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गुरुवार, 29 नवंबर 2018

जातिभेद मिटाता रेल का सामान्य डिब्बा और संघ

- लोकेन्द्र सिंह -
'ट्रेन के सफर में एक बेहद खास बात है, जिसे हमें अपने असल जीवन में भी चरितार्थ करना चाहिए- ट्रेन में जाति का कोई भेद नहीं। सामान्य डिब्बे में तो धन का भी कोई भेद नहीं। सीट खाली है तो हम झट से उस पर बैठ जाते हैं, यह सोचे बिना कि जिससे सटकर बैठना है वह मेहतर भी हो सकता है और चमार भी। वह धोबी भी हो सकता है और कंजर भी। सामान्य डिब्बे में सीट पाने के लिए धन और उसके बल पर हासिल की जाने वाली जुगाड़ भी काम नहीं आती। जो पुरुषार्थ करेगा और जिसके भाग्य में होगी सीट उसी को मिलती है।'
            'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर और राष्ट्र के महान नायक मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने जीवन का काफी हिस्सा ट्रेनों में गुजारा। इनके लिए एक गीत भी रचा गया है जिसके बोल हैं- गाड़ी मेरा घर है कह कर जिसने की दिन-रात तपस्या... ' और वो गीत गुनगुनाने लगे। चॉकलेट रंग का कुर्ता-पाजामा और ऊपर से खादी की सदरी डाल रखी थी, उन बुजुर्ग ने। वे ही अपने सामने बैठे एक युवक से बातें कर रहे थे और फिर ये गीत गुनगुनाने लगे, मनमौजी की तरह। वो श्रीधाम एक्सप्रेस के सामान्य डिब्बे में खिड़की के पास बैठे थे। मैं हबीबगंज रेलवे स्टेशन से गाड़ी में चढ़ा था। भीड़ बहुत ज्यादा तो नहीं थी। मैं सीट तलाश रहा था। उन्होंने यह देखकर इशारे से मुझे अपने पास बैठा लिया। सुकून मिला कि चलो अब ग्वालियर तक करीब साढ़े पांच घण्टे का सफर अखरेगा नहीं। आराम से बैठने लायक जगह मिल गई है।

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

कम्युनिज्म से अध्यात्म की यात्रा-1

मार्क्स और लेनिन को पढ़ने वाला, 
लिख-गा रहा है नर्मदा के गीत

धूनी-पानी में उदासीन संत रामदास जी महाराज के साथ लोकेन्द्र सिंह
  ऐसा  कहा जाता है- 'जो जवानी में कम्युनिस्ट न हो, समझो उसके पास दिल नहीं और जो बुढ़ापे तक कम्युनिस्ट रह जाए, समझो उसके पास दिमाग नहीं।' यह कहना कितना उचित है और कितना नहीं, यह विमर्श का अलग विषय है। हालाँकि मैं यह नहीं मानता, क्योंकि मुझे तो जवानी में भी कम्युनिज्म आकर्षित नहीं कर सका। उसका कारण है कि संसार की बेहतरी के लिए कम्युनिज्म से ज्यादा बेहतर मार्ग हमारी भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा में दिखाया गया है। कोई व्यक्ति जवानी में कम्युनिस्ट क्यों होता और बाद में उससे विमुख क्यों हो जाता है? इसके पीछे का कारण बड़ा स्पष्ट है। एक समय में देश के लगभग सभी शिक्षा संस्थानों में कम्युनिस्टों की घुसपैठ थी, उनका वर्चस्व था। यह स्थिति अब भी ज्यादा नहीं बदली है। जब कोई युवा उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालयों में आता है, तब वहाँ कम्युनिस्ट शिक्षक उसके निर्मल मन-मस्तिष्क में कम्युनिज्म का बीज रोपकर रोज उसको सींचते हैं। बचपन से वह जिन सामाजिक मूल्यों के साथ बड़ा हुआ, जिन परंपराओं का पालन करने में उसे आनंद आया, माँ के साथ मंदिर में आने-जाने से भगवान के जिन भजनों में उसका मन रमता था, लेकिन जब उसके दिमाग में कम्युनिज्म विचारधारा का बीज अंकुरित होकर आकार लेने लगता है, तब वह इन्हीं सबसे घृणा की हद तक नफरत करने लगता है। इस हकीकत को समझने के लिए फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' को देखा जा सकता है। बहरहाल, जब वह नौजवान महाविद्यालय से निकलकर असल जिंदगी में आता है, तब उसे कम्युनिज्म की सब अवधारणाएं खोखलीं और अव्यवहारिक लगने लगती हैं। कॉलेज में दिए जा रहे कम्युनिज्म के 'डोज' की जकडऩ से यहाँ उसके विवेक को आजादी मिलती है। उसका विवेक जागृत होता है, वह स्वतंत्रता के साथ विचार करता है। परिणाम यह होता है कि कुछ समय पहले जो विचार क्रांति के लिए उसकी रगों में उबाल ला रहा था, अब उस विचार से उसे बेरुखी हो जाती है। वह विचारधारा उसे मृत प्रतीत होती है। यानी विवेक जागृत होने पर कम्युनिज्म का भूत उतर जाता है। 

रविवार, 31 जुलाई 2011

बिट्टो

बीना स्टेशन। स्वर्णजयंती एक्सपे्रस। २७ जुलाई २०११। सार्थक ग्वालियर से भोपाल जा रहा था। उसकी भोपाल में पोस्टिंग हो गई थी। वह वहां एक अखबार में काम करता है। बीना स्टेशन पर ट्रेन को रुके हुए १५ मिनट से ज्यादा वक्त बीत गया था। सभी यात्री गर्मी और उमस से बेहाल थे। महीना तो सावन का था, लेकिन भीषण गर्मी और पसीने से तरबतर शरीर से चैत्र मास का अहसास हो रहा था। कई लोग उमस से परेशान हो कर डिब्बे से उतरकर प्लेटफार्म पर खड़े हो गए थे। जिसके हाथ जो था वह उसी से हवा करने की कोशिश में था। सब की एक ही चाह थी कि जल्द ही ट्रेन चल दे तो थोड़ी राहत मिले।
'अहा! ट्रेन चल दी।' एक हल्के से झटके से सार्थक को यह अहसास हुआ। उसने सुकून की लम्बी सांस खींची और सीट से अपनी पीठ टिका दी। ट्रेन ने हल्की गति भी पकड़ ली।
लेकिन तभी, 'उफ! यह क्या हुआ?'  प्लेटफार्म पर बदहवास चीखते-चिल्लाते ट्रेन के बराबर में एक महिला को भागते देखकर अनायस सार्थक के मुंह से निकला। वह जोर-जोर से बिट्टो-बिट्टो पुकार रही थी। बिट्टो शायद उसकी बेटी का नाम था। जो ट्रेन में अपने पिता के साथ सफर कर रही थी। हां, बिट्टो उसी की बेटी है। कोई १०-११ साल की लड़की। सार्थक को याद आया कि थोड़ी देर पहले ही तो वह मेरी खिड़की के पास खड़ी थी। वह अपने पति और बेटी को छोडऩे स्टेशन आई थी। उस समय गर्मी से परेशान सार्थक के कानों में भी उनकी बातें घुल रहीं थीं। वह अपने पति से कह रही थी-  'मुझे भी साथ चलना है।'
'हां बाबा। मैं जल्द ही तुम्हें ले जाऊंगा।' पति लाड़ से उसे समझाते हुए कह रहा था।
'जल्द ही मतलब जल्द ही मुझे ले जाना और हां ट्रेन में बिट्टो का ध्यान रखना। पानी की बोटल रख ली या नहीं। गर्मी बहुत है।' - महिला ने अपने पति को हिदायत देते हुए कहा।
इसके बाद सार्थक खुद अपने सुबह में खो गया। सुबह जब वह तैयार हो रहा था तो उसकी पत्नी के भी लगभग यही वाक्य थे। भारतीय नारियों के हृदय में कितना साम्य होता है। अगर वह पश्चिमी जीवन शैली की चपेट में न आई हो तो। खैर...
फिर अचानक इसे क्या हुआ? ये इस तरह क्यों चीख रही है? तरह-तरह के उलझे हुए सवाल सार्थक के दिमाग में दस्तक देने लगे। अच्छा खुद ही उनके तरह-तरह जवाब भी तलाश रहा था। ट्रेन जब तक रुकी थी बेटी और पति उसके पास थे, लेकिन जैसे ही गाड़ी ने चलना शुरू किया होगा उसकी ममता जाग उठी होगी। उसकी छाती बेटी से बिछडऩे के भय से बैठने लगी होगी। मां आखिर मां होती है। हां यही कारण तो मौजूं दिखता है। उसके इस तरह बेसुध होकर बिट्टो-बिट्टो पुकारते हुए भागने के लिए। बेटी से बिछडऩे की पीढ़ा उसके चेहरे से साफ झलक रही थी। पति से दूर रहने का गम एक बारगी भारतीय स्त्री सह सकती है, लेकिन अपने बच्चों से दूर उससे नहीं रहा जाता। हां, यही सच है।
गाड़ी तेज होती जा रही थी। वह अब भी और जोर लगाकर दौड़ रही थी। आंखों से आंसुओं की नदी बह रही थी। वह बिट्टो के अलावा और कुछ बोल भी नहीं पा रही थी। उस क्षण सार्थक के मन में एक ही बात ने जोर मारा। जल्दी से चेन खींचकर गाड़ी को रोका जाए। यह सोचते हुए सार्थक ने चेन पुलिंग के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि गाड़ी से कूदता हुआ उसका पति उसे दिखा। गाड़ी से इस तरह उतरते समय वह गिरते-गिरते बचा था।
'क्या हुआ? क्या बात है?' उसने अपनी पत्नी का चेहरा दोनों हाथों में भरकर उससे पूछा। ऐसी किसी स्थिति में पुरुष अक्सर क्रोधित हो जाते हैं। उसने विस्मय और परेशानी के लहजे में यह पूछा था। लेकिन, अब भी महिला के मुंह से सिवाय बिट्टो के कुछ नहीं निकला। वह और कुछ नहीं कह पाई। इस पर भागते हुए उस युवक ने गाड़ी से अपनी बेटी को उतारा। प्लेटफार्म पर तीनों मां-पिता और बेटी एक दूसरे से लिपटकर खड़े हो गए। महिला अभी भी सिसक-सिसक कर रो रही थी। उसके पति की भी आंखे नम हो गई थी। उसने पत्नी और बेटी को अपने कलेजे से ऐसे चिपका लिया जैसे सालों बाद उनसे मिला हो। सार्थक भी नम पलकों से उन्हें तब तक निहारता रहा। जब तक वे उसे नजर आए। इसके बाद भोपाल तक रास्ते भर वे उसके जेहन में बने रहे।

दो शब्द : यह एक सत्य घटना है। जिससे मैं बहुत प्रभावित हुआ। इसे मैंने एक लघुकथा का रूप देने की कोशिश की है। पता नहीं सफल रहा या असफल। इतना तो पता है कि मैं उस मां निश्चल प्रेम और अपनी बेटी के लिए उसकी तड़प अंकित करने में असफल रहा।

शुक्रवार, 3 जून 2011

कुछ अपना-सा, कुछ बेगाना-सा शहर भोपाल

षि गालव की तपोस्थली ग्वालियर (ग्वाल्हेर) से राजा भोज की नगरी भोपाल (भोजपाल) आए हुए तकरीबन 25 दिन हो गए हैं। भोपाल प्रदेश की राजधानी है। राजधानी में रहने का सुख पाना बहुतों का सपना होता है। मेरा भी था। लेकिन, अब तक मुझे भोपाल में सुखद अनुभूति नहीं हो सकी है। हां, ग्वालियर से बिछुडने की पीड़ा जरूर है। ग्वालियर मुझे रोज याद आता है। आबाद भोपाल में रहने के लिए अब तक एक ठिकाना नहीं ढूंढ सका हूं। शायद इसलिए भी कि मुझे आफिस के नजदीक ही रहना है और अपना जेब भी छोटी है। वो तो शुक्र है कि यहां मेरे कुछ अजीज रहते हैं, जिनसे हौसला कायम है। वरना मैं अब तक उल्टे पैर ग्वालियर भाग लिया होता। दीपक जी सोनी, प्रमोद जी त्रिवेदी, मुकेश जी सक्सेना, अनिल जी सौमित्र। इन सबसे मेरे दिल के तार बहुत गहरे जुड़े हैं। भोपाल में ये सब मेरा सबसे बड़ा सहारा हैं। इनके अलावा कुछ और भी हैं जिन पर मैं अपना अधिकार रखता हूं। कुछ नए दोस्त भी बने हैं। इन सबकी वजह से पहाड़ सी परेशानियां भी बौनी नजर आती हैं।
              यह पहली दफा नहीं है कि मैं घर से बाहर रह रहा हूं। फर्क इतना है पहले पता रहता था कि दो-तीन महीने गुजरने के बाद वापस घर पहुंच जाउंगा। इस बार आने का तो पता था, लेकिन घर कब जाऊंगा यह नहीं पता। शायद इसलिए ही रह-रहकर ग्वालियर की बहुत याद आती है। बात इतनी सी नहीं है। दरअसल सुना है कि यहां चूना बहुत लगाया जाता है। यहां एक जगह का तो नाम ही चूना भट्टी है। भोपाल आते ही एक साहित्यक पत्रिका के माध्यम से साहित्यकार ने आगाह कर दिया कि भैया भोपाल में संभलकर रहना। न जाने कब कोई भोपाली सूरमा (सूरमा भोपाली) मिल जाए और मजाक-मजाक में चूना लगा जाए। इस बात पर विश्वास करने के अलावा कोई और चारा भी नहीं था। साहित्यकार आला दर्जे का था और खुद चूनाभोगी (भुक्तभोगी) था। सो गुरू बहुत डर बैठा है मन में। अपुन ठहरे बाबा भारती कोई भी डाकू सुल्तान ठग सकता है।
            वाहन विहीन हूं। आफिस जाते वक्त चेतक ब्रिज मिलता है। दरअसल आफिस चेतक ब्रिज के पास ही है। पुल के ठीक बीच जाकर खडा हो जाता हूं। वहां से नीले और लाल रंग की लम्बी-लम्बी ट्रेनें गुजरती हैं। मन करता है कि हीरो की माफिक पुल से सीधे ट्रेन पर कूद सवार हो जाऊं और घर पहुंच जाऊं। लेकिन, यह भी संभव नहीं। खैर, थकहार कर फिर से एक अदद ठौर की तलाश में जुट जाता हूं। माना कि कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली। लेकिन, ये भी सही है कि एक दिन तेली के दिन भी फिरेंगे और राजा भोज अपनी नगरी में उसे ससम्मान स्थान देंगे।

  फिलहाल खाली दिमाग की उपज एक कविता और झेलिए.....

ग्वालियर तू बहुत याद आता है।

गोपाचल पर्वत पर शान से खडा
आसमान का मुख चूमता ‘दुर्ग’
नदीद्वार, जयेन्द्रगंज, दौलतगंज
नया बाजार से कम्पू को आता रास्ता
वहां बसा है मेरा प्यारा घर
मुझे बहुत भाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।

सात भांति के वास्तु ने संवारा
सबको गोल घुमाता ‘बाड़ा’
दही मार्केट में कपडा, टोपी बाजार मे जूता
गांधी मार्केट में नहीं खादी का तिनका
पोस्ट आफिस के पीछे नजरबाग मार्केट में
मेरा दोस्त कभी नहीं जाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।

सन् 57 के वीरों की विजय का गवाह
शहर की राजनीति का बगीचा ‘फूलबाग’
बाजू से निकली स्वर्णरेखा नाला
कईयों को कर गया मालामाल
चैपाटी की चाट खाने
शाम को सारा शहर जाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है

चाय की दुकान, कालोनी का चैराहा
यहां सजती दोस्तों की महफिल
देष की विदेष की, आस की पड़ोस की
बातें होती दुनिया जहान की
मां की ममता, पिता का आश्रय
पत्नी का प्यार बुलाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।
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- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

बुधवार, 15 सितंबर 2010

हिन्दी हृदय की भाषा है

''हिन्दी में भाव हृदय की गहराई से निकलते हैं और अंग्रेजी में दिमाग की ऊपरी सतह से।"
इन्ही में एक है कुशल शर्मा..
 १४   सितंबर है, हिन्दी दिवस है। सबने लिखा, खूब लिखा। समर्थन में लिखा। विरोध में लिखा। किसी ने बहुत अच्छा लिखा तो किसी ने औसत लिखा। किसी न किसी तरह हिन्दी को याद किया। एक मैं ही रह गया था। हिन्दी की सेवा में ही उलझा था। फुरसत हुई तो देखा हिन्दी दिवस को अंग्रेजी कलेण्डर के हिसाब से बीते हुए २० मिनट हो चुके हैं, लेकिन एक ऐसी याद जेहन में आ गई कि लिखने को बैचेन हो उठा। व्यक्तिगत अनुभव है हो सकता है उससे सब सहमत न हो। वैसे भी किसी के अनुभव ही क्या, किसी के विचार से सब सहमत हो ऐसा नहीं होता। अगर ऐसा होता तो निश्चित ही आज भारत में हिन्दी का बोलबाला उतना ही होता, जितना आज हिन्दी प्रेमियों और सेवियों ने चाहा है। खैर बात को आगे बढ़ाते हैं। बात कोई आठ-नौ साल पुरानी होगी। मैं दिल्ली और हरियाणा की सीमा पर स्थित साधना स्थली झिंझौली में एक शिविर में प्रशिक्षण ले रहा था। यह शिविर सूर्या फाउंडेशन ने आयोजित किया था। यह संस्था बड़े नेक उद्देश्य के साथ समाजकार्य में लगी है।
.          यहीं मेरी कई लोगों से मित्रता हुई। जिससे मेरी दोस्ती उडीसा, पंजाब, हिमाचल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, औरंगाबाद और दिल्ली सहित कई राज्यों तक फैल गई। सभी मित्रों से पत्रों के माध्यम से जीवंत संपर्क था। डाकिया मेरी मां से कहता था कि आपका लड़का करता क्या है? भारत के कई राज्यों से इसके पत्र आते रहते हैं। मैं भी एक साथ सौ-दो सौ पोस्टकार्ड खरीद लाता था। स्थानीय पोस्ट ऑफिस के बाबू कभी भी २५-५० से अधिक पोस्टकार्ड देते ही नहीं थे, तो सीधे मुख्य डाकघर से ही खरीदने पड़ते थे। हां तो इन्हीं दोस्तों में से एक अजीज था कुशल शर्मा। पंजाब से है। एकदम मस्तमौला। उसने शिविर के दौरान मुझे भांगड़ा सिखाने का बहुत प्रयत्न किया, लेकिन वह सफल नहीं हो पाया। उसके और मेरे बीच में प्रति सप्ताह दो पत्र तय थे। मेरी अंग्रेजी बहुत कमजोर थी और आज भी वैसी ही लंगड़ी है। उसने एक दफा कहा कि चल आज से हम अंग्रेजी में पत्र लिखा करेंगे जिससे तेरी अंग्रेजी अच्छी हो जाएगी। फिर शुरू हुआ अंग्रेजी पत्राचार। काफी लम्बे समय तक चला। उसके कहे अनुसार मेरी अंग्रेजी में निश्चित तौर पर सुधार हुआ। ठीक-ठीक याद नहीं फिर भी शायद उसका जन्मदिन था। इस अवसर पर मैंने उसे अंग्रेजी मैं पत्र नहीं लिखा, अपने हृदय की भाषा से अपने अंतर्मन के विचारों को अंतर्देशी पर उतारा था। पत्र का जवाब भी हिन्दी में ही आया। वह पत्र आज भी मेरे पास संभाल कर मेरे संदूक में रखा हुआ है। इस वक्त मैं कार्यालय में हूं वरना वह पत्र जरूर प्रकाशित करता। उसमें लिखा था- ''भाई आज से हम हिन्दी में ही पत्र लिखा करेंगे। हिन्दी में भाव हृदय की गहराई से निकलते हैं और अंग्रेजी में दिमाग की ऊपरी सतह से।"

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

.... बुरे फंस गए यार

फ! बड़े दिन बाद कुछ लिखने का मौका मिला है। थोड़ी राहत की सांस ले रहा हूं। पत्रकारिता में आकर बुरा फंस गया हूं, लेकिन जितना फंसा हूं उतना ही मजा भी आ रहा है। .... तो साहब अपनी फिलहाल तो यह स्थिति है कि रबड़ी खा भी रहे हैं और उसके दोष भी गिना रहे हैं। जब से पत्रकारिता के मैदान में कूदा हूं न खाने का वक्त बचा है, न सोने का कोई ठीक समय है। हमारे पुरखे कहते हैं कि ब्रह्म मूहूर्त में उठो, लेकिन हम उसी समय सोने के लिए बिस्तर टटोलते हैं। सुबह का सूरज चादर तले कभी सपने में दिख जाए तो ठीक नहीं तो जय रामजी की। मध्य प्रदेश का वासी हूं सो जब आँख  खुलती है तो जलता हुआ बल्ब भी नसीब नहीं होता। इसी बात पर एक चुटकुला याद आया- एक अंग्रेज आया हिन्दी सीखने, मप्र में रहने लगा और जब गया तो दो वाक्य सीखे हिन्दी के दो वाक्य सीखे एक बिजली आ गई और दूसरा बिजली चली गई।  हां तो कह रहा था कि सुबह का सूरज... और शाम का डूब जाता है ऑफिस में,  कम्प्यूटर के आगे गिटर-पिटर करते-करते।
...........सामाजिक रिश्तों से यूं  दूर हुआ कि मेरे पडोस में रहने वाला दोस्त भी कहता है कि कहां गया था यार, बहुत दिन से दिखा नहीं। किताबें पढऩे का शौक तो लगता है बहुत दूर छूटते जा रहा है। कई दोस्तों से किताबें ले रखी हैं पढऩे के लिए वक्त मिले तो पढूं। उनकी किताबें वापस न करने से अपनी तो साख पर बट्टा लग गया है। जिसे देखो कह देता है देखो लोकेन्द्र बदल गया है इसे किताबें न देना, मेरी अभी तक वापस नहीं की हैं। पहले अपन जिससे किताब लेते थे नियत समय पर वापस करते थे या फिर थोड़ी शेष रहने की स्थिति में उससे अनुमति लेकर कुछ दिन रख लेते थे।
...........मेरी होने वाली पत्नी की सौत हो गई है पत्रकारिता। वो जब भी फोन करती हैं तब या तो हम सो रहे होते हैं या फिर अखबार पढ़ रहे होते हैं। अक्सर यह कहकर फोन काट देती हैं कि-जब आपके अपने अखबारों से फुरसत मिल जाए तो इस सबला नारी को भी याद कर लेना, हम होंठ सिले सुनते रहते हैं और उनके फोन काटने का इंतजार करते हैं। ...........अरे यार मैं भी न.... समय मिला तो कुछ लिखने की जगह अपनी व्यथा सुनाने लगा आपको। चलो यार अब जैसी भी जिंदगी है इसे भी मजे से जीना है और जो भी लिख गया है आप उसे उतने ही मजे से पढ़ लीजिएगा। वैसे एक सलाह दूं (चेतावनी : मुफ्त की सलाह से बचो) - अगर कोई पत्रकारिता में आना चाह रहा हो तो न आना और न ही अपने बच्चों को भेजना ओके। रहने दो आप तो आ ही जाना बड़ा मजा आएगा शानदार करियर है इस क्षेत्र में बस आत्मविश्वास और जूझने की प्रवृत्ति हो आपके मन में, फिर कोई पंगा नहीं। पहले रखना पहले वाली मुफ्त की सलाह थी।

बुधवार, 5 मई 2010

... और जीत गए जंग

म सदा एक ही रोना रोते रहते हैं कि इस समय मैं कौन किसके लिए क्या करता है? सब अपने-अपने लिए जीते हैं। हकीकत में यह पूर्ण सत्य नहीं है आज भी दुनिया में कई लोग मौजूद हैं जो निस्वार्थ भाव से सेवा कार्य करते हैं। असल में उसमें उन्हें जो मजा आता है सुख मिलता है, बस इसी अद्भुत सुख की कामना उस निस्वार्थ भाव से किए जा रहे काम के पीछे का स्वार्थ होता है।
मेरा शहर है ग्वालियर। ग्वालियर का स्टेशन, यहां से होकर हजारों यात्री निकलते हैं। कोई नई बात नहीं सभी रेलवे स्टेशन पर यही होता है। पर एक खास चीज है, मेरे ग्वालियर के रेलवे स्टेशन की। यहां आपको कई युवक-युवती और बुजुर्ग लोग ट्रेन के हर डिब्बे तक दौड़-भाग कर पानी पिलाते नजर आएंगे। ये सभी पंजाबी परिषद के माध्यम से निशुल्क और निस्वार्थ भाव से रेलवे यात्रियों को भरी दोपहर में पानी पिलाते हैं। इसके लिए न तो सरकार-प्रशासन उन्हें कुछ देता है और न ही संस्था के माध्यम से उन्हें कुछ मिलता है। फिर भी बड़ी जीवटता से ये ४५-४८ डिग्री के प्राणसुखाऊ टेम्परेचर में भी सूख रहे गलों को तर करने के लिए दौड़-भाग करते हैं।
मुख्य बात यह है कि सात-एक दिन पहले प्रशासन ने स्टेशन पर पानी बेचने वालों के हित को ध्यान में रख कर फैसला लिया था कि कोई भी अब स्टेशन पर निशुल्क पानी उपलब्ध नहीं कराएगा। मुझे प्रशासन के इस आदेश से बड़ी हताशा हुई। खुद तो कोई व्यवस्था करता नहीं और कोई आगे आकर भला काम करना चाहे तो उसे करने नहीं देता। पंजाबी परिषद के लोगों ने इस आदेश के विरुद्ध आवाज बुलंद की। उनकी आवाज में सत्य था और उन करोड़ों लोगों की दुआएं थीं, जिनके सूखे गलों तक परिषद के लोगों ने नीर पहुंचाया था। आखिर में चार-एक दिन में ही प्रशासन को अपने फैसला बदलना पड़ा। आज जब स्टेशन पहुंचा तो उन्हें पानी पिलाते देख सुखद अनुभूति हुई। 
---->>  "एक याद है मेरी परिषद के साथ आप पढ़ो तो सुनाऊं। चूंकि अपुन का मन भी थोड़ा-सा सेवाभावी है। मैं कॉलेज में पढ़ रहा था तब मेरा भी मन हुआ कि खुद एक प्याऊ खोलूं। खर्चा पानी जोड़ा, अपने पॉकेट से बाहर का मामला दिखा। फिर सोचा किसी को स्पॉन्सर बना देते हैं, कुछेक नाम थे मेरे पास जो मेरा कहा नहीं टाल सकते थे। खैर ये आइडिया भी ड्राप किया। फिर डिसाइड किया कि क्यों न परिषद के काम में हाथ बंटाया जाए। अपने एक भाई साहब जी हैं उन्होंने रेलवे स्टेशन पर परिषद की उत्साही टीम से मिलवाया। ग्वालियर की गर्मी, उफ! बाबा। ऐसी गर्मी में सिर से बांधी सॉफी और पानी की ट्रॉली इधर से उधर दौड़ा कर डिब्बे-डिब्बे जाकर पानी पिलाया। कभी-कभी थकान होने पर बैठ जाते तो, ऊर्जा से लबालब बुजुर्ग कहते-क्या बेटा अभी तो खून गर्म है और इस गर्मी से उबल भी रहा होगा। आलस मत खाओ। उनका कहना सुनकर फिर अपने काम पर लग जाते। बड़ा अच्छा अनुभव रहा। खूब मजे आए थे सफर पर निकले लोगों को पानी पिलाने में......."

सोमवार, 8 मार्च 2010

क्या हमें सोने के लिए औरतें मिलेंगी


ओरछा में राजा राम के दरबार में उस दिन बहुत हलचल थी। इस दिन विवाह की उत्तम लग्र थी। कई युवा जोड़े एक-दूजे का हाथ थाम कर, अग्नि को साक्षी मानकर एक-दूजे के हो रहे थे। यह बात फरवरी माह की है। मैं अजीज के विवाह समारोह में शामिल होने के लिए ओरछा पहुंचा था। मेरा यह मित्र बहुत ही सादगी पसंद है। उसने धूमधाम से विवाह करने की जगह साधारण ढंग से विवाह करने का फैंसला लिया था। विवाह में उसने दहेज के रूप में एक नया पैसा लड़की वालों से नहीं लिया। जैसे-तैसे हमने जिद करके एक स्टेज सजा ली थी उसे तो वह भी पसंद नहीं था। स्टेज पर दो कुर्सियां जमा ली थीं और उनके पीछे कुछ फूलों की लडिय़ां लटका ली थीं। उन कुर्सियों पर ही दूल्हा-दुल्हन बैठे थे। सभी उनको बधाई दे रहे थे और याद के लिए फोटो निकलवा रहे थे। कार्यक्रम चल ही रहा था तभी अचानक मैं पलटा और देखा कि हमारा एक दोस्त दो अंग्रेजों के साथ स्टेज की ओर चला आ रहा है। मैंने दोस्त से पूछा कहां से पकड़ लाया तू इन फिरंगियों को। उसने कहा कहीं से नहीं खुद ही कौतुहलवश विवाह की रस्में देखने चले आए थे। अतिथि देवो भव की परंपरा हमारे यहां है ही। सो मैंने उससे कहा अब ये आए हैं तो इनका स्वागत सत्कार करो। कुछ खिलाओ-पिलाओ आखिर ये हमारे अतिथि हैं। वे बेल्जियम के रहने वाले थे और भारत भ्रमण पर आए थे। उनसे पूछने के बाद मुझे पता चला। मैंने उन्हें गुलाब जामुन और दहीबड़े  खाने को दिए। उन्होंने चटकारे लेकर दो दौने दहीबड़े चट कर दिए। काफी देर तक मैं और मेरा दोस्त उनसे बातें करते रहे। विवाह की अलग-अलग रस्मों की जानकारी उन्हें देते रहे। उनकी भी इच्छा हुई वर-वधू के साथ फोटो निकलवाने की। मैंने उनको हिंदी में सिखाया कि वर-वधू को कहना- खुश रहो और पूतो फलो-दूधो नहाओ। बंदो ने जल्दी सीख भी लिया। स्टेज पर पहुंचते ही जैसे ही उसने ये बोला, माहौल ठहाकों से गूंज गया। काफी देर बाद जब वो जाने लगे तो मैं उन्हें बाहर तक छोडऩे गया। अधिक समय हो जाने के कारण धर्मशाला के दोनों गेट पर ताला लटक रहा था। मैंने दोस्त को चौकीदार को बुलाने के लिए भेजा। मजाक में दोनों गोरों से कहा कि- अब आप आज यहीं रूक जाइए, सुबह चले जाना। उन्होंने जो जवाब दिया उसकी मुझे कतई आशा नहीं थी। उनका प्रत्युत्तर सुनकर मुझे बड़ा क्रोध आया। मैंने तुरंत ही गेट खोलकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया और सोचता रहा- इतना सम्मान मिलने पर क्या हम इस तरह की बात अपने मेजबान के सामने रख सकते हैं। दिल ने उत्तर दिया नहीं मेरे संस्कार इस बात की इजाजत नहीं देते। उनकी बात सुनकर ही मुझे समझ आया कि- क्यों हमारी सभ्यता और संस्कृति महान है। उन्होंने जवाब दिया था- हम रुक जाते हैं। क्या हमें सोने के लिए सुंदर औरतें मिलेंगी।
स्त्री की इज्जत करो
दुनिया आपकी इज्जत करेगी।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

सपोर्टिंग इनिंग्स ; लोकेन्द्र सिंह

 Lokendra Singh Rajput                                                     महान सचिन की महान पारी - मेरे प्यारे शहर में मेरे पसंदीदा प्लेयर ने अद्भुत काम कर दिया। बड़े अरमान से मैच देखने कैप्टन रूप सिंह स्टेडियम पहुंचा। बड़े दिनों से लगी थी सचिन से दौ सौ रन बनाने की उम्मीद, आज अपनी उपस्थिति में पूरी होते देखी। जैसे ही सचिन ने १८० रन पार किए उसके बाद तो गजब का रोमांच मैदान में था। सचिन के हर शॉट पर स्टेडियम में उपस्थित हरेक दर्शक उछल-उछल पड़ रहा था। अहा! क्या नजारा था। अद्वितीय सचिन ने अद्भुत कारनामा कर दिया। पूरा ग्वालियर झूम उठा। बिना संगीत के  ही सारा स्टेडियम नाचने लगा। मानो सचिन के बल्ले से स्वर लहरी फूट पड़ी हो। चौके-छक्के पर बल्ले से निकलने वाली आवाज यूं लगी की डीजे की धमक हो। सचिन की ऐतिहासिक कारनामें का गवाह सारा शहर बना और मैं भी, इसी सोच के साथ मन प्रफुल्लित होता रहा।
बेइज्ती करा दी- यूं तो मैच में खूब मजा आया, बस एक क्षण ऐसा काला रहा कि दिल दुख गया। भारतीय टीम बल्लेबाजी कर रही थी और सचिन का बल्ला आग उगल रहा था। उसी बीच किसी चिरकुट टाइप के लड़के ने जो हरकत की उसने सारे ग्वालियर को शर्मसार कर दिया। किसी ने भारी सुरक्षा के एक दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ी को पत्थर फेंक कर मार दिया। उसके बाद पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा। मेहमानों को सॉरी कहना पड़ा। शहर के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को अभद्रता न करने की अपील करनी पड़ी। जो भी था उसकी पहचान तो नहीं हो सकी लेकिन, अंतर्राष्ट्रीय पटल पर ग्वालियर की छवि धूमिल हो गई। हमारे बीच भी कई चिरकुट बैठे थे जिन्हें हम लोग संभाल रहे थे। चूंकि हम दस-बारह लोग थे सो उनको हमारी बात माननी पड़ रही थी। जब मैंने एक को अभद्रता करने से रोका तो वो मुझ पर ही बन बैठा होता पर जैसे ही उसने देखा की ये पूरी फौज के साथ ही तो पूरे मैच में शांत रहा।
सुरक्षा व्यवस्था में लगाई सेंध-मैच शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके इसके लिए भारी फोर्स तैनात किया गया था। सुरक्षाधिकारियों ने दावा किया था कि मैच में परिंदा भी पर नहीं फडफ़ड़ा सकेगा। सब दावों के बीच परिंदों ने पर फडफ़ड़ाए और बीट भी की। बीट करने वाले का तो ऊपर वर्णन आ ही गया है। पेन-पेंसिल से लेकर मोबाइल तक स्टेडियम में ले जाना प्रतिबंधित था। लेकिन सारी सुरक्षा व्यवस्था को धत्ता बताकर कई लोग अंदर मोबाइल लेकर पहुंचे। जबकि पुलिस ने कम से कम छह जगह चैकिंग बिठा रखी थी। इतनी चैकिंग के बावजूद कैसे लोग मोबाइल अंदर लेकर पहुंचे, यह बात सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाती है। शायद ऐसी ही सुरक्षा व्यवस्था है हमारे पास तभी हम आंतकवाद और नक्सलवाद के हमलों को रोकने में नाकामयाब हैं। हम तो घर से बढिय़ा घी के बने हुए मैथी के परांठे ले गए थे लेकिन बाहर ही छीन लिए गए सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देकर।