क ठिनाइयां आपको अंदर से मजबूत करती हैं। अचानक से आईं मुसीबतें आपको फटाफट निर्णय लेने का अनुभव देती हैं। अनजाने रास्ते और लंबे सफर आपके लिए नई राहें खोलते हैं। यह सब करने के लिए बस थोड़े-से साहस की जरूरत होती है। उठाइए साइकिल और निकल जाइए, ऐसे रास्तों पर जहां जाने के लिए आपका जी मचल रहा हो। जिंदगी को ठाट से जीने के लिए साइकिलिंग से अच्छा विकल्प नहीं है। यह कहना है रोमांच के साथी युवा देवेन्द्र तिवारी का। मध्यप्रदेश के जिले ग्वालियर में कृषक परिवार में जन्मे देवेन्द्र तिवारी देश के कई दुर्गम क्षेत्रों को साइकिलिंग से जीत चुके हैं।
शनिवार, 27 अप्रैल 2013
गुरुवार, 11 अप्रैल 2013
मोदी, मोदी और मोदी
भा रत की राजनीति इस समय मोदीमय है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी के जिक्र के बिना शायद ही कोई दिन बीतता हो। इसे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजरें जमाए नरेन्द्र मोदी की कुशल रणनीति कह सकते हैं। मोदीफोबिया से ग्रस्त कांग्रेस के नेता यहां तक कि राहुल गांधी भी
आए दिन मोदी का जिक्र कर ही देते हैं। भाजपा में वटवृक्ष बनते जा रहे नरेन्द्र मोदी से पार्टी के क्षत्रपों में भी भय है। उन्हें डर है कि 'मोदी बरगद' की छांव में वे मुरझा न जाएं। इसीलिए मैं प्रधानमंत्री-मैं प्रधानमंत्री का राग अलाप कर पार्टी के नेता मोदी बहस शुरू कर देते हैं। हाल के घटनाक्रम देखकर स्पष्ट होता है कि राजनीति के नए चाणक्य नरेन्द्र मोदी का ही कमाल है कि वे एक दिन भी खबरों से परे नहीं जाते। दिल्ली में फिक्की के महिला सम्मेलन को संबोधित करना हो या फिर कोलकाता में उद्योगपतियों के कार्यक्रम में भाषण देना हो, इस तरह के तमाम आयोजन और बहस को मोदी की रणनीति के ही एक हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
नरेन्द्र मोदी मंच लूटने में माहिर हैं। उनकी लोकप्रियता फिलहाल सिर चढ़कर बोल रही है। इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी का भाषण सुनने के लिए भीड़ इतनी अधिक थी कि फिक्की के महिला सम्मेलन का स्थान बदलकर एक पांच सितारा होटल करना पड़ा। फेसबुक और ट्विटर पर मोदी के भाषण के कुछ हिस्से बड़ी तेजी के साथ शेयर हुए और उतनी ही तेजी से उन पर कंमेट आए। मोदी ने फिक्की के महिला सम्मेलन में महिला सशक्तिकरण की बात बड़े जोरदार ढंग से रखकर महिलाओं का भरोसा भी जीत लिया। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या, बढ़ते लिंगानुपात की निंदा की। लड़कियों को समान अवसर उपलब्ध कराने की वकालत की। महिला उद्यमियों की तारीफ की और उन्हें सरकार की ओर से अधिक मदद उपलब्ध कराने की बात कही। फिक्की में महिलाओं से मुखातिब होने के मौके को नरेन्द्र मोदी ने खूब कैश कराया। इस बहाने उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि यदि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनकी सरकार महिला हितैषी होगी। महिला सशक्तिकरण की नीतियां नए सिरे से तय की जाएंगी। इसके लिए नीति निर्माण की प्रक्रिया में महिलाओं को शामिल किया जाएगा। ५० प्रतिशत महिला आरक्षण बिल का जिक्र कर नरेन्द्र मोदी ने सरकार में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने का भी संकेत दिया।
फिक्की में दिए भाषण पर बहस खत्म हो पाती उससे पहले ही नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस और मीडिया को एक और मसला पकड़ा दिया। कोलकाता में तीन बड़े व्यापारिक संगठनों भारत चेम्बर ऑफ कॉमर्स, इंडियन चेम्बर ऑफ कॉमर्स और मर्चेंट चेम्बर ऑफ कॉमर्स की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मोदी ने सीधे यूपीए पर हमला बोला और ममता बनर्जी को रिझाने के लिए वामपंथियों को भी लपेटे में ले लिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के किए गड्ढे मैं गुजरात में भर रहा हूं तो बंगाल में ३२ साल में वामपंथियों ने जो गड्ढे किए हैं उन्हें भरने का काम ममता बनर्जी कर रही हैं। राजग के विस्तार की योजना निश्चित ही मोदी के दिमाग में है। जयललिता से उनकी अच्छी बनती है। ममता जरूर नैनो प्रकरण के बाद से मोदी से नाराज हैं। लेकिन, ममता दीदी की पटरी कांग्रेस के साथ भी नहीं बैठ रही है। वे राजग में पहले भी शामिल रह चुकी हैं। इसीलिए मोदी ममता का पक्ष लेकर प्रधानमंत्री पद के लिए अपना पक्ष मजबूत करने की कोशिश में हैं। आखिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी विकल्प तो उन्हें ही ढूंढऩा है जो राजग में नीतिश की जगह ले सके। क्योंकि ज्यादा संभावना है कि मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए घोषणा होते ही नीतीश कुमार राजग से अलग हो जाएंगे।
नरेन्द्र मोदी ने कोलकाता के अपने इस भाषण में सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया। मोदी ने कहा कि कांग्रेस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोई अपना नेता ही नहीं मानता। यह तकरीबन सच भी है, जिससे पूरा हिंदोस्तान वाकिफ है। यह बयान देने के पीछे मोदी के गहरे निहितार्थ हैं, जिन्हें समझना जरूरी है। उन्होंने संकेत दिया है कि देश को कैसा नेता चाहिए रबर स्टम्प या फिर जिसका जनाधार हो यानी नरेन्द्र मोदी। मनमोहन सिंह के बहाने नरेन्द्र मोदी ने अप्रत्यक्ष रूप से एक फ्रेम आमजन को दी है कि आप ही फिट करके देखिए कि प्रधानमंत्री कुर्सी पर कौन जमेगा?
अब नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी देखा जाए तो नरेन्द्र मोदी कहीं आगे दिखते हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़े गए चुनावों में कांग्रेस को कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी है जबकि नरेन्द्र मोदी अपनी दम पर तीसरी बार गुजरात में सरकार बनाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खम ठोंक रहे हैं। राहुल गांधी राष्ट्रीय बहस और संवेदनशील मुद्दों के दौरान राष्ट्रीय पटल से गायब रहते हैं जबकि मोदी हमेशा चर्चा में रहते हैं। हाल ही में राहुल गांधी का सीआईआई में दिया गया भाषण काफी सराहा गया लेकिन उतनी ही उसकी आलोचना भी हुई। ठीक यही स्थिति कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में दिए भाषण की रही। जिसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं को नई दिशा देने की जगह भावुक भाषण दिया। यहां तक की उन्होंने राजनीति को जहर का प्याला ही बता दिया। खैर, राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के सामने कहीं नहीं टिकते उसके कारण हैं। राहुल गांधी अपने भाषण में देश की समस्याएं तो बखूबी उठाते हैं लेकिन उनके पास समाधान नहीं है। उनके भाषण से सवाल तो बहुत उपजते हैं लेकिन जवाब राहुल गांधी के पास नहीं है। सीआईआई में दिए भाषण में राहुल कहते हैं कि भारत के सामने कई समस्याएं हैं। इन समस्याओं का समाधान जरूरी है। लेकिन, समाधान कैसे होगा? यह राहुल नहीं बता पाते हैं। राहुल कहते हैं कि युवाओं को सस्ती और बेहतर शिक्षा देने की जरूरत है। हकीकत यह है कि उनकी ही सरकार के दौरान शिक्षा महंगी होती जा रही है। हाल ही में केन्द्रीय विद्यालयों की फीस में भी बढ़ोतरी की गई है। निजी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय की मनमर्जी तो जग जाहिर है। शिक्षा सस्ती और सर्व सुलभ कैसे होगी? इसकी नीति राहुल गांधी नहीं बता सके। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार चंद लोग चला रहे हैं। सरकार चलाने के लिए आमजनता की भागीदारी की जरूरत है। सरकार में सबको कैसे, कहां और किस स्तर तक भागीदार बनाया जाएगा, इसका भी जवाब राहुल गांधी अपने भाषण में नहीं देते हैं। जबकि नरेन्द्र मोदी समाधान पर बात करते हैं। उनके पास हर सवाल का जवाब है। हाल ही में नरेन्द्र मोदी ने इंडिया टुडे कॉनक्लेव में शिरकत की थी। तब उनसे वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने पूछा था कि आप गुजरात दंगे के सवालों से बचते क्यों हैं? मोदी ने जवाब में कहा था कि मैं किसी भी सवाल से न तो डरता हूं और न ही बचता हूं। यदि मैं डरता तो यहां दिग्गज पत्रकारों के बीच नहीं आता। इस दौरान मोदी ने पूछे गए तमाम सवालों के जवाब तर्क के साथ रखकर अपना विजन देश के सामने रखा। विदेश नीति कैसी हो, देश के विकास की योजना क्या हो, एफडीआई को लागू किया जाए तो कैसे, भ्रष्टाचार दूर करने की योजना और सुरक्षा के मसले पर बेबाकी से अपना पक्ष रखा। इंडिया टुडे के एडिटर इन चीफ अरुण पुरी ने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से जुड़ा एक सवाल किया। जिसके जवाब में उन्होंने बड़ा सधा हुआ जवाब दिया, जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि सुरक्षा तो हर किसी को चाहिए, क्या मुस्लिम और क्या हिन्दू। इसलिए मेरी नीति है कि हर आदमी को उसके अधिकार और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए। कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि एक रणनीति के तहत आगे बढ़ रहे नरेन्द्र मोदी कॉनक्लेव, ऑनलाइन भाषण, छात्रों, फिक्की और उद्योगपतियों के आयोजनों में शिरकत कर अपना विजन देश के सामने रखते जा रहे हैं। बहस-मुहाबिस के बीच नमो बता रहे हैं कि वे देश के प्रधानमंत्री बने तो देश की तस्वीर क्या होगी?
गुरुवार, 4 अप्रैल 2013
मनुष्य जाति में स्त्री सबसे ज्यादा कामुक?
भा रत में बाजार यौन फंतासियों के इर्द-गिर्द सिमट रहा है। विज्ञापन जगत मनुष्य की यौनिक संवेदनाओं को कुरेद-कुरेद कर जगा रहा है और पैसा बना रहा है। क्या नैतिक और क्या अनैतिक, इससे उसे कोई वास्ता नहीं। विज्ञापन बाजार बस मनुष्य की मनुष्यता का दोहन कर रहा है। यौन व्यवहार को जीवन की प्राथमिकता और सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। टेल्क पाउडर से लेकर सोड़ा पाउडर तक बेचने के लिए नग्नता बेधड़क परोसी जा रही है। ऐसा नहीं है कि विज्ञापन के क्षेत्र में सृजन की कमी है। यहां कई रचनाधर्मी काम कर रहे हैं। नतीजतन, कई बेजोड़ विज्ञापन देखने में आ रहे हैं, जो समाज की बुराई पर सीधी चोट कर रहे हैं, मनुष्य के कलेजे को फड़कने का बंदोबस्त कर रहे हैं। फिर भी, बाजार के चूल्हे पर गंदगी क्यों उबल रही है? समझ से परे है। ऐसे में कई बार साजिश की बू आती है। जैसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को पीछे धकेलने का षड्यंत्र रचा जा रहा हो। मनुष्य से उसकी मनुष्यता छीनने की साजिश हो। इंसान को यौन संदर्भ में जानवर बनाने की व्यवस्था हो। जो भी है यह, बेहद घातक है। संभलना होगा हमें, निगरानी संस्थाओं और नीति निर्माताओं को भी। उत्पादन बेचने के लिए विज्ञापन कंपनियों की मनमानी अधिक दिन तक नहीं चलनी चाहिए। इस मनमानी को रोकने में ही सबकी भलाई।
एक दिन मेरे परिवार का नन्हा सदस्य (तीन वर्ष) अपने बालों को सीधा करते हुए बुदबुदा रहा था। मैंने उससे पूछा क्या कर रहा है? इस पर उसने इतराते हुए कहा- मामा, ऐसा करने से लड़कियां फिदा हो जाएंगी। दरअसल, वह कोमल हृदय का बालक 'बालों में लगाए जाने वाले जैल' के विज्ञापन की नकल कर रहा था यानी वह उक्त भौंड़े विज्ञापन से सीख रहा था लड़की पटाने का फंडा। कुछ समय पहले एक जेंट्स अण्डरवियर का विज्ञापन आता था। इसमें अण्डरवियर को धोते वक्त महिला को अतिकामुक होते दिखाया जाता था। इस विज्ञापन पर बड़ा बवाल मचा। मचना भी चाहिए था। बाद में इसका प्रसारण बंद हो गया। लेकिन, ऐसे विज्ञापन तो अब भी बड़ी संख्या में बन रहे हैं और दिख रहे हैं।
स्त्रीत्व का निरादर : बॉडी स्प्रे की खुशबू से मदहोश होकर सारी वर्जनाएं तोड़कर युवक के पीछे युवती का चले आना, बिस्तर से अंतवस्त्रों को उतार फेंकना। कपड़े (जींस) के विज्ञापन में नग्न पुरुषों को दिखाना। यहां भी उक्त कंपनी के जींस पहनने के बाद पुरुषों का संसर्ग पाने के लिए स्त्री को लंपट होते दिखाया गया है। डर्टी विज्ञापन नग्नता ही नहीं परोस रहे बल्कि स्त्री अस्मता से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। यह अधिक चिंता की बात है। डर्टी कैटेगरी के सभी विज्ञापन यही दिखाते हैं कि मनुष्य जाति में स्त्री सबसे ज्यादा कामुक है। काम इच्छाओं पर उसका जोर नहीं, वह इनके आगे हार जाती है। स्त्री की सोच सेक्स से शुरू होकर सेक्स पर ही खत्म हो जाती है। डर्टी विज्ञापन में भारत में शीर्ष पर बैठी स्त्री को दोयम दर्जे पर धकेलने का षड्यंत्र साफ दिखता है।
सकारात्मकता ही है हिट फार्मूला : सामान बेचने के लिए डर्टी विज्ञापन ही एकमात्र सफल फार्मूला नहीं है। निरमा, एमडीएच मसाला, टाटा चाय, बजाज स्कूटर सहित कई उदाहरण हैं। इन कंपनियों के ऐसे कई विज्ञापन हैं जो इतिहास के पृष्ठ पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गए हैं। एक भी डर्टी विज्ञापन उतना बड़ा हिट नहीं हुआ जितना कि ये साफ-सुथरे विज्ञापन रहे। आजकल प्रसारित हो रहा चाय कंपनी का विज्ञापन - देश उबल रहा है। उबलेगा तभी तो आएगा जोश, बढ़ेगी मिठास, बदलेगा देश का रंग.... भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में चल रही मुहिम का हिस्सा लगता है। इस विज्ञापन को देखकर लगता है कि समाज जागरण का काम तो सामान बेचने के साथ भी किया जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक यह विज्ञापन अन्य डर्टी विज्ञापन से कही अधिक हिट है। ग्राहक को उत्पाद की ओर आकर्षित तो करता ही है उसके मन में कुछ करने का जज्बा भी भरता है। इस तरह के विज्ञापन मनुष्य देह के उन्नत शिखर (मस्तिष्क) में स्पंदन करते हैं। यहां स्पष्ट कर हूं कि मेरा ऐसा मानना कतई नहीं है कि आप सामान न बेंचे या हर सामान बेचने के साथ समाज सृजन करें। लेकिन, कम से कम समाज को दूषित तो न करें। हर कोई आगे जाना चाहता है। बाजार में अपनी 'आवाज' सबसे ऊंची रखना चाहता है। लेकिन, इसके लिए समाज को क्या कीमत चुकानी पड़ रही है यह तो सोचना ही पड़ेगा।
स्त्रीत्व का निरादर : बॉडी स्प्रे की खुशबू से मदहोश होकर सारी वर्जनाएं तोड़कर युवक के पीछे युवती का चले आना, बिस्तर से अंतवस्त्रों को उतार फेंकना। कपड़े (जींस) के विज्ञापन में नग्न पुरुषों को दिखाना। यहां भी उक्त कंपनी के जींस पहनने के बाद पुरुषों का संसर्ग पाने के लिए स्त्री को लंपट होते दिखाया गया है। डर्टी विज्ञापन नग्नता ही नहीं परोस रहे बल्कि स्त्री अस्मता से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। यह अधिक चिंता की बात है। डर्टी कैटेगरी के सभी विज्ञापन यही दिखाते हैं कि मनुष्य जाति में स्त्री सबसे ज्यादा कामुक है। काम इच्छाओं पर उसका जोर नहीं, वह इनके आगे हार जाती है। स्त्री की सोच सेक्स से शुरू होकर सेक्स पर ही खत्म हो जाती है। डर्टी विज्ञापन में भारत में शीर्ष पर बैठी स्त्री को दोयम दर्जे पर धकेलने का षड्यंत्र साफ दिखता है।
सकारात्मकता ही है हिट फार्मूला : सामान बेचने के लिए डर्टी विज्ञापन ही एकमात्र सफल फार्मूला नहीं है। निरमा, एमडीएच मसाला, टाटा चाय, बजाज स्कूटर सहित कई उदाहरण हैं। इन कंपनियों के ऐसे कई विज्ञापन हैं जो इतिहास के पृष्ठ पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गए हैं। एक भी डर्टी विज्ञापन उतना बड़ा हिट नहीं हुआ जितना कि ये साफ-सुथरे विज्ञापन रहे। आजकल प्रसारित हो रहा चाय कंपनी का विज्ञापन - देश उबल रहा है। उबलेगा तभी तो आएगा जोश, बढ़ेगी मिठास, बदलेगा देश का रंग.... भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में चल रही मुहिम का हिस्सा लगता है। इस विज्ञापन को देखकर लगता है कि समाज जागरण का काम तो सामान बेचने के साथ भी किया जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक यह विज्ञापन अन्य डर्टी विज्ञापन से कही अधिक हिट है। ग्राहक को उत्पाद की ओर आकर्षित तो करता ही है उसके मन में कुछ करने का जज्बा भी भरता है। इस तरह के विज्ञापन मनुष्य देह के उन्नत शिखर (मस्तिष्क) में स्पंदन करते हैं। यहां स्पष्ट कर हूं कि मेरा ऐसा मानना कतई नहीं है कि आप सामान न बेंचे या हर सामान बेचने के साथ समाज सृजन करें। लेकिन, कम से कम समाज को दूषित तो न करें। हर कोई आगे जाना चाहता है। बाजार में अपनी 'आवाज' सबसे ऊंची रखना चाहता है। लेकिन, इसके लिए समाज को क्या कीमत चुकानी पड़ रही है यह तो सोचना ही पड़ेगा।
प्रतिक्रियाओं पर देना होगा ध्यान : समाज जागरण में लगी संस्थाओं के प्रयासों के चलते नागरिक जागरूक हुए हैं, वे अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराने के लिए आगे आने लगे हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में डर्टी विज्ञापनों के खिलाफ काफी शिकायतें हुई हैं। विज्ञापनों पर नजर रखने वाली स्वयंसेवी स्वनियंत्रित संस्था एडवरटाइजिंग काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) के पास प्रतिदिन डर्टी विज्ञापनों को लेकर हजारों शिकायतें पहुंचती हैं। अफसोस की बात है कि इसके बाद भी इस तरह के विज्ञापनों पर रोक लगना तो दूर इनमें कमी नहीं आई है। हालांकि इस बीच एएससीआई ने सूचना प्रसारण मंत्रालय को इस संबंध में एक प्रस्ताव भेजा है। इस प्रस्ताव में डर्टी विज्ञापनों का प्रसारण रात ११ से सुबह ६ बजे के बीच करने की सिफारिश की गई है। एएससीआई ने बाकायदा ऐसे विज्ञापनों की सूची भी मंत्रालय को भेजी है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भी इस मसले को गंभीरता से लिया है। विभाग की मंत्री अंबिका सोनी ने हाल ही में लोकसभा के प्रश्नकाल में बताया था कि विज्ञापनों की नीति निर्धारण के लिए मंत्रियों का एक समूह बनाया गया है। यह समूह जल्द ही इस मसले पर अपनी राय देगा। डर्टी विज्ञापनों का प्रसारण रात ११ से सुबह ६ बजे के बीच करने से समस्या का हल नहीं होगा। क्योंकि आजकल की जीवनशैली ऐसी है कि बच्चे भी देर रात तक टेलीविजन देखते हैं। डर्टी विज्ञापनों को लेकर लोगों में कितना आक्रोश है, उनकी क्या प्रतिक्रियाएं हैं और वे क्या चाहते हैं, मंत्रियों के समूह को यह जरूर जानना चाहिए। मंत्री समूह की राय कुछ ऐसी हो जो लोगों को पसंद आए न कि कंपनियों के मालिकों को। मंत्री समूह को इस दिशा में अपनी राय बनाने से पहले उन तमाम प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करना चाहिए जो एएससीआई पर प्रसारण मंत्रालय तक लोगों ने पहुंचाईं हैं।
शनिवार, 16 मार्च 2013
नक्सलियों को खुली चुनौती
रा म-कृष्ण, बुद्ध और गांधी के देश में हिंसक संघर्ष बर्दाश्त नहीं है। ध्येय कितना भी ऊंचा, पवित्र और जनहित का हो लेकिन उसे पाने के लिए उचित माध्यम होना जरूरी है। बुलेट की ताकत पर बदलाव संभव नहीं होता। बदलाव तो स्वत: स्फूर्त होना चाहिए। बंदूक की नाल से तो डराया जाता है। जिसके हाथ में बंदूक होती है वह कब, किस तरफ उसे मोड़ दे, कोई नहीं जानता। यही नक्सलवाद और माओवाद के नाम पर किया जाता रहा है। व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ संघर्ष अब निरीह जनता के खिलाफ हो गया है। लोग तंग आ गए हैं। नक्सलवाद भ्रष्ट हो गया है। उसका शिकार आदिवासी समाज ही बन रहा है। नक्सलियों के आतंक से तंग वनवासी समाज ने खुला पत्र लिख है। इस पत्र में बस्तर आदिवासी रक्षा समिति ने नक्सलियों से घोटपाल मड़ई विस्फोट में घायल हुए तीन ग्रामीणों को मुआवजा देने की मांग की है। समिति ने आदिवासी संस्कृति व परम्पराओं को भविष्य में आघात नहीं पहुंचाने की माओवादियों से लिखित गारंटी भी मांगी है। वनवासियों ने साफ कहा है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो नक्सली कड़ी कार्रवाई के लिए तैयार रहें। संभवत: यह पहला मौका है जब वनवासियों ने नक्सलियों के खिलाफ इस तरह का खुला पत्र जारी किया है। हालात बदल रहे हैं। वनवासी अब और अधिक नक्सल आतंक सहन करने के मूड में नहीं दिख रहे। यह महज एक मांग पत्र नहीं है बल्कि नक्सलियों को खुली चुनौती है। आओ, अब देखते हैं तुम्हें। सचेत उन्हें भी हो जाना चाहिए जो गाए-बगाहे लाल हिंसा का समर्थन करते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवियों को वनवासी समुदाय की पीड़ा समझनी होगी और उनके हित में अपनी लेखनी का उपयोग करना चाहिए। स्थितियां बिगड़े उससे पहले सरकार को भी चेतना होगा। आम नागरिकों के हित की रक्षा करना सरकार की ही जिम्मेदारी है। यह नौबत नहीं आनी चाहिए कि नक्सलवाद से लडऩे के लिए जनता को हथियार उठाने पड़ें। भारत सरकार के पास मौका है नक्सल आतंक को जड़ से उखाड़ फेंकने का। पीडि़त और शोषित वनवासी सरकार के साथ आने को तैयार हैं, यदि सरकार की नीयत साफ हो तो।
वनवासी समाज की चिंता इस बात से भी बढ़ गई है कि नक्सलवाद के नाम पर धीमे-धीमे उनकी संस्कृति को भी निशाना बनाया जा रहा है। उनके लोगों का खून तो बह ही रहा है। नक्सलवाद भले ही वर्ष १९६७ में पश्चिम बंगाल के गांव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ हो लेकिन इसके नेताओं की वैचारिक प्रेरणा का केन्द्र विदेशी है। नक्सवाद के जन्म के साथ ही इसके प्रारंभिक नेताओं ने राष्ट्र विरोधी नारा लगाया था- 'चेयरमैन माओ ही हमारा चेयरमैन है।' माओ त्से तुंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक और चीनी क्रांति का नेता था। जगजाहिर है कि चीन की तथाकथित ग्रेट प्रोलेटोरियन कल्चरल रिवोल्यूशन यानी सांस्कृतिक क्रांति में लाखों लोगों की जान व्यर्थ चली गई थी। करीब २० लाख लोगों की मौत, ४० लाख लोगों को बंदी बनाया गया और चीनी जनता पर बंदूक-तोप की दम पर वामपंथी विचारधारा थोपी गई। स्टालिन (शासन काल १९२४-१९५३) के समय सोवियत संघ में और पॉल पॉट के शासनकाल १९७५-८० के बीच कंबोडिया में निर्दोष लोगों को विचारधारा के नाम पर कत्ल किया गया। तथाकथित भारतीय नक्सलवाद का कनेक्शन भी अंतरराष्ट्रीय वामपंथी आंदोलनों से है। विदेशी प्रेरणा केन्द्र होने के कारण नक्सलवाद का भारतीय परंपराओं और संस्कृति से कोई सरोकार नहीं है। खासकर हिन्दुत्व के तो ये विरोधी ही हैं। दरअसल, हिन्दुत्व राष्ट्रवाद की सीख देता है और नक्सलवाद की इसमें कोई रुचि नहीं है। दंतेवाड़ा जिले के ग्राम घोटपाल में आंगा देव व ग्राम्य देवता पर श्रद्धा के चलते वार्षिक मड़ई मनाया जाता है। इसी मेले में नक्सलियों ने विस्फोट किया। जिससे दो आदिवासी युवतियों और एक ग्रामीण घायल हो गया है। चार पुलिस जवान भी घायल हुए। इस विस्फोट को वनवासियों ने अपने आराध्य आंगा देव का अपमान माना है। तीखी प्रतिक्रिया करते हुए रक्षा समिति ने देवताओं का अपमान करने पर आंध्रप्रदेश के नक्सलियों को फांसी देने की भी मांग की है। हालांकि नक्सली पहले भी वनवासी लोगों को निशाना बनाते रहे हैं। मुखबिरी का आरोप लगाकर मासूम-कोमल बच्चों सहित पूरे परिवार को जला दिया जाता है। बेरहमी से उनका कत्ल कर दिया जाता रहा है। तथाकथित नक्सली आंदोलन में शामिल करने के लिए बच्चों को जबरन उठाकर ले जाया जाता है। जवान लड़कियों के साथ दुराचार के मामले भी सामने आने लगे हैं। अब तो इनकी हरकतें बेहद घृणित हो गईं हैं। सुरक्षा जवान की हत्या कर उसके मृत शरीर में बम लगाने की हरकत, नजीर है कि नक्सलवाद विचार का पतन कितना हो चुका है।
दरअसल, भारत में सक्रिय नक्सली समूह वास्तव में देश के विरुद्ध परोक्ष युद्ध लड़ रहे हैं। पुलिस रक्षक दल पर आक्रमण करना, वनवासियों में दबदबा बनाने के लिए अबोध नागरिकों की निर्मम हत्या, राजनीति का संरक्षण पाने के लिए राजनेताओं की हत्या, धन उगाही के लिए व्यवसायियों को धमकाना, सरकार की विकासोन्मुखी योजनाओं के कार्यान्वयन को रोकना, स्कूल की इमारतों में बम विस्फोट और शिक्षकों का अपहरण कर हत्या करना ऐसी सभी घटनाएं यही संकेत करती हैं। नक्सलियों की लोकतंत्र में आस्था नहीं। वे लोकतंत्र को उखाड़कर अतिवादी व निरंकुश कम्युनिष्ट शासन स्थापित करना चाहते हैं। अब तक लाल आतंक के नाम पर नक्सली लाखों लोगों का खून बहा चुके हैं। इनमें पुलिस के जवान, सरकारी अफसर, नेता, व्यवसायी, उद्योगपतियों सहित आम नागरिक भी शामिल हैं।
भारत में ८ प्रतिशत से अधिक वनवासी आबादी है। नक्सलवाद इन्हीं के बीच केंद्रित है। अब तक की सरकारों को १५ प्रतिशत मुस्लिमों की तो चिंता है लेकिन वनांचल में रहने वाले अबोध वनवासियों की फिक्र नहीं। १५ प्रतिशत लोगों के लिए तो अरबों रुपए की योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन वनवासियों के लिए सिर्फ दिखावा। ये भोले-भाले वनवासी अल्पसंख्यकों की तरह मुखिर नहीं हैं, ये अब तक की केन्द्र सरकारों के वोट बैंक भी नहीं है। क्या इसीलिए इनकी उपेक्षा की जाती है। नक्सलबाड़ी से निकलकर देश के ५० से अधिक जिलों में नक्सलवाद के फैलने के लिए अब तक की सरकारों की उदासीनता ही जिम्मेदार है। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़ीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के जनजातीय और पिछड़े क्षेत्रों में नक्सली गतिविधियां अधिक हैं। इसे ही रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है यानी लाल आतंक का गढ़। हालांकि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में भी इनकी हिंसक घटनाएं सामने आती हैं। नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर मजबूती के साथ प्रयास होने चाहिए। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भूमि सुधार, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेलकूद और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देकर वनवासियों का विश्वास जीतना होगा। वनवासी क्षेत्रों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे। सड़क, इमारतों और रेल की पटरियों को नुकसान पहुंचाने वाले नक्सलियों से भी कड़ाई से निपटना होगा। सरकार को चाहिए कि वह सेना की भी मदद ले क्योंकि नक्सलवाद अब नासूर बन गया है। यही नहीं पुलिस का भी आधुनिकीकरण करना होगा। नक्सलियों के पास एके-४७ से लेकर अति आधुनिक हथियार हैं लेकिन पुलिस के पास पुरानी तकनीक की बंदूकें, ऐसे में पुलिस भी कैसे मुकाबले करे। हालांकि नक्सल आतंक से निपटने के नाम पर सरकार के पास नीति है लेकिन नीयत नहीं है। नक्सल प्रभावित इन क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए सरकारों को पुरजोर कोशिश करनी होगी। आधे-अधूरे मन के साथ बदलाव संभव नहीं। लाल आतंक के चगुंग में फंसे वनवासी सुकून चाहते हैं जो उनके नसीब में नहीं।
वनवासी समाज की चिंता इस बात से भी बढ़ गई है कि नक्सलवाद के नाम पर धीमे-धीमे उनकी संस्कृति को भी निशाना बनाया जा रहा है। उनके लोगों का खून तो बह ही रहा है। नक्सलवाद भले ही वर्ष १९६७ में पश्चिम बंगाल के गांव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ हो लेकिन इसके नेताओं की वैचारिक प्रेरणा का केन्द्र विदेशी है। नक्सवाद के जन्म के साथ ही इसके प्रारंभिक नेताओं ने राष्ट्र विरोधी नारा लगाया था- 'चेयरमैन माओ ही हमारा चेयरमैन है।' माओ त्से तुंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक और चीनी क्रांति का नेता था। जगजाहिर है कि चीन की तथाकथित ग्रेट प्रोलेटोरियन कल्चरल रिवोल्यूशन यानी सांस्कृतिक क्रांति में लाखों लोगों की जान व्यर्थ चली गई थी। करीब २० लाख लोगों की मौत, ४० लाख लोगों को बंदी बनाया गया और चीनी जनता पर बंदूक-तोप की दम पर वामपंथी विचारधारा थोपी गई। स्टालिन (शासन काल १९२४-१९५३) के समय सोवियत संघ में और पॉल पॉट के शासनकाल १९७५-८० के बीच कंबोडिया में निर्दोष लोगों को विचारधारा के नाम पर कत्ल किया गया। तथाकथित भारतीय नक्सलवाद का कनेक्शन भी अंतरराष्ट्रीय वामपंथी आंदोलनों से है। विदेशी प्रेरणा केन्द्र होने के कारण नक्सलवाद का भारतीय परंपराओं और संस्कृति से कोई सरोकार नहीं है। खासकर हिन्दुत्व के तो ये विरोधी ही हैं। दरअसल, हिन्दुत्व राष्ट्रवाद की सीख देता है और नक्सलवाद की इसमें कोई रुचि नहीं है। दंतेवाड़ा जिले के ग्राम घोटपाल में आंगा देव व ग्राम्य देवता पर श्रद्धा के चलते वार्षिक मड़ई मनाया जाता है। इसी मेले में नक्सलियों ने विस्फोट किया। जिससे दो आदिवासी युवतियों और एक ग्रामीण घायल हो गया है। चार पुलिस जवान भी घायल हुए। इस विस्फोट को वनवासियों ने अपने आराध्य आंगा देव का अपमान माना है। तीखी प्रतिक्रिया करते हुए रक्षा समिति ने देवताओं का अपमान करने पर आंध्रप्रदेश के नक्सलियों को फांसी देने की भी मांग की है। हालांकि नक्सली पहले भी वनवासी लोगों को निशाना बनाते रहे हैं। मुखबिरी का आरोप लगाकर मासूम-कोमल बच्चों सहित पूरे परिवार को जला दिया जाता है। बेरहमी से उनका कत्ल कर दिया जाता रहा है। तथाकथित नक्सली आंदोलन में शामिल करने के लिए बच्चों को जबरन उठाकर ले जाया जाता है। जवान लड़कियों के साथ दुराचार के मामले भी सामने आने लगे हैं। अब तो इनकी हरकतें बेहद घृणित हो गईं हैं। सुरक्षा जवान की हत्या कर उसके मृत शरीर में बम लगाने की हरकत, नजीर है कि नक्सलवाद विचार का पतन कितना हो चुका है।
दरअसल, भारत में सक्रिय नक्सली समूह वास्तव में देश के विरुद्ध परोक्ष युद्ध लड़ रहे हैं। पुलिस रक्षक दल पर आक्रमण करना, वनवासियों में दबदबा बनाने के लिए अबोध नागरिकों की निर्मम हत्या, राजनीति का संरक्षण पाने के लिए राजनेताओं की हत्या, धन उगाही के लिए व्यवसायियों को धमकाना, सरकार की विकासोन्मुखी योजनाओं के कार्यान्वयन को रोकना, स्कूल की इमारतों में बम विस्फोट और शिक्षकों का अपहरण कर हत्या करना ऐसी सभी घटनाएं यही संकेत करती हैं। नक्सलियों की लोकतंत्र में आस्था नहीं। वे लोकतंत्र को उखाड़कर अतिवादी व निरंकुश कम्युनिष्ट शासन स्थापित करना चाहते हैं। अब तक लाल आतंक के नाम पर नक्सली लाखों लोगों का खून बहा चुके हैं। इनमें पुलिस के जवान, सरकारी अफसर, नेता, व्यवसायी, उद्योगपतियों सहित आम नागरिक भी शामिल हैं।
भारत में ८ प्रतिशत से अधिक वनवासी आबादी है। नक्सलवाद इन्हीं के बीच केंद्रित है। अब तक की सरकारों को १५ प्रतिशत मुस्लिमों की तो चिंता है लेकिन वनांचल में रहने वाले अबोध वनवासियों की फिक्र नहीं। १५ प्रतिशत लोगों के लिए तो अरबों रुपए की योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन वनवासियों के लिए सिर्फ दिखावा। ये भोले-भाले वनवासी अल्पसंख्यकों की तरह मुखिर नहीं हैं, ये अब तक की केन्द्र सरकारों के वोट बैंक भी नहीं है। क्या इसीलिए इनकी उपेक्षा की जाती है। नक्सलबाड़ी से निकलकर देश के ५० से अधिक जिलों में नक्सलवाद के फैलने के लिए अब तक की सरकारों की उदासीनता ही जिम्मेदार है। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़ीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के जनजातीय और पिछड़े क्षेत्रों में नक्सली गतिविधियां अधिक हैं। इसे ही रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है यानी लाल आतंक का गढ़। हालांकि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में भी इनकी हिंसक घटनाएं सामने आती हैं। नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर मजबूती के साथ प्रयास होने चाहिए। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भूमि सुधार, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेलकूद और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देकर वनवासियों का विश्वास जीतना होगा। वनवासी क्षेत्रों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे। सड़क, इमारतों और रेल की पटरियों को नुकसान पहुंचाने वाले नक्सलियों से भी कड़ाई से निपटना होगा। सरकार को चाहिए कि वह सेना की भी मदद ले क्योंकि नक्सलवाद अब नासूर बन गया है। यही नहीं पुलिस का भी आधुनिकीकरण करना होगा। नक्सलियों के पास एके-४७ से लेकर अति आधुनिक हथियार हैं लेकिन पुलिस के पास पुरानी तकनीक की बंदूकें, ऐसे में पुलिस भी कैसे मुकाबले करे। हालांकि नक्सल आतंक से निपटने के नाम पर सरकार के पास नीति है लेकिन नीयत नहीं है। नक्सल प्रभावित इन क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए सरकारों को पुरजोर कोशिश करनी होगी। आधे-अधूरे मन के साथ बदलाव संभव नहीं। लाल आतंक के चगुंग में फंसे वनवासी सुकून चाहते हैं जो उनके नसीब में नहीं।
सोमवार, 11 मार्च 2013
समान अधिकार और सम्मान चाहिए, विशेषाधिकार नहीं
बैं क में भारी भीड़ थी। लोग घंटों से लाइन में लगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। तभी कॉलेज की एक लड़की आती है। उम्र २०-२२ साल। तंग कपड़े पहने हुए और आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ाए हुए थी। भीड़ देखकर परेशान थी। लेडीज फर्स्ट जुमले का फायदा उठाने के लिए लाइन खड़ी न होकर काउंटर पर आगे चली गई। तभी एक युवक ने उसे आवाज दी- ओ दोस्त लाइन में आ जाओ। हम भी बहुत देर से यहां खड़े हैं। क्या हो जाएगा? यदि मैं तुमसे पहले ड्राफ्ट बना लूंगी तो। अकेली ही तो हूं, बस पांच मिनट का ही तो अंतर आएगा। अब दूसरा दृश्य देखिए रेलवे स्टेशन टिकट के लिए लंबी कतार। ठीक बैंक वाली लड़की जैसी ही टिप-टॉप लड़की यहां भी आती है। आगे की ओर खड़े लोगों से अपना टिकट लेने का निवेदन करती है। इस पर एक युवक ने उससे कहा - अरे बहन, तुम खुद ही पहले टिकट ले लो। कहां लड़कों के साथ लाइन में फंसोगी। लकड़ी मुस्काती हुई आगे जाती है और टिकट ले लेती है। एक और दृश्य देखिए। मल्टीप्लेक्स सिनेमा का टिकट काउंटर। टिकट लेने के लिए लंबी लाइन लगी है। यहां भी महिलाओं की अलग से लाइन नहीं है। वह दो पल के लिए खड़ी होकर सोच ही रही थी कि टिकट ले या नहीं। इसके बाद वह लाइन में लगने लगी। लाइन में खड़े एक-दो लड़कों ने कहा- अरे आप कहां लाइन में लग रही हो। आप तो लड़की हो, आगे चली जाओ। वह पहले टिकट मिल जाएगा। यहां लड़की का जवाब गौर करने लायक था। उसने कहा- मुझे जरूरत नहीं। लड़की होने के कोई विशेषाधिकार नहीं चाहिए। जितने विशेषाधिकार देने थे, ऊपर वाले ने दे दिए हैं। धरती पर तो बस सम्मान और समान अधिकार चाहिए।
तीनों लड़कियों में आखिरी वाली लड़की ने पते की बात कही। विशेषाधिकार तो कमजोर होने की निशानी है। स्त्रियां सदैव से यह सिद्ध करती आई हैं कि कम से कम वे पुरुषों के मुकाबले किसी काम में कमजोर तो नहीं ही है। बल्कि की आगे ही हैं। व्यक्तिगत गुणों के मुकाबले भी पुरुष उनके सामने कहीं नहीं टिकता। अब देखें तो नारी आंदोलन के नाम पर हो उल्टा रहा है। स्त्री के लिए विशेषाधिकार की मांग की जा रही है। जिसकी उसे कतई जरूरत नहीं है। उसके जीवन में कमी है तो समान अधिकार की। सम्मान की। ये उसे मिल जाए तो फिर किसी विशेषाधिकार की उसे जरूरत नहीं रह जाती। बलात्कार के खिलाफ दिल्ली में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ। कानून में भी फेरबदल किया गया। लेकिन, क्या इससे बलात्कार की घटनाओं में कमी आई। जवाब है नहीं। लड़कियों को उसी रफ्तार से रौंदा जा रहा है। महानगर से लेकर कस्बे तक एक जैसे हालात हैं। सवाल उठता है कि तो कैसे बदलाव आएगा? क्या कानूनों को कड़ा नहीं किया जाना चाहिए? जरूर आएगा बदलाव। कानून भी कड़े होने चाहिए सभी तरह के अपराधियों के लिए। यह अलग बात है कि बदलते दौर में कड़े कानून स्त्रियों के सहायक तो हो सकते हैं लेकिन उसके प्रति समाज की सोच नहीं बदल सकते। स्त्री को देखने, सोचने और समझने का नजरिया बदलना होगा। इसकी शुरुआत किसी कानून के बनने से नहीं हो सकती। मन बनाना होगा। समाज यानी स्त्री-पुरुष दोनों को खुद से करनी होगी शुरुआत। स्त्री को कदम-कदम पर क्षणिक लाभ लेने के लिए खुद को कमजोर साबित करने से बचना होगा। उसे लेडीज फर्स्ट के जुमले को छोडऩा होगा। मैं नारी हूं इसलिए मेरी मदद कीजिए, यह भी नहीं चलने देना होगा। पुरुष को भी यह खयाल दिल से निकालना होगा कि नारी को उसकी जरूरत है। देखने में आता है कि कोई लड़का गाड़ी धकेलकर ले जा रहा है तो कोई उससे नहीं पूछता कि क्या दिक्कत है? मैं क्या मदद कर सकता हूं? लेकिन, स्थिति इसके उलट हो यानी जब कोई लड़की गाड़ी धकेलकर ले जा रही हो तो राह चलते सौ लोग रुककर उससे पूछते हैं, क्या हुआ? कोई मदद तो नहीं चाहिए? पुरुषों को हर काम में लड़कियों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाने की मानसिकता से भी पीछा छुड़ाना होगा। इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। अपनी बहन-बेटी को स्कूल-कॉलेज छोडऩे जाने की बजाय उसे स्वयं जाने दिया जाए। घर में बेटे के समान ही बेटी को भी पढ़ाई का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए। उसे सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ाना चाहिए कि ब्याह करने में दिक्कत न आए। उसे अच्छा नौकरीपेशा वर मिल सके। जिस तरह लड़के को अफसर बनाने के लिए पढ़ाई पर पैसा खर्च किया जाता है वैसी ही बिटिया को भी अफसर बनाने का सपना देखना चाहिए। घर की संपत्ति में भी पुत्र के बराबर पुत्री को हक देना चाहिए। इस मामले में अभी समाज बहुत रूढि़ है। घर की सबसे लाड़ली सदस्य से पिता, मां और भाई भी उस समय खपा हो जाते हैं, जब वह शादी के बाद पैतिृक संपत्ति में से अपना हिस्सा मांग ले। इस वक्त घरवालों का एक ही कहना होता है कि दहेज तो दे दिया, अब क्या भाइयों का हिस्सा भी चाहिए। खून के रिश्ते बिगडऩे से बचाने के लिए घर की बेटी छोटी-मोटी नौकरी करके गुजारा कर लेती है लेकिन किसी भी आपात स्थिति में वह पिता की संपत्ति में से हिस्सा नहीं मांगती। यहां समानता लाने के लिए काफी प्रयास करने होंगे। असमानता और विभेद की लकीर घर में बेटा और बेटी को दी जाने वाली अलग-अलग नैतिक शिक्षा से भी बनती है। बेटे के लिए भरपूर आजादी। बेटी को ये नहीं करना चाहिए, वो नहीं करना चाहिए, तमाम बंदिशें। जबकि नैतिकता और मर्यादा का पाठ लड़की के साथ-साथ लड़कों को भी पढ़ाया जाए तो ठीक बनेगा आने वाला समाज।
दिक्कत कहां है? क्यों तमाम प्रयास के बावजूद हम वहीं के वहीं खड़े हैं? इसके लिए हम सबके साथ-साथ बहुत हद तक नारी को आधुनिक बनाने के नाम पर चल रहे तमाम नारी आंदोलन भी जिम्मेदार हैं। मशहूर नारीवादी चिंतक जर्मेन ग्रीयर का कथन याद आता है कि नारीवादी आंदोलनों ने भारतीय नारी को बस तीन चीजें दी हैं- लिपस्टिक, हाईहील सैंडल और ब्रा। हम सबकी नजर में भी आधुनिक स्त्री की छवि लाली-पाउडर पोते, स्टाइलिश बाल कटवाए और जींस-टीशर्ट पहनने वाली लड़की की है। इतना ही नहीं नारीवादी आंदोलनों से जुड़े लोग नारी की आजादी के नाम पर सिर्फ यौनिक आजादी की ही प्रमुखता से चर्चा करते हैं। जिसका खामियाजा स्त्री को ही उठाना पड़ रहा है। यौनिक आजादी की आड़ में बाजार ने उसे अपना गुलाम बना लिया है। बाजार ने आधुनिक नारी का समूचा व्यक्तित्व उसके शरीर पर केन्द्रित कर दिया है। नारी देह दिखाकर साबुन से लेकर सीमेंट तक बेचा जा रहा है। बाजार अपने मतलब के लिए नारी देह से सारे लिबास नोंच लेना चाहता है।
बाजार और नारीवादी आंदोलन के नाम पर आए भटकाव से तो स्वत: नारी को ही बचना होगा। उसे तय करना चाहिए कि उसकी पहचान कैसे हो? उसे जरूरत नहीं पुरुषों की नजरों में सुंदर दिखने की। उसे ही तय करना होगा कि बाजार की ओर से सुझाए कपड़े उसे पहनने हैं या फिर देह और देश-काल के अनुरूप। उसे जरूरत नहीं किसी का सामान बेचने के लिए अपना शरीर बेचने की। उसे घर से लेकर बाजार तक स्वयं को मजबूत साबित करना होगा। कहीं भी अगर पुरुष उसे कमजोर समझ कर आगे जाने का अवसर दे या दया भाव दिखाए तो स्त्री को ताकत के साथ उसका प्रतिरोध करना चाहिए। बराबर ताकत वाले का सब सम्मान करते हैं।
तीनों लड़कियों में आखिरी वाली लड़की ने पते की बात कही। विशेषाधिकार तो कमजोर होने की निशानी है। स्त्रियां सदैव से यह सिद्ध करती आई हैं कि कम से कम वे पुरुषों के मुकाबले किसी काम में कमजोर तो नहीं ही है। बल्कि की आगे ही हैं। व्यक्तिगत गुणों के मुकाबले भी पुरुष उनके सामने कहीं नहीं टिकता। अब देखें तो नारी आंदोलन के नाम पर हो उल्टा रहा है। स्त्री के लिए विशेषाधिकार की मांग की जा रही है। जिसकी उसे कतई जरूरत नहीं है। उसके जीवन में कमी है तो समान अधिकार की। सम्मान की। ये उसे मिल जाए तो फिर किसी विशेषाधिकार की उसे जरूरत नहीं रह जाती। बलात्कार के खिलाफ दिल्ली में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ। कानून में भी फेरबदल किया गया। लेकिन, क्या इससे बलात्कार की घटनाओं में कमी आई। जवाब है नहीं। लड़कियों को उसी रफ्तार से रौंदा जा रहा है। महानगर से लेकर कस्बे तक एक जैसे हालात हैं। सवाल उठता है कि तो कैसे बदलाव आएगा? क्या कानूनों को कड़ा नहीं किया जाना चाहिए? जरूर आएगा बदलाव। कानून भी कड़े होने चाहिए सभी तरह के अपराधियों के लिए। यह अलग बात है कि बदलते दौर में कड़े कानून स्त्रियों के सहायक तो हो सकते हैं लेकिन उसके प्रति समाज की सोच नहीं बदल सकते। स्त्री को देखने, सोचने और समझने का नजरिया बदलना होगा। इसकी शुरुआत किसी कानून के बनने से नहीं हो सकती। मन बनाना होगा। समाज यानी स्त्री-पुरुष दोनों को खुद से करनी होगी शुरुआत। स्त्री को कदम-कदम पर क्षणिक लाभ लेने के लिए खुद को कमजोर साबित करने से बचना होगा। उसे लेडीज फर्स्ट के जुमले को छोडऩा होगा। मैं नारी हूं इसलिए मेरी मदद कीजिए, यह भी नहीं चलने देना होगा। पुरुष को भी यह खयाल दिल से निकालना होगा कि नारी को उसकी जरूरत है। देखने में आता है कि कोई लड़का गाड़ी धकेलकर ले जा रहा है तो कोई उससे नहीं पूछता कि क्या दिक्कत है? मैं क्या मदद कर सकता हूं? लेकिन, स्थिति इसके उलट हो यानी जब कोई लड़की गाड़ी धकेलकर ले जा रही हो तो राह चलते सौ लोग रुककर उससे पूछते हैं, क्या हुआ? कोई मदद तो नहीं चाहिए? पुरुषों को हर काम में लड़कियों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाने की मानसिकता से भी पीछा छुड़ाना होगा। इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। अपनी बहन-बेटी को स्कूल-कॉलेज छोडऩे जाने की बजाय उसे स्वयं जाने दिया जाए। घर में बेटे के समान ही बेटी को भी पढ़ाई का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए। उसे सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ाना चाहिए कि ब्याह करने में दिक्कत न आए। उसे अच्छा नौकरीपेशा वर मिल सके। जिस तरह लड़के को अफसर बनाने के लिए पढ़ाई पर पैसा खर्च किया जाता है वैसी ही बिटिया को भी अफसर बनाने का सपना देखना चाहिए। घर की संपत्ति में भी पुत्र के बराबर पुत्री को हक देना चाहिए। इस मामले में अभी समाज बहुत रूढि़ है। घर की सबसे लाड़ली सदस्य से पिता, मां और भाई भी उस समय खपा हो जाते हैं, जब वह शादी के बाद पैतिृक संपत्ति में से अपना हिस्सा मांग ले। इस वक्त घरवालों का एक ही कहना होता है कि दहेज तो दे दिया, अब क्या भाइयों का हिस्सा भी चाहिए। खून के रिश्ते बिगडऩे से बचाने के लिए घर की बेटी छोटी-मोटी नौकरी करके गुजारा कर लेती है लेकिन किसी भी आपात स्थिति में वह पिता की संपत्ति में से हिस्सा नहीं मांगती। यहां समानता लाने के लिए काफी प्रयास करने होंगे। असमानता और विभेद की लकीर घर में बेटा और बेटी को दी जाने वाली अलग-अलग नैतिक शिक्षा से भी बनती है। बेटे के लिए भरपूर आजादी। बेटी को ये नहीं करना चाहिए, वो नहीं करना चाहिए, तमाम बंदिशें। जबकि नैतिकता और मर्यादा का पाठ लड़की के साथ-साथ लड़कों को भी पढ़ाया जाए तो ठीक बनेगा आने वाला समाज।
दिक्कत कहां है? क्यों तमाम प्रयास के बावजूद हम वहीं के वहीं खड़े हैं? इसके लिए हम सबके साथ-साथ बहुत हद तक नारी को आधुनिक बनाने के नाम पर चल रहे तमाम नारी आंदोलन भी जिम्मेदार हैं। मशहूर नारीवादी चिंतक जर्मेन ग्रीयर का कथन याद आता है कि नारीवादी आंदोलनों ने भारतीय नारी को बस तीन चीजें दी हैं- लिपस्टिक, हाईहील सैंडल और ब्रा। हम सबकी नजर में भी आधुनिक स्त्री की छवि लाली-पाउडर पोते, स्टाइलिश बाल कटवाए और जींस-टीशर्ट पहनने वाली लड़की की है। इतना ही नहीं नारीवादी आंदोलनों से जुड़े लोग नारी की आजादी के नाम पर सिर्फ यौनिक आजादी की ही प्रमुखता से चर्चा करते हैं। जिसका खामियाजा स्त्री को ही उठाना पड़ रहा है। यौनिक आजादी की आड़ में बाजार ने उसे अपना गुलाम बना लिया है। बाजार ने आधुनिक नारी का समूचा व्यक्तित्व उसके शरीर पर केन्द्रित कर दिया है। नारी देह दिखाकर साबुन से लेकर सीमेंट तक बेचा जा रहा है। बाजार अपने मतलब के लिए नारी देह से सारे लिबास नोंच लेना चाहता है।
बाजार और नारीवादी आंदोलन के नाम पर आए भटकाव से तो स्वत: नारी को ही बचना होगा। उसे तय करना चाहिए कि उसकी पहचान कैसे हो? उसे जरूरत नहीं पुरुषों की नजरों में सुंदर दिखने की। उसे ही तय करना होगा कि बाजार की ओर से सुझाए कपड़े उसे पहनने हैं या फिर देह और देश-काल के अनुरूप। उसे जरूरत नहीं किसी का सामान बेचने के लिए अपना शरीर बेचने की। उसे घर से लेकर बाजार तक स्वयं को मजबूत साबित करना होगा। कहीं भी अगर पुरुष उसे कमजोर समझ कर आगे जाने का अवसर दे या दया भाव दिखाए तो स्त्री को ताकत के साथ उसका प्रतिरोध करना चाहिए। बराबर ताकत वाले का सब सम्मान करते हैं।
रविवार, 3 मार्च 2013
सोने के दांत वाले लोगों का देश
सो वियत संघ यानी रूस। लम्बे समय तक अमरीका का सीधा प्रतिद्वंद्वी रहा। अभी भी है। महाशक्ति रूस। १९९० में सोवियत संघ का विघटन शुरू हुआ। कम्युनिस्ट विचारधारा के कमजोर होने की शुरुआत। कम्युनिस्ट शासन के दौर में रूस विकास की दौड़ में काफी पीछे छूट रहा था। लोग आर्थिक सुधारों के लिए लोकतंत्र सरकार के प्रति विश्वास जता रहे थे। रूसी जनता कम्युनिस्ट शासन की तानाशाही से तंग आ चुकी थी। कुछ साल पहले दैनिक समाचार-पत्र में किसी लेखिका का आलेख पढ़ा था कि रूस में जब कम्युनिज्म का परचम फहरा रहा था, तब लोगों को बोलने की पूरी आजादी नहीं थी। खासकर कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ तो कोई कुछ बोल भी नहीं सकता था। यहां तक कि कम्युनिस्ट सरकार की बुराई सुनना भी गुनाह था। लेखिका लिखती है कि ट्रेन में सफर करते समय एक विदेशी यात्री किन्हीं अव्यवस्थाओं को लेकर सरकार की बुराई कर रहा था। सामने की सीट पर बैठा रूसी नागरिक विदेशी यात्री को चुप रहने को कह रहा था। इतने में ट्रेन में सवार दो सुरक्षाकर्मियों ने विदेशी और सामने की सीट पर बैठे रूसी नागरिक दोनों को गिरफ्तार कर लिया। विदेशी यात्री को थाने ले जाकर कड़ी हिदायत दी गई कि इस देश में यहां की सरकार (कम्युनिस्ट) की निंदा करने की आजादी नहीं है। आप चूंकि बाहरी हो, हमारे मेहमान हो इसलिए जाने दे रहे हैं। विदेशी व्यक्ति ने पुलिस से पूछा कि सामने बैठे आदमी का क्या दोष था? उसे क्यों गिरफ्तार किया। पुलिस के अफसर ने कहा, उसने सरकार की निंदा सुनी। यह उसका बहुत बड़ा अपराध है, उसे कड़ी सजा दी गई है। अभिव्यक्ति पर कुछ इस तरह ताला लगा रखा था साम्यवादी सत्ता ने रूस में। सोवियत संघ के १९९० में विघटन के साथ ही वहां के लोगों को बोलने की आजादी मिल गई। हालात बदल गए। लोग सरकार की नीतियों और व्यवस्था के खिलाफ विचार कर सकते थे और बोलने भी लगे।
सोवियत संघ के इस दौर का जिक्र पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट शिखा वार्ष्णेय ने अपनी किताब 'स्मृतियों में रूस' में किया है। हालांकि किताब में इसकी विस्तृत चर्चा नहीं है। उन्होंने १९९० से १९९६ तक रूस में रहकर पत्रकारिता की पढ़ाई की। इस दौरान शिखा वार्ष्णेय के अनुभवों का ही संकलन है स्मृतियों में रूस। सहज और सरल भाषा में यादों को उकेरने के खूबसूरत प्रयास के लिए वे बधाई की पात्र हैं। उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात अगस्त २०१२ में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई। मीडिया एक्टिविस्ट और चरैवेति (भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश की पत्रिका) के संपादक अनिल सौमित्र के प्रयासों से भोपाल में मीडिया चौपाल का आयोजन किया गया था। इसी में शामिल होने के लिए शिखा वाष्र्णेय आई थीं। हालांकि हमारी पहचान सोशल मीडया पर पहले ही हो चुकी थी। मीडिया चौपाल में ही उन्होंने 'स्मृतियों में रूस' मुझे भेंट की। सुखद आनंद की अनुभूति हुई क्योंकि पुस्तक की रोचकता के बारे में अलग-अगल ब्लॉग पर समीक्षाएं पढ़ चुका था और पुस्तक को पढऩे की तीव्र इच्छा थी।
सोवियत संघ के इस दौर का जिक्र पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट शिखा वार्ष्णेय ने अपनी किताब 'स्मृतियों में रूस' में किया है। हालांकि किताब में इसकी विस्तृत चर्चा नहीं है। उन्होंने १९९० से १९९६ तक रूस में रहकर पत्रकारिता की पढ़ाई की। इस दौरान शिखा वार्ष्णेय के अनुभवों का ही संकलन है स्मृतियों में रूस। सहज और सरल भाषा में यादों को उकेरने के खूबसूरत प्रयास के लिए वे बधाई की पात्र हैं। उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात अगस्त २०१२ में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई। मीडिया एक्टिविस्ट और चरैवेति (भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश की पत्रिका) के संपादक अनिल सौमित्र के प्रयासों से भोपाल में मीडिया चौपाल का आयोजन किया गया था। इसी में शामिल होने के लिए शिखा वाष्र्णेय आई थीं। हालांकि हमारी पहचान सोशल मीडया पर पहले ही हो चुकी थी। मीडिया चौपाल में ही उन्होंने 'स्मृतियों में रूस' मुझे भेंट की। सुखद आनंद की अनुभूति हुई क्योंकि पुस्तक की रोचकता के बारे में अलग-अगल ब्लॉग पर समीक्षाएं पढ़ चुका था और पुस्तक को पढऩे की तीव्र इच्छा थी।
रूस और भारत के बीच बेहद करीबी रिश्ते रहे हैं। अब भी दोनों देश दोस्त हैं। भारतीय जनता और रशियन आवाम में एक-दूसरे के लिए प्रेम और सम्मान है। रूस में भारत के सिनेमा को खूब पसंद किया जाता है। यह तो मालूम था लेकिन इतना नहीं पता कि रूस के अधिकतर घरों में 'मेरा जूता है जापानी' और 'आई एम ए डिस्को डांसर' बजा करता था। सिनेमा हॉल में मिथुन चक्रवर्ती और अमिताभ बच्चन की कोई न कोई फिल्म का प्रदर्शित होते रहना। शिखा किताब के आखिरी हिस्से में लिखती भी हैं कि न जाने कितनी बार सिर्फ भारतीय होने के कारण टैक्सी वालों ने उनसे किराया नहीं लिया।
शिखा वार्ष्णेय की लेखन शैली इतनी धाराप्रवाह है कि किताब पढ़ते समय अंतरमन में एक-एक कर सारे दृश्य दीख पड़ते हैं। मास्को से वेरोनिश की ट्रेन यात्रा, वोरोनिश रेलवे स्टेशन, मास्को यूनिवर्सिटी की भव्य इमारत, सड़कों पर जमी बर्फ, खूबसूरत मॉस्को मेट्रो स्टेशन, क्रेमलिन, मक्सिम गोर्की और पुश्किन का घर। पुस्तक में इनके चित्र भी प्रकाशित किए गए हैं। हालांकि किताब में इनका सतही वर्णन है। दरअसल, किताब पर्यटक के नजरिए से लिखी भी नहीं है। यह तो एक मस्तमौला विद्यार्थी के संघर्ष के सुहावने पलों का दस्तावेज है। रूस के खान-पान, रहन-सहन और लोगों के व्यवहार को समझने में किताब बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। ठंड का तो बड़ा ही रोचक वर्णन है। रूस में १० महीने ठंड पड़ती है। ठंड इतनी कि खिड़की के बाहर थैला लटकाकर उससे डीप फ्रीजर का काम लिया जा सकता है। झील, तालाब सब जम जाते हैं और सड़कों पर सफेद मखमली चादर की तरह बर्फ फैल जाती है। जिस पर रूसी बच्चे जमकर आइस स्केटिंग करते हैं। रूस की राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर दिखाने के साथ-साथ शिखा वाष्र्णेय वहां के सामाजिक जीवन का भी शब्द चित्र खींचती हैं। रूस में परिवार व्यवस्था पुरुष प्रधान है। हालांकि वहां की औरतें मर्दों की तुलना में अधिक मेहनती हैं। जिस तरह भारत में लड़कियों के खिड़की और छज्जों पर बैठने पर घर की बुजुर्ग महिलाएं व पुरुष टोक दिया करते हैं वैसे ही रूस में लड़की को खिड़की के आसपास बैठा देख कोई न कोई महिला टोक दिया करती हैं। हिदायत दी जाती है कि लड़कियों को खिड़की पर नहीं बैठना चाहिए। लोग नियमों को स्वत: पालन करते हैं। सड़कें साफ-सुथरी हैं। चॉकलेट का रैपर भी रूसी नागरिक सड़क पर नहीं फेंकते हैं। अंधविश्वास भी बहुत है रूसियों में। आत्माएं बुलाने और उनसे अपना भविष्य जानने का बहुत प्रचलन है।
कुछ मजेदार और रोचक बातें :
- चाय को रूस में चाय ही कहते हैं। वहां जाओ और चाय मांगनी हो तो कहिएगा चाय दे दे मेरी मां/बाप!
- वहां कद्दू के आकार का पत्तागोभी और सेव मिलता है।
- रूस में स्कूलों के नाम नहीं नंबर होते हैं। खास और जरूरी बात है कि वहां बच्चे अपने ही इलाके के स्कूल में पढ़ते हैं।
- अधिकतर रूसियों की बत्तीसी में कम से कम एक दांत तो सोने या चांदी का होता ही है।
- क्रिसमस २५ दिसंबर को नहीं बल्कि ७ जनवरी को मनाया जाता है।
- अंधविश्वास : खाना बनाते समय चाकू गिर गया तो पति भन्नाया हुआ घर आएगा। काली बिल्ली का रास्ता काटना शुभ माना जाता है।
दो शब्द अलग से : जैसा कि मैंने बताया कि यह किताब मुझे अगस्त २०१२ में शिखा वार्ष्णेय ने भेंट की। इसको पढऩे की इच्छा पहले से थी। लेकिन, किताब हाथ आने के बाद से छह माह बाद मैं इसे पढ़ सका। शिखा जी का लेखन इतना रसदार है कि एक बैठक में ही 'स्मृतियों में रूस' को पढ़ गया। सलिल वर्मा, अनूप शुक्ल, संगीता स्वरूप, मनोज कुमार, वन्दना अवस्थी दुबे सहित कई वरिष्ठ साहित्यकारों ने भी पुस्तक के विषय में बढिय़ा टिप्पणी की है।
शिखा वार्ष्णेय की लेखन शैली इतनी धाराप्रवाह है कि किताब पढ़ते समय अंतरमन में एक-एक कर सारे दृश्य दीख पड़ते हैं। मास्को से वेरोनिश की ट्रेन यात्रा, वोरोनिश रेलवे स्टेशन, मास्को यूनिवर्सिटी की भव्य इमारत, सड़कों पर जमी बर्फ, खूबसूरत मॉस्को मेट्रो स्टेशन, क्रेमलिन, मक्सिम गोर्की और पुश्किन का घर। पुस्तक में इनके चित्र भी प्रकाशित किए गए हैं। हालांकि किताब में इनका सतही वर्णन है। दरअसल, किताब पर्यटक के नजरिए से लिखी भी नहीं है। यह तो एक मस्तमौला विद्यार्थी के संघर्ष के सुहावने पलों का दस्तावेज है। रूस के खान-पान, रहन-सहन और लोगों के व्यवहार को समझने में किताब बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। ठंड का तो बड़ा ही रोचक वर्णन है। रूस में १० महीने ठंड पड़ती है। ठंड इतनी कि खिड़की के बाहर थैला लटकाकर उससे डीप फ्रीजर का काम लिया जा सकता है। झील, तालाब सब जम जाते हैं और सड़कों पर सफेद मखमली चादर की तरह बर्फ फैल जाती है। जिस पर रूसी बच्चे जमकर आइस स्केटिंग करते हैं। रूस की राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर दिखाने के साथ-साथ शिखा वाष्र्णेय वहां के सामाजिक जीवन का भी शब्द चित्र खींचती हैं। रूस में परिवार व्यवस्था पुरुष प्रधान है। हालांकि वहां की औरतें मर्दों की तुलना में अधिक मेहनती हैं। जिस तरह भारत में लड़कियों के खिड़की और छज्जों पर बैठने पर घर की बुजुर्ग महिलाएं व पुरुष टोक दिया करते हैं वैसे ही रूस में लड़की को खिड़की के आसपास बैठा देख कोई न कोई महिला टोक दिया करती हैं। हिदायत दी जाती है कि लड़कियों को खिड़की पर नहीं बैठना चाहिए। लोग नियमों को स्वत: पालन करते हैं। सड़कें साफ-सुथरी हैं। चॉकलेट का रैपर भी रूसी नागरिक सड़क पर नहीं फेंकते हैं। अंधविश्वास भी बहुत है रूसियों में। आत्माएं बुलाने और उनसे अपना भविष्य जानने का बहुत प्रचलन है।
कुछ मजेदार और रोचक बातें :
- चाय को रूस में चाय ही कहते हैं। वहां जाओ और चाय मांगनी हो तो कहिएगा चाय दे दे मेरी मां/बाप!
- वहां कद्दू के आकार का पत्तागोभी और सेव मिलता है।
- रूस में स्कूलों के नाम नहीं नंबर होते हैं। खास और जरूरी बात है कि वहां बच्चे अपने ही इलाके के स्कूल में पढ़ते हैं।
- अधिकतर रूसियों की बत्तीसी में कम से कम एक दांत तो सोने या चांदी का होता ही है।
- क्रिसमस २५ दिसंबर को नहीं बल्कि ७ जनवरी को मनाया जाता है।
- अंधविश्वास : खाना बनाते समय चाकू गिर गया तो पति भन्नाया हुआ घर आएगा। काली बिल्ली का रास्ता काटना शुभ माना जाता है।
दो शब्द अलग से : जैसा कि मैंने बताया कि यह किताब मुझे अगस्त २०१२ में शिखा वार्ष्णेय ने भेंट की। इसको पढऩे की इच्छा पहले से थी। लेकिन, किताब हाथ आने के बाद से छह माह बाद मैं इसे पढ़ सका। शिखा जी का लेखन इतना रसदार है कि एक बैठक में ही 'स्मृतियों में रूस' को पढ़ गया। सलिल वर्मा, अनूप शुक्ल, संगीता स्वरूप, मनोज कुमार, वन्दना अवस्थी दुबे सहित कई वरिष्ठ साहित्यकारों ने भी पुस्तक के विषय में बढिय़ा टिप्पणी की है।
![]() |
| मक्सिम गोर्की टाउन और शिखा वार्ष्णेय अपने दोस्तों के साथ रूस में |
पुस्तक : स्मृतियों में रूस
मूल्य : ३०० रुपए (सजिल्द)
लेखक : शिखा वार्ष्णेय
प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स
एक्स-३०, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-२, नईदिल्ली-११००२०
मूल्य : ३०० रुपए (सजिल्द)
लेखक : शिखा वार्ष्णेय
प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स
एक्स-३०, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-२, नईदिल्ली-११००२०
शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013
हिन्दुओं के लिए दोहरी त्रासदी था विभाजन
१४ अगस्त १९४७ आधुनिक भारत का सबसे दु:खद दिन था। कुछ सिर-फिरे नेताओं की सत्तालोलुपता के कारण दोनों ओर से हजारों-लाखों लोगों को मार डाला गया। विशेषकर वर्तमान पाकिस्तान में बसे हिन्दुओं की निर्ममता से हत्या की गई। जुलाई-अगस्त से ही उपद्रव शुरू हो गए थे, जो विभाजन के बाद तक जारी रहे। रात के समय हिन्दुओं के घर और दुकान अधिकारियों की मिलीभगत से उपद्रवी जला रहे थे और हिन्दुओं को मार-काट कर उन पर कब्जा कर रहे थे। बीभत्स नर-संहार के समाचार पाकिस्तान में बसने के इच्छुक लोगों को भी कंपा रहे थे। खून-पसीने की कमाई से बनाए पूर्वजों के और अपने पहले घर को कोई छोडऩा नहीं चाहता। लेकिन, धार्मिक देश के नाम पर नर से पिचाश बने लोगों के आगे उदार हिन्दुओं की हिम्मत जवाब देने लगी। आखिर ज्यादातर हिन्दुओं ने पाकिस्तान जो कि हिन्दुओं के लिए नापाक हो चुका था, से भाग आना ही उचित समझा। अहो! दुर्भाग्य, सुरक्षित भारत चले आना भी उनके नसीब में नहीं था। उस पार से रेलगाडिय़ों में जिन्दा इंसान की जगह लाशें यात्रा कर हिन्दुस्तान आती थीं। जिनकी किस्मत बहुत ही बुलंद थी, वे ही अमन की सरजमीं पर सही-सलामत आ सके। महज तीन माह में ही पाकिस्तान में बसे ९० फीसदी हिन्दुओं ने हमेशा के लिए अपने पैतृक भूमि को छोड़ दिया, या कहें छोडऩे पर मजबूर होना पड़ा। विभाजन की नींव हिन्दू-मुस्लिम एकता को छिन्न-भिन्न करके रखी गई थी। उस दौर के कई मुस्लिम और हिन्दू संतों ने इस खूनी मंजर को रोकने के अथाह प्रयास किए थे लेकिन प्रयास रंग नहीं ला सके। विभाजन का दंश हिन्दुओं को ही नहीं चुभा वरन इससे उदार मुस्लिम भी आहत हुए। उन्होंने भी अपने लोग खोए और भूमि भी। लेकिन, तुलनात्मक रूप से इसका खामियाजा हिन्दुओं को अधिक उठाना पड़ा। विभाजन की अधिक मार हिन्दुओं पर ही पड़ी। लुटे-पिटे हिन्दू, खाली हाथ बमुश्किल जान बचाकर हिन्दुस्तान आ सके थे।
कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद ने शायद इतिहास ठीक से नहीं पढ़ा या अहमद बेहद निर्मम है, जिसे विभाजन के घाव को कुरेदने में मजा आ रहा है। तभी मिस्टर अहमद ने बड़ी आसानी से कह दिया कि लालकृष्ण आडवाणी यहां सेवा नहीं मेवा खाने के लिए आए हैं। पाकिस्तान से यहां आना महज आडवाणी का मसला नहीं है। यह तो उन लाखों लोगों का दु:ख है, जिन्होंने अपनी जमीन खोयी और अपनी आंखों के सामने परिजनों की हत्या देखी। आडवाणी का भारत मेवा खाने के लिए आना, ऐसा कह कर कांग्रेसी नेता ने इन लाखों लोगों को तकलीफ पहुंचाई है। हकीकत तो यह है कि आडवाणी जैसे ही तमाम हिन्दुओं के लिए वहां रहना मुमकिन ही नहीं था। जो वहां रह गए, आज उनकी क्या हालत है, किसी से छिपी नहीं। विश्व के मीडिया में आई रिपोर्ट बयां करती हैं कि आज भी पाकिस्तान में हिन्दू सबसे निचले दर्जे का आदमी है। या कहें, पाकिस्तानी हुकूमत को उसकी फिक्र ही नहीं, उसकी नजर में हिन्दू पाकिस्तान का नागरिक है ही नहीं। वहां हिन्दू अपनी ही सुरक्षा और सेवा नहीं कर पा रहा है तो भला दूसरे हिन्दुओं की देखभाल कैसे करे? यह बात कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद को समझ नहीं आएगी क्योंकि वह भारत में रहते हैं। उन्हें जीने के लिए टेरर टैक्स नहीं देना पड़ता। उन्हें अपने परिजन की मौत पर धार्मिक रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार करने में बाधा नहीं होती। राजनीति में शीर्ष सत्ता तक पहुंचने में आसानी है। उन्हें जवान होती बेटियों के अपहरण और बलात्कार का डर नहीं। बलात धर्मांतरण का खौफ नहीं, क्योंकि शकील अहमद भारत में रहते हैं, धर्मनिरपेक्ष और हिन्दु बहुसंख्यक भारत में। पाकिस्तान में उक्त कामों में से एक भी हिन्दू आसानी के साथ नहीं कर पाता। उसका जीना दूभर है। वह बेचारा भारत भी नहीं आ पाता। आ भी जाता है तो यहां की सरकार उसकी चिंता नहीं करती है।
विभाजन के वक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी २० साल से भी कम उम्र के थे। लेकिन, सामाजिक जीवन में सक्रिय थे। सिंध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ताओं में उनका नाम था। संघ उस वक्त पाकिस्तान में बसे हिन्दुओं से यही आग्रह कर रहा था कि हिन्दू अपनी जमीन न छोड़ें, भारत नहीं जाएं, मिल-जुलकर यहीं पाकिस्तान में बसे रहें। इससे स्पष्ट है कि विभाजन की घोषणा के साथ ही लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान छोडऩे का विचार नहीं बनाया होगा। लालकृष्ण आडवाणी अपनी आत्मकथा 'मेरा देश मेरा जीवन' में लिखते हैं कि सितंबर के आरंभ में एक दिन वे मोटरसाइकिल से कराची के मुख्य रेलवे स्टेशन के पास की सड़क पर जा रहे थे। उन्होंने वहां एक व्यक्ति का शव देखा, जिसकी छुरा घोंपकर हत्या कर दी गई थी। कुछ दूर ही चले थे कि उन्होंने एक और शव देखा, फिर एक तीसरा....। वे आगे लिखते हैं कि यह दृश्य उनके लिए अस्वाभाविक और परेशान करने वाला था। उन्होंने अपने जीवन में पहली बार सड़कों पर इस तरह लाशें देखी थीं। अपने आसपास इस तरह की घटनाएं देखने के बाद ही आडवाणी ने पाकिस्तान छोडऩे का निश्चय किया।
शकील अहमद साहब को जरा सोचना चाहिए कि ऐसी स्थिति में भला कोई इंसान रुकना चाहेगा। हां, उनकी सुप्रीमो यहां मेवा खाने जरूर आई हैं। अब भला शकील अहमद आडवाणी को ढाल बनाकर अपनी ही पार्टी की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी को निशाना बना रहे हैं तो बात अलग है। लेकिन, जायज फिर भी नहीं। क्योंकि यह केवल एक आडवाणी से जुड़ा मसला नहीं है वरन विभाजन से आहत लाखों लोगों की बात है।
कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद ने शायद इतिहास ठीक से नहीं पढ़ा या अहमद बेहद निर्मम है, जिसे विभाजन के घाव को कुरेदने में मजा आ रहा है। तभी मिस्टर अहमद ने बड़ी आसानी से कह दिया कि लालकृष्ण आडवाणी यहां सेवा नहीं मेवा खाने के लिए आए हैं। पाकिस्तान से यहां आना महज आडवाणी का मसला नहीं है। यह तो उन लाखों लोगों का दु:ख है, जिन्होंने अपनी जमीन खोयी और अपनी आंखों के सामने परिजनों की हत्या देखी। आडवाणी का भारत मेवा खाने के लिए आना, ऐसा कह कर कांग्रेसी नेता ने इन लाखों लोगों को तकलीफ पहुंचाई है। हकीकत तो यह है कि आडवाणी जैसे ही तमाम हिन्दुओं के लिए वहां रहना मुमकिन ही नहीं था। जो वहां रह गए, आज उनकी क्या हालत है, किसी से छिपी नहीं। विश्व के मीडिया में आई रिपोर्ट बयां करती हैं कि आज भी पाकिस्तान में हिन्दू सबसे निचले दर्जे का आदमी है। या कहें, पाकिस्तानी हुकूमत को उसकी फिक्र ही नहीं, उसकी नजर में हिन्दू पाकिस्तान का नागरिक है ही नहीं। वहां हिन्दू अपनी ही सुरक्षा और सेवा नहीं कर पा रहा है तो भला दूसरे हिन्दुओं की देखभाल कैसे करे? यह बात कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद को समझ नहीं आएगी क्योंकि वह भारत में रहते हैं। उन्हें जीने के लिए टेरर टैक्स नहीं देना पड़ता। उन्हें अपने परिजन की मौत पर धार्मिक रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार करने में बाधा नहीं होती। राजनीति में शीर्ष सत्ता तक पहुंचने में आसानी है। उन्हें जवान होती बेटियों के अपहरण और बलात्कार का डर नहीं। बलात धर्मांतरण का खौफ नहीं, क्योंकि शकील अहमद भारत में रहते हैं, धर्मनिरपेक्ष और हिन्दु बहुसंख्यक भारत में। पाकिस्तान में उक्त कामों में से एक भी हिन्दू आसानी के साथ नहीं कर पाता। उसका जीना दूभर है। वह बेचारा भारत भी नहीं आ पाता। आ भी जाता है तो यहां की सरकार उसकी चिंता नहीं करती है।
विभाजन के वक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी २० साल से भी कम उम्र के थे। लेकिन, सामाजिक जीवन में सक्रिय थे। सिंध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ताओं में उनका नाम था। संघ उस वक्त पाकिस्तान में बसे हिन्दुओं से यही आग्रह कर रहा था कि हिन्दू अपनी जमीन न छोड़ें, भारत नहीं जाएं, मिल-जुलकर यहीं पाकिस्तान में बसे रहें। इससे स्पष्ट है कि विभाजन की घोषणा के साथ ही लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान छोडऩे का विचार नहीं बनाया होगा। लालकृष्ण आडवाणी अपनी आत्मकथा 'मेरा देश मेरा जीवन' में लिखते हैं कि सितंबर के आरंभ में एक दिन वे मोटरसाइकिल से कराची के मुख्य रेलवे स्टेशन के पास की सड़क पर जा रहे थे। उन्होंने वहां एक व्यक्ति का शव देखा, जिसकी छुरा घोंपकर हत्या कर दी गई थी। कुछ दूर ही चले थे कि उन्होंने एक और शव देखा, फिर एक तीसरा....। वे आगे लिखते हैं कि यह दृश्य उनके लिए अस्वाभाविक और परेशान करने वाला था। उन्होंने अपने जीवन में पहली बार सड़कों पर इस तरह लाशें देखी थीं। अपने आसपास इस तरह की घटनाएं देखने के बाद ही आडवाणी ने पाकिस्तान छोडऩे का निश्चय किया।
शकील अहमद साहब को जरा सोचना चाहिए कि ऐसी स्थिति में भला कोई इंसान रुकना चाहेगा। हां, उनकी सुप्रीमो यहां मेवा खाने जरूर आई हैं। अब भला शकील अहमद आडवाणी को ढाल बनाकर अपनी ही पार्टी की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी को निशाना बना रहे हैं तो बात अलग है। लेकिन, जायज फिर भी नहीं। क्योंकि यह केवल एक आडवाणी से जुड़ा मसला नहीं है वरन विभाजन से आहत लाखों लोगों की बात है।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)





