बुधवार, 4 अक्तूबर 2023

‘एकात्मता की प्रतिमा’ से दुनिया में जाएगा अद्वैत एवं हिन्दुत्व का संदेश

ओंकारेश्वर में शङ्करावतरणम्


मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर में सुखदायिनी नर्मदा नदी के किनारे मांधाता पर्वत पर जिस समय संत-महात्मा एवं अन्य महानुभाव वैदिक यज्ञ के बाद आदि शंकराचार्य की प्रतिमा का पूजन करने आगे बढ़ रहे थे, ठीक उसी समय मेघदूतों ने आकर कुछ क्षण के लिए वर्षा की। दृश्य ऐसा था कि मानो स्वयं देवता भी आचार्य शंकर का अभिषेक करने से स्वयं को रोक नहीं पाए....

‘शङ्करावतरणम्’ समारोह के अंतर्गत स्वामी अवधेशानंद जी गिरी महाराज, परमात्मानंद जी, स्वामी स्वरूपानंद जी और स्वामी तीर्थानंद जी महाराज सहित 13 प्रमुख अखाड़ों के प्रतिनिधियों और देशभर से आए हजारों साधु-संतों की उपस्थिति में भाद्रपद, शुक्ल पक्ष षष्टी (21 सितंबर) को संस्कृतिमयी वातावरण में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आदि शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची दिव्य एवं मोहक प्रतिमा का अनावरण किया। समारोह के दौरान ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो मांधाता पर्वत पर स्वर्ग उतर आया है और आचार्य शंकर का एक बार फिर से अवतरण हो रहा है। केरल, आसाम, ओडीसा, राजस्थान, मध्यप्रदेश इत्यादि राज्यों के कलाकारों ने अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से समारोह को अलौकिक स्वरूप प्रदान किया। वेद मंत्रों के उच्चारण ने वातावरण में वैदिक ऊर्जा का संचार किया, जिसे सहज अनुभव किया जा रहा था। सभी संतों एवं महानुभावों ने समवेत स्वर में कहा कि आदि शंकराचार्य की यह प्रतिमा देश-दुनिया में हिन्दू संस्कृति, अद्वैत के सिद्धांत, एकता और शांति के संदेश को पहुँचाएगी।

आदि शंकराचार्य की इस मूर्ति को ‘एकात्मता की प्रतिमा’ और यहाँ विकसित होनेवाले संपूर्ण परिसर को ‘एकात्म धाम’ नाम दिया गया है। प्रतिमा अनावरण के बाद संध्या के समय ओंकारेश्वर के प्रसिद्ध तीर्थस्थल सिद्धवरकूट में ‘ब्रह्मोत्सव’ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एकात्म धाम में 2 हजार 200 करोड़ रूपये की लागत से बननेवाले ‘अद्वैत लोक’ का शिलान्यास किया, जो 2026 तक बनकर पूर्ण हो जाएगा। मांधाता पर्वत पर 11.5 हेक्टेयर भूमि पर आकार ले रहे अद्वैत लोक में आचार्य शंकर के जीवन पर केंद्रित संग्रहालय का निर्माण भी किया जाएगा। इसके साथ ही यहाँ ‘आचार्य शंकर अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान’ की स्थापना भी की जा रही है, जो भारत की ज्ञान-परंपरा के अध्ययन और प्रयास का केंद्र बनेगा। अद्वैत लोक को श्रद्धालुओं और शोधार्थी युवाओं के लिए खास तौर पर तैयार किया जा रहा है। सरकार यहाँ शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए चार शोध केंद्र भी स्थापित करने का विचार कर रही है। ये शोध केंद्र आदि गुरु शंकराचार्य जी के चार शिष्यों के नाम पर रखे गए हैं। जो इस प्रकार हैं- अद्वैत वेदांत आचार्य पद्मपाद केंद्र, आचार्य हस्तमलक अद्वैत विज्ञान केंद्र, आचार्य सुरेश्वर सामाजिक विज्ञान अद्वैत केंद्र, आचार्य तोटक साहित्य अद्वैत केंद्र। 

जूना अखाड़े के अवधेशानंद गिरी महाराज, संघ के वरिष्ठ प्रकारक श्री सुरेश भैय्याजी जोशी, श्री सुरेश सोनी एवं संतों की उपस्थिति में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया ओंकारेश्वर में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य की सबसे बड़ी प्रतिमा का अनावरण एवं अद्वैत लोक का शिलान्यास


ओंकारेश्वर में इसलिए स्थापित की गई प्रतिमा :

ओंकारेश्वर आचार्य शंकर की दीक्षा भूमि है। जब उनकी उम्र केवल 8 वर्ष थी, तब गुरु की खोज उन्हें मध्यप्रदेश में ओंकारेश्वर तक खींच लायी। केरल के कालाड़ी से लगभग 1600 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हुए वे लगभग 1200 वर्ष पहले ओंकारेश्वर आए थे। जिस पर्वत पर यह प्रतिमा स्थापित हुई है, वहीं पर उन्हें गुरु गोविंद भगवद्पाद मिले थे। गुरु से चार वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करके आदि शंकराचार्य भारत को उसके स्व से परिचय कराने एवं एकात्मता के सूत्र में बांधने के लिए निकले। इसलिए सरकार ने निर्णय लिया कि संतों के मार्गदर्शन में ओंकारेश्वर के मान्धाता पर्वत पर आदि शंकारचार्य को समर्पित ‘एकात्म धाम’ विकसित किया जाए। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के साथ आदि शंकराचार्य का गहरा नाता है। माँ नर्मदा की स्तुति में उन्होंने नर्मदाष्टकम जैसी अद्भुत रचना की। आज भी नर्मदा मैया की स्तुति के लिए नर्मदाष्टकम का पाठ किया जाता है।

ओंकारेश्वर में 'एकात्मा की मूर्ति' जगद्गुरु आदि शंकराचार्य की प्रतिमा। Photo: Lokendra Singh

संतों के मार्गदर्शन में शिवराज का संकल्प पूरा :

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 9 फरवरी, 2017 को ओंकारेश्वर में नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान आदि शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा की थी। सरकार के सामने समस्या यह थी कि 12 वर्ष के आचार्य शंकर की प्रतिमा कैसी हो? उस अवस्था में वे कैसे दिखते होंगे? दरअसल, आचार्य शंकर का बाल स्वरूप का कोई चित्र उपलब्ध नहीं है। उनका जो चित्र आमतौर पर हमें देखने को मिलता है, उसे महान चित्रकार राजा रवि वर्मा ने बनाया था। सरकार ने संतों एवं विद्वानों के साथ लंबा विमर्श करके प्रतिमा का स्वरूप, उसका रंग एवं वस्त्र इत्यादि की विस्तृत चर्चा की। यहाँ तक विचार किया गया कि गले में पहनी रुद्राक्ष की माला के कितने रुद्राक्ष वस्त्र के ऊपर दिखेंगे और वस्त्र की सलवटें कितनी और कैसी होंगी। बाल स्वरूप के आदि शंकराचार्य का चित्र तैयार करने की जिम्मेदारी प्रसिद्ध चित्रकार वासुदेव कामत को दी गई। उन्होंने वेदों एवं संतों के मार्गदर्शन में बालक शंकर का भावपूर्ण चित्र तैयार किया। इसी चित्र के आधार पर प्रख्यात मूर्तिकार भगवान रामपुरे ने अथक परिश्रम से प्रतिमा को आकार दिया। 

आदि शंकराचार्य की भाँति उनकी प्रतिमा ने भी समाज को किया एक :

जब हम आदि शंकराचार्य का जीवन देखते हैं तो सामने आता है कि उन्होंने अद्वैत का प्रचार-प्रसार कर समाज को जोड़ने का कार्य किया। देशभर में भ्रमण के दौरान उन्होंने समाज को एकजुट किया और उन्हें हिन्दू धर्म का ज्ञान कराया। समाज को बताया कि हम सब एक ही ब्रह्म के अंश हैं। सब एक समान हैं। आदि शंकराचार्य की इस प्रतिमा के निर्माण में समाज का सहयोग रहे, इसके लिए वर्ष 2017-18 मध्यप्रदेश के लगभग 23 हजार पंचायतों में गाँव-गाँव तक एकात्म यात्राएं निकाली गईं। जनजागरण एवं धातु संग्रहण के उद्देश्य से निकाली इन यात्राओं में समाज के हर वर्ग से धातु एकत्रित की गई। इसके बाद यात्रा में जो धातुएं प्राप्त हुईं, उनका उपयोग आदि शंकराचार्य की अष्टधातु की प्रतिमा के निर्माण में उपयोग किया गया।

विश्व को शांति और एकता का संदेश देगी प्रतिमा: मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि आदिगुरु शंकराचार्य की ‘एकात्मता की प्रतिमा’ विश्व को शांति और एकता का संदेश देगी। भगवान राम ने भारत को उत्तर से दक्षिण तक जोड़ा, भगवान कृष्ण ने भारत को पूर्व से पश्चिम तक जोड़ा लेकिन आदि शंकराचार्य ने भारत को पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों तरफ से जोड़ा। आचार्य शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के सिद्धांत का प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने कहा कि दुनिया में जितने भी द्वंद और वाद-विवाद हैं उन सभी का समाधान अद्वैत वेदांत में ही है। युद्ध नहीं शांति, संघर्ष नहीं समन्वय, घृणा नहीं प्रेम का संदेश, सिर्फ अद्वैत वेदांत ही दे सकता है। अद्वैत वेदांत की यात्रा भेद-अभेद यात्रा है। अपना भारत विश्व कल्याण की मंगल कामना करने वाला देश है। मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश में परिव्रजन योजना पर कार्य किया जाएगा। इसके तहत सेवा कार्य के पवित्र उद्देश्य से प्रवास और अन्य स्थान पर समाज के उपयोगी प्रकल्प अपनाने के लिये नागरिकों के साथ ही संत समाज को भी जोड़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि विकासखण्ड का चयन कर युवाओं के माध्यम से अद्वैत के सिद्धान्त का प्रचार किया जाएगा। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास ने शिविरों के माध्यम से युवाओं को एकात्मता और मानव-कल्याण के विचार से जोड़ा है। 

गुरु देने वाली धरा है मध्यप्रदेश : स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज

जूना पीठाधीश्वर के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद जी महाराज ने कहा कि देश का हृदय प्रदेश गुरु देनेवाली धरा भी है। शंकराचार्य जी को मध्यप्रदेश में आगमन पर गुरु गोविंद पाद मिले और मध्यप्रदेश की धरती से जगतगुरु भी मिले। मुख्यमंत्री श्री चौहान को जगतगुरु ने ही इस कार्य के लिये चयनित किया। ओंकारेश्वर में शंकराचार्य की प्रतिमा की स्थापना और अद्वैत धाम की पहल मानवीय नहीं बल्कि ईश्वरीय या दैवीय संकल्प है। मुख्यमंत्री श्री चौहान अच्छे शासक, प्रशासक होने के साथ ही उच्च कोटि के उपासक भी है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में शंकरदूत भी बनाये जा रहे हैं। अद्धैत दर्शन के संदेश को समाज तक पहुँचाने वाले युवा-उत्प्रेरक और प्रचारक शिविरों के माध्यम से तैयार किये जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि प्रतिमा अनावरण समारोह की बहुत सारी व्यवस्थाएं इन शंकरदूतों ने ही संभाल रखी थीं।

दीर्घकाल के बाद ‘स्व’ को अभिव्यक्त कर रहा है भारत : सुरेश सोनी जी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं वरिष्ठ विचारक श्री सुरेश सोनी ने कहा कि झंझावातों के बाद भी भारत आगे बढ़ रहा है। दीर्घकाल के बाद भारत ‘स्व’ को अभिव्यक्त कर रहा है। भारत की सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक परम्परा के प्रति स्थानों का विकास हो रहा है। केदारनाथ, अयोध्या, काशी और उज्जैन में महाकाल लोक से राष्ट्रवासियों का ध्यान आकर्षित हुआ है। नागरिकों की आशा और आंकाक्षा है कि देश एक हो, अद्वैत का सिद्धान्त प्रचारित करने के प्रयास सराहनीय हैं। मुख्यमंत्री श्री चौहान इसके लिये साधुवाद के पात्र हैं। ओंकारेश्वर की भौतिक प्रतिमा लोगों के आध्यात्मिक मानस तक पहुँचेगी। संतों की तपस्या और सिद्धान्त हमारे व्यवहार में व्यक्त होंगे, इसके चिन्ह दिखाई दे रहे हैं। आज अद्वैत के विचार को जीवन में उतारने की आवश्यकता है। ओंकारेश्वर का प्रकल्प एक गंगोत्री के समान है जो जल की धारा को बढ़ाते हुए महासागर के रूप में सामने आयेगा। संतों की प्रेरणा और आशीर्वाद मिल जाने से यह साकार होगा। ब्रह्मोत्सव जी-20 के सन्दर्भ में एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य के विचार को भी बल मिला है।

ब्रह्मोत्सव में साधु, संतों और अखाड़ों के प्रमुखों ने की एकात्म धाम प्रकल्प की प्रशंसा :

ब्रह्मोत्सव में 13 प्रमुख अखाड़ों के प्रतिनिधि और देश के विभिन्न सम्प्रदायों के प्रतिनिधि भी उपस्थित हुए। गुरू मॉ आनंदमूर्ति जी के साथ ही पद्मश्री श्री वी.आर. गौरीशंकर भी पधारे। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक अनेक प्रान्तों के प्रतिनिधि आये। विभिन्न पीठों के जगद्गुरु शंकराचार्य ने भी लाइव संदेश के माध्यम से एकात्म धाम के लिये शुभकामना संदेश दिये। इस अवसर पर श्रृंगेरी श्री शारदा पीठ के पूज्य जगद्गुरु श्री श्री श्री विधुशेखर भारती जी महाराज, द्वारिका शारदा पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य सदानंद सरस्वती जी महाराज, कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य विजयेंद्र सरस्वती जी महाराज, अखंड परमधाम हरिद्वार के प्रमुख परमानंद गिरी जी महाराज सहित कई संतों ने अपने आशीर्वचन दिए। अंत में संस्कृति मंत्री श्रीमती उषा ठाकुर ने अध्यात्म के इस कार्यक्रम में संतों के पहुँचने और नागरिकों के शामिल होने पर सभी का आभार माना।

मध्यप्रदेश में नर्मदा के तीरे इस धाम में भगवान ओंकारेश्वर पर्वत पर भागवतपाद जगतगुरु की भव्य और दिव्य प्रतिमा स्थापित करने का प्रकल्प अद्भुत है। आज यहाँ दक्षिण भारत से भी अनेक संत पधारे हैं। आदि शंकराचार्य जी आज भारत के सांस्कृतिक स्वरूप का मेरुदंड बने हैं। हमारी संस्कृति इस तरह विकसित नहीं होती यदि शंकराचार्य जी नहीं आते। - स्वामी श्री अवधेशानंद गिरि महाराज, महामंडलेश्वर, जूना पीठाधीश्वर 

आज का दिन सिर्फ भारतीयों के लिये नहीं सम्पूर्ण विश्व के लिये महत्वपूर्ण है। युवाओं द्वारा वेदांत का प्रचार हो रहा है, आज मनुष्य छोटी-छोटी बातों में फँसा हुआ है। इन छोटी बातों को जड़ से उखाड़ फेंकना है अर्थात इन्हें समाप्त कर एकता और वेदांत के विचार को प्रचारित करना होगा। - श्री परमानंद गिरि जी महाराज, हरिद्वार

आदि गुरु शंकराचार्य की भव्य मूर्ति बन जाने से श्रद्धालुओं को परम सुख की अनुभूति मिलेगी। अद्वैत के सिद्धान्त अनंत हैं। इन सिद्धान्तों ने समाज के विभिन्न लोगों को जोड़ा है। - जगद्गुरू शंकराचार्य श्री विधुशेखर भारती महास्वामी, शारदा पीठ, श्रृंगेरी

यह अवसर बहुत शुभ है। एक दौर में वेद ग्रन्थों के प्रमाण मांगे जाने लगे थे। आचार्य शंकर ने अपने धार्मिक सूत्रों से उनका खण्डन किया। आचार्य मानते थे कि प्रत्येक प्राणी में परमात्मा का अंश है। - जगद्गुरु शंकराचार्य श्री सदानंद सरस्वती, शारदापीठ द्वारिका

वेदों का सार है विश्व-कल्याण। आज इस विचार को सारा विश्व मान रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने महाकाल धार्मिक क्षेत्र का भी विस्तार किया है। अद्वैत के सिद्धान्तों से देश का विकास होगा और भारत जल्द विश्व गुरु बन सकेगा। - जगद्गुरू शंकराचार्य  स्वामी विजयेन्द्र सरस्वती, कांची कामकोटि पीठ, कांचीपुरम


आचार्य शंकर फिल्म का निर्माण होगा : 

ब्रह्मोत्सव में न्यास द्वारा फिल्म ‘शंकर’ के निर्माण की घोषणा भी की गई। विख्यात फिल्म निर्देशक आशुतोष गोवारिकर आचार्य शंकर को समर्पित फिल्म का निर्देशन करेंगे। आशुतोष गोवारिकर ने इस संबंध में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (ट्वीटर) से पोस्ट किया है- “मैं बहुत सम्मानित अनुभव कर रहा हूँ कि आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास के सहयोग से बननेवाली फिल्म ‘शंकर’ के माध्यम से आदि शंकराचार्य के जीवन एवं ज्ञान को सामने लाने का अवसर मुझे मिला है”। 

कर्नाटक के श्रृंगेरी मठ से आई 112 फीट की रुद्राक्ष माला :

श्रृंगेरी शारदा पीठ से आदिगुरु शंकराचार्य के लिए 112 फीट की माला लाई गई। पीठ से आए प्रतिनिधि मंडल ने 10 हजार रुद्राक्ष से बनी यह माला मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सौंपी। माला के सभी रुद्राक्ष पांचमुखी हैं। मठ की ओर से चरण पादुकाएं भी भेजी जाएंगी।

श्रृंगेरी शारदा पीठ ने आदिगुरु शंकराचार्य को समर्पित की 112 फीट की पांचमुखी रुद्राक्ष की माला। Photo: Lokendra Singh


एकात्मता की मूर्ति की विशेषताएं :

  • एकात्म धाम में स्थापित आचार्य शंकर की प्रतिमा का नाम एकात्मता की मूर्ति (स्टैच्यू ऑफ वननेस) है।
  • 108 फीट की अष्टधातु मूर्ति आचार्य शंकर के बाल रूप 12 वर्ष की आयु की है।
  • मूर्ति के आधार में 75 फीट का पैडेस्टल है।
  • यह मूर्ति पाषाण निर्मित 16 फीट के कमल पर स्थापित है।
  • मूर्तिकार श्री भगवान रामपुरे एवं चित्रकार श्री वासुदेव कामत के मार्गदर्शन में मूर्ति का निर्माण किया गया है।
  • प्रतिमा में 88 प्रतिशत कॉपर, 4 प्रतिशत जिंक, 8 प्रतिशत टिन का उपयोग किया गया है। प्रतिमा 100 टन वजनी है।
  • कुल 290 पैनल से यह मूर्ति निर्मित की गई है।
  • समग्र अधोसंरचना के निर्माण में उच्च गुणवत्ता के 250 टन के स्टेनलेस स्टील का उपयोग किया गया है।
  • कंक्रीट के पैडस्टल की डिजाइन 500 वर्ष तक की समयावधि को ध्यान में रखकर की गई है।

(पाञ्चजन्य और पाथेय कण के लिए आवरण कथा/कवर स्टोरी- लोकेन्द्र सिंह एवं सौरभ तामेश्वरी)


शङ्करावतरणम् की झलकियां :

जब चढ़ा शंकर की भक्ति का रंग। इन महात्मा को देखकर आपका हृदय आनंद से भर उठेगा। क्या खूब नाचे... जय जय शंकर, हर हर शंकर



‘एकात्मता की मूर्ति’ एक भारत–श्रेष्ठ भारत का संदेश दे रही है। आचार्य शंकर के स्वागत में भारत की संस्कृति के विविध रंग एकात्म भाव के साथ दिखाई दिए। 

ओंकारेश्वर में इतिहास बनते देखा है।

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