घर पहुंच जाया करते थे। 
  पहली दोपहर जब लेखक अपने दोस्तों के साथ मणिक मुल्ला के घर पहुंचा तो अहसास हुआ कि मैं भी उस मित्र समूह में शामिल हूं। हां, मुझे अपना बीता वक्त याद आ गया था। मेरा गांव। गांव के दोस्त। पहाड़। खेत-खलियान। सोना गाय और झुर्रियों वाला एक खास चेहरा। दाऊ बाबा का चेहरा। असली और पूरा नाम हरभजन सिंह किरार। वे गांव में ही रहते हैं। अब तो काफी वृद्ध हो गए होंगे। बहुत दिन से तो उन्हें देखा ही नहीं। ख्याल आया कि मेरे मणिक मुल्ला तो दाऊ बाबा हैं। हां, उन्होंने मुझे और मेरे दोस्तों को खूब कहानियां सुनाई हैं। अंतर इतना ही तो है कि मणिक मुल्ला दोपहर में कहानी सुनाता था जबकि दाऊ बाबा रात में। स्कूली शिक्षा के दौरान परीक्षा के बाद गर्मियों में तीन माह की छुट्टी मिलती थी। मेरे ये तीन महीने गांव में बीतते थे। समय के साथ यह सब छूट गया। अब तो कभी-कभार ही गांव जाना हो पाता है। वह भी दिनभर या एक-दो दिन के लिए। गांव में पहाड़ है उसी की तलहटी में बाबा (दादा), चाचा, दाऊ बाबा, दोस्त लोग रात को खटिया बिछाकर सोते थे। दरअसल, वहीं हमारे गौत (जानवर बांधने की जगह) भी थे। पशुधन की देखभाल के लिए सभी वहां सोते थे। लेकिन, मैं तो दाऊ बाबा से कहानियां सुनने के लिए वहां सोने जाता था। कहानियों का खजाना था उनके पास। मेरी फरमाइश पर ही कोई कहानी दोबारा सुनाई जाती थी वरना तो हर रोज एक नई कहानी। उनकी कहानियों में राजाओं का शौर्य, देशभक्त योद्धाओं की वीरता, भारत का वैभव, नारियों की महानता और पवित्रता, धर्म की विजय, अधर्म का नाश, मां की ममता, पिता का आश्रय, मेहनत कर सफल होने वालों की दास्तां, व्यापारियों के किस्से, परियों की खूबसूरती सब कुछ मिलता था। मैं बड़े चाव से उनसे कहानियां सुनता था। कहानी के अंत में वे भी मणिक मुल्ला की तरह निष्कर्ष निकाला करते थे। एक तरह से वे हमें कहानी से शिक्षित करने का प्रयास करते थे। निश्चित तौर पर उनसे सुनी कहानियों का असर मेरे जीवन पर पड़ा है और अभी भी है। 
धर्मवीर भारती के उपन्यास में या कहें मणिक मुल्ला की कहानियों में राजा-रानी, परी-देवताओं के किस्से तो नहीं थे। लेकिन, मध्यमवर्गी समाज का सटीक चित्रण है। आर्थिक संघर्ष है, निराशा के घनघोर बादलों के बीच आशा की रोशनी है। भरोसा तोड़ते लोगों के बीच भी विश्वास श्वांस लेता दिखता है। निश्छल प्रेम है। कपट है। क्रोध है। दोस्ती और दुश्मनी भी है। दु:ख है तो सुख भी है। सूरज के सातवां घोड़ा उपन्यास में मणिक मुल्ला ने कहानियों को इस ढंग से सुनाया है कि जो लोग सुखान्त उपन्यास के प्रेमी हैं वे जमुना के सुखद वैधव्य से प्रसन्न हों, लिली के विवाह से प्रसन्न हों और सत्ती के चाकू से मणिक मुल्ला की जान बच जाने पर प्रसन्न हों। जो लोग दु:खान्त के प्रेमी हैं वे सत्ती के भिखारी जीवन पर दु:खी हों, लिली और मणिक मुल्ला के अनन्त विरह पर दुखी हों। लेकिन, दाऊ बाबा अपनी कहानियों से किसी को दु:खान्त का  प्रेमी होने का मौका नहीं देते थे। वे सुखान्त के उपासक थे। कहानी सुनने वाले के मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो, मन में आत्मविश्वास हिलोरे ले, यही उनका प्रयास रहता था। हालांकि उनकी कहानियां मौलिक नहीं थी। वे कहानियां गढ़ते नहीं थे बल्कि उन्होंने कहानियों का संग्रह किया था अपने पूर्वजों से, धार्मिक ग्रंथों से। कभी-कभी वे स्वयं के अनुभव भी सुनाया करते थे ठीक कहानी की तरह। लम्बा अरसा बीत गया उन्हें सुने हुए। उन्हें सुनने की कामनापूर्ति का स्वांग रचा मैंने।
     सूरज का सातवां घोड़ा में मणिक मुल्ला को दाऊ बाबा माना और लेखक की जगह स्वयं को रखा। उपन्यास खत्म होने पर एक अलहदा अहसास था। लगा फिर से वही पहाड़ की तलहटी में खटिया बिछाकर दाऊ बाबा की कहानियों का आनंद ले रहा हूं। मणिक मुल्ला की कहानियों से मिले आनंद की खुमारी टूटी भी न थी एक सुबह मां का फोन आया। मां कह रही थीं - दाऊ बाबा नहीं रहे। कल गांव जाऊंगी तेरे पिताजी के साथ। तुझे तो छुट्टी नहीं मिलेगी। फोन उठाया था तब मैं नींद में था लेकिन यह सब सुनकर मैं सन्न रह गया। बाद में मां से और कितनी देर तक, क्या बात हुई कुछ ठीक से याद नहीं रहा। याद रहा बस इतना कि मेरा मणिक मुल्ला चला गया। 

शनिवार, 14 जनवरी 2012

बड़ा मुश्किल होता है अपनों से दूर होना

 ए क बरस और बीत गया। मैं 28 साल का हो गया। मेरे जीवन का 28वां साल उडऩ खटोले पर सवार होकर आया था। पता ही नहीं चला कब गुजर गया। मैं बस देखता रहा और वो तरसाकर चलता बना। इस साल बहुत कुछ पाया तो बहुत कुछ नहीं। कुछ पाकर भी नहीं पा सका। इस बहुत कुछ खोया भी तो बहुत कुछ खोकर भी नहीं खोया। कुल जमाकर कुछ नए पाठ सीखने को मिले। 28वें वसंत की शुरुआत में ही प्रणय सूत्र में बंध गया था। 21 जनवरी को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। तीन माह प्रेम से गुजरे ही थे कि विरह ने आकर घेर लिया। और अधिक ऊंचा पढऩे की ख्वाहिस से राजधानी भोपाल चला आया। राजधानी में पत्रकारिता करने की अदम्य लालसा भी थी। भोपाल ट्रांसफर करने के लिए कंपनी में अर्जी दे रखी थी। मई में फरमान आ गया-भोपाल जाना है। अद्र्धांगिनी को यह स्वीकार न था कि मैं उसे छोड़कर जाऊं और वह भरेपूरे परिवार को छोड़कर जाए। उस रात वह देर तक रोयी थी। मुझसे बात भी नहीं की थी। एक क्षण तो उसके आंसुओं ने मेरे पैरों में बेढिय़ां ही डाल दी थीं। अंततोगत्वा मेरा जाना तय हुआ। इधर, इन दिनों मेरी मां का भी बुरा हाल था। वो कई बार मुझसे पूछ चुकी थीं - तेरा जाना जरूरी है क्या? यहीं रहकर पढ़ाई नहीं हो सकती क्या? जैसे-तैसे करके मैं उन्हें समझा सका। विदा करते वक्त दरवाजे पर मां-पिता, दादा-दादी, भाई-बहिन सब थे।  शहर से दूर जाने का मेरा यह पहला मौका नहीं था। हर साल मैं 10 से 20 दिन के प्रवास पर घर से बाहर जाता ही था। लेकिन, इस बार मैं लम्बे समय तक वापस घर नहीं आने के लिए शहर छोड़ रहा था। दरवाजे से सटकर मेरी मां खड़ी थी। भाई स्कूटर लेकर तैयार था। मेरी और मां की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ रहा था। दोनों एक-दूसरे के सामने रोना नहीं चाहते थे। सब मुझे देख रहे थे, मैं बारी-बारी से सबको। आंसुओं की झीनी परत के कारण मुझे सबके चेहरे धुंधले नजर आ रहे थे। ठीक वैसे ही धुंध छाए कांच की दूसरी ओर देखने पर दिखता है। ठीक वैसे ही जैसे सर्द मौसम में हल्की धुंध में चीजें लिपटी हुई होती हैं। भाई स्टेशन तक छोडऩे आया था। मैं स्कूटर पर पीछे बैठा था। अब मां सामने नहीं थी। आंसुओं को और बांध न सका। बह गए सब।
      भोपाल के हर चौराहे से सफलता की सौ राहें फूटती हैं। लेकिन, शुरुआती दिनों में मुझे सिर्फ घर जाती राह ही नजर आती थी। मेरा व्यथित मन देख साथ देने के लिए श्रीमती जी भी भोपाल आ गईं। इधर, यहां भी आवोहबा मुझे भाने लगी। धीरे-धीरे ही सही लेकिन कब मैं भोपाली हो गया पता ही नहीं चल सका। भोपाल के ताल ने मेरा बड़ा साथ दिया। जब भी उदास हुआ या आनंद की अनुभूति हुई अपने अभिन्न मित्र दीपक सोनी के साथ पहुंच जाता था ताल के किनारे। घंटो उसे देखता रहता। सूरज की रोशनी में भी तो कभी चंद्रमा की चांदनी में ताल से बातें कीं। उसके पास सभी बातों का जवाब था। एक दिन उसने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहा- मुझे देखो गर्मी में कितना रीत जाता हूं। लेकिन, मुझे उम्मीद रहती है कि वक्त बदलता है। मन सकारात्मक रखो तो बुरे दिन भी मौज से कट जाते हैं। फिर बारिश के बाद में लबालब हो जाता हूं। और भी तमाम बातें वो मुझसे करता था। इस बीच भोपाल में मुझे कई अच्छे दोस्त भी मिल गए। कुछ पहले से ही थे तो माहौल बन गया।
     मेरे प्रेरणास्त्रोत युवा संत स्वामी विवेकानंद का जन्मदिवस मेरी जन्मतिथि (14 जनवरी) से दो दिन पहले (12 जनवरी) को पड़ता है। 'विवेक' से 'आनंद' लेता रहा इसलिए कभी भी निराशा को मन में घर नहीं करने दिया। हालांकि इस साल हमला तो नैराश्य ने कई बार किया था। कई बार उसने मेरे आत्मविश्वास और उत्साह पर हावी होना चाहा। लेकिन, धूल ही चाट सका बेचारा। मेरे पास स्वामी विवेकानंद के प्रेरणादायी विचारों की एक छोटी-सी पुस्तिका थी - 'शक्तिदायी विचार'। इस पढ़कर साहस बटोर लेता और भिड़ जाता अंधेरे से। उम्मीद की दो किरण तो फोड़ ही लाता था। बस फिर क्या चल रही है जिंदगी....

शुक्रवार, 3 जून 2011

कुछ अपना-सा, कुछ बेगाना-सा शहर भोपाल

षि गालव की तपोस्थली ग्वालियर (ग्वाल्हेर) से राजा भोज की नगरी भोपाल (भोजपाल) आए हुए तकरीबन 25 दिन हो गए हैं। भोपाल प्रदेश की राजधानी है। राजधानी में रहने का सुख पाना बहुतों का सपना होता है। मेरा भी था। लेकिन, अब तक मुझे भोपाल में सुखद अनुभूति नहीं हो सकी है। हां, ग्वालियर से बिछुडने की पीड़ा जरूर है। ग्वालियर मुझे रोज याद आता है। आबाद भोपाल में रहने के लिए अब तक एक ठिकाना नहीं ढूंढ सका हूं। शायद इसलिए भी कि मुझे आफिस के नजदीक ही रहना है और अपना जेब भी छोटी है। वो तो शुक्र है कि यहां मेरे कुछ अजीज रहते हैं, जिनसे हौसला कायम है। वरना मैं अब तक उल्टे पैर ग्वालियर भाग लिया होता। दीपक जी सोनी, प्रमोद जी त्रिवेदी, मुकेश जी सक्सेना, अनिल जी सौमित्र। इन सबसे मेरे दिल के तार बहुत गहरे जुड़े हैं। भोपाल में ये सब मेरा सबसे बड़ा सहारा हैं। इनके अलावा कुछ और भी हैं जिन पर मैं अपना अधिकार रखता हूं। कुछ नए दोस्त भी बने हैं। इन सबकी वजह से पहाड़ सी परेशानियां भी बौनी नजर आती हैं।
              यह पहली दफा नहीं है कि मैं घर से बाहर रह रहा हूं। फर्क इतना है पहले पता रहता था कि दो-तीन महीने गुजरने के बाद वापस घर पहुंच जाउंगा। इस बार आने का तो पता था, लेकिन घर कब जाऊंगा यह नहीं पता। शायद इसलिए ही रह-रहकर ग्वालियर की बहुत याद आती है। बात इतनी सी नहीं है। दरअसल सुना है कि यहां चूना बहुत लगाया जाता है। यहां एक जगह का तो नाम ही चूना भट्टी है। भोपाल आते ही एक साहित्यक पत्रिका के माध्यम से साहित्यकार ने आगाह कर दिया कि भैया भोपाल में संभलकर रहना। न जाने कब कोई भोपाली सूरमा (सूरमा भोपाली) मिल जाए और मजाक-मजाक में चूना लगा जाए। इस बात पर विश्वास करने के अलावा कोई और चारा भी नहीं था। साहित्यकार आला दर्जे का था और खुद चूनाभोगी (भुक्तभोगी) था। सो गुरू बहुत डर बैठा है मन में। अपुन ठहरे बाबा भारती कोई भी डाकू सुल्तान ठग सकता है।
            वाहन विहीन हूं। आफिस जाते वक्त चेतक ब्रिज मिलता है। दरअसल आफिस चेतक ब्रिज के पास ही है। पुल के ठीक बीच जाकर खडा हो जाता हूं। वहां से नीले और लाल रंग की लम्बी-लम्बी ट्रेनें गुजरती हैं। मन करता है कि हीरो की माफिक पुल से सीधे ट्रेन पर कूद सवार हो जाऊं और घर पहुंच जाऊं। लेकिन, यह भी संभव नहीं। खैर, थकहार कर फिर से एक अदद ठौर की तलाश में जुट जाता हूं। माना कि कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली। लेकिन, ये भी सही है कि एक दिन तेली के दिन भी फिरेंगे और राजा भोज अपनी नगरी में उसे ससम्मान स्थान देंगे।

  फिलहाल खाली दिमाग की उपज एक कविता और झेलिए.....

ग्वालियर तू बहुत याद आता है।

गोपाचल पर्वत पर शान से खडा
आसमान का मुख चूमता ‘दुर्ग’
नदीद्वार, जयेन्द्रगंज, दौलतगंज
नया बाजार से कम्पू को आता रास्ता
वहां बसा है मेरा प्यारा घर
मुझे बहुत भाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।

सात भांति के वास्तु ने संवारा
सबको गोल घुमाता ‘बाड़ा’
दही मार्केट में कपडा, टोपी बाजार मे जूता
गांधी मार्केट में नहीं खादी का तिनका
पोस्ट आफिस के पीछे नजरबाग मार्केट में
मेरा दोस्त कभी नहीं जाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।

सन् 57 के वीरों की विजय का गवाह
शहर की राजनीति का बगीचा ‘फूलबाग’
बाजू से निकली स्वर्णरेखा नाला
कईयों को कर गया मालामाल
चैपाटी की चाट खाने
शाम को सारा शहर जाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है

चाय की दुकान, कालोनी का चैराहा
यहां सजती दोस्तों की महफिल
देष की विदेष की, आस की पड़ोस की
बातें होती दुनिया जहान की
मां की ममता, पिता का आश्रय
पत्नी का प्यार बुलाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।
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- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

रविवार, 9 मई 2010

क्या इतना सहज होता है सांसद व वरिष्ठ पत्रकार

प्रभात झा बने मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष
राज्यसभा सांसद प्रभात झा को मप्र में भारतीय जनता पार्टी का निर्विरोध प्रदेश अध्यक्ष चुन लिया गया है। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं मप्र भाजपा चुनाव पर्यवेक्षक कलराज मिश्र भोपाल में इसकी घोषणा की।
प्रभात का प्रदेश अध्यक्ष बनना

माना जा रहा है कि पत्रकार से सांसद बने प्रभात झा के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने से पार्टी कार्यकताओं में नया जोश व ऊर्जा का संचार होगा। प्रभात को संगठन और जमीनी स्तर के कार्यकर्ता पसंद करते हैं इसी का परिणाम है कि उनके अध्यक्ष बनने पर किसी ने उंगली नहीं उठाई सिवाय ताई (इंदौर से भाजपा की सांसद सुमित्रा महाजन)। चूंकि वे भी प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए लालायतित थीं। लेकिन, पार्टी संगठन की डोर में बंधे होने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। वहीं फग्गन सिंह कुलस्ते का भी मन प्रदेश अध्यक्ष बनने का था लेकिन वे संगठन के मनाने पर मन गए। खैर ये राजनीति की बाते हैं अपुन को ज्यादा तो समझ आती नहीं.......
प्रभात जी से मेरा प्रत्यक्ष का संपर्क है सो मैं लिख रहा हूं उनसे हुईं मुलाकात का जिक्र.....
कैंटीन में सीखी उनसे पत्रकारिता
बात उन दिनों की है जब मैं अपने साथियों के साथ जीवाजी यूनिवर्सिटी में थे और हम किताबों में पत्रकारिता पढ़ा करते थे। किसी पत्रकार या बड़े आदमी से हम कुछ सीखने की ललक से मिला करते थे। जब भी कोई बड़ा आदमी और नामचीन पत्रकार आता तो बड़ा सम्भलकर बात करना पड़ती थी। साथ में उनके सम्मान का भी पूरा ख्याल रखना पड़ता था। 
....... भले ही प्रभात जी पत्रकार से राज्यसभा सांसद हो गए हों लेकिन, पत्रकारिता आज भी उनके लिए सर्वोपरि है। गर्मियों के दिन थे शायद मई-जून होगी। प्रभात जी ग्वालियर प्रवास पर आए हुए थे। हमने और हमारे शिक्षक ने सोचा क्यों न प्रभात जी को विश्वविद्यालय आमंत्रित किया जाए और कुछ मार्गदर्शन लिया जाए। हमने उन्हें फोन किया और उनसे आग्रह किया,  वे मान गए और दोपहर का दो बजे का समय दिया। हम हमेशा की तरह अपने मेहमान के स्वागत की जुगत भिड़ाने लगे। तब हमें ख्याल आया अरे यार आज तो संडे है। राजनीति विभाग के एचओडी से कॉनफ्रेंस हॉल की अनुमति के लिए गए। चूंकि वे मन से कांग्रेसी ठहरे सो उन्होंने संडे का बहाना लेते हुए मना कर दिया। हांलाकि इससे पूर्व हम वहां संडे के दिन ही एक आयोजन कर चुके थे। खैर अब हमारा दिमाग खराब हो रहा था। दोपहर के दो बज गए श्री प्रभात जी विश्वविद्यालय परिसर में आए तो हमने उन्हें अपनी परेशानी से अवगत कराया। उन्होंने सहज लेते हुए कहा-बात करने के लिए किसी खास जगह की क्या जरूरत है कहीं भी बैठ लेते हैं। भगवान का शुक्र था कि कैंटीन खुली थी। उन्होंने कैंटीन खुली देख कर कहा चलो कैंटीन की टीनशेड में ही बैठ लेते हैं। हम सभी असहज थे लेकिन वो बिल्कुल सहज दिख रहे थे। करीब उन्होंने एक घंटे का समय बिताया और अपने अनुभव बांटे साथ ही पत्रकारिता करियर के लिए कुछ टिप्स भी दिए। एक राज्यसभा सांसद और एक वरिष्ठ पत्रकार को इतना सहज कभी नहीं देखा।
कर्मयोगी
सहज उपलब्ध 
पत्रकारिता जीवन की शुरुआत होने के बाद की मुलाकात भी जेहन में है। प्रभात जी ने ग्वालियर की तमाम छोटी-मोटी गलियां और हर ओर जाने वाली सड़कें अपने कदमों से नापी हैं अपने पत्रकारिता जीवन में। मेरे मामाजी (नरोत्तम यादव)  उनके अच्छे मित्र थे। एक दफा मैंने बातों बातों में मामा जी से कहा-मैं पत्रकार बनना चाहता हूं। तब उन्होंने प्रभात जी के बारे में मुझे बताया कि पत्रकारिता आसान नहीं, प्रभात जी कांधे एक थैला टांगे सुबह  घर से निकलते हैं और पैदल-पैदल सब दूर हो आते हैं। (तब मैं प्रभात जी को न जानता था).... उनकी बातों से मुझे जान पड़ा पत्रकारिता तो अपने बस की नहीं। लेकिन किस्मत को तो इसी झमेले में फंसाना था, फंसा ही लिया। हां तो बात कर रहा था..... मैं जबलपुर नईदुनिया से इंटर्नशिप करके शहर लौटा था। एक भाईसाहब शाम को मुझसे मिलने आए। अचानक से उन्होंने कहा चलो प्रभात जी से मिल आएं। मैं फुरसत में था और मेरा उनसे मिलने का मन भी रहता है तो तुरंत चल दिया। पडाव स्थित उनके कार्यालय पहुंचे। काफी लोग उनसे मिलने के लिए बैठे थे। वे सो रहे थे। उठने पर जैसे ही उन्हें भाई साहब (राजेश पुरोहित) और मेरे आने के बारे में पता चला उन्होंने अंदर ही हमें बुला लिया। काफी देर तक बात होती रही। मेरे पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की बधाई देते हुए  कार्यकर्ता द्वारा लाई गई मिठाई से मेरा मुंह मीठा कराया। वे पैरों में दवा लगा रहे थे तब मैंने उनके पैरों की ओर  देखा।  तो उनकी तपस्या साफ-साफ दिखी। उन्होंने जो शिद्दत से पत्रकारिता की थी उसके निशा आज भी उनके पैरों में थे। ........... कोई अपने काम के प्रति कितना समर्पित होता है उनको देखकर पता चला।

बुधवार, 5 मई 2010

... और जीत गए जंग

म सदा एक ही रोना रोते रहते हैं कि इस समय मैं कौन किसके लिए क्या करता है? सब अपने-अपने लिए जीते हैं। हकीकत में यह पूर्ण सत्य नहीं है आज भी दुनिया में कई लोग मौजूद हैं जो निस्वार्थ भाव से सेवा कार्य करते हैं। असल में उसमें उन्हें जो मजा आता है सुख मिलता है, बस इसी अद्भुत सुख की कामना उस निस्वार्थ भाव से किए जा रहे काम के पीछे का स्वार्थ होता है।
मेरा शहर है ग्वालियर। ग्वालियर का स्टेशन, यहां से होकर हजारों यात्री निकलते हैं। कोई नई बात नहीं सभी रेलवे स्टेशन पर यही होता है। पर एक खास चीज है, मेरे ग्वालियर के रेलवे स्टेशन की। यहां आपको कई युवक-युवती और बुजुर्ग लोग ट्रेन के हर डिब्बे तक दौड़-भाग कर पानी पिलाते नजर आएंगे। ये सभी पंजाबी परिषद के माध्यम से निशुल्क और निस्वार्थ भाव से रेलवे यात्रियों को भरी दोपहर में पानी पिलाते हैं। इसके लिए न तो सरकार-प्रशासन उन्हें कुछ देता है और न ही संस्था के माध्यम से उन्हें कुछ मिलता है। फिर भी बड़ी जीवटता से ये ४५-४८ डिग्री के प्राणसुखाऊ टेम्परेचर में भी सूख रहे गलों को तर करने के लिए दौड़-भाग करते हैं।
मुख्य बात यह है कि सात-एक दिन पहले प्रशासन ने स्टेशन पर पानी बेचने वालों के हित को ध्यान में रख कर फैसला लिया था कि कोई भी अब स्टेशन पर निशुल्क पानी उपलब्ध नहीं कराएगा। मुझे प्रशासन के इस आदेश से बड़ी हताशा हुई। खुद तो कोई व्यवस्था करता नहीं और कोई आगे आकर भला काम करना चाहे तो उसे करने नहीं देता। पंजाबी परिषद के लोगों ने इस आदेश के विरुद्ध आवाज बुलंद की। उनकी आवाज में सत्य था और उन करोड़ों लोगों की दुआएं थीं, जिनके सूखे गलों तक परिषद के लोगों ने नीर पहुंचाया था। आखिर में चार-एक दिन में ही प्रशासन को अपने फैसला बदलना पड़ा। आज जब स्टेशन पहुंचा तो उन्हें पानी पिलाते देख सुखद अनुभूति हुई। 
---->>  "एक याद है मेरी परिषद के साथ आप पढ़ो तो सुनाऊं। चूंकि अपुन का मन भी थोड़ा-सा सेवाभावी है। मैं कॉलेज में पढ़ रहा था तब मेरा भी मन हुआ कि खुद एक प्याऊ खोलूं। खर्चा पानी जोड़ा, अपने पॉकेट से बाहर का मामला दिखा। फिर सोचा किसी को स्पॉन्सर बना देते हैं, कुछेक नाम थे मेरे पास जो मेरा कहा नहीं टाल सकते थे। खैर ये आइडिया भी ड्राप किया। फिर डिसाइड किया कि क्यों न परिषद के काम में हाथ बंटाया जाए। अपने एक भाई साहब जी हैं उन्होंने रेलवे स्टेशन पर परिषद की उत्साही टीम से मिलवाया। ग्वालियर की गर्मी, उफ! बाबा। ऐसी गर्मी में सिर से बांधी सॉफी और पानी की ट्रॉली इधर से उधर दौड़ा कर डिब्बे-डिब्बे जाकर पानी पिलाया। कभी-कभी थकान होने पर बैठ जाते तो, ऊर्जा से लबालब बुजुर्ग कहते-क्या बेटा अभी तो खून गर्म है और इस गर्मी से उबल भी रहा होगा। आलस मत खाओ। उनका कहना सुनकर फिर अपने काम पर लग जाते। बड़ा अच्छा अनुभव रहा। खूब मजे आए थे सफर पर निकले लोगों को पानी पिलाने में......."

बुधवार, 27 जनवरी 2010

नहीं लडूंगा अब अकेले....


समाज क्या होता है? क्यों समाज में उठना-बैठना चाहिए? क्यों एकांकी जीवन सदा आनंददायक नहीं होता? दो-तीन दिन में सही अर्थ समझा इन बातों का। हमारे बुजुर्ग जो भी कह गए हैं सौ फीसदी सही कह गए हैं। उन्होंने यूं ही धूप में बाल सफेद नहीं किए थे मान गए गुरू। अब सुनो, हमें यह बात दो-तीन दिन में क्योंकर समझ में आई? असल में ठीक आज से दो-ढाई साल पहले अपन सामाजिक आदमी थे। २४ में से १४ घंटे समाज के बीच में बीतते थे। खासकर वंचित समाज के बीच। बड़ा प्यार मिलता था। चाहे छोटा बच्चा हो या फिर ७० साल का आदरणीय वृद्ध। सभी प्रेम और अधिकार पूर्वक भैया संबोधन के साथ पुकारते थे। जब भी बस्ती में कदम रखता पहले पहल "राम-राम भैया जी" से स्वागत होता था। फिर छोटे-छोटे दोस्त अपने-अपने घर जबरन खींचकर ले जाते। वहां मां-बहनें वात्सल्य रस से सरोबोर कोई चाय तो कोई आलू के परांठे खिलाते। सबको पसंद था कि मुझे आलू के परांठे पसंद हैं, इसी वजह से कई शाम मेरी बस्ती के मेरे अपने घरों में बुक रहती थी। कभी मुझे कोई परेशानी हो या उन्हें कोई परेशानी हो तो बेवक्त और वक्त पर हम एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे। आज सब यह बड़ा याद आ रहा है। कारण है इसका। दो-तीन दिन से अकेला हूं। अपने मुश्किल समय में। एक-दो लोगों को छोड़ दूं तो कोई साथ नहीं खड़ा। सब अपने-अपने काम में मस्त हैं। ऐसे नहीं है कि उन्हें मेरी समस्या का पता न हो। दुख तो इस बात का है कि मदद मांगने पर भी नकार सुनने को मिल रही है। कोई कहीं बिजी है तो कोई कहीं। खैर सबको बिजी रहने का मौलिक अधिकार है। आखिर कल ही तो गणतंत्र दिवस था सबको खूब याद आए होंगे अपने मौलिक अधिकर पर मौलिक कर्तव्य तो किसी ने भूलकर भी याद नहीं किए होंगे कसम राम की।
मुझे किसी बात की इतनी परवाह नहीं है। परवाह है तो इस बात की कि मैं अपने उन निस्वार्थ लोगों से कितना दूर हो गया। यह आजकल की पढ़ाई और नौकरी का कमाल है। नहीं-नहीं यह तो सिर्फ और सिर्फ मेरा दोष है। मुझ पर वक्त था उनके साथ बिताने का, लेकिन मेरी मती फिर गई थी जो गलत जगह अनमोल समय जाया कर दिया। हे भगवान मुझे फिर से उनके बीच जाने का अवसर दे। तू अवसर दे या नहीं दे मैं तो ढूंढ लूंगा। उनके दिलों में मेरे लिए जो प्रेम है वो मर थोड़े गया होगा। अभी भी थोड़ा तो जीवित होगा। उसे फिर से प्रगाढ़ कर लुंगा मेरे राम मेरा तुझसे वादा रहा। अब मैं अकेले नहीं लडूगां फिर से मेरे अपने मेरे साथ होंगे, ठीक पहले की तरह। फिर से मैं बेफिक्र रहकर किसी भी मुश्वित को न्यौता दे सकूंगा या फिर छिपकर और अचानक आई समस्या से लड़ सकूंगा। सबके साथ। अब बस इस बार अकेला लड़ लूं, फिर जीतकर मुझे थोड़ी फुरसत मिलेगी। वही मेरे लिए मौका होगा अपनों के पास जाने का। अच्छा दोस्तो अभी मुझे अकेला लडऩा है तो मैं चलता हूं फिर जल्दी ही मिलूंगा......

सोमवार, 18 जनवरी 2010

आखिर कब तलक कहेंगे शहीदों को आतंकवादी....


आज फिर से वो दिन याद आ गया। वही दिन जब मैंने पहली दफा दिल्ली में कदम रखा था। तब मैं सूर्या फाउंडेशन के सौजन्य से दिल्ली दर्शन कर रहा था। दिल्ली दर्शन के दौरान हम पहुंचे त्रिमूर्ती म्यूजियम में। जहां जवाहरलाल नेहरू जी से संबंधित सामग्रियों का संग्रह किया गया था। हम करीब पचासएक लोग होंगे। हमने देखा कि म्यूजियम अलग-अलग सेक्शन में बंटा हुआ है। किसी सेक्शन में उनके द्वारा उपयोग में लाईं गईं कटोरी, चम्मच, कप और प्लेट सजाकर रखे हुए थे, मस्त! ठंडी हवा में। नेहरू जी ने चीन में कहीं खाना खाया हो या फिर रूस और इंग्लैंड में, वहां से वे या उनके शागिर्द चम्मच कटोरी लाना नहीं भूले। ये चम्मच कटोरी बड़े शान से मुंह खोले भरी गर्मी में पंखे की ठंडी हवा में पडे थे। ऐसे ही अगल-अलग सेक्शन में अलग-अलग चीजें रखी हुईं हैं किसी में कपड़े-लत्ते और किसी में चिट्ठी-पत्री.  सब बढिय़ा चमचमाते साफ-सुथरे कमरों में थे।
अब हम आगे बड़े तो एक कोने में किचिननुमा छोटा सा कमरा दिखा। कमरे में पर्याप्त रोशनी नहीं थी। एक देशी लट्टू अंधकार से लड़ता दिख रहा था। मैंने देखा यहां पंखा नहीं है, दीवारें भी खुर्द-बुर्द हैं। आपको पता है इस कमरे में क्या था? इतना तो आप भी मन ही मन विचार कर चुके होंगे की इसमें नेहरू जी की कोई प्रिय वस्तु नहीं रखी होगी। अगर आप यह सोच रहे हैं तो आप सही हैं। हां इस कमरे में उनकी प्रिय वस्तु तो नहीं थी लेकिन, हमारे सबसे प्रिय और अनुकरणीय क्रांतिकारियों के फोटो थे वहां की टूटी-फूटी दीवारों पर। उनको शहादत के बाद भी यह स्थान नसीब हुआ क्यों? इतना ही नहीं उसमें नेहरूजी का एक पत्र भी लगा था जिसमें उन्होंने कांतिकारियों को आतंकवादी संबोधित किया है। हमारे क्रांतिकारियों के साथ ऐसा क्यों होता रहता है अपनी समझ से परे हैं?
पिछले दो-चार वर्षों से लगातार पढ़ता आ रहा हूं कि क्रांतिकारियों को इस किताब में आतंकवादी लिख दिया उस किताब में उग्रवादी लिख दिया। जब भी यह सब पढ़ा खून में उबाल आया। आज फिर उबाल आया और एक सकूंन भी हुआ कि उसके खिलाफ एक आम शिक्षक आवाज उठा रहा है। १६ जनवरी २०१० को दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी के शीर्षस्थ दैनिक समाचार पत्र जनसत्ता के पृष्ठ  क्रमांक ४ पर खबर पढ़ी दसवीं की किताब में शहीदों को लिखा गया आतंकवादी. आईसीएसई बोर्ड नई दिल्ली के अनुमोदित कक्षा १० की इतिहास की पुस्तक में चापेकर बंधुओं, वीर सावरकर, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, असफाक उल्ला खां और पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों को आतंकवादी के रूप में पढ़ाया जा रहा है। फतेहपुर जिले के शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद राहत अली ने पुस्तक की इस गलती को पकड़ा. मोहम्म अली ने दसवीं की हिस्ट्री एंड सिविक्स पार्ट-२ से इन शब्दों को हटाने की मुहिम छेड़ दी हैं। उन्होंने पुस्तक से टेररिस्ट शब्द हटाने की मांग की है। पुस्तक के पेज नंबर १२० के पहले पैरे में क्रांतिकारियों को आतंकवादी लिखा गया है।
ऐसा क्यों होता है और कब तक होता रहेगा एक बड़ा सवाल है जो हमारे सामने फन उठाए खड़ा है..... यह दोष हमारी शिक्षा व्यवस्था का है या फिर प्रशासन का.

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

बहुत कुछ पाया २६ वें साल में...

मकर संक्राति पर्व के दिन २६ बसंत पार कर चुका हूं। साथी पार्टी लेने की जिद पर अड़ गए। लेकिन, मुझे इस दफा पार्टी देने का कोई कारण नजर नहीं आया। अच्छा मेरा ऐसा कोई ऐसा दोस्त सामने नहीं आया जिसे असल में मेरे जन्म दिन की खुशी हो। अगर ऐसा होता तो पार्टी मांगने की जिद करने की अपेक्षा पार्टी दे भी तो सकता था। हां दो लोगों ने कहा था जिनमें से एक की तो बहुत तबियत खराब हो गई और दूसरे को मैंने मना कर दिया। मैं भी इस बार ढ़ीठ बना रहा पार्टी नहीं देना दी तो नहीं दी। क्योंकि इस दफा मैं अपने जन्म दिन को मस्ती दिवस में नहीं गवाना नहीं चाहता था, इसे मैं चिंतन दिवस के रूप में लेना चाहता था। और मैंने किया भी वही। सोचा और पीछे मुड़कर देखा तो मैंने पाया कि यह वर्ष मेरे लिए लाया तो बहुत कुछ था। बहुत बातें समझ में आईं। असल में कहूं तो जिंदगी के इस एक साल ने बहुत कुछ सीखने का अवसर दिया। जो मैं आज तक नजरअंदाज करता रहता था, उस पर इस वर्ष मेरी नजर रही। रोज मेरे माथे पर अलग-अलग भाव रहते थे जिसे कोई भी वह बंदा देख सकता था जो मेरे जैसा हो। साथ ही असफलताओं ने नए पाठ पढ़ाए। किसी ने उम्मीदें तोड़ी तो किसी ने उम्मीदें जगाईं और किसी ने उम्मीद से बढ़कर मेरे लिए किया। हालांकि मैं किसी से कोई उम्मीद नहीं रखता। जो मुझे ठीक लगता है करता हूं और जो ठीक नहीं लगता नहीं करता। इसलिए किसी से उम्मीद रखने का कोई प्रश्र ही नहीं उठता। मैं जो करता हूं अपने मन को प्रसन्न रखने के लिए करता हूं। उसी में मेरा हित, समाज का हित और मेरे अपने और गैरों का हित छुपा हुआ हो सकता है।
इस साल मैंने जिंदगी के नए सफर के लिए कदम बढ़ाए। जीवन की नैया चलती रहे सो नौकरी पाने के लिए खूब भाग-दौड़ की। जबलपुर तक राउंड मारा। वहां आश्वासन भी मिला और नौकरी का ऑफर भी लेकिन अपुन को जमा नहीं या कह सकते हैं कि उससे पहले मुझे कहीं और अवसर मिल गया। असल में सितंबर नवदुर्गा महोत्सव के दौरान मेरी किस्मत और आदरणीय मानव जी (दैनिक भास्कर के समाचार संपादक डॉ. संतोष मानव) ने मुझे ग्वालियर दैनिक भास्कर में काम करने का अवसर उपलब्ध कराया। इसके लिए मैं सदैव उनका आभारी रहूंगा। मेरी किस्मत थोड़ी अच्छी है तभी मुझे बेहतरीन साथीयों का सहयोग मिला। भास्कर की सेटेलाइट टीम में मेरी नियुक्ति हो गई। सेटेलाइट टीम के कप्तान आदरणीय श्री रमेश राजपूत का मार्गदर्शन मुझे हर रोज नई दिशा देता रहा और रहेगा भी क्योंकि वे बेहतरीन कप्तान हैं। साथियों का हौंसला कैसे बुलंद रहे अच्छी तरह से जानते हैं। मेरे साथियों ने कभी भी मुझे किसी प्रकार की परेशानी नहीं आने दी। श्री संजय सिंह जी, श्री अवधेश जी श्रीवास्तव, श्री अनिल जी श्रीवास्तव, श्री मनीष जी पिसाल और श्री सुरेंद्र मिश्रा जी सबने समय-समय पर साथ दिया, हौंसला बढ़ाया और आगे बढऩे की राह दिखाई। बहुत कुछ सीखा मैंने अपने इन नए साथियों से और सीख रहा हूं। मैं भाग्यशाली ही हूं कि मुझे अपने करियर के शुरूआत में ही इतने अच्छे लोगों का साथ मिला। यही सबसे बढ़ी उपलब्धि मिली इस वर्ष।
और तो बस सीखा चलते हुए, ठोकर खाते हुए। अभी बहुत लम्बा रास्ता है। उसमें काम आएगा इस वर्ष का सीखा हुआ।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

बस यूं ही बैठे-बैठे...

रविवार की सुबह वही रोज की तरह देरी से उठा करीब 11 बजे। जब से पत्रकारिता के पेशे में कदम रखा है तब से देर तक जागना और देर सबेरे उठने की गंदी आदत विकसित हो गई। आंख मिचते ही कुर्सी की ओर देखा अखबार रखे हैं या नहीं। घर में सबको पता है तो जो भी पढऩे के लिए अखबार उठाता है वापस वहीं मेरे सिरहाने रखी कुर्सियों पर रख देता है। मैंने मिचमिचाते हुर्ईं आखों से देखा रखा है मेरा अपना अखबार दैनिक भास्कर जहां मैं काम करता हूं। साथ में स्वदेश जहां पहली बार मैंने कलम को आड़ा-तिरछा चलाना शुरू किया था। एक और जिसके हम मुरीद हैं उसकी भाषा को लेकर जनसत्ता। आज रविवार था रविवार का जनसत्ता कुछ खास होता है। जैसे ही मैंने जनसत्ता का रविवारीय अंक देखा मन चार माह पीछे चला गया। रविवारीय की कवर स्टोरी पर नर्मदा के सहयात्री और प्रकृति के चितेरे अमृतलाल वेगड़ की इस बार नर्मदा यात्रा वृतांत छपा था। मां चाय लेकर आती उससे पहले तो मैं उसे पढ़कर खत्म कर चुका था और भूतकाल में गोते लगा रहा था। पहली बार मैंने अमृतलाल वेगड़ को जबलपुर के समदडिय़ा होटल में देखा था। वे वहां जबलपुर रत्न नईदुनिया, जबलपुर की निर्णायक मंडल के सदस्य के रूप में उपस्थित थे और मैं उस कार्यक्रम के आयोजन समिति का छोटा सा हिस्सा था। मैं उस समय नईदुनिया, जबलपुर में इंटर्नशिप कर रहा था। वो दिन तो अद्भुत था मेरे लिए। कई दिन तक रोमांचित करता रहा और मैं अपने भाग्य पर इठलाता रहा कि देखो एक ही दिन में जबलपुर के ही नहीं वरन देश के नामी चेहरों से मुलाकात करने का अवसर मिला। छ: नाम तो आज भी याद हैं एक तो अमृतलाल वेगड़, ज्ञान रंजन, चन्द्रमोहन जी जिन्हें सब बाबू के नाम से पहचानते हैं, चित्रकार हरि भटनागर, समाजसेवी चंद्रप्रभा पटेरिया और जस्टिस वीसी वर्मा। सब अपने-अपने क्षेत्र के धुरंधर हैं। उस दिन सबसे अधिक किसी ने प्रभावित किया तो चंद्रप्रभा पटेरिया और अमृतलाल वेगड़ जिनको कभी स्कूली शिक्षा के दौरान किताबों में पढ़ा था।

जहां मैं खड़ा था उसके ठीक सामने वाली कुर्सी पर श्री वेगड़ बैठे थे। बादामी रंग का कुर्ता और झकझकाती धोती पहन रखी थी उन्होंने। शहर के नागरिकों ने जबलपुर रत्न के लिए कुछ चुनिंदा लोगों के नाम भेजे थे। कमाल था की जूरी का प्रत्येक सदस्य रत्न के लिए नामांकित प्रत्येक व्यक्ति के बारे में खूब जानकारी रखते थे।

अमृतलाल जी जितने सहज थे कोई भी उतना सहज नहीं दिख रहा था। उनके बात करने के अंदाज से कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। आज उनके यात्रा वृतांत को पढ़कर भी कुछ वैसा ही अनुभूति हुई। वाणी जितनी प्रभावशाली थी शब्द भी कहीं कमतर नहीं दिखे। शुरू से जब पढऩा आरंभ किया तो अंत पर आकर ही रूका। तब भी मैं यही सोच रहा था कि यह खत्म क्यों हो गया और क्यों नहीं लिखा। इस बार उनकी नर्मदा परिक्रमा में कुछ पुराने तो कुछ नए साथी शामिल हुए। अगर मैं जबलपुर होता तो मैं भी जाता नर्मदा परिक्रमा पर। जो नए साथी शामिल हुए उनमें से एक के नाम से में भली भांति परिचित हूं और एक के साथ समय व्यतीत किया और कुछ सीखा भी है। एक हैं राजीव मित्तल जो अभी लखनऊ में हिंदोस्तान के संपादक हैं। श्री राजीव जी का खूब नाम सुना था नईदुनिया के ऑफिस में अपने साथियों से, तो मिलने की भी इच्छा है देखें कब भाग्य उनसे मिलाता है। दूसरा नाम प्रमोद चौबे। ये नईदुनिया जबलपुर में कॉपीएडीटर हैं। कई दफा कॉपी कैसे लिखी जाती है, कैसे एडिट की जाती है इन्होंने ही सिखाया था। हमारी काफी मदद की। इसलिए कभी नहीं भूल सकता।

इतने मैं तो मां चाय लेकर आ गई। कहने लगी तुम बहुत देर से उठते हो, स्वास्थ्य खराब हो जाएगा। पेट निकल आएगा। जल्दी उठा कर जरा घूमने-फिरने जाया कर अच्छा रहता है।

मैंने मां से इशारे से कहा चाय मेज पर रख दो। उन्हें पता था अभी ये देर से उठना बंद नहीं करेगा। ऐसी बात नहीं है कि मैं उठ नहीं सकता। अब पिछले ही महीने रोज सुबह छ: बजे उठता था। बस यूं ही बैठे-बैठे फिर से जबलपुर चला गया.... यादों में। तभी अपनी बहन की एक कविता याद आई......
 मन पंछी है पंछी की तरह नील गगन में उड़ जाऊं मैं,
कोई न रोके कोई न टोके कोई न मुझको कैद करे.