रविवार, 23 दिसंबर 2018

एक चतुर कलाकार की तरह राजनीतिक/धार्मिक कार्ड खेल गए नसीरुद्दीन शाह

- लोकेन्द्र सिंह - 
भारतीय सिनेमा के वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने अपने विवादित बयान से एक बार फिर असहिष्णुता की बहस को जिंदा कर दिया है। एक ओर नसीर कह रहे हैं कि उन्हें भारत में डर लगता है, वहीं पाकिस्तान में यातनाएं झेल कर भारत सरकार के प्रयास से वापस लौटे हामिद नेहाल अंसारी अपने देश में सुकून महसूस कर रहे हैं। अब कौन सही है, नसीर साहब या हामिद? नसीरुद्दीन को इस देश ने बहुत सम्मान और प्रसिद्धि दी है। यह देश उनकी कला का प्रशंसक है। किंतु, नसीर अपने देश को क्या लौटा रहे हैं? आज कुछेक घटनाओं को आधार बना कर नसीर कह रहे हैं- 'मैं अपने बच्चों के लिए चिंतित हूं क्योंकि कल को अगर भीड़ उन्हें घेरकर पूछती है कि तुम हिंदू हो या मुसलमान? तो उनके पास इसका कोई जवाब नहीं होगा। यह मुझे चिंतित करता है और मैं हालात को जल्द सुधरते हुए नहीं पा रहा हूं।' उन्हें यह डर तब क्यों नहीं लगता, जब जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को चिह्नित कर के मारा और भगाया गया। उन्हें यह डर तब क्यों नहीं लगता, जब कैराना से हिंदुओं का पलायन कराया जाता है? नसीर साहब दुनिया देखती है कि वह भीड़ कौन-सी है जो घेर कर धर्म पूछती है और कुरान की आयत नहीं सुनाने वालों को गोलियों से भून देती है। शुक्र है कि आपके बच्चों को कुरान की आयतें तो याद हैं। जब उन्हें भीड़ घेरेगी तो आयतें सुनाकर वह जान बचा लेंगे, लेकिन उनका क्या होगा जिन्हें रामायण की चौपाई और गीता के श्लोक याद हैं?
          आपने ऐसी घटना का जिक्र कर यह निंदनीय वक्तव्य दिया है, जिसके पीछे राजनीतिक साजिश की बू आ रही है। नसीरुद्दीन ने यह तो बताया कि पुलिसकर्मी की मौत से अधिक तवज्जो गाय की मौत को दी जा रही है, लेकिन उन्होंने उन घटनाओं का जिक्र करना उचित नहीं समझा जिनमें गो-तस्करों ने पुलिसवालों की हत्याएं और उनके साथ मारपीट की है। नसीरुद्दीन एक उम्दा कलाकार की भांति यहाँ खेल गए। उन्होंने बहुत चालाकी से इशारों ही इशारों में मुस्लिम समाज को पीडि़त और हिंदुओं को शोषक बता दिया। उनका यह वक्तव्य सहज नहीं, बल्कि किसी राजनीति से प्रेरित लग रहा है। उनका यह बयान फिल्म अभिनेता आमिर खान के बयान की भी याद दिला रहा है, जो उन्होंने असहिष्णुता की मुहिम के दौरान दिया था। नसीरुद्दीन शाह को यदि किसी राजनीतिक दल, विचारधारा या फिर नेता से दिक्कत है तो उन्हें खुलकर उस पर ही निशाना साधना चाहिए। गोल-मोल बातें करके समूचे देश और हिंदुओं को कटघरे में खड़ा नहीं करना चाहिए। 
          नसीर साहब को इतिहास के पन्ने पलटने चाहिए, तब उन्हें ध्यान आएगा कि भारत में डरना किसे चाहिए और गुस्सा किन पर आना चाहिए? भारत तो सदैव मोहब्बत और साथ मिल-जुल कर रहने की बात करता रहा, लेकिन तथाकथित डरे हुए लोगों ने देश का विभाजन कर अपने लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश बना लिया। विभाजन के समय डरे तो वह लोग थे, जिन्होंने लाहौर से आनी वाली ट्रेनों में अपनों की लाशें देखी थीं। डरे तो वह लोग हैं, जो पाकिस्तान और बांग्लादेश से अपनी जान/धर्म/आबरू बचा कर भारत आ रहे हैं। डर क्या होता है, कभी नसीर साहब को इन लोगों के साथ बात करके समझना चाहिए। बहरहाल, यदि नसीर कुछेक घटनाओं को आधार बना कर भयभीत और गुस्से में हैं तो उन्हें ऐसी अनेक घटनाएं याद दिलाई जा सकती हैं, जिनमें मुस्लिमों की भीड़ ने हिंदुओं की हत्याएं की हैं। किंतु, ऐसा करने से नफरत की दीवार ही मजबूत होगी। इसलिए ऐसी बातों से समझदार और प्रभावशाली लोगों को बचना चाहिए। नसीरुद्दीन शाह ने आज एक बहुत बड़ा प्रशंसक वर्ग खो दिया है। वह चाहते तो सकारात्मक संदेश दे सकते थे, लेकिन उन्होंने विक्टिम कार्ड खेल कर एक नकारात्मक बहस को जन्म दे दिया है। उनके बयान की सब ओर निंदा हो रही है।

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