गुरुवार, 19 जुलाई 2012

मेरे गांव की शाम

मेरे गाँव की शाम | Mere Gaanv Ki Shaam | Lokendra Singh


शाम सुहानी आती होगी मेरे गांव में
सूरज अपनी किरणें समेटे
पहाड़ के पीछे जाता होगा
शीतलता फैलाते-फैलाते
चन्दा मामा आता होगा।
नदी किनारे सांझ ढले
मोहन बंसी मधुर बजाता होगा
शाम सुहानी आती होगी मेरे गांव में।

पीपल वाले कुंए पर पानी भरने
मेरी दीवानी आती होगी
चूल्हा जलाने अम्मा
जंगल से लकड़ी बहुत-सी लाती होगी
मंदिर से घंटे की आवाज सुनकर
मां घर में संझावाती करती होगी।
शाम सुहानी आती होगी मेरे गांव में।

दूर हवा में धूला उड़ती देखो
चरवाहे गायों को लेकर आते होंगे
अपनी मां की बाट चाह रहे
गौत में बछड़े रम्भाते होंगे
आज के प्रदूषित वातवरण में भी
सच्चे सुख मेरे गांव में मिलते होंगे।
शाम सुहानी आती होगी मेरे गांव में।
- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

धरती-धरती चलो चिदंबरम, आसमान की छाती न फाड़ो

 कां ग्रेसनीत यूपीए सरकार की स्थिति दलदल में फंसे उस आदमी की तरह हो गई है, जो दलदल से बाहर निकलने के लिए जितना हाथ-पैर मारता है उतना ही दलदल में भीतर धंसता जाता है। सच को स्वीकार करने की जगह उस पर पर्दा डालने के लिए झूठ, कुतर्क और हास्यास्पद बयान जारी होंगे तो आमजन के अंतर्मन में उबाल आना स्वाभाविक है। अंडरअचीवर प्राइम मिनिस्टर की वकालत करने आए पी. चिदंबरम ने देश के आम आदमी की बेइज्जती करके कांग्रेस को और बुरा फंसा दिया। अब चिदंबरम और पूरी कांग्रेस देश को बरगलाने में लगी है। सलमान खुर्शीद, पी. चिदंबरम सहित तमाम नेता सफाई देते घूम रहे हैं। अपना घर साफ नहीं रख पा रहे गृहमंत्री पी. चिदंबरम क्या खाक मिस्टर क्लीन (?) की रक्षा कर पाते। होम करते ही हाथ जला बैठे। जिस देश की ६० फीसदी जनता दो जून का भोजन (?) जुटाने के लिए दिनभर हाड़ रगड़ती हो, उससे कहा जा रहा है कि वह आइसक्रीम खाकर मौज उड़ा रही है। यह देश की ६० फीसदी से भी अधिक आबादी का मजाक बनाना नहीं तो क्या है? जीवन के लिए हर क्षण संघर्ष कर रहे इस वर्ग को याद भी नहीं होगा कि उन्होंने और उनके बच्चों ने पिछली दफा आइसक्रीम कब खाई थी? संभवत: उन्हें तो यह भी नहीं पता होगा कि कोन वाली आइसक्रीम कौन-सी होती है? शाम की दो रोटी के इंतजाम के लिए जो आदमी सुबह निकलता हो उसके लिए एक किलो चावल पर एक रुपया बढ़ाना बहुत मायने रखता है। इसलिए निवेदन है कि चिदंबरम महाशय धरती-धरती चलो, आसमान की छाती न फाड़ो।
     फ्रांसीसी क्रांति के समय भूख से पीडि़त जनता वर्साय के महल के सामने जुट आई। इस उम्मीद के साथ कि महारानी उनका दर्द समझेंगी और कुछ राहत जनता को देंगी। जनता के प्रतिनिधियों ने महारानी से कहा कि जनता भूखी है। उसके पास खाने को ब्रेड (रोटी) नहीं है। उसकी मदद कीजिए। इस पर महारानी ने कहा कि ब्रेड नहीं है तो क्या हुआ? जनता से कहो कि वह केक खाए। ऐश-ओ-आराम में रह रही महारानी को क्या पता कि महल के बाहर उसके कुप्रबंधन से जनता कैसी मुसीबतें झेल रही है? केक खाने वाली महारानी को क्या पता कि केक जनता की पहुंच के बाहर है। जिस जनता के पास रोटी खरीदने के लिए पैसा न हो वह केक का दाम कहां से चुकाएगी? चिदंबरम का बयान इससे कहीं निचले स्तर का है। फ्रांस की साम्राज्ञी ने तो महल के बाहर की दुनिया देखी ही नहीं थी इसलिए उसे अपनी जनता की यथास्थिति पता नहीं थी। लेकिन, चिदंबरम साहब तो देश की दशा और दिशा से बखूबी वाकिफ हैं। भ्रष्टचार और महंगाई से आजिज आ चुकी जनता दिल्ली में कई बार डेरा डालकर अपने दर्द से भारत सरकार को बावस्ता करा चुकी है। इसके बाद भी गृहमंत्री पी. चिदंबरम कह रहे हैं कि लोग पानी की बॉटल पर १५ रुपए और आइसक्रीम के कोन पर २० रुपए तो खर्च कर सकते हैं लेकिन गेहूं-चावल की कीमत में एक रुपए की बढ़त बर्दाश्त नहीं कर पाते। शायद चिदंबरम भूल गए कि उनकी ही सरकार के निर्देशन में योजना आयोग ने गरीबी का मजाक बनाते हुए आंकड़े पेश किए थे। आयोग के मुताबिक ३२ रुपए रोज पर शहर में और २६ रुपए रोज पर गांव में आदमी आराम से गुजारा कर सकता है। अब चिदंबरम साहब बताएं कि ३२ और २६ रुपए वाला आदमी २० रुपए आइसक्रीम पर कैसे खर्च कर सकता है। हवाई जहाज के बिजिनस क्लास में यात्रा करने वाला नहीं सोच सकता कि ट्रेन के जनरल डिब्बे में भेड़-बकरियों की तरह भरकर यात्रा करने के पीछे क्या मजबूरी हो सकती है। फाइव स्टार होटल में दाल की एक कटोरी के लिए तीन हजार रुपए खर्च करने वाला नहीं सोच सकता कि गेहूं-चावल पर एक रुपए बढऩे पर क्यों गरीब का कलेजा बैठ जाता है। भारत में करीब ४.६२ लाख राशन की उचित मूल्य की दुकानों से लगभग २० करोड़ परिवार को राशन बांटा जाता है। इन २० करोड़ परिवारों को पता है कि गेहूं-चावल का दाम प्रतिकिलो एक रुपए बढ़ाने पर घर के बजट पर क्या असर पड़ता है। उसकी भरपाई के लिए कितने घंटे ओवरटाइम कर हाड़तोड़ मजदूरी कर जीवन खपना पड़ता है। भारत में ४८ फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। इस मामले में भारत दुनिया में १५८वें स्थान पर खड़ा है। हमारे यहां शिशु मृत्यु दर एक हजार पर ५२ है, इससे दुनिया में हमारा १२२वां स्थान है। ये हाल इसलिए हैं कि लोगों के पास अच्छा खाने-पहनने-रहने के लिए पर्याप्त पैसा-साधन नहीं है। अगर सारा देश आइसक्रीम खा रहा होता तो स्थिति इतनी विकराल न होती। कांग्रेस सरकार को चाहिए कि वोट बैंक को साधने की नीतियां बनाना छोड़े और सही मायने में आम आदमी की चिंता करे। उसके विकास की दृष्टि रखकर योजनाएं बनाए। कांग्रेस के वर्तमान हाल को देखकर नहीं लगता कि उसका हाथ आम आदमी के साथ है। सच तो यह है कि इस वक्त कांग्रेस का हाथ आम आदमी के गिरेबां पर है।
       कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की आंखें तो भारत की गरीबी के संबंध में वर्ल्ड बैंक के आकंडे देखकर भी नहीं खुलीं। जिसे गरीबों से कोई लेना-देना नहीं हो या अंतिम छोर पर खड़े आदमी के उत्थान की चिंता ही न हो, उस सरकार को इन सबसे क्या फर्क पड़ता है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है कि गरीबी रेखा के नीचे जीने वाली आबादी के प्रतिशत के लिहाज से भारत की स्थिति केवल अफ्रीका के सब-सहारा देशों से ही बेहतर है। बैंक ने अनुमान जताया है कि २०१५ तक भारत की एक तिहाई आबादी करीब ६० रुपए प्रतिदिन से कम आय में गुजारा कर रही होगी। यूपीए सरकार की नीतियां देखकर तो वर्ल्ड बैंक के इस दावे से शायद ही कोई इनकार कर सके। वर्ल्ड बैंक की यह रिपोर्ट ग्लोबल इकनॉमिक प्रॉस्पेक्टस फॉर - २००९ शीर्षक से प्रकाशित हुई है। यह रिपोर्ट कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की नाकामी को साफ पानी की तरह हमारे सामने रखती है। इधर, टाइम मैगजीन ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अंडरअचीवर बताते हुए सरकार की वोट बैंक बढ़ाने वाली नीतियों की जमकर आलोचना की है। टाइम मैगजीन की रिपोर्ट कहती है कि भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरी सरकार सुधारों की दिशा में आगे नहीं बढ़ पा रही है। यूपीए के मंत्री-नेता सब वोट बढ़ाने के उपायों में फंसे दिखते हैं। गिरती आर्थिक वृद्धि, बढ़ता घाटा और रुपए की गिरती साख को संभालने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लाचार रहे हैं। कोयला आवंटन में मनमोहन के हाथ भी काले दिख रहे हैं। मंत्रियों पर प्रधानमंत्री का कोई नियंत्रण नहीं है। यूपीए-१ और यूपीए-२ के आठ साल के कार्यकाल में २जी सहित १५ लाख करोड़ रुपए से अधिक के घोटाले सामने आ चुके हैं। सरकार की नीतियां इतनी लचर हैं कि तीन साल में महंगाई दर १० फीसदी से ऊपर निकल गई है। पेट्रोल और रसोई गैस के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। विकास दर औंधे मुंह पड़ी है। फिलहाल विकास दर ६.५ फीसदी पर स्थिर है, जो पिछले नौ सालों में सबसे कम है। मैगजीन के एशिया अंक के कवर पेज पर प्रकाशित ७९ वर्षीय मनमोहन की तस्वीर के ऊपर शीर्षक दिया गया है - उम्मीद से कम सफल... भारत को चाहिए नई शुरुआत।

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

आनंद

टिक... टिक... टिक.... घड़ी की सुइयां भी इतने धीमे चल रही हैं लगता है इन्हें जंग लग गई है। कितनी देर से बैठा हूं, आधा घंटा नहीं हुआ अब तक। पिछले दस दिन, मेरी शादी के दस दिन तो कैसे फुर्र से बीत गए थे। पता ही नहीं चला था। तब तो बड़ा सरपट भाग रहा था वक्त। अब क्या हुआ? क्या किसी ने वक्त के पैर बांध दिए? नहीं, भला ऐसा हो सकता है क्या? समय पर किसका जोर है? वो तो मनमौजी है। अपनी ही धुन में चलता है। तभी तो अपने बुरे वक्त में आदमी लाख चाहे लेकिन अच्छे वक्त को उसकी मर्जी के खिलाफ खींचकर नहीं ला सकता। वह तो अपनी मर्जी से ही आता है। सार्थक बैंक में पैसा जमा करने आया था। बैंक का लंच टाइम खत्म ही नहीं हो रहा था। सार्थक के दिमाग को खाली देखकर ऊटपटांग विचारों ने आक्रमण कर दिया था। उसके अंतर्मन में खुद से ही यह संवाद चल रहा था। बैंक में कट्ट काले रंग से पुती लोहे की कुर्सियां पड़ी थी। इन्हीं में से एक कुर्सी पर आगे की ओर झुककर सार्थक बैठा था।
      हाल ही में उसकी शादी हुई थी। एक दिन पहले ही नवविवाहिता की विदाई हुई थी। उसकी छुट्टियां भी खत्म होने को थीं। शादी के बाद का थोड़ा-बहुत काम बाकी था, घर के सभी लोग उसी काम को खत्म करने में लगे थे। मां यहां-वहां से आए बर्तन व अन्य सामान वापिस पहुंचाने में व्यस्त थी। पिताजी हिसाब-किताब निबटा रहे थे। आज सुबह ही पिताजी ने सार्थक को कहा था- आज बैंक चले जाना। पैसा निकाल लाना ताकि हलवाई, सुनार और किराने वाले का हिसाब कर देंगे।
          फरवरी की दस तारीख थी। इन दिनों बैंक में पेंशन लेने वालों की खासी भीड़ रहती है। दोपहर बाद यह भीड़ छट जाती है। यही सोचकर सार्थक दोपहर बाद बैंक में पहुंचा था। लेकिन, आज तो उस वक्त भी भीड़ मौजूद थी। चार-छह बूढ़ी औरतें थीं, जो वहीं मंडल बनाकर बैठी थीं। सभी अपनी-अपनी बहुओं के गुण-दोष की विवेचना कर रहीं थीं। बीच-बीच में उनमें से एक-दो महिलाएं बैंक कर्मियों को महिलाओं वाली गालियां दे देतीं। नाशमिटे अभी तक लंच ही कर रहे हैं। कितना भकोसते हैं। अरे, भकोसते तो उतना ही हैं, हरामखोरी ज्यादा करते हैं। हजारों रुपए मिलते हैं, बैठकर रुपए गिनने के, तब भी मुंओं से काम नहीं किया जाता। हम बूढ़े लोग इतनी दूर से आए हैं हमारा काम करने की बजाय इन्हें गपियाने से फुरसत नहीं है। चल री छोड़ भी, इन्हीं नालायकों की वजह से हमें बतराने का मौका तो मिल जाता है, वरना तो हम कहां एक दूसरे का सुख-दु:ख बांट पाते हैं। हां, हां सही कह रही हो भौजी। बैंककर्मियों के लंच टाइम को सुख-दु:ख की पूछपरख का मौका बताने वाली बूढ़ी औरत ने आगे को सरकते हुए कहा- हां, तो मैं कह रही थी कि मेरी बहू हैं ना... उसे जरा-सा काम करने में भी कष्ट होता है। तुम्हें तो याद होगा हम लोग अपने जमाने में घंटों तक तो चक्की से आटा ही पीसा करते थे। इन्हें तो सब हाथ में मिलता है तब भी चार रोटी सेंकने में भी सिर दुखता है.......
      वहीं पास में ही कुछेक कुर्सियां छोड़कर सात-आठ वृद्ध पुरुष भी बैठे थे। वे अपने बीते दिनों को याद कर रहे थे। अपने दिनों के बहाने वे अपने दिनों की राजनीति की चर्चा कर रहे थे। सार्थक नहीं सोच पा रहा था कि महिलाओं को 'घर-घर की कहानी' से फुरसत क्यों नहीं मिलती। उनकी बातचीत का केन्द्र बिन्दु अकसर यही क्यों होता है। वहीं पुरुषों के पास राजनीति की चर्चा के अलावा और कोई मुद्दा नहीं है क्या? सार्थक ने वृद्ध पुरुषों की बातों पर कान दिया तो पता चला कि राष्ट्रीय-क्षेत्रीय नेताओं के चरित्र पतन की बातों में उलझे थे। राजनीति में यह इस समय हॉट टॉपिक था। हाल ही में दो-तीन नेताओं के सेक्स वीडियो सामने आए थे। वृद्धों के चर्चा मंडल में कोई अपने जमाने के चरित्रवान नेताओं के किस्से सुना रहा था तो कोई आज के भ्रष्ट नेताओं के कारनामों का बखान कर रहा था। सार्थक ने मन ही मन सोचा कि दोनों ही जगह जो बहस चल रही है उसका अंत नहीं है। कहानी घर-घर की जितनी खिंचेगी उतनी कम होगी। राजनीति पर चल रही बहस का तो कोई ओर-छोर ही नहीं है।
      इसी बीच सार्थक की नजर एक धवल वस्त्र पहने शांत भाव से बैठे एक वृद्ध पर पड़ी। वे किसी की तीन-तेरह में नहीं थे। एक कुर्सी पर बैठे थे, चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। शायद यह मुस्कान इस चेहरे पर हमेशा रहती होगी, ऐसा लग रहा था। बाल पूरे पके हुए थे। सिर के भी और दाड़ी के भी। हल्की घनी दूध-सी सफेद दाड़ी से झांकते मुस्काते होंठ इंद्रधनुष की तरह लग रहे थे। उस शस को देखकर अजीब-सा सुकून मिल रहा था। सार्थक एकटक उन सज्जन के माथे से प्रस्फुटित हो रहे तेज का आनंद ले ही रहा था तभी एक वृद्धा पैसा निकालने वाले काउंटर पर पहुंची। उसने कैशियर को डपटते हुए कहा - हम बुजुर्ग यहां परेशान हो रहे हैं और तुहारा लंच टाइम अभी तक खत्म ही नहीं हुआ। घड़ी में देखो जरा पूरे ढाई बजकर पांच मिनट ऊपर हो चुके हैं। कैशियर पर वृद्ध की बात का कोई असर नहीं हुआ। हालांकि उसने सिर नीचे की ओर रखकर ही जवाब दिया - माते अभी पूरे दस मिनट बाकी हैं। इस पर वृद्धा ने दीवार पर टंगी गोल घड़ी की ओर हाथ से इशारा करते हुए कहा- वो देखो घड़ी। बैंक ही ही घड़ी है न? क्या टाइम हो रहा है उसमें दिख रहा है या नहीं? पूरे पांच मिनट अधिक हो चुके हैं और तुमसे बात करने में समय जाया हो रहा है वो अलग। लेकिन, कैशियर का वही रूखा व्यवहार। उसने जवाब दिया - दादी वो दस मिनट आगे है। दस मिनट बाद ही खिड़की खुलेगी। दस मिनट मतलब दस मिनट। बूढ़े तो वैसे ही बच्चे होते हैं। कई बच्चे अपनी बात नहीं मनते देख बिगड़ जाते हैं। उन बूढ़ी औरत का स्वभाव भी कुछ इसी तरह के बच्चे के जैसा था। कैशियर का जवाब सुनकर बूढ़ी औरत उखड़ गई। वह और हल्ला करने लगी। विवाद बढ़ता देख सार्थक ने कैशियर से कहा- महोदय आपने लंच बे्रक तो इसी घड़ी से किया होगा तो काम भी इसी घड़ी के मुताबिक शुरू कर दीजिए। वह कुछ कह पाता इससे पहले ही एक दूसरे कैशियर ने अपनी खिड़की खोलकर उस बूढ़ी औरत को अपने पास बुला लिया। उसने साथी के बर्ताव के लिए उस वृद्धा से माफी भी मांग ली थी। 
    खिड़की खुलते ही सब लोग कतार में आ गए। वो सफेद दाड़ी वाले वृद्ध सार्थक के पीछे ही थे। जैसे ही सार्थक की बारी आई तो कैशियर ने सार्थक से कहा - आप युवा हैं। आपसे निवेदन है कि आपके पीछे जो सज्जन हैं उन्हें पहले पैसा निकालने का मौका दें। इस पर वृद्ध ने कैशियर को ऐसा करने से मना कर दिया। उन्होंने सहज भाव से कहा - पहले इनकी ही बारी है इन्हें ही पैसा दें। सार्थक पैसा लेकर पास में ही असली-नकली नोट की जांच करने लगा। उसने देखा कि कैशियर ने उस वृद्ध को जैसे ही वृद्ध को उनका पैसा दिया, वृद्ध ने धन्यवाद कहा और झट से अपनी जेब से चार चॉकलेट निकालकर कैशियर को दे दीं। चॉकलेट देखकर कैशियर प्रफुल्लित हो गया, उसके चेहरे पर ऐसे भाव आए कि जैसे उसे कोई खजाना मिल गया हो। सफेद दाड़ी वाले वृद्ध ने काउंटर छोड़ते हुए कैशियर को कहा - हमेशा ऐसे की ईमानदारी से काम करना और लोगों की मदद करना। कैशियर ने अपनी सीट से खड़े होकर उनका अभिवादन किया। सार्थक कुछ अचंभे में था। वृद्ध ने कैशियर को चॉकलेट क्यों दी? उसने कैशियर से पूछा - सर, ये सज्जन कौन थे? कैशियर ने मुस्काते हुए जवाब दिया - ये आनंद भाई थे। शहर इन्हें टॉफी वाले बाबा के नाम से भी जानता है। अनुशासन, ईमानदारी और लोगों की मदद करने वालों को ये इनाम स्वरूप टॉफी देते हैं। सार्थक बैंक से बाहर निकलते हुए सोच रहा था - वे देवदूत की तरह बाबा अपने नाम को किस तरह सार्थक कर रहे हैं। चहुंओर आनंद बिखेर रहे हैं।

रविवार, 24 जून 2012

लायक से नालायक तक का सफर

 भा रतीय हिन्दी सिनेमा यानी बॉलीवुड को १००वां साल लग गया है। पता नहीं यह बॉलीवुड का शैशव काल ही चल रहा है या फिर वो जवानी की दहलीज पर है, यह भी संभव है कि वह सठियाने के दौर में हो। खैर जो भी हो, इन ९९ सालों में भारतीय सिनेमा में कई बदलाव देखे गए। कई मौके ऐसे आए जब बॉलीवुड के कारनामे से हमारा सीना चौड़ा हो गया। कई बार बॉलीवुड ने लज्जित भी खूब कराया। शुरुआती दौर में भारतीय सिनेमा लायक बना रहा। समाज को शिक्षित करता रहा। देश-दुनिया को भारतीय चिंतन, पंरपरा और इतिहास से परिचित कराता रहा। लेकिन, नई शताब्दी के पहले दशक की शुरुआत से ही इसके कदम बहकने लगे। धीरे-धीरे यह नालायक हो गया। फिलवक्त इस नालायक बॉलीवुड की रील बेहद डर्टी है।
      यह तो सभी जानते हैं कि भारत में सिनेमा की शुरुआत दादा साहब फाल्के ने की। दादा साहब फाल्के का सही नाम धुन्दीराज गोविंद फाल्के था। १९११ में उन्होंने ईसा मसीह के जीवन पर बनी फिल्म देखी। इसके बाद उनके मन में विचारों का ज्वार उमडऩे लगा। भारत के महापुरुषों और इतिहास को आधार बनाकर फिल्म बनाने के विचार दादा साहब के मन में आने लगे। जब विचारों ने मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया तो उन्होंने फिल्म बनाने का संकल्प लिया। फिल्म निर्माण की कला सीखने के लिए वे लंदन पहुंच गए। लंदन में दो साल रहकर उन्होंने सिनेमा निर्माण की तकनीकी सीखी। वहां से कुछ जरूरी उपकरण लेकर वे भारत वापस आए। काफी मेहनत-मशक्कत के बाद उन्होंने भारतीय जन-जन में रचे-बसे चरित्र राजा हरिशचन्द्र पर फिल्म बनाई। ३ मई १९१३ को भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म प्रदर्शित हुई। यह मूक फिल्म थी। दादा साहब को उनके साथियों ने खूब कहा कि फिल्म का आइडिया बकवास है, तुम्हारी फिल्म कोई देखने नहीं आएगा, भारत की जनता को फिल्म देखने का सऊर नहीं। लेकिन, 'राजा हरिशचन्द्र' की लोकप्रियता ने सारे कयासों को धूमिल कर दिया। इस तरह भारत में दुनिया के विशालतम फिल्म उद्योग बॉलीवुड की नींव पड़ी।
    यहां गौर करने लायक बात है कि दादा साहब जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति ने एक सुने-सुनाए, जन-जन में रचे-बसे चरित्र पर फिल्म क्यों बनाई? संभवत: उन्हें सिनेमा के प्रभाव का ठीक-ठीक आकलन था। सिनेमा लोगों के अंतर्मन को प्रभावित करता है। उनके जीवन में बदलाव लाने का सशक्त माध्यम है। इसके अलावा उनके मन में सिनेमा से रुपयों का ढेर लगाने खयाल नहीं था। ईसा मसीह के जीवन पर बनी फिल्म को देखकर उनके मन में पहला विचार यही कौंधा कि भारत के महापुरुषों पर भी फिल्म बननी चाहिए। ताकि लोग उनके जीवन से प्रेरणा लेकर स्वस्थ्य समाज का निर्माण कर सकें। हरिशचन्द्र सत्य की मूर्ति हैं। सत्य मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी, उपलब्धी और सर्वोत्तम गुण है। 'राजा हरिशचन्द्र' के बाद भी लंबे समय तक भारत में बनाई जाने वाली फिल्में संस्कार और शिक्षाप्रद थीं। १४ मार्च १९३१ को प्रदर्शित पहली बोलती फिल्म आलमआरा और १९३७ में प्रदर्शित पहली रंगीन फिल्म किसान कन्या की कहानी साहित्य से उठाई गई थी। भारतीय सिनेमा लंबे समय तक सीधे तौर पर भारतीय साहित्य से जुड़ा रहा। बंकिमचन्द्र और प्रेमचंद की कृतियों पर सिनेमा रचा गया, जिसने समाज को दिशा दी। रचनात्मक सिनेमा गढऩे के लिए गुरुदत्त, हिमांशु रॉय, सत्यजीत रे, वी. शांताराम, विमल रॉय, राजकपूर, नितिन बॉस, श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों को हमेशा याद किया जाएगा। लेकिन, २१ वीं सदी की शुरुआत से ही बॉलीवुड के रंग-ढंग बदलने लगे। महेश भट्ट जैसे तमाम भटके हुए निर्देशकों ने भारतीय सिनेमा की धुरी साहित्य और संस्कृति से हटाकर नग्नता पर टिका दी। मनुष्य के दिमाग को शिक्षा देने वाले साधन को दिमाग में गंदगी भरने वाला साधन बना दिया। 'आज बन रहीं फिल्में परिवार के साथ बैठकर देखने लायक नहीं है' यह वाक्य बॉलीवुड के लिए आज हर कोई कहता है। इसके बावजूद भट्ट सरीखे निर्देशक कहते हैं कि हम वही बना रहे हैं जो समाज देखना चाहता है। अब ये किस समाज से पूछकर सिनेमा बनाते हैं यह तो पता नहीं। लेकिन, मेरे आसपास और दूर तक बसा समाज तो इस तरह की फिल्म देखना कतई पसंद नहीं करता। खासकर अपने माता-पिता, भाई-बहन और बच्चों के साथ तो नहीं ही देखता। ऐसी फिल्में समाज देखना नहीं चाहता इसका ताजा उदाहरण है- टेलीविजन पर डर्टी फिक्चर के प्रसारण का विरोध। यहां इस बात को भी समझिए कि समाज घर में तो ऐसी फिल्म नहीं देखना चाहता लेकिन घर के बाहर उसे परहेज नहीं है। इसी डर्टी फिक्चर की कमाई यह सच बताती है। लेकिन, इस सब में एक बात साफ है कि डर्टी टाइप की फिल्में समाज हित में नहीं हैं। डेल्ही बेल्ही, लव सेक्स और धोखा, ब्लड मनी, मर्डर, हेट स्टोरी, जिस्म और आने वाली फिल्म जिस्म-२ (इसमें पॉर्न एक्ट्रेस नायिका है) जैसी फिल्में समाज में क्या प्रभाव छोड़ रहीं हैं कहने की जरूरत नहीं है। इनके प्रभाव से निर्मित हो रहा समाज भारत के लोगों की चिंता जरूर बढ़ा रहा है लेकिन वे भी हाथ और मुंह बंद किए बैठे हैं। भारतीय सिनेमा के पिछले पांच-छह सालों को देखकर इसका आने वाला भविष्य उज्वल नहीं दिखता। आज बॉलीवुड १००वें साल में प्रवेश कर रहा है, इसकी और समाज की बेहतरी के लिए निर्माताओं, निर्देशकों और दर्शकों को विचार करना होगा। निर्माता-निर्देशकों को विचार करना होगा क्या कैमरे को नंगई के अलावा कहीं और फोकस नहीं किया जा सकता? दर्शकों को विचार करना होगा कि जिस सिनेमा को हम अपने परिवार के साथ नहीं देख सकते या जिसे हम अपने बच्चों को नहीं दिखा सकते, उसका बहिष्कार क्यों न किया जाए?
आधी हकीकत, आधा फ़साना :  डेली न्यूज़ के एफएम में प्रकाशित लीड आर्टिकल.

शनिवार, 16 जून 2012

उपनिषदगंगा : भारत में भारतीयता का प्रवाह

 भा रत के संदर्भ में देखा जाए तो सबसे अधिक सशक्त जनमाध्यम आज भी आकाशवाणी और दूरदर्शन ही है। दूरदर्शन का भौतिक विकास, पहुंच और तकनीकी तंत्र निजी चैनल्स के मुकाबले कहीं अधिक बेजोड़ है। भारत के सुदूर गांवों को तो छोड़ ही दीजिए महानगरों से कुछ दूर बसे गांवों में भी निजी चैनल्स की पहुंच नहीं है जबकि वहां धड़ल्ले से दूरदर्शन देखा जा रहा है। भारत आज भी गांवों में ही बसता है। देश में शहरी आबादी से कहीं अधिक ग्रामवासी हैं। स्पष्ट है, 'वास्तविक दर्शक संख्या' दूरदर्शन के मुकाबले किसी के पास नहीं। टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट) के नाम पर जो दर्शक संख्या प्रदर्शित की जाती है वह इने-गिने शहरों से प्राप्त आंकड़े हैं। यह भारत के टेलीविजन दर्शकों की वास्तविक संख्या नहीं है। यहां दूरदर्शन के सशक्त जनमाध्यम होने की चर्चा इसलिए की जा रही है क्योंकि हाल ही में दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल (डीडी-१) पर बहुचर्चित धारावाहिक 'उपनिषद गंगा' का प्रसारण शुरू हुआ है। ११ मार्च, २०१२ से प्रति रविवार सुबह १०:०० से १०:३० बजे तक यह प्रसारित हो रहा है। दरअसल, धारावाहिक उपनिषद गंगा भारतीय संस्कृति, परंपरा और चिंतन पर आधारित है। उपनिषद की विभिन्न कथाओं को लेकर डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने इसे बनाया है। इसके निर्माण में चिन्मय मिशन का अमूल्य योगदान है। डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी टेलीविजन जगत में 'चाणक्य' धारावाहिक से प्रसिद्ध हुए। ९० के दशक में चाणक्य भारतीय टेलीविजन का बेहद चर्चित और क्रांतिकारी धारावाहिक रहा है। आज भी इसकी उतनी ही मांग है। दूरदर्शन को नई ऊंचाईयां चाणक्य से मिलीं। डॉ. द्विवेदी मुंबई में उन विरले लोगों में से एक हैं जो भारतीय संस्कृति और साहित्य को लेकर काम कर रहे हैं। उन्होंने अमृता प्रीतम के उपन्यास 'पिंजर' पर इसी शीर्षक से फिल्म बनाई। इसे फिल्म समीक्षकों ने खूब सराहा। पिंजर के लिए डॉ. द्विवेदी को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। प्रसिद्ध उपन्यासकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' पर आधारित उनकी फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' तैयार है। फिलहाल तो डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी और दूरदर्शन का राष्ट्रीय चैनल डीडी-१ 'उपनिषद गंगा' को लेकर चर्चा में है। उपनिषद गंगा सभ्यता और संस्कृति के विकास की गाथा है। इसमें उपनिषद की कहानियों के साथ ही पुराण और इतिहास की कहानियों को भी सम्मिलित किया गया है। याज्ञवल्क्य-मैत्रैयी, नचिकेता, सत्यकामा-जाबाल, जनक, गार्गी, उद्दालक, श्वेतकेतु, अष्टावक्र, हरिशचंद्र, भृर्तहरि, जड़भरत, प्रह्लात, वाल्मीकि, भास्कराचार्य, वरहमिहिर, शंकराचार्य की कहानियां धारावाहिक में आधुनिक परिप्रेक्ष्य में दिखाई जाएंगी। इसमें चाणक्य, तुलसीदास, मीराबाई, पुंडलिक और दाराशिकोह तक की कहानियों को भी शामिल किया गया है।
      पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के कार्य में संलग्न संस्था 'स्पंदन' के कार्यक्रम में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी का भोपाल आना हुआ। इस दौरान सिनेमा, टेलीविजन और संस्कृति पर उनका व्याख्यान हुआ। उनसे एक सज्जन ने पूछा- आपने इतना बढिय़ा धारावाहिक बनाया है तो इसे किसी निजी चैनल पर प्रसारित क्यों नहीं करवाया? दूरदर्शन को आज कौन देखता है? इस पर डॉ. द्विवेदी ने बहुत ही गंभीर और सोचने को विवश करने वाला जवाब दिया। उन्होंने कहा- दूरदर्शन और निजी चैनल में रिमोट के एक बटन का ही तो फर्क है। इसके अलावा दूरदर्शन भारत का राष्ट्रीय चैनल है, इसकी पहुंच भी व्यापक है। स्पंदन के ही कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत में सिनेमा की शुरुआत सांस्कृतिक मूल्यों के साथ हुई। दादा साहेब फाल्के ने १९१३ में पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई। हालांकि आज मुंबई में साहित्य पर काम करने वाले लोग कम ही बचे हैं। दरअसल, पहले शिक्षा, प्रसार और प्रचार टेलीविजन के आधार थे लेकिन बाजारवाद ने सब कबाड़ा कर दिया है। आज टेलीविजन और सिनेमा से शिक्षा गायब है। वहीं, संस्कृति और साहित्य के लिए दूरदर्शन पर जितना गंभीर काम हो रहा है उतना कहीं और नहीं। यही कारण है कि हम टेलीविजन के सामने घंटेभर बैठे रहते हैं और लगातार चैनल बदलते रहते हैं, देखते कुछ नहीं।
    दूरदर्शन के प्रति डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के आग्रह को देखकर ही यह आलेख लिखने का संबल मुझे मिला। भारत में दूरदर्शन ५३ बरस का हो गया है। इस दौरान उसने तमाम अनुभव जुटाए। दूरदर्शन का काफी विकास और विस्तार हुआ। आज दूरदर्शन ३० चैनल का बड़ा परिवार है। १५ सितंबर, १९५९ को भारत में टेलीविजन की शुरुआत हुई थी। बाद में, निजी चैनल्स की बाढ़-सी आ गई। फिलवक्त देश में करीब ५०० निजी चैनल हैं। भारत में दूरदर्शन का स्वरूप कैसा हो? इस बात की चिंता के लिए समय-समय पर कमेटियां (चंदा कमेटी, बीजी वर्गीस कमेटी और पीसी जोशी कमेटी) बनी। पीसी जोशी कमेटी ने कहा था- टेलीविजन किसी भी देश का चेहरा होता है। अगर किसी देश का परिचय पाना है तो उसका टेलीविजन देखना चाहिए। वह राष्ट्र का व्यक्तित्व होता है। स्पष्ट है कि दूरदर्शन पर भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाले कार्यक्रम ही प्रसारित होना चाहिए, इस आशय की रिपोर्ट पीसी जोशी के नेतृत्व वाली कमेटी ने सरकार को सौंपी थी। संभवत: यही कारण रहा कि भारतीय संस्कृति, साहित्य और चिंतन को बचाए रखने, उसके संवर्धन और प्रोत्साहन में जो योगदान दूरदर्शन का है वह अन्य किसी का नहीं। निजी चैनल्स ने तो पैसा बनाया और इसके लिए संस्कृति को विद्रूप भी करना पड़ा तो किया, आज भी कर रहे हैं। भारत में जब निजी चैनल्स को प्रसारण के अधिकार मिले तो टेलीविजन और साहित्य से जुड़े लोगों को एक उम्मीद जगी थी, सोचा था प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इससे चैनल्स पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की गुणवत्ता में वृद्धि होगी। लेकिन, स्थिति विद्वानों की सोच के विपरीत है। आज देश में चैनल्स की भीड़ है। उनके बीच प्रतिस्पर्धा भी है लेकिन गुणवत्ता बढ़ाने की नहीं वरन गुणवत्ता गिराने की प्रतिस्पर्धा है।
    निजी चैनल्स पर प्रसारण के क्षेत्र में उतरे तो उनके पास दर्शकों का टोटा था। दूरदर्शन की दर्शक संख्या बेहद मजबूत थी। दूरदर्शन पर प्रसारित अर्थपूर्ण कार्यक्रमों ने दर्शकों को बांधे रखा था। ऐसे में निजी चैनल्स ने दूरदर्शन के दर्शकों को हड़पने के लिए बाकायदा षड्यंत्र रचा। उन्होंने हिटलर के मंत्री गोएबल्स के प्रोपेगण्डा सूत्र का उपयोग किया। 'दूरदर्शन घटिया है। दूरदर्शन पर प्रसारित सामग्री भी भला देखने वाली है क्या? दूरदर्शन आउटडेटेड हो गया है।' ऐसे झूठ निजी चैनल्स के गुटों ने जोर-जोर से चिल्लाकर और चालाकी से आमजन के अंतरमन में बैठा दिए। टीआरपी के झूठे खेल में दूरदर्शन को पिछड़ा दिखाया गया। यह सच है कि निजी चैनल्स यह भ्रम खड़ा करने में सफल रहे कि दूरदर्शन देखे जाने लायक चैनल नहीं है। महानगरों में यह भ्रम आज भी कायम है। लेकिन, असल स्थिति इसके उलट है। गोएबल्स का सूत्र 'एक झूठ को सौ बार बोलो वह सच लगने लगेगा' सफल नहीं क्योंकि झूठ सच भले ही प्रतीत करा दिया जाए लेकिन वह सच नहीं बन पाता। सच तो सच ही रहता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की पराजय का एक कारण गोएबल्स का यह सूत्र भी था। गोएबल्स अंत तक हिटलर को यही बताता रहा कि जर्मनी युद्ध जीत रहा है जबकि रणक्षेत्र में कुछ और ही घट रहा था। ठीक यही स्थिति दूरदर्शन और निजी चैनल्स की जंग के साथ है। १९८२ से १९९१ तक का समय भारतीय दूरदर्शन का स्वर्णकाल रहा। इस दौरान दूरदर्शन ने न सिर्फ नायक गढ़े वरन एक टेलीविजन संस्कृति का विकास भी किया। इस दौरान उसने कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड कायम किए। यह उसकी लोकप्रियता का दौर था। रंगीन प्रसारण (१९८२ में भार में आयोजित एशियाड गेम्स से) और सोप ऑपेरा ने इसे और विस्तार दिया। महाभारत और रामायण ने किंवदंतियां रचीं। कहते हैं कि महाभारत और रामायण के प्रसारण के वक्त भारत की सड़कें सूनी हो जाती थी। दूरदर्शन पर प्रसारित हुए धारावाहिक हमलोग, बुनियाद, ये जो जिंदगी है, विक्रम-बेताल, चंद्रकांता, करमचंद, तमस और चाणक्य को जो लोकप्रियता हासिल हुई वो किसी भी निजी चैनल्स के किसी भी धारावाहिक को नहीं मिल सकी। डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा निर्मित 'उपनिषद गंगा' धारावाहिक इसी श्रंखला को आगे बढ़ाएगा यह तय है। ११ मार्च, २०१२ से प्रति रविवार अब तक प्रसारित एपिसोड तो इसी बात की हामी भरते है। 
( त्रैमासिक पत्रिका मीडिया क्रिटिक में प्रकाशित आलेख )

सोमवार, 11 जून 2012

रोम-रोम में बसे हैं प्रभु राम

 रा  मकथा आदर्श जीवन की संपूर्ण गाइड है। राम भारतवर्ष के प्राण हैं। वे भारत के रोम-रोम में बसे हैं। यही कारण है कि उनका अनादर देश बर्दाश्त नहीं कर सकता। 'मेरे राम मेरी रामकथा' लिखने से पूर्व प्रख्यात लेखक नरेन्द्र कोहली राम चरित्र पर एक वृह्द उपन्यास लिख चुके हैं, जिसे खूब सराहा गया। यह दो भागों में था - अभ्युदय-१ (दीक्षा, अवसर, संघर्ष की ओर) और अभ्युदय-२ (युद्ध-१ व युद्ध-२)। पहला खंड 'दीक्षा' का लेखन उन्होंने १९७३ में शुरू किया था लेकिन इसको लिखने से पहले उनके मन में बड़ी उथल-पुथल मची थी। आखिर वे भारत के मर्म पर लिखने जा रहे थे। जरा-सी ऊंच-नीच बवंडर खड़ा कर सकती थी। लेकिन, राम के जीवन का कोई कड़वा सच होता तब लेखकीय धर्म उसे भी लिखने के लिए मजबूर करता, ऐसे में मुश्किल हो सकती थी। उनसे पहले कुछेक अति बुद्धिवादियों ने राम के चरित्र को छलनी करने का प्रयास किया ही था। यही कारण रहा कि जब कोहली ने उपन्यास लिखना आरंभ किया तो सबसे पहली आपत्ति उनके पिता ने ही की। उनका मानना था कि राम परम ब्रह्म हैं और नरेन्द्र साधारण चरित्र का कथाकार, जो घटना का रस लेता है। उनके पिता को आशंका थी कि वह लोकप्रियता हासिल करने के लिए राम के चरित्र को औरों की तरह दूषित न कर दें। लेकिन, 'दीक्षा' जब प्रकाशित होकर आया, पाठकों और आलोचकों के हाथ पहुंचा। इसके बाद वहां से जो सकारात्मक रुझान आया वह नरेन्द्र कोहली के लिए बड़े ही आनंद का विषय था। खासकर वह क्षण उनके लिए अविस्मरणीय है जब उन्होंने माता-पिता को बैठाकर 'दीक्षा' का पाठ उनके सामने किया। उपन्यास सुनकर उनके पिता ने प्रसन्नता जाहिर की। कहा कि- उन्हें कोई आपत्ति नहीं क्योंकि उपन्यास में कहीं भी प्रभु राम की अवमानना नहीं है। एक सनातनी हिन्दू का प्रमाण-पत्र मिलने के बाद तो लेखक का साहस बढ़ गया और इसके बाद १९७५ से १९७९ के बीच रामकथा के सारे खंड प्रकाशित हो गए। हालांकि ऐसा नहीं रहा कि उनकी आलोचना नहीं हुई। समीक्षकों ने आपत्ति जताई थी कि राम का चरित्र स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि लेखक ने राम की किसी भी चारित्रिक दुर्बलता का चित्रण नहीं किया था। आलोचक की मान्यता थी कि ऐसा कोई नहीं है जिसकी कोई चारित्रिक दुर्बलता नहीं हो। उनका ऐसा सोचना स्वाभाविक है क्योंकि उन्होंने संभवत: अपने जीवन में ऐसा कोई सज्जन देखा ही नहीं होगा। इस पर लेखक कहता है कि श्रीराम के चरित्र में मुझे कहीं कोई छिद्र दिखाई नहीं दे रहा था। जब दोष था ही नहीं तो तथाकथित साहित्यिक पंडितों को प्रसन्न करने के लिए मैं उस परम पावन चरित्र पर कालिमा तो नहीं पोत सकता था।
         लोकनायक राम के जीवन पर शानदार उपन्यास लिखने के लम्बे समय बाद २००९ में उनकी 'मेरे राम मेरी रामकथा' पुस्तक का प्रकाशित हुई। इस पुस्तक की रचना के संदर्भ में नरेन्द्र कोहली कहते हैं कि रामकथा के प्रकाशन के बाद से बहुत सारे प्रश्न मेरे सामने आए थे- कुछ दूसरों के द्वारा पूछे गए और कुछ मेरे अपने मन में अंकुरित हुए थे। बहुत कुछ वह था जो लोग पूछ रहे थे और बहुत कुछ वह था जो मैं पाठकों को बताना चाहता था। यही कारण है कि समय-समय पर अनेक कोणों से, अनेक पक्षों को लेकर मैं अपनी सृजन प्रक्रिया और अपनी कृति के विषय में सोचता, कहता और लिखता रहा। अंतत: उन सारे निबन्धों, साक्षात्कारों, वक्तव्यों और व्याख्यानों को मैंने एक कृति के रूप में प्रस्तुत करने का मन बनाया। इस प्रकार जो मंथन नरेन्द्र कोहली मन में हुआ वही 'मेरे राम मेरी रामकथा' में आपके सामने है।
          लेखक ने पुस्तक में रामायण के प्रसंगों को वर्तमान की परिस्थितियों के बरक्स रखकर यथास्थिति से अवगत कराने का सकारात्मक प्रयास किया है। किसी देश पर अधिपत्य जमाए रखने के लिए वहां बौद्धिक नेतृत्व को खत्म करना जरूरी है। रावण व अन्य राक्षण यही किया करते थे। वे इसे समझाने के लिए बांग्लादेश स्वतंत्रता के युद्ध का उदाहरण देते हैं। कोहली लिखते हैं कि उस युद्ध में उनकी गहरी रुचि थी। इसलिए उसके संबंध में समाचार-पत्रों में प्रकाशित होने वाली सूचनाओं को वे बहुत रुचि से पढ़ते थे। उसी संदर्भ में समाचार छपा था कि पाकिस्तानी सेना अत्यंत सुनियोजित ढंग से सूची बना-बनाकर बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों की हत्या कर रही है। उनकी इच्छा थी कि बांग्लादेश का एक-एक बुद्धिजीवी समाप्त कर दिया जाए ताकि बांग्लादेश को बौद्धिक नेतृत्व नहीं मिल सके। इस समाचार से लेखक को स्पष्ट हुआ कि रावण के नेतृत्व में राक्षस, दंडकवन के ऋषियों का मांस क्यों खा रहे थे। अब तक ऋषियों के वध की घटनाएं, राक्षसों की क्रूरता को चित्रित करने का साधन मात्र थीं, किन्तु अब वे मानव समाज के दलित-दमित वर्ग को पिछड़ा बनाए रखने के लिए उसे बौद्धिक नेतृत्व से वंचित करने के क्रूर षड्यंत्र का प्रतीक थीं।
मेरे राम मेरी रामकथा
- नरेन्द्र कोहली
मूल्य : २५० रुपए (सजिल्द)
प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
४६९५, २१-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२

      आज समाज में नुकीले दांतों, विशाल और भयाभय शरीर वाले राक्षस नहीं है। लेकिन, राक्षस तो हैं ही। जो धर्म का पालन नहीं करते, गरीब और असहाय को सताते हैं वे राक्षस ही हैं। इसे भी लेखक ने स्पष्ट किया है। राक्षस को जाति नहीं है। रामकथा में ही एकाधिक स्थानों पर राम जिस समय किसी राक्षस के कंठ पर अपने चरण रखकर पूछते हैं कि वह कौन है तो वह अपना परिचय देता हुआ कहता है कि वह गंधर्व था, अब राक्षस हो गया है। इस प्रकार सामान्य लोग भी राक्षस हो जाते हैं और दंड के अभाव में लगातार राक्षस हो रहे हैं। राक्षस जीवन-शैली और चिंतन को स्वीकार कर लेने वाला कोई भी व्यक्ति राक्षस हो सकता है। आमूलचूल परिवर्तन समाज जागरण और जनांदोलन से ही आता है। यही कारण है कि ऋषियों ने राम को रावण के खिलाफ जननायक के रूप में खड़ा किया, अयोध्या के राजा के रूप में नहीं। उन्होंने राम से पहले जनजागरण कराया, समाज में राम की छवि जननेता की बनाई ताकि लोग राम के साथ अन्यास के खिलाफ उठ खड़े हों। विश्वामित्र को सिद्धाश्रम ही बचाना होता तो वे स्वयं किसी राजा की शरण में चले जाते या ताड़का वध के बाद राम को वापस अयोध्या भेज देते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। क्योंकि उनकी योजना समाज जागरण कर अत्याचारी रावण के खात्मे की थी। नरेन्द्र कोहली ने 'मेरे राम मेरी रामकथा' में राम के जीवन से जुड़े कई प्रश्नों को बेहतर तर्क प्रस्तुत कर स्पष्ट किया है। जिन प्रसंगों को लेकर विधर्मी राम के चरित्र पर सवाल उठाते हैं उन्हें 'मेरे राम मेरी रामकथा' करारा जवाब है। रामसेतु प्रसंग की चर्चा कर उन्होंने केन्द्र सरकार और राम विरोधियों की मानसिकता को भी उजागर किया है। वैसे तो देश में रोज ही कहीं न कहीं रामकथा का वाचन-श्रवण होता ही रहता है फिर भी राम के मर्म को समझना है तो यह पुस्तक और राम के जीवन पर लिखा नरेन्द्र कोहली का उपन्यास पढऩा चाहिए।

शुक्रवार, 1 जून 2012

अन्याय हारेगा सत्य जीतेगा सबके साथ से, सत्यमेव जयते


 'टी वी और सिनेमा को हमेशा मनोरंजन के तौर पर नहीं देखा जा सकता है और न ही मनोरंजन का मतलब सिर्फ लोगों को हंसाना है। मैंने हमेशा कुछ अलग करने की कोशिश की है। भारत में जमीन से जुड़े इतने हीरो हैं, जिनकी जिंदगी से काफी प्ररेणा ली जा सकती है। सत्यमेव जयते एक कार्यक्रम नहीं भारत जोड़ो और समाज जागरण का अभियान है।' हाल ही में शुरू हुए चर्चित शो 'सत्यमेव जयते' को लेकर यह कहना है आमिर खान का। मनोरंजन के जगत, खबरों की दुनिया, आभासी दुनिया और जनमानस के बीच में शो काफी चर्चा बटोर रहा है। शो का आगाज दमदार रहा है। आमिर खान ने सत्यमेव जयते के पहले ही एपिसोड में सबसे चर्चित और जरूरी मुद्दा उठाया है। मुद्दा है कोख में कत्ल का। स्त्री अत्याचार का। बेटा-बेटी में झूठे भेद का। शो में सिर्फ मुद्दा उठाया भर नहीं गया बल्कि इस विकराल समस्या के जन्मने के कारण और इसके खात्मे के उपायों की भी चर्चा हुई। साथ ही अपने ही अंश की अपनी ही कोख में हत्या के दंश को झेल चुकी बहादुर महिलाओं के साहस को भी सलाम किया गया। उन्हें इस रूप में प्रस्तुत किया गया कि समाज की और भी महिलाएं कह उठें- 'बस, अब बहुत हुआ। ये अत्याचार सहन नहीं।' पहले एपीसोड के बाद सत्यमेव जयते की आधिकारिक वेबसाइट पर इतनी प्रतिक्रियाएं आईं की वेबसाइट क्रेश हो गई। फेसबुक, ऑरकुट, गूगल प्लस, ट्वीटर और अन्य सोशल साइटों पर समाजसेवियों, सोशल हस्तियों, साहित्यकारों, मनोरंजन जगत के लोगों और आम आदमी ने सत्यमेव जयते को एक क्रांति बताया, शो की भरपूर सराहना की।
    बेटा-बेटी का भेद समाज से अभी गया नहीं। जबकि समाज में शिक्षा बढऩे के साथ ही इसके जाने के कयास लगाए गए थे। लेकिन, घटनाओं को देखने से लगता है कि शिक्षा के प्रसार से भी अभी कोई अधिक फर्क नहीं आया है। शिक्षित लोग भी झूठी सामाजिक परंपरा में फंसे हैं। जबकि हम आसपास देखते हैं कि झूठ की बुनियाद पर खड़ी सभी सामाजिक परंपराएं दरक रहीं हैं। आज बेटी श्मशान घाट जाकर अपने माता-पिता को मुखाग्नि दे रही है तो नौकरी-व्यवसाय करके माता-पिता का भरण-पोषण कर रही है। एक सफेद झूठ समाज में प्रचारित किया गया है कि वंश बेटे से चलता है। जबकि वंश तो बेटी की कोख से ही पैदा होता है। बेटा चाहकर भी अकेले संतान पैदा नहीं कर सकता। इतना ही नहीं बेटियां सब क्षेत्रों में कामयाबी के झंडे गाड़ रही हैं। कार्यक्रम में मध्यप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा की घटनाओं के बारे में बताया गया। जो सच सामने आया वह दिल दहलाने वाला है। कन्याओं को जन्म देने वाली माताओं के साथ किस तरह का बर्बर सलूक किया जाता है यह देखकर तमाम लोगों की आंखों में अश्रूधार और धमनियों में रक्त प्रवाह तेज हुआ होगा। कोख में दम तोड़तीं बेटियां चीख-चीख कर कहती हैं कि आज भी सामंती युग कायम है। हमने दुनिया को दिखा दिया है कि हम बेटों के मुकाबले कहीं कमतर नहीं इसके बावजूद हमारा स्वागत नहीं किया जा रहा। जबकि इन्ही प्रदेशों की कई बेटियों ने मिशाल कायम की है। राजस्थान और मध्यप्रदेश की दो महिला सरपंचों को केन्द्र सरकार की ओर से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय गौरव ग्राम पंचायत पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राजस्थान के दौसा जिले की विमला देवी मीणा और मध्यप्रदेश के धार जिले की जामबाई मुनिया को यह सम्मान मिला। वहीं, पिछले साल मार्च में संयुक्त राष्ट्र संघ की इंफोपॉवर्टी वल्र्ड कॉन्फ्रेंस में लाजवाब भाषण देकर राजस्थान के टोंक जिले के सोड़ा गांव की सरपंच छवि राजावत ने दुनिया में नाम कमाया। एमबीए डिग्रीधारी छवि अपने गांव के विकास के लिए ऊंची नौकरी छोड़कर गांव आकर बस गई। मध्यप्रदेश की साध्वी और तेजतर्रार नेता उमा भारती ने तो राजनीति में तमाम प्रतिमान स्थापित किए। हाल ही में घोषित हुए संघ लोक सेवा आयोग के परीक्षा परीणाम में भी बेटियों ने अपनी योग्यता का लोहा मनवाया। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे आसपास मौजूद हैं।
    आमिर खान महज फिल्मी पर्दे पर समाज के लिए आवाज बुलंद करने वाले अभिनेता नहीं हैं। उन्होंने समय-समय पर प्रत्यक्ष रूप से समाज के लिए आगे आकर काम किया है। वे नर्मदा बांध के विस्थापितों के प्रति हमदर्दी रखते हैं। मेधा पाटकर के साथ आकर विस्थापितों की आवाज बुलंद करते हैं। भ्रष्टाचार रहित समाज के लिए प्रयासरत हैं। अण्णा के मंच से भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लोकपाल की सिफारिश करते हैं। बच्चों के प्रति समाज का रुख सकारात्मक रहे इसके लिए 'तारे जमीं' से संदेश देते हैं। ये तो चंद उदाहरण मात्र हैं, आमिर खान इनसे भी अधिक कार्य समाज के लिए करते हैं। आमिर सकारात्मक और सार्थक सिनेमा रचने में विश्वास रखते हैं। भारतीय सिनेमा को १००वां साल शुरू हो गया है। ऐसे में बॉलीवुड के अन्य दिग्गज अभिनेताओं और निर्देशकों को सोचना चाहिए कि मुनाफा फिल्मों में नंगापन दिखाने से ही नहीं कमाया जा सकता, आमिर की तरह सकारात्मक सिनेमा रचकर भी कमाया जा सकता है। ऐसे सिनेमा से प्रसिद्ध और सफलता मुनाफे के साथ बोनस के रूप में मिलती है।
    सत्यमेव जयते के पहले एपीसोड में मध्यप्रदेश के मुरैना जिले की परवीन खान की दास्तान दिखाई गई। परवीन साहस का प्रतिरूप है। परवीन की बेटियों को लगातार बेरहमी से मारा जाता रहा। आखिर वह इस सबसे तंग आ गई। उसने तय किया कि इस बार वह अपनी बेटी को दुनिया दिखाएगी, किसी भी कीमत पर। उसने ऐसा करके भी दिखा दिया। हालांकि बाद में उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ी। उसके पति (क्षमा करें उसे पति कहना गलत होगा, ऐसे आदमी को बहशी दरिंदा ही कहा जाना उचित होगा) ने मुंह से परवीन की नाक चबा ली। मुरैना भ्रूण हत्या और कन्या हत्या के लिए काफी कुख्यात है। एक समय में यहां कन्या हत्या के बेहद घृणित तरीके प्रचलित रहे हैं। यहां उनका जिक्र करना भी उचित न होगा। हालांकि अब पहले की तुलना में स्थिति में काफी सुधार आया है। फिर भी 2011 की जनगणना के आंकड़े भी बयां करते हैं कि 2001 की तुलना में लिंगानुपात में अंतर बढ़ा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक मुरैना ही मध्यप्रदेश में सबसे कम लिंगानुपात वाला जिला है। यहां छह साल तक की उम्र के बच्चों में 1000 लड़कों पर महज 825 लड़कियां हैं। जनगणना 2001 के मुताबिक यहां इस आयु वर्ग का लिंगानुपात 837 था। यानी एक दशक में यहां लिंगानुपात में 12 अंकों की गिरावट दर्ज हुई। जो निश्चिततौर पर चिंतनीय है। वैसे प्रदेश के हाल भी खराब ही हैं। जनगणना 2011 के आकंड़ों के मुताबिक प्रदेश में शून्य से छह वर्ष तक के आयु समूह का लिंगानुपात 912 है। यह 2001 की जनगणना के मुताबिक 932 था। यानी इस एक दशक में प्रदेश में भी 20 अंक की गिरावट हुई। प्रदेश में बेटी के यह हाल देखकर सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने बेटी बचाओ अभियान भी शुरू कर रखा है। लेकिन, बेटियों के प्रति सोच में बदलाव किसी एक के बूते आना संभव नहीं, हम सबके मिले-जुले प्रयास से ही संभव हो सकता है। पहले ही एपिसोड में आमिर खान ने पंजाब के एक गांव को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। जहां सभी ग्रामवासियों ने तय किया कि कोई भी भ्रूण हत्या नहीं करवाएगा। कोख में जिसे भी ईश्वर ने भेजा है दुनिया में उसका स्वागत किया जाएगा। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय में उस गांव का लिंगानुपात समान हो गया। वहां लड़के-लड़कियों की संख्या समान हो गई। हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए कि जितने भी सामाजिक बदलाव आए वे सब सामूहिक प्रयास से ही आए। इसलिए कन्या भ्रूण हत्या और कन्या शिशु हत्या को रोकना है तो सबको सामने आना होगा।
    चलते-चलते सत्यमेव जयते के बहाने दूरदर्शन की ताकत की भी बात कर ली जाए। यह शो आठ भाषाओं में नौ चैनलों पर १०० देशों में दिखाया जाएगा। इतना ही नहीं यह पहला शो है जो निजी चैनल्स पर प्रसारित होने के साथ ही साथ दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल (डीडी-१) पर भी प्रसारित होगा। दरअसल, तमाम टीआरपी के आंकड़ों के बाद भी यह व्यवहारिक सत्य है कि दूरदर्शन की जितनी पहुंच है उतनी किसी भी निजी चैनल की नहीं। टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) में भले ही दूरदर्शन पिछड़ा नजर आता हो, क्योंकि यह मनोरंजन बेच रहे लोगों की चालाकी है। आमिर खान कहते हैं कि मैं ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचना चाहता हूं इसलिए टेलीविजन का उपयोग कर रहा हूं। उन्हें पता है कि निजी चैनलों की पहुंच शहर और शहर से लगे कुछ कस्बों तक ही है। जबकि भारत तो गांवों में बसता है। समाज जागरण करना है तो मास तक पहुंचना होगा। मास तक पहुंचने का माध्यम सिर्फ दूरदर्शन ही है। दूरदर्शन की पहुंच शहर से लेकर दूरदराज के गांव तक है। सत्यमेव जयते को शुरुआत से मिल रही सफलताओं को देखकर कहा जा सकता है कि यह मनोरंजन के जगत से लेकर सामाजिक जगत में परिवर्तन ला सकता है। बस, इसके लिए आमजन के साथ ही जरूरत है।