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शनिवार, 21 नवंबर 2015

बेटी के लिए कविता-2


"मेरी चिड़िया, 
आज तुम पूरे एक साल की हो गयी हो। 
तुम्हारी हँसी के मौसम में मौज का एक साल कब निकल गया, 
पता ही नहीं चला। 
तुम्हारे आने के बाद असल में अहसास हुआ, 
पिता होने का अर्थ क्या है? 
हृदय और अधिक संवेदनशील हो गया है। 
लौट आया है मेरा भी बचपन तुम्हारे साथ। 
तुम्हारी नन्ही कोमल अंगुलियां जब मेरे गालों को स्पर्श करती हैं, 
मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठता है। 
सुबह-सुबह ऑफिस जाते वक्त रोज देखता हूँ, 
किवाड़ के उस पार छूटता हुआ मेरा मन 
और इस पार घुटने-घुटने चलकर आता तुम्हारा मन। 
शाम को घर लौटने की व्याकुलता रहती है, 
तुम्हारी हँसी के साथ झरने वाले 
चमेली-चम्पा-गेंदा-गुलाब समेटने के लिए। 
पता नहीं तुम कौन-सा जग जीत लेती हो, 
मुझे सामने पाकर। 
अपने नन्हे घुटनों पर खड़ी हो जाती हो, दोनों हाथ विजयी मुद्रा में उठाकर। 
जब तक कलेजे से लटक नहीं जाती हो, 
सुकून नहीं मिलता तुम्हें और मुझे भी। 
मेरे साथ से तुम्हें कौन-सा खजाना मिलता, मुझे पता नहीं। 
लेकिन हाँ, मुझे जरूर धरती पर स्वर्ग मिल जाता है। 
तुम्हारी अजब लीला है। 
मेरे घर आने के बाद तो जैसे धरती पर कांटे उग आते हैं, 
गोदी से उतरने का नाम नहीं लेती हो। 
फिर तो नींद भी तुम्हें मेरे कंधे पर ही आती है। 
खैर, बहुत बात हैं लिखने-कहने को, ख़त्म नहीं होंगी। 
कभी-कभी मन करता है, घड़ी की सुईयों से लटक जाऊँ, 
कालचक्र के पहिये को थाम लूँ। 
ऐसे ही रहे यह समय, हमेशा के लिए। 
तुम नन्ही परी और मैं अल्हड़ पिता।"
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- लोकेन्द्र सिंह -

सोमवार, 26 मई 2014

सशक्त समाज के लिए जरूरी है स्वतंत्र पत्रकारिता


लेखक लोकेन्द्र सिंह की पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' विमोचित 
ग्वालियर, २४ मई। पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं का संप्रेषण नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता में संवेदनशील लेखन होना चाहिए। आज देश में जिस प्रकार से पत्रकारिता और राजनीति में विकृतियां उत्पन्न हो रही हैं, उनके मूल में विदेशी पूंजी निवेश है। इसलिए सशक्त समाज के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता बहुत आवश्यक है। वर्तमान में पत्रकार परतंत्र हो गए हैं, जब तक पत्रकारों को लिखने की आजादी प्राप्त नहीं होगी तब तक हम सशक्त समाज का निर्माण नहीं कर सकते। यह बात गणेश शंकर विद्यार्थी मंच एवं जीवाजी विश्वविद्यालय दूरस्थ शिक्षण अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में 'पत्रकारिता, राजनीति और देश' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में आमंत्रित वक्ताओं ने कही। गालव सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के प्रोडक्शन सहायक लोकेन्द्र सिंह राजपूत की पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' का विमोचन भी किया गया। 
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रघु ठाकुर थे। जबकि अध्यक्षता मुंशी प्रेमचंद सृजनपीठ उज्जैन के निदेशक जगदीश तोमर ने की। विशिष्ट अतिथियों के रूप में आईटीएम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष एवं राजनीतिक विश्लेषक संजय द्विवेदी उपस्थित थे। इस मौके पर स्वदेश के सम्पादक लोकेन्द्र पाराशर दूरस्थ शिक्षण अध्ययनशाला के उप निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा एवं पुस्तक के लेखक लोकेन्द्र सिंह भी मंचासीन थे।

राजनीति और पत्रकारिता एक सिक्के के दो पहलू : रघु ठाकुर
गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रघु ठाकुर ने कहा कि पत्रकारिता और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन्हें धर्म के रास्ते पर चलाना चाहिए। धर्म का तात्पर्य यह है कि वह समाज की पीड़ा को समझें। उन्होंने पत्रकारिता की आजादी की बात करते हुए कहा कि आज देश में लिखने वाले परतंत्र हो गए हैं। जब तक पत्रकारों को लिखने की आजादी नहीं होगी तब तक हम सशक्त समाज का निर्माण नहीं कर सकते। श्री ठाकुर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज राजनीति और पूंजी में एक रिश्ता बन गया है। राजनीति और पूंजी के घालमेल के कारण आज समाज प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को ऐसा लेखन करना चाहिए जिससे समाज सही दिशा पा सके। उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों के मालिक निजी स्वार्थ देखते हैं। पत्रकारों के भले के लिए मालिक नहीं सोच रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी अब तक देश के प्रमुख समाचार पत्रों ने मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की हैं। मजीठिया से संबंधित कोई समाचार भी समाचार-पत्रों में भेजा जाए तो एक लाइन भी नहीं छपेगा। उन्होंने मीडिया के वर्तमान स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के मीडिया के लिए खबर के मुख्य आधार हैं- क्राइम, कॉमेडी, क्रिकेट, सिनेमा और सेलेब्रिटी। सामाजिक सरोकार आज पत्रकारिता में कहीं पीछे छूट गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने आम चुनाव में खर्च की सीमा तय कर दी ७० लाख रुपए। ऐसे में क्या कोई आम आदमी चुनाव लड़ सकेगा। क्या आम आदमी चुनाव में खड़े होकर ७० लाख रुपए खर्च करने के क्षमता रखने वाले व्यक्ति से मुकाबला कर सकेगा। 

सवालों से मजबूत होता है लोकतंत्र : संजय द्विवेदी  
राजनीतिक विश्लेषक और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने कहा कि हिन्दुस्तान को समझने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि जनता को मीडिया और राजनेताओं से सवाल करते रहना चाहिए क्योंकि सवालों से ही लोकतंत्र मजबूत होता है। निष्पक्ष होकर पत्रकार को अपनी कलम चलानी चाहिए। किसी पार्टी विशेष से जुड़कर लिखेंगे तो उस लेखन में वह धार नहीं होगी। किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर लेखन करना भी ठीक नहीं। चुनाव के दौरान कई लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी सुपारी लेकर कलम चला रहे थे कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे। क्यों नहीं बनने देंगे, इसका किसी के पास वाजिब जवाब नहीं था। यह तरीका ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता, राजनीति और देश आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता देश हित में होनी चाहिए। श्री द्विवेदी ने मुजफ्फरनगर के दंगों का जिक्र करते हुए बताया कि मुजफ्फरनगर के दंगों की रिपोर्टिंग गलत तरीके से की गई। इसका नतीजा यहा रहा कि स्थितियां और अधिक बिगड़ीं।  

स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है : रमाशंकर सिंह
कार्यक्रम के विशिष्ट आईटीएम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह  ने कहा कि महात्मा गांधी भी मानते थे कि स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है। उन्होंने कहा कि आज मीडिया और राजनीति में गहरा रिश्ता हो गया है, जिसे समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज शेयर बाजार, सट्टा और सर्वे कई गलत तस्वीरें समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं, जिससे समाज प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान तभी आगे बढ़ेगा जब लोगों में सामाजिक न्याय के लिए भूख पैदा होगी। पत्रकारिता का यह दायित्व है कि लोगों में सामाजिक चेतना की भूख पैदा करे। 

कठपुतलियों की डोर अपने हाथ में ले जनता : लोकेन्द्र पाराशर
स्वदेश के सम्पादक लोकेन्द्र पाराशर ने कहा कि मीडिया और पत्रकारिता में भिन्नता है लेकिन समाज को दोनों एक ही दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया प्रबंधन हो रहा है तो उसमें पत्रकारिता नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज का दर्द लिखने के लिए लेखक या पत्रकार के मन में आग होनी चाहिए। यह आग एक से दूसरे के मन में जलनी चाहिए। पुस्तक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश कठपुतलियों के हाथ में नहीं होना चाहिए। अगर कठपुतलियों के हाथ में देश है भी तो इन कठपुतलियों की डोर हमारे हाथ में होनी चाहिए, किसी और के हाथ में डोर नहीं होनी चाहिए।

लोकेन्द्र ने देश के मानस को झकझोरा है : जगदीश तोमर
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश तोमर ने पत्रकारिता और पत्रकार को समाज का महत्वपूर्ण अंग बताया। उन्होंने कहा कि आजादी के समय भी हर पत्रकार एक स्वतंत्रता सेनानी की भूमिका में था। पत्रकार अच्छे से काम कर सके, सकारात्मक पत्रकारिता कर सके इसके लिए समाज को उसका साथ देना चाहिए। पत्रकारिता के मूल्यों में समय के साथ कमी आई है लेकिन यह सही नहीं है कि पत्रकारिता में सब बुरा ही बुरा है। पत्रकारिता एकदम भ्रष्ट हो गई है। पत्रकारिता में अब भी अच्छे लोग हैं। उनका साथ देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता आज भी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और वह अपना धर्म आज भी निभा रही है। श्री तोमर ने 'देश कठपुतलियों के हाथ में' पुस्तक के लेखक एवं युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह को बधाई देते हुए कहा कि लोकेन्द्र ने अपने आलेखों के माध्यम से देश के मानस को झकझोरने की कोशिश की है। उनके लेखों में सकारात्मकता है। पत्रकारिता को सही मायने में एक विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए। लोकेन्द्र ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से उसी विपक्ष की भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि लोकेन्द्र सिंह के आलेख ही नहीं बल्कि उनकी कहानियां भी विचारोत्तेजक हैं। वे लेखक हैं, कहानीकार हैं, कवि हैं। लोकेन्द्र बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी हैं।

प्रबुद्धजन रहे मौजूद : 
पुस्तक विमोचन समारोह और संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत सहकार्यवाह यशवंत इंदापुरकर, दूरदर्शन केन्द्र ग्वालियर के निदेशक संतोष अवस्थी, वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र श्रीवास्तव, सुरेश सम्राट, राकेश अचल, देव श्रीमाली, जनसम्पर्क विभाग के संयुक्त संचालक डॉ. एच.एल. चौधरी, सुभाष अरोरा, प्रो. ए.पी.एस. चौहान, डॉ. केशव ङ्क्षसह गुर्जर, प्रो. अयूब खान सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन कर किया गया। अतिथियों का स्वागत हरेकृष्ण दुबोलिया, विभोर शर्मा, गिरीश पाल, विवेक पाठक द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन जयंत तोमर ने एवं आभार दूरस्थ शिक्षण अध्ययन के उप निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा ने व्यक्त किया।

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

कठिन है ‘शब्द साधना’ की राह

lokendra singh/लोकेन्द्र
  अ पने ब्लॉग पर मैंने आखिरी पोस्ट (बड़ों के लिए किस्से बचपन के) २४ सितंबर को प्रकाशित की थी। तब से लेकर अब तक भारी व्यस्तता का दौर रहा। इस बीच पढऩे-लिखने का क्रम ही टूट गया। शिखा वाष्र्णेय की पुस्तक ‘स्मृतियों में रूस’ को रोज लालायित होकर देखता हूं लेकिन पढ़ नहीं पा रहा हूं। कारण एक ही है भारी व्यस्तता। १६ अक्टूबर को बालक पांच माह का हो गया। अपने नन्हें राजकुमार को भी समय देने में असमर्थ हूं। कल तो श्रीमती जी ने ताना मार ही दिया- तुम्हारे पास तो परिवार के लिए समय ही नहीं है। अपुन सुनकर रह गए। और कर भी क्या सकते थे। खैर, आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा कौन-सा मील चला रहा था? हमारे इधर कहावत है- मील चलाना। जो मनुष्य यह कहता हुआ पाया जाता है कि मेरे पास समय नहीं है। दूसरे मनुष्य उसे पलटकर यही कहावत सुना देते हैं- तुम कौन-सा मील चला रहे, जो तुम्हारे पास दो मिनट का भी समय नहीं है। कुछ नहीं दोस्तो अभी-अभी संस्थान बदला है। राजस्थान पत्रिका को विदा कह कर नईदुनिया (जागरण ग्रुप) आया हूं। नया माहौल, नया सिस्टम, थोड़ा सहज होने में समय तो लगता ही है। फिर अपुन तो महाआलसी राम हैं। जरा-सा बदलाव, थोड़ा देर से सोना, बहुत देर से उठना। समय कब निकल जाता है अपुन को पता ही नहीं चलता।
           खैर, अभी तक की कहानी शीषर्क से मेल नहीं खा रही न? चलो यू टर्न लेते हैं। गपशप छोडक़र मुद्दे की बात पर आते हैं। दरअसल, भारी व्यस्तता का एक और कारण है, जिसकी चर्चा मैं आप लोगों से करना चाहता हूं। इन दिनों में अपने पहले काव्य संग्रह के प्रकाशन को लेकर इधर-उधर हाथ-पैर मारने में लगा हूं। संग्रह तैयार है लेकिन प्रकाशक नहीं मिल रहा। मिले भी तो क्यों? अपुन कोई देश-विदेश में ख्याति अर्जित कवि हैं नहीं। अपुन कोई बेस्टसेलर बुक राइटर भी नहीं? साहित्य का कोई सामंत भी अपना मुंह बोला ताऊ नहीं। अपनी कविताओं से विवाद भी नहीं फैलने वाला। ‘लोकेन्द्र जी हम कविताएं नहीं छापते’। कई प्रकाशकों का यह जवाब सुनकर तो माथे पर चिंता की और लकीरें और बढ़ गईं। एक तो आटा कम था वह भी गीला हो गया। दोस्तो, इस भागम-भाग भरे डेढ़ माह में एक विद्वान ने अपुन को उम्मीद की लौ दिखाई कि लगे रहो बेटा जब तक सांस है, कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा। हारकर बैठ गए तो कुछ नहीं होना। उन्होंने यह मंत्र मुझे सीधे नहीं दिया। यह तो उन्होंने साहित्य जगत की बिडम्वना को लेकर कहा था। 
          हुआ यूं कि मैं गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की पुस्तकों के लोकार्पण कार्यक्रम में पहुंचा। कार्यक्रम में मंच पर देश के बड़े साहित्यकार जगदीश जी तोमर और दिवाकर विद्यालंकार जी विराजमान थे। विद्यालंकार जी ने अपने उद्बोधन में गिरिजा जी की पुस्तकों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसके बाद उन्होंने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में दो तरह की साधना होती है। एक तो भाव साधना और दूसरी शब्द साधना। भाव साधना पहली साधना है। शब्द साधना अगली सीढ़ी है। भाव साधना में साहित्यकार कितना भी पारंगत हो जाए लेकिन उसकी साधना तब तक अधूरी है जब तक शब्द साधना पूरी न हो जाए। शब्द साधना का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि शब्द साधना का मोटा-मोटा अर्थ है भावों का प्रकाशित हो जाना। किसी साहित्यकार की कृति प्रकाशित होने में बड़ा श्रम लगता है। हिन्दी साहित्य में प्रकाशक या तो स्थापित नामों को ही छाप रहे हैं या फिर जो उन्हें धन देता है उसे छाप देते हैं। अर्थात् भाव साधना से भी अधिक परिश्रम और महत्व की साधना है शब्द साधना। लेखक और कवि की बात समाज में जन-जन तक पहुंचे उसके लिए शब्द साधना बहुत जरूरी है। विद्यालंकार जी ने आगे कहा कि निराश होकर रचनाकार कभी-कभी सोचता है कि उसकी कृति स्तरीय नहीं है। यह सोचकर वह उसे किसी संदूक या किसी कोने में छुपा देता है। ऐसा करके वह भावों की हत्या करता है। अशुद्धियों और त्रुटियों के डर से साहित्य रचना को प्रकाशित नहीं कराना गलत कदम है। सबकी रचनाओं में कमियां रह जाती हैं, जिन्हें समालोचना, आलोचना और समीक्षा के बाद दूर किया जाता है।
            मित्रो उनके इस उद्बोधन ने अपने पिचकते फेंफड़ों में हवा भर दी। कार्यक्रम में ही जोश आ गया। मन ही मन तय किया कि अब और जोर-शोर से अपने काव्य संग्रह के प्रकाशन की तैयारी की जाएगी। शब्द साधना की कठिन डगर पर चल निकला हूं, देखते हैं कब पूरी होती है।
चलते-चलते : आप लोग भी बहुत दुष्ट हो। जरा ब्लॉग से दूर क्या हुआ? आप लोगों ने तो आना ही बंद कर दिया। दुष्टई की हद होती है, हाल-चाल तक नहीं पूछा मेरा। चलो छोड़ो अब आते रहिएगा। आभासी दुनिया के रिश्तों में भी थोड़ी संवेदनशीलता बनी रहनी चाहिए, वरना दुश्मनों के आरोपों को सच होते देर नहीं लगती।

शनिवार, 14 जनवरी 2012

बड़ा मुश्किल होता है अपनों से दूर होना

 ए क बरस और बीत गया। मैं 28 साल का हो गया। मेरे जीवन का 28वां साल उडऩ खटोले पर सवार होकर आया था। पता ही नहीं चला कब गुजर गया। मैं बस देखता रहा और वो तरसाकर चलता बना। इस साल बहुत कुछ पाया तो बहुत कुछ नहीं। कुछ पाकर भी नहीं पा सका। इस बहुत कुछ खोया भी तो बहुत कुछ खोकर भी नहीं खोया। कुल जमाकर कुछ नए पाठ सीखने को मिले। 28वें वसंत की शुरुआत में ही प्रणय सूत्र में बंध गया था। 21 जनवरी को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। तीन माह प्रेम से गुजरे ही थे कि विरह ने आकर घेर लिया। और अधिक ऊंचा पढऩे की ख्वाहिस से राजधानी भोपाल चला आया। राजधानी में पत्रकारिता करने की अदम्य लालसा भी थी। भोपाल ट्रांसफर करने के लिए कंपनी में अर्जी दे रखी थी। मई में फरमान आ गया-भोपाल जाना है। अद्र्धांगिनी को यह स्वीकार न था कि मैं उसे छोड़कर जाऊं और वह भरेपूरे परिवार को छोड़कर जाए। उस रात वह देर तक रोयी थी। मुझसे बात भी नहीं की थी। एक क्षण तो उसके आंसुओं ने मेरे पैरों में बेढिय़ां ही डाल दी थीं। अंततोगत्वा मेरा जाना तय हुआ। इधर, इन दिनों मेरी मां का भी बुरा हाल था। वो कई बार मुझसे पूछ चुकी थीं - तेरा जाना जरूरी है क्या? यहीं रहकर पढ़ाई नहीं हो सकती क्या? जैसे-तैसे करके मैं उन्हें समझा सका। विदा करते वक्त दरवाजे पर मां-पिता, दादा-दादी, भाई-बहिन सब थे।  शहर से दूर जाने का मेरा यह पहला मौका नहीं था। हर साल मैं 10 से 20 दिन के प्रवास पर घर से बाहर जाता ही था। लेकिन, इस बार मैं लम्बे समय तक वापस घर नहीं आने के लिए शहर छोड़ रहा था। दरवाजे से सटकर मेरी मां खड़ी थी। भाई स्कूटर लेकर तैयार था। मेरी और मां की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ रहा था। दोनों एक-दूसरे के सामने रोना नहीं चाहते थे। सब मुझे देख रहे थे, मैं बारी-बारी से सबको। आंसुओं की झीनी परत के कारण मुझे सबके चेहरे धुंधले नजर आ रहे थे। ठीक वैसे ही धुंध छाए कांच की दूसरी ओर देखने पर दिखता है। ठीक वैसे ही जैसे सर्द मौसम में हल्की धुंध में चीजें लिपटी हुई होती हैं। भाई स्टेशन तक छोडऩे आया था। मैं स्कूटर पर पीछे बैठा था। अब मां सामने नहीं थी। आंसुओं को और बांध न सका। बह गए सब।
      भोपाल के हर चौराहे से सफलता की सौ राहें फूटती हैं। लेकिन, शुरुआती दिनों में मुझे सिर्फ घर जाती राह ही नजर आती थी। मेरा व्यथित मन देख साथ देने के लिए श्रीमती जी भी भोपाल आ गईं। इधर, यहां भी आवोहबा मुझे भाने लगी। धीरे-धीरे ही सही लेकिन कब मैं भोपाली हो गया पता ही नहीं चल सका। भोपाल के ताल ने मेरा बड़ा साथ दिया। जब भी उदास हुआ या आनंद की अनुभूति हुई अपने अभिन्न मित्र दीपक सोनी के साथ पहुंच जाता था ताल के किनारे। घंटो उसे देखता रहता। सूरज की रोशनी में भी तो कभी चंद्रमा की चांदनी में ताल से बातें कीं। उसके पास सभी बातों का जवाब था। एक दिन उसने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहा- मुझे देखो गर्मी में कितना रीत जाता हूं। लेकिन, मुझे उम्मीद रहती है कि वक्त बदलता है। मन सकारात्मक रखो तो बुरे दिन भी मौज से कट जाते हैं। फिर बारिश के बाद में लबालब हो जाता हूं। और भी तमाम बातें वो मुझसे करता था। इस बीच भोपाल में मुझे कई अच्छे दोस्त भी मिल गए। कुछ पहले से ही थे तो माहौल बन गया।
     मेरे प्रेरणास्त्रोत युवा संत स्वामी विवेकानंद का जन्मदिवस मेरी जन्मतिथि (14 जनवरी) से दो दिन पहले (12 जनवरी) को पड़ता है। 'विवेक' से 'आनंद' लेता रहा इसलिए कभी भी निराशा को मन में घर नहीं करने दिया। हालांकि इस साल हमला तो नैराश्य ने कई बार किया था। कई बार उसने मेरे आत्मविश्वास और उत्साह पर हावी होना चाहा। लेकिन, धूल ही चाट सका बेचारा। मेरे पास स्वामी विवेकानंद के प्रेरणादायी विचारों की एक छोटी-सी पुस्तिका थी - 'शक्तिदायी विचार'। इस पढ़कर साहस बटोर लेता और भिड़ जाता अंधेरे से। उम्मीद की दो किरण तो फोड़ ही लाता था। बस फिर क्या चल रही है जिंदगी....

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

अपने सुख की चाबी अपने जेब में रखें

 च लो आज कुछ दार्शिनिक हुआ जाए। वैसे मैं जिस बात पर दार्शिनिक हो रहा हूं वह मन में कई रोज से चल रही थी। हालांकि उसको अपने व्यक्तित्व में उतार अभी तक नहीं सका हूं। फिर भी आपसे चर्चा कर रहा हूं। वैसे मैं उस बात के लिए किसी को नहीं कहता, जिसका मैं अपने जीवन में अनुसरण नहीं करता। हां तो मेरा मत है कि 'व्यक्ति को अपने सुख की चाबी अपनी जेब में रखनी चाहिए।' दरअसल होता क्या है कि सामान्य व्यक्ति कुछ लोगों की हरकत से दुखी हो जाता है और खुश भी। उसकी खुशी और दुख का कारण बहुत हद तक ऐसी बातें या कारण होते हैं जिनसे प्रत्यक्षत: उसका जुड़ाव नहीं होता। ऐसे लोग अतिसंवेदनशील श्रेणी में आते हैं। संत श्री १००८ लोकेन्द्र सिंह जी महाराज (हंसो मत) का कहना है कि अति भावुक लोगों को सुख से जीना है तो उन्हें इस प्रवृत्ति का त्याग करना पड़ेगा। उन्हें अपने सुख की चाबी दूसरों की जेब से निकाल कर अपनी जेब में रखनी होगी। महाराज का एक और कहना है कि इस दुनिया में मानवीय संवेदनाओं की कमी हो गई है, इसलिए सुख की चाबी अपनी जेब में रख कर आप भी संवेदनहीन न हो जाना। संवेदनाएं बचा कर रखना। क्योंकि बिना संवेदनाओं के मनुष्य, मनुष्य नहीं रहता। 
 संत श्री १००८ लोकेन्द्र सिंह जी महाराज
        अब आप दुविधा में आ गए होंगे कि यह कैसे संभव है।  सब कुछ हो सकता है साहब प्रयास की जरूरत है। हालांकि पहले ही कह चुका हूं कि मैंने असफलता के डर से प्रयास ही नहीं किया। वैसे मेरे कुछ नजदीकी मित्रों का कहना है कि मेरे स्वभाव में परिवर्तन आया है। थोड़ा बहुत मुझे भी महसूस होता है। हालांकि मैं पलट कर उन्हें यही जवाब देता हूं कि नहीं मैं तो वैसा ही हूं, लेकिन मन ही मन यह विचार भी चलता रहता है कि आप लोगों के व्यवहार की वजह से ही ये बदलाव मुझमें आए हैं। मैंने खुद तो सुख की चाबी अपनी जेब में नहीं रखी, लेकिन मेरा यह काम दूसरों ने कर दिया। उन्होंने वह कीमती चाबी खुद ही अपनी-अपनी जेबों से निकाल कर मेरी जेब में डाल दी। दरअसल किसी को ऐसे व्यक्ति के लिए क्यों दु:खी होना चाहिए जिसे आपका खयाल ही न हो। उस व्यक्ति के लिए क्यों रोएं, जिसका मन आपकी आंखों में आंसू देख प्रफुल्लित होता हो। उस व्यक्ति के लिए क्यों दर्द होना चाहिए, जो बार-बार आपका भरोसा तोड़े?  इनकी फिक्र छोड़ो। कुछ ऐसे दोस्तों को ढूंढ़ों जो आपके जैसे हों। फिर मस्त गजल गाओ-
खूब निभेगी हम दोनों में,
मेरे जैसा तू भी तो है...
दोस्तों एक बात स्पष्ट करता चलूं कि भले ही मुझमें बदलाव आए हों, लेकिन मेरे भीतर की संवेदना अभी तक जिंदा हैं। और एक बात मेरे सुख की चाबी तो कुछ लोगों ने मेरी जेब में सरका दी, लेकिन आपको सलाह है कि आप 'अपने सुख की चाबी अपने ही जेब में रखो।'

बुधवार, 27 जनवरी 2010

नहीं लडूंगा अब अकेले....


समाज क्या होता है? क्यों समाज में उठना-बैठना चाहिए? क्यों एकांकी जीवन सदा आनंददायक नहीं होता? दो-तीन दिन में सही अर्थ समझा इन बातों का। हमारे बुजुर्ग जो भी कह गए हैं सौ फीसदी सही कह गए हैं। उन्होंने यूं ही धूप में बाल सफेद नहीं किए थे मान गए गुरू। अब सुनो, हमें यह बात दो-तीन दिन में क्योंकर समझ में आई? असल में ठीक आज से दो-ढाई साल पहले अपन सामाजिक आदमी थे। २४ में से १४ घंटे समाज के बीच में बीतते थे। खासकर वंचित समाज के बीच। बड़ा प्यार मिलता था। चाहे छोटा बच्चा हो या फिर ७० साल का आदरणीय वृद्ध। सभी प्रेम और अधिकार पूर्वक भैया संबोधन के साथ पुकारते थे। जब भी बस्ती में कदम रखता पहले पहल "राम-राम भैया जी" से स्वागत होता था। फिर छोटे-छोटे दोस्त अपने-अपने घर जबरन खींचकर ले जाते। वहां मां-बहनें वात्सल्य रस से सरोबोर कोई चाय तो कोई आलू के परांठे खिलाते। सबको पसंद था कि मुझे आलू के परांठे पसंद हैं, इसी वजह से कई शाम मेरी बस्ती के मेरे अपने घरों में बुक रहती थी। कभी मुझे कोई परेशानी हो या उन्हें कोई परेशानी हो तो बेवक्त और वक्त पर हम एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे। आज सब यह बड़ा याद आ रहा है। कारण है इसका। दो-तीन दिन से अकेला हूं। अपने मुश्किल समय में। एक-दो लोगों को छोड़ दूं तो कोई साथ नहीं खड़ा। सब अपने-अपने काम में मस्त हैं। ऐसे नहीं है कि उन्हें मेरी समस्या का पता न हो। दुख तो इस बात का है कि मदद मांगने पर भी नकार सुनने को मिल रही है। कोई कहीं बिजी है तो कोई कहीं। खैर सबको बिजी रहने का मौलिक अधिकार है। आखिर कल ही तो गणतंत्र दिवस था सबको खूब याद आए होंगे अपने मौलिक अधिकर पर मौलिक कर्तव्य तो किसी ने भूलकर भी याद नहीं किए होंगे कसम राम की।
मुझे किसी बात की इतनी परवाह नहीं है। परवाह है तो इस बात की कि मैं अपने उन निस्वार्थ लोगों से कितना दूर हो गया। यह आजकल की पढ़ाई और नौकरी का कमाल है। नहीं-नहीं यह तो सिर्फ और सिर्फ मेरा दोष है। मुझ पर वक्त था उनके साथ बिताने का, लेकिन मेरी मती फिर गई थी जो गलत जगह अनमोल समय जाया कर दिया। हे भगवान मुझे फिर से उनके बीच जाने का अवसर दे। तू अवसर दे या नहीं दे मैं तो ढूंढ लूंगा। उनके दिलों में मेरे लिए जो प्रेम है वो मर थोड़े गया होगा। अभी भी थोड़ा तो जीवित होगा। उसे फिर से प्रगाढ़ कर लुंगा मेरे राम मेरा तुझसे वादा रहा। अब मैं अकेले नहीं लडूगां फिर से मेरे अपने मेरे साथ होंगे, ठीक पहले की तरह। फिर से मैं बेफिक्र रहकर किसी भी मुश्वित को न्यौता दे सकूंगा या फिर छिपकर और अचानक आई समस्या से लड़ सकूंगा। सबके साथ। अब बस इस बार अकेला लड़ लूं, फिर जीतकर मुझे थोड़ी फुरसत मिलेगी। वही मेरे लिए मौका होगा अपनों के पास जाने का। अच्छा दोस्तो अभी मुझे अकेला लडऩा है तो मैं चलता हूं फिर जल्दी ही मिलूंगा......